कुछ पत्रकार तो छापे से ख़ुश हैं!

सुधांशु द्विवेदी-

भास्कर पर छापे का तहेदिल से स्वागत। टैक्स चोर भास्कर घराना मीडिया कर्मियों का बहुत बड़ा शोषक रहा है। जब मालिकान पर कुछ होता है तो पत्रकारिता पर हमला बताया जाने लगता है। जो कि नितांत गलत व भ्रामक है।

पत्रकारिता पर असली हमला तो तब होता है जब मालिकान अपने मीडिया कर्मियों को कम वेतन, जरा सी आवाज उठाने पर बाहर का रास्ता दिखाने या सामूहिक छटनी से होता है।
सरकार से अपने काम निकालने के लिए पत्रकारों का इस्तेमाल करना, खिलाफ या पक्ष में खबरे लिखवाना इनकी ट्रिक है।

इनकी संपत्ति में वृद्धि बुलेट ट्रेन की स्पीड की तरह होती रहती है पर कर्मचारियों को देने के लिए ये कुंडली मारकर बैठ जाते हैं। तय वेतन को आधा या चौथाई करने के लिए भी भास्कर बदनाम रहा है। अतएव ऐसे शोषक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए। इस समूह का हरसाल आडिट होना चाहिए।


विजय शर्मा-

जो पत्रकार-गैर पत्रकार मजीठिया वेजबोर्ड का लाभ न मिलने पर अपने मालिकों के खिलाफ कोर्ट में लड़ रहे हैं वो ही भास्कर पर छापे का विरोध कर रहे हैं। कमाल है। खुद के अखबार का मालिक चोर और दूसरे अखबार का मालिक साहूकार… ये कैसे?

एक अखबार पर टैक्स चोरी के मामले में मारे गए छापे पर कुछ पत्रकार लोग नाराज हैं। क्यों? क्या ये मीडिया मालिक भ्र्ष्टाचार में लिप्त नहीं है?

क्या ये वास्तविक सर्कुलेशन से कई गुना ज्यादा सर्कुलेशन दिखा कर सरकार से ऊंची दरों पर विज्ञापन नहीं लेते? क्या ये मीडिया मालिक इस देश का कानून मानते हैं?

क्या ये मीडिया मालिक पत्रकारों और गैर पत्रकारों को मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतन दे रहे हैं? क्या इन मीडिया मालिकों ने अपने हक के लिए लड़ रहे कर्मचारियों को नौकरी से नहीं निकाला?

इनकम टैक्स विभाग द्वारा मारे गए छापे का विरोध करने वाले पत्रकारों के पास यदि मेरे सवालों के जवाब हों तो अवश्य दें


राहुल चौकसे-

पत्रकारिता की आड़ में कारोबार करने पर आय व सम्पत्ति स्वतः संदिग्ध हो जाती है। अख़बार पूरे कारोबार का एक उपक्रम मात्र है। अगर दामन पाक-साफ है तो जांच में सहयोग देना ही चाहिए कारोबारी को। इसमें समूह की परतें उधड़ने से बचाने के लिए पत्रकारिता को ढाल बनाना पूरी तरह गलत है।


हर्ष कुमार-

दैनिकभास्कर पर आईटी रेड… दैनिक भास्कर पर पड़ रहे आयकर छापों की राजनीतिक लिहाज़ से आलोचना की जा रही लेकिन मीडियाकर्मियों को तो इस पर खुश ही होना चाहिए।

जिन लोगों ने इस संस्थान में काम किया हुआ है वह जानते हैं कि यह कितना कमीना संस्थान है।इस संस्थान की पॉलिसी रही है कि आपको ज्वाइनिंग के समय जो सैलरी बतायी जाएगी वो कभी नहीं दी जाएगी।

हमेशा धोखाधड़ी का माहौल रहता है। जनवरी 2008 में दैनिक भास्कर के तत्कालीन ग्रुप एडिटर श्रवण कुमार गर्ग ने INS नई दिल्ली में मेरा इंटरव्यू लिया और मुझे चंडीगढ़ में स्पोर्ट्स एडिटर की पोस्ट ऑफ़र की।

लेकिन उनकी शर्त यह थी कि मुझे सपरिवार चंडीगढ़ में शिफ़्ट होना होगा।मैंने कहा ऐसा क्यों? तो उनका कहना था कि अगर ऐसा नहीं होगा तो फिर आप हर शनिवार को रविवार को छुट्टी मांगोगे। घर जाओगे, कभी बच्चा बीमार पड़ जाएगा, कभी माता जी की तबियत ख़राब हो जाएगी आदि।

मैंने उनसे कहा कि सर इंसान परिवार के लिए ही नौकरी करता है और अगर उसके लिए ही समय नहीं मिलेगा तो फिर इस नौकरी की क्या ज़रूरत है? श्रवण गर्ग ने कहा कि नहीं तुम सोच लो भाई और सोच समझकर ही फ़ैसला लेना।

इंटरव्यू में मौजूद रहे उस समय के संपादक HR सुदेश गोड ने भी कहा कि एकदम फ़ैसला मत करो थोड़ा सोच समझकर बता देना।कोटा के संपादक अवनीश भी वहीं इंटरव्यू के समय बैठे थे और मेरे सीधे जवाब पर हतप्रभ थे।

अंत में मैंने कहा-सर ऐसी नौकरी का क्या फ़ायदा है जो परिवार के रास्ते में बाधा बने और इनकार करके वहां से चला आया। ये कमीने संस्थान हैं और इनका समय समय पर इलाज होना ज़रूरी है।राजनीतिक लिहाज़ से हो सकता है कि सरकार ने ग़लत किया हो लेकिन भास्कर में काम करने वाले लोग सब ख़ुश होंगे।


एलएन शीतल-

मीडिया कोई पवित्र गाय नहीं, जिसे ‘रक्षाकवच’ हासिल है!

देश के सबसे बड़े मीडिया हाउस – ‘भास्कर समूह’ पर IT और ED की छापेमारी को मीडिया पर हमला बताया जा रहा है. कहा जा रहा है कि सरकार ने भास्कर ग्रुप के सत्ताविरोधी तेवरों से चिढ़कर उसे सबक सिखाने और अन्य अख़बारों/चैनलों को डराने के लिए यह कार्रवाई की है.

ऐसा कहने वालों को मालूम होना चाहिए कि कोई भी अख़बार या न्यूज़ चैनल ऐसी कोई ‘पवित्र गइया’ बिल्कुल नहीं, जिसे रक्षा-कवच प्राप्त है.

कौन नहीं जानता कि विभिन्न अख़बार और चैनल बैनर की आड़ में तमाम तरह के धन्धे करते हैं और अपने उन धन्धों से जुड़ी अवैध गतिविधियों की अनदेखी करने के लिए सरकारों पर अड़ी-तड़ी डालने में कोई कसर बाकी नहीं रखते. भास्कर सिरमौर है इनमें. अख़बार के नाम पर सरकारों औने-पौने दामों में ज़मीनें हथियाना और फिर फिर उन ज़मीनों का मनमाना इस्तेमाल करना विशेषाधिकार है इनका. बिल्डरों के साथ मिलकर फ्लैट-डुप्लेक्स बनवाने-बिकवाने और व्यापारियों से मिलकर उनके उत्पादों को बढ़ाने के लिए अपने पाठकों को उकसाने का धत्कर्म करने में सबसे तेज गति वाला है समूह!

मीडिया भी एक इंडस्ट्री है. तो फिर किसी अन्य इंडस्ट्री की तरह उस पर भी छापे क्यों नहीं पड़ सकते? लेकिन छापे पड़ते ही कुछ लोग चीखना शुरू कर देते हैं कि बदले की कार्रवाई हो रही है. कोई मीडिया हाउस, जो ’92 में 100 करोड़ का भी नहीं था, वह ’21आते-आते हज़ारों करोड़ का कैसे हो गया, यह किसी से छिपा नहीं है. इसे समझने के लिए ज़्यादा ज्ञान की ज़रूरत नहीं है.


अपूर्व भारद्वाज-

सुबह से अपने आप को पत्रकारिता का हरिश्चन्द्र बताकर विक्टिम कार्ड खेल रहे दैनिक भास्कर से एक प्रतिशत भी सहानुभूति नही है. प्रेस की आजादी की बहसबाज़ी से दूर सच सिर्फ इतना है कि मीडियापहले भी व्यापारी चलाते थे. अब भी व्यापारी चला रहे हैं. जिस किसी को भी मुगालता हो वो दूर कर ले. हिंदी पट्टी का कोई भी अखबार जनसरोकार की पत्रकारिता नही कर रहा है . मीडिया कारपोरेट स्टायल से ही चल रहा है…

थोड़ा मेमोरी रिफ़्रेश कीजिए…2015 की मन की बात देखिये मोदी जी खुद भास्कर का तारीफ करके खबरो को पॉजिटिव और नेगेटिव में बॉटने का खेल रचे थे. आज भी भास्कर मंडे को नो नेगेटिव न्यूज देता है . मोदी ने खबरों का एजेंडा और हेडलाइन मैनेजमेंट करने की शुरुआत वंही से की थी औऱ इस सब मे भास्कर उनका ब्रांड एम्बेसडर था

बिल्कुल व्हाइट और ब्लैक जैसा फेक्ट है भास्कर के मीडिया के अलावा कितने व्यापार है …वो किसी से छुपा है क्या?? मामूली अखबार से शुरू हुआ कारोबार अरबो के व्यापार तक पहुँच गया है और बड़े बड़े लोग इन्हें सत्य का हस्ताक्षर कह रहे है तो मुझे क्या किसी को भी उनकी बुद्धि पर तरस आएगा.

आप इन पर पड़ रहे छापे पर भोकाल मचा रहे है तो भैया सुन लो यह बड़े लोग है यह सब जगह से निकल जायँगे क्योंकि उन्हें पता है कि देश और नेता कैसे चलते हैं.इनके मुँह से मीडिया की आज़ादी बात तब बकवास लगती है जब यह सारे अखबार सरकार की गोद मे बैठकर सब्सिडी पर जमीन ले लेते है टाइम्स ऑफ इंडिया से लेकर इंडियन एक्सप्रेस तक को पत्रकारिता के नाम पर मात्र एक रूपए में जगह दी गई है जिस पर करोडों का किराया वसूल रहे हैं तो यह नैतिकता की बातें न करे तो बेहतर है

मीडिया आज राजनीतिक दलाली और सरकारी ठेकों की लाइजनिंग की उपजाऊ जमीन है मालिकों को राज्यसभा जाना है या अपने वाले नेताओं को मन माफिक मंत्रालय देना है संबके पास सरकार के राज है जिसका इस्तेमाल सच्चाई को दबाने के लिए किया जाता है

सरकार के डर से आप अपने पत्रकार को निकाल देते हैं……खुद करोड़ो कमा रहे है फिर भी पत्रकारों की तनख्वाह नही बढ़ा रहे है, महामारी के काल मे भी लोगो की नौकरी ले रहे है. सेठ जी आप अपने पत्रकारो के नही हो सकते तो ….फिर आप पत्रकारिता के क्या होंगे।

केवल नाम मे भास्कर लिखने से कोई सूरज के समान सच्चा और तेज नही हो जाता, सच्चाई नैतिकता से आती है और आज की मीडिया में नैतिकता नाम की कोई चिड़िया नही है. पूरे कुँए ने भांग घुली हुई है और यही अंतिम सत्य है.


नवनीत चतुर्वेदी-

बतौर एक पत्रकार व लेखक मैं हर पीड़ित पत्रकार व आम आदमी के पक्ष में खड़ा था ,हूं और आगे भी रहूंगा। राजनीति की यह नई पारी शुरू ही इसलिए की है कि इन सिद्धांतों की लड़ाई और मजबूती से लड़ी जा सके।

लेकिन मैं मीडिया घरानों के साथ बिल्कुल नहीं हूं, न तो दैनिक भास्कर के और न भारत समाचार के।

दैनिक भास्कर कोई क्रांति नही कर रहा है, अब तक दलाली ही करता आया है, और आज भी वही कर रहा है ,मैं यह तर्क स्वीकार नही कर सकता कि सुबह का भुला हुआ भास्कर शाम को घर आ गया है इसलिए पुराने कुकर्म माफ कर दो।

हमारे देश के संविधान में किसी भी कुकर्म की कोई माफी नही है, हर पाप अपराध की सजा मुकर्रर की गई हैं।

भारत समाचार में किसका पैसा लगा है सब जानते है कि वो एक राजनीतिक दल का अघोषित चैनल है, इसलिए बदले की कार्यवाही है, चुनावी मौसम है अतः सब जायज है भाजपा के राज में।

भास्कर के कुकर्मो का पिटारा उसके ही कर्मचारियों से पूछा जा सकता है। उनके पास मेरे से भी बड़ी लिस्ट होगी।

भास्कर और भारत समाचार दोनों विशुद्ध व्यापारी है, भास्कर बड़ा हाथी है, उसकी तुलना में भारत समाचार के कुकर्म बहुत मामूली है, दोनों की एक तराजू पर तुलना सही नही है।

यदि आप के मन मे पत्रकारिता को जिंदा रखने का इतना ही जोश उबल रहा है तो स्वतंत्र पत्रकारों ,वेब पोर्टल्स, यूट्यूब चैनल वालो को दीजिये, 5 रुपये का एक अखबार मने महीने का 150/- उनको दीजिए, बूंद बूंद से घड़ा भरता है, ये लोग न तो एजेंडा चलाएंगे न फेक न्यूज़ देंगे।


उमेश चतुर्वेदी-

दैनिक भास्कर के संस्थापक सेठ द्वारका प्रसाद अग्रवाल को पुलिस ने टाट-पट्टी घोटाले में गिरफ्तार किया था। जाहिर है, तब भी केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकारें थीं।

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Comments on “कुछ पत्रकार तो छापे से ख़ुश हैं!

  • बिहार (मुजफ्फरपुर यूनिट) में अनुमंडल एवं प्रखंड के स्ट्रींगरों को प्रति माह 1000 रूपये की पारिश्रमिक दे रहा है, दैनिक भास्कर!

    इसी को कहते हैं,

    नाम बड़े और दर्शन छोटे!

    Reply
  • Ramesh kumar says:

    अगर आप सही हैं तो छापा से क्यों डर। जांच होने दीजिए। आप भी किसी के खिलाफ खबर लिखते हैं और वह निर्दोष रहता है तो क्या उसकी भरपाई करते हैं? सुबह से बेफजूल का फूहड़ स्लोगन चला रहा यह अखबार। मीडिया की आड़ लेकर गलत काम से पैसा कमाना ही तो धंधा है। अपने कितने पत्रकारों को मजीठिया वेतनमान देता है यह तो बताए। चले छापा को गलत कहने।

    Reply

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