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सुख-दुख

हमें भोजन पकाने के तौर तरीकों में मूलभूत बदलाव करने की जरूरत है… जानिए कैसे!

विवेक उमराव-

यूट्यूब में चैनल भरे पड़े हैं, जिनमें बताया जाता है कि कैसे ढाबे स्वाद वाली सब्जी इत्यादि बनाई जाए, मिलियन्स वीव्स होते हैं इनके, लाखों फालोवर्स। जब तक मुझे शरीर क्रिया विज्ञान की समझ नहीं थी, तब तक मैं इन चैनलों को देखता था, सीखता था कि फलाना सब्जी कैसे बनाई जाए।

अब जब शरीर क्रिया विज्ञान की अच्छी खासी समझ हो चुकी है, तो मुझे अहसास होता है कि हम अधिकतर सब्जी के नाम पर केवल पेट में भोजन का वजन ठूंसते हैं।

अधिकतर सब्जियों को बनाने का बहुत ही सामान्य व रूटीन तरीका हम लोगों में से अपवाद छोड़ अधिकतर लोग फालो करते हैं। हम लोग तेल को बहुत गर्म करते हैं फिर उसमें जीरा, प्याज, लहसुन, अदरक इत्यादि डालते हैं और फ्राई करते हैं। अनेक ग्रेवी तो इस तरह बनाई जाती हैं कि हम प्याज इत्यादि का रंग भूरा होने तक फ्राई करते हैं, टमाटर को भी तेल निकलने तक फ्राई करते हैं। हम बहुत चीजें भून कर खाते हैं, भले ही भूनने की कतई भी जरूरत नहीं होती है, क्योंकि हमें जलाव में स्वाद आता है।

तेल को इतना गर्म कर देते हैं कि तेल की अपनी संरचना लगभग पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो जाती है। फिर इसी छिन्नभिन्न हो चुके तेल में हम सब्जी पकाते हैं या जो भी तलना हो वह तलते हैं। हम विटामिन जलाते हैं, हम मिनरल्स जलाते हैं, हम प्रोटीन जलाते हैं। हमारे शरीर के लिए आवश्यक जीवाणु तो हमारे भोजन पकाने के तरीकों में बिलकुल भी बच ही नहीं पाते हैं, यही कारण है कि हमारे समाज में अधिकांश लोगों का पाचनतंत्र गड़बड़ रहता है। जीवाणुओं के लिए हमें अपने भोजन में कच्ची सब्जियों का सेवन जरूर ही करना चाहिए, विशेषकर वे सब्जियां जो धरती के नीचे पैदा होती हैं।

हम लोगों को जलाव में स्वाद आता है। मुझे इसका कारण यह लगता है कि हम लोगों के पूर्वजों ने सैकड़ों सालों तक मिट्टी के चूल्हे में रोटी बनने के स्वाद को चखा इसलिए जलाव का स्वाद हमारे स्वाद के जीन्स में घुस गया है। हमें जलाव का स्वाद चाहिए होता है। हम दूध तक को जलाकर पीते हैं तो अधिक स्वाद पाते हैं। हम पत्थरों (सिलबट) के बीच चटनी पीसने में स्वाद पाते हैं क्योंकि पत्थर का जलाव मिश्रित हो जाता है।

चूंकि हमारे जीन्स में जलाव वाला स्वाद घुस चुका है, इसलिए हमें जलाव में स्वाद आता है। मुझे भी स्वाद आता है। लेकिन जबसे शरीर क्रिया विज्ञान की समझ विकसित हुई है, तबसे एक आधारभूत समझ आई है कि जिस तरह से सब्जियां हम लोग बनाते हैं, उस तरीके से सब्जियों व मसालों के अधिकतर पौष्टिक तत्वों को हम अनजाने में नष्ट कर चुके होते हैं।

प्राकृतिक रूप से शरीर के लिए भोजन स्वाद के लिए या पेट में खाने ठूंसने के लिए नहीं किया जाता है। बल्कि भोजन शरीर को तत्वों की आपूर्ति के लिए होता है। हम कितना भी खा लें, कुछ भी खा लें, लेकिन यदि हम भोजन बनाने की प्रक्रिया में तत्वों को नष्ट कर देते हैं, तो हमारे शरीर को तत्वों की आपूर्ति नहीं हो पाती है।

मैंने बहुत लोगों को देखा है कि भोजन पकाते समय नीबूं डालते हैं। इससे खट्टेपन का स्वाद तो आता है लेकिन गर्म करने के कारण नींबू के अनेक तत्वों को हम नष्ट कर चुके होते हैं, विटामिन-C तो लगभग पूरी तरह से नष्ट हो ही जाता है।

स्वाद की आदत बदलना बहुत मुश्किल नहीं होता है। हम जिसमें स्वाद महसूस करना शुरू कर देते हैं, कुछ समय बाद हमें उसी में स्वाद मिलना शुरू होने लगता है। हमें भोजन पकाने के तौर तरीकों में मूलभूत बदलाव करने की जरूरत है। ताकि हम अपने शरीर को तत्वों की आपूर्ति कर सकें और बीमार कम पड़ें, पाचनतंत्र, कैंसर, ट्यूमर इत्यादि बीमारियों से बचने के लिए अपनी ओर से अपनी जिम्मेदारी का प्रयास कर सकें। प्रदूषण को ठीक करना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन कम से कम हम उतना तो कर ही सकते हैं, जितना हमारे हाथ में है।

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