अगर कारपोरेट कंपनियों में काम करते हैं और खुद को गुलाम-स्लेव्स नहीं मानते तो इसे पढ़िए!

Narendra Nath : टेक महिंद्रा से जुड़े एक टेककर्मी को एचआर से फोन आता है। उसकी बात कुछ इस तरह होती है…

एचआर-हेलो, आप कल दस बजे तक रिजाइन कर दें।
स्टॉफ-क्या?? क्यों? इतनी जल्दी कैसे होगा। टूटे हुए व्यक्ति की आवाज साफ सुनी जा सकती है।

एचआर कर्मी- करना ही होगा। कल दस बजे तक रिजनाइ नहीं करते हैं तो उसके बाद आपको टर्मिनेट कर दिया जाएगा और तब कोई बेनिफिट नहीं मिलेगी। साफ आर्डर है
स्टॉफ- अरे,मेरे तीन साल का परफारमेंस,बिजनेस देखें। मैंने बहुत अच्छा किया है। सारे पेपर हैं। फिर ऐसा कैसे?

एचआर-इसका परफारमेंस से कोई मतलब नहीं है। यह कॉस्ट कटिंग के लिए किया गया है
स्टॉफ-फिर भी आप कह रही हैं कल सुबी 10 बजे तक रिजनाइन कर दें।ऐसा कैसे संभव है? यह इनह्यूमन है। मेरी जरूरतें हैं। इतनी जल्दी तो मैं घर भी नहीं जा सकता हूं। कैसे होगा? कुछ तो टाइम दो?

एचआर-तल्खी में- आप दस बजे तक कीजिये। नहीं तो टर्मिनेट। आपने अपने पेपर में साफ साइन किया था कि कंपनी कभी भी आपको निकाल सकती है।
स्टॉफ-ठीक है। लेकिन कम से कम मुझे एक बार अपनी बात रखने का तो कोई मौका दें। किसी सीनियर के सामने मुझे अपनी बात रखनें दे प्लीज। ऐसा कैसे इतने कम नोटिस पर नाैकरी छोड़ना संभव है। मेरी जरूरतें हैं। प्लीज किसी से बात करनें का माैका दें

एचआर की तल्खी और बढ़ते हुए- यह कॉरपोरेट ऑफिस का आर्डर है। कोई बात नहीं सुनी जाएगी। आपके बॉसोज को भी सब पता है। उन्हें कल 10 बजे तक रिजाइन करो नहीं तो टर्मिनेट आर्डर इशु हो जाएगा। ऑप्शन साफ है। इसमें कोई समझौते की गुंजाइश नहीं है
स्टॉफ-बिना जाने नौकरी छोड़ना भी तो ठीक नहीं। मैं क्या करूंगा। प्लीज। प्लीज। मेरे बारें में सोचये। एक मौका दीजिये।

एचआर-कल सुबह 10 बजे तक। आेके। फोन काट दिया जाता है।

कॉरपोरेट जगत का डार्क सिक्रेट सब जानते हैं। लेकिन यह बातचीत जब सुनेंगे तो जानते हुए भी मोमेंट ऑफ शॉक देगा। गुलाम-स्लेव्स का कॉरपोरेटीकरण का सुनता देख अहसास होगा कि हम-आप किस हालात में सरवाइव करते हैं। डार्विन ने जब अपना थ्योरी दिया हो लेकिन सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट एंड लकीएस्ट के दौर में हम हैं।

इस बात में हर कोई रिसीविंग इंड पर खुद को रखकर सोच सकता है। जरा सोचें, वह बार-बार अपनी जरूरतें का हवाला दे रहा था। अगले महीने उसकी ईएमआई होगी,बच्चे का स्कूल होगा। दूसरी जरूरतें होगी। कॉरपोरेट के चक्कर में उसने खुद को समाज से खुद को दूर कर लिया होगा,सो मदद कर सकने वाले जमीनी लोगों को इसने अपने अच्छे दिनों में दूर कर लिया होगा। वह तन्हा होगा, अकेला होगा।

सबक सबके लिए हैं। जैसे मृत्यु अनिश्चित है, कभी भी आ सकती है। यह फोन कॉल भी कभी भी किसी को आ सकती है। ऐसे कॉल के बाद कौन किस तरह अागे बढ़ता है,असली चुनौती उसके बाद शुरू होती है।

नोट-हालांकि फोन पर हुई बातचीत के बाद कंपनी के मालिक आनंद महिंद्रा ने माफी मांगी है। उनसे मैं व्यक्तिगत रूप से मिला हूं। वह उन चंद बड़े उद्योगपति में शामिल हैं जिनका एक मानवीय चेहरा है। जिनके पास सिर्फ पैसा कमाने वाला दिमाग नहीं है बल्कि धड़कने वाला दिल भी है।

टाइम्स आफ इंडिया में कार्यरत पत्रकार नरेंद्र नाथ की एफबी वॉल से.



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Comments on “अगर कारपोरेट कंपनियों में काम करते हैं और खुद को गुलाम-स्लेव्स नहीं मानते तो इसे पढ़िए!

  • सत्य वक्ता says:

    टर्मिनेशन के सिलसिले में साफ़ और सख्त प्रवधानों की जरुरत है। जैसे टर्मिनेशन के 30 दिन के भीतर सभी तरह के भुगतान कर्मचारी को कर दिए जाने चाहिए।

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