चीफ रिपोर्टर के नाम पत्र : आपको सिर्फ पुरुषों से प्राब्लम क्यों है?

आदरणीय चीफ रिपोर्टर जी
सन्मार्ग
कोलकाता

आपको प्रणाम।

मुझे तो पहचान ही गये होंगे आप। मैंने 3-4 साल आपके अधीन काम किया था लेकिन आपके रवैये के कारण मुझे सन्मार्ग छोड़कर कम तनख्वाह पर दूसरे अखबार में नौकरी करनी पड़ी। उस वक्त आप चीफ रिपोर्टर ही थे। अभी किस पद पर हैं पता नहीं इसलिए चीफ रिपोर्टर ही संबोधित कर रहा हूँ। मैंने पहले तय किया था कि सन्मार्ग को पत्र लिखूंगा और लिख भी चुका था लेकिन पिछली रात जब अपने पुराने दिन याद कर रहा था तो मुझे खयाल आया कि क्यों न सीधे आपको ही पत्र लिखूं इसलिए सन्मार्ग को लिखे पत्र को अपने लैपटॉप से डिलीट किया और फिर आपको पत्र लिखा।

आपके लिए मेरे पास कई सवाल हैं। गुस्सा भी है और नसीहत भी। आप ठहरे हमारे एक्स बॉस सो आप हम जैसों की नसीहत तो लेंगे नहीं। मत लीजिये लेकिन सवाल पूछने का अधिकार तो मुझे है और मैं पूछूंगा। सबसे पहले तो मैं आपसे यही पूछना चाहता हूँ कि आपको पुरुषों से नफरत क्यों है? दिवंगत लेखक राजेंद्र यादव ने ही शायद अपने उपन्यास ‘सारा आकाश’ में लिखा था कि नारी ही नारी की कष्टों का कारण है लेकिन यह किसने लिखा था कि पुरुष ही पुरुष के कष्टों का कारण है, मुझे नहीं पता। आपको पता हो तो जरूर बताइये।

महिलाएँ पुरुषों से नफरत करें यह भी समझ में आता है लेकिन मेरे पल्ले यह बात नहीं पड़ रही है कि आपको केवल और केवल पुरुषों से ही नफरत क्यों है? सन्मार्ग से पहले आप जहाँ काम करते थे, वहाँ क्या किसी पुरुष ने आपको सताया था? उसी का खुन्नस निकालते हैं? अगर ऐसा है तो हम जैसे दर्जनों कलमघसीट जो आप द्वारा प्रताड़ित किये जाने के कारण सन्मार्ग छोड़ चुके हैं, आप की ही राह पर चल दें? अगर ऐसा होगा तो आप कल्पना कर सकते हैं कि मीडिया हाउस के दफ्तरों का स्वरूप क्या होगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप हीनता के शिकार हैं इसलिये पुरुषों के साथ ऐसा करते हैं?

सन्मार्ग के बारे में बाहर में चर्चा है कि यह हाउस महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देता है। आपको भी पता है कि ऐसा क्यों कहा जा रहा है। आपके कान तक भी ये बातें पहुँचती होंगी। कभी आपने इस पर विचार किया है कि ऐसा क्यों कहा जाता है। महिला सशक्तीकरण अच्छी बात है। अब तो महिलाओं को हर क्षेत्र में आरक्षण मिल गया है लेकिन आप पुरुषों की जलालत की शर्त पर महिला सशक्तीकरण क्यों कर रहे हैं?

महिलाओं और पुरुषों की प्रतिभा को मापने के लिए आपने अलग-अलग बैरोमीटर क्यों रखा है? जो सिरदर्द होने पर आपके माथे पर अमृतांजन मल दे, बुखार होने पर फफकते हुए दवाई दुकान में जाये और दवाई खरीदकर ला दे, कमजोरी महसूस होने पर गर्म दूध में हॉरलिक्स घोरकर पीने को दे, सुबह-सुबह फोन कर आपकी तबीयत के बारे में पूछे वे महिलाएं आपकी नजर में बहुत अच्छी पत्रकार हो जाती हैं। आपने नहाया कि नहीं यह जो पूछ लेती है उसे एक्स्ट्रा प्वाइंट्स मिल जाते हैं। आधी रात को अखबार का काम निपटाकर महिला पत्रकारों को आप फोन करते हैं। जो तुरंत फोन उठा लें और कम से कम आधे घंटे तक बेमतलब की बातें करें वे अच्छी पत्रकार का तमगा पा जाती हैं और जो फोन नहीं उठातीं, कल को उनकी क्लास लगती है। क्लास लिये जाने के बाद भी नहीं सुधरने वाली महिला पत्रकारों को कोपभाजन बनना पड़ता है।

जब अखबार की छपाई शुरू हो जाती है तब ऐसा कौन-सा जरूरी काम होता होगा जिसके लिए आप इन लड़कियों को फोन करते हैं? क्या आपको पता है कि निम्नमध्यवर्गीय परिवार की लड़कियों को जब आधी रात के बाद फोन आते हैं और उन्हें न चाहते हुए भी कम से कम आधे घंटे तक हंसकर-मुस्कराकर बतियाना पड़ता है तो उसके पिता-माँ-भाई उससे क्या-क्या सवाल पूछते होंगे? या छुट्टी के दिन भी फोन कर एक-एक घंटे तक ऊलजुलूल बातें करते होंगे तो उनके साथ छुट्टी बिता रहे उनके परिजन क्या सोचते होंगे? ये मेरी जिज्ञासाएँ हैं। मैं बस जानना चाहता हूँ कि ये सब करते हुए आपके जेहन कभी इस तरह के सवाल आये की नहीं। मुझे उम्मीद है कि आप नाराज नहीं होंगे बल्कि इस पर विचारेंगे क्योंकि ये गंभीर मसला है। आपके चलते बाहर गलत संदेश जा रहा है।

3-4 वर्ष आपके अंडर में काम करके मैंने यही महसूस किया कि आपको पुरुष पत्रकार ऐसे चाहिए जो लिख भी लेता हो और साथ ही उनके शरीर की संरचना भी अलग हो। संरचना अलग होने को आप कुछ और मत समझिये। संरचना अलग से मेरा आशय है आपको ऐसे पुरुष पत्रकार चाहिए जिनकी रीढ़ की हड्डी बेहद लचीली हो और उनके कान में फिल्टर लगे हों। इसके अपने फायदे हैं। रीढ़ की हड्डी लचीली होने से वे तुरंत झुक जायेंगे और कान  में फिल्टर लगे होने के कारण आपके मुंह से निकलने वाले गुड़ जैसे मीठे बोल छनकर उनके कान तक पहुँचेंगे ताकि उन्हें शूगर का खतरा न रहे। उदाहरण के तौर पर अगर आप पुरुष पत्रकार से कहें कि तुम नाली के कीड़े हो तो उन्हें सुनाई पड़े कि तुम बहुत मेधावी हो। अब इतने मीठे बोल बोलेंगे आप तो पुरुष पत्रकार कहाँ से पचा पायेंगे, इसलिए उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ती है। जिनके कान में फिल्टर लगा होगा उन्हें भी यह मीठा ही लगता होगा। हाँ, जो आपके मीठे बोल सुनकर घर जाते होंगे और वहाँ नीम के पत्ते चबाते होंगे, वही लोग लम्बे समय तक आपके साथ काम कर पाते होंगे।

वैसे महिलाओं के चयन के आपके जो नियम हैं उनमें वे लड़कियाँ भी पिस जाती हैं जो सचमुच में पत्रकारिता ही करना चाहती हैं। कारण कि आप इन लड़कियों से भी वैसी ही उम्मीद पाल लेते हैं लेकिन जब वे आपकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरती हैं तो उनके साथ भी वैसा ही सुलूक होता है जो पुरुष पत्रकारों के साथ किया जाता है। आप चाहते हैं कि लड़कियाँ शादी भी अगर करे तो आपसे पूछकर, ये क्या बात हुई? आप इन लड़कियों क्या लगते हैं कि आपसे पूछकर ये शादी करेंगी।

खैर…छोडिये इन बातों को। आपके साथ काम करके मुझे एक नई चीज सीखने को मिली कि महिला पत्रकार का प्रमोशन होता है तो वे अनौपचारिक पर्सनल सेक्रेटरी बन जाती हैं। तब पर्सनल सेक्रेटरी का काम होता है आपका फोन उठाना, टिफिन खोलकर खाने को देना, सर का टेबुल साफ कर सामानों को सजाकर रखना, आप आपिस में आयें तो नीचे उतरकर आपका बैग उठा लाना आदि। मुझे लगता था कि रिपोर्टर का प्रमोशन सीनियर रिपोर्टर, फिर विशेष संवाददाता, फिर चीफ रिपोर्टर वगैरह-वगैरह होता होगा लेकिन अब जाना कि पर्नसल सेक्रटरी भी एक सीनियर पोस्ट होता है महिला पत्रकारों के लिए। यह अच्छा है। मुझे लगता है कि आप पत्रकारिता के क्षेत्र में कुछ नया कर रहे हैं जिसे आने वाली कई पीढ़ियाँ याद रखेंगी। 

आप जिस पद्धति से कर्मचारियों का चयन करते हैं, वह गजब है। निजी कंपनियों को आपसे सीखना चाहिए। चयन के लिए जो परीक्षा आप लेते हैं उसमें जितना अधिक गलत लिखा जाता है मार्क्स उतने अधिक मिलते हैं क्योंकि आपके पास मोलभाव करने का विकल्प रहता है गोया आपको रिपोर्टर नहीं बैगन, गोभी और आलू चाहिए। आप लड़कियों और लड़कों को यह कह पाते हैं कि भई आपकी हिन्दी बहुत खराब है, हम आपको सिखायेंगे इसलिए पैसे कम देंगे। मेरी सलाह मानिये तो आप किसी निजी कंपनी में मानव संसाधन प्रबंधक बन जाइये। आप अपनी प्रतिभा से कंपनी को फर्श से अर्श पर पहुँचा दीजियेगा।

यह अच्छी बात है कि आप वैसी लड़कियों को नौकरी देते हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर हों। जरूरत पड़ने पर उनकी आर्थिक मदद भी करते हैं लेकिन ऐसा कर आप उन्हें एहसान तले हमेशा दबाये रखते हैं, यह ठीक नहीं है। असल में निम्नमध्यवर्गीय परिवार से आने वाली इन लड़कियों पर पारिवारिक दबाव होता है जिस कारण वे कई बार मजबूर हो जाती हैं। मुझे लगता है कि ऐसा कर ये महिलाएं पत्रकारिता के पेशे के साथ न्याय नहीं कर रही हैं। पत्र के मार्फत मैं उन लड़कियों से अपील करना चाहता हूँ जो अखबार की नौकरी करना चाहती हैं। प्लीज अगर आप सच में पत्रकारिता करना चाहती हैं तो पहले खुद को टटोल लीजिये, इसके बाद ही इस पेशे में आइये। आपको कोई हक नहीं है कि पत्रकारिता के नाम पर आप कुछ और करने लगें और दूसरी लड़कियाँ जो ईमानदारी से काम करती हैं उन्हें भी आपके जैसा करने पर मजबूर किया जाये।

सर आपने पत्रकारों के लिए अब कई विकल्प खोल दिये हैं। अभी लोग कहते हैं कि आप सन्मार्ग के चीफ रिपोर्टर हैं और प्रमोटर भी। आने वाले समय में दूसरे पत्रकार जो मालिक के कृपापात्र होंगे या नहीं भी होंगे, वे आपके रास्ते पर चलेंगे और तब लोगबाग कहेंगे कि फलां पत्रकार जमीन की दलाली भी करता है, फलां पत्रकार इंश्योरेंस एजेंट भी है, फलां पत्रकार ट्रांसपोर्टर भी है। वे अपने विजिटिंग कार्ड पर लिखेंगे जर्नलिस्ट कम लैंड ब्रोकर, जर्नलिस्ट कम इंश्योरेंस एजेंट वगैरह वगैरह। हमें बस डर इस बात का है कि लोग यह न कह दे कि पत्रकार मोटिया मजदूर भी है या पत्रकार बसों में कंडक्टरी भी करता है। अगर ऐसा होगा तो इसके लिए आप जैसे लोग ही जिम्मेवार होंगे जो ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों का कायदे से इनक्रीमेंट भी नहीं करवाते हैं। आपको याद है मेरे सन्मार्ग में रहते कितनी बकलोल लड़कियाँ आयीं जिनकी तनख्वाह दो साल में ही मुझसे ज्यादा हो गयी थी। अगर छोटे स्तर के गॉडफादरहीन पत्रकार दोस्तों को अच्छी तनख्वाह नहीं मिलेगी तो वे मजबूर होकर यही सब करेंगे न।

सर आप मालिक के सामने जाकर 5 सेकेंड में 10 बार सर बोलते हैं और अनैतिक काम (मसलन नो पार्किंग में पार्क कर देने पर पुलिस से गाड़ी छुड़वाना, जहाँ पटाखे फोड़ने की इजाजत नहीं वहां पटाखे फोड़ने के लिए पुलिस से एनओसी दिलवाना, हवाई जहाज के शौचालय में साबुन की टिकिया डलवाना आदि) भी अलाउद्दीन के चिराग के जिन्न की तरह चुटकी में करवा देने का आश्वासन दे आते हैं। इन डिमांडों को पूरे करने के लिये जब लड़कियों पर दबाव बनाते हैं तो आपको पता है इन लड़कियों को बड़े अफसरों के आगे कितना गिड़गिड़ाना पड़ता होगा। जब ये पत्रकार महिलाएँ उनके सामने गिड़गिड़ाती होंगी तो कसम से पत्रकारिता के स्तम्भों की दिवंगत रूह जार-जार रोती होगी। आप जरा सोचिये जब ये अफसरों की चिरौरी करती होंगी तो ये अफसर क्या सोचते होंगे? क्या कोलकाता से हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत इसलिए हुई थी कि 21वीं सदी में इसका स्वरूप ऐसा हो जाये?

सुनते हैं कि सन्मार्ग जब बंद होने की कगार पर था तो बाबू रामअवतार गुप्ता (दिवंगत) खुद लोगों को अखबार बांटते थे। क्या यही दिन देखने के लिये उन्होंने सन्मार्ग को खड़ा किया था? आप तो अक्सर कहते थे कि गुप्ता जी (राम अवतार) को आप पर बहुत भरोसा था, क्या आप उस भरोसे को तोड़ नहीं रहे हैं? आप रोज उनके भरोसे का कत्ल नहीं कर रहे हैं? अगर आप सोच सकते हैं तो सोचिये और थोड़ी-सी शर्म कीजिये।

पत्र यहीं समाप्त करता हूँ।

लेखक उमेश राय सन्मार्ग के वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं. इन दिनों दिल्ली में पानी की समस्या पर काम करने वाली एक एनजीओ के लिए काम कर रहे है. उन्होंने कोलकाता और सन्मार्ग को जिस लिजलिजेपन से जिया है, उसे फेसबुक पर बयां किया है.

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