ईद पर कुर्बानी : ख़ूनी खेल को चैरिटी का जामा न पहनाइये!

Tabish Siddiqui : मांसाहार के लिए आप क़ुर्बानी नहीं करते हैं.. और न गोश्त को ग़रीबों में बाटने के लिए करते हैं.. और न कुपोषित को पोषित करने के लिए करते हैं.. इसलिए पहले तो अगर आप भ्रम में हैं तो इसे दूर कीजिये और दूसरों को भी भ्रमित न कीजिये… क़ुर्बानी आप करते हैं अपने ईष्ट यानि “अल्लाह” को ख़ुश करने के लिए.. इसके सिवा क़ुर्बानी का कोई मक़सद नहीं होता है.. तो पहला सच तो ये बोलिए अपने आप से और दूसरों से..झूठ बोलना छोड़िये कि आपको ग़रीबों की बड़ी फ़िक़्र है इसलिए बकरा काटते हैं आप.. ख़ूनी खेल को चैरिटी का जामा न पहनाइये.

दूसरी बात.. हम जैसे जो क़ुर्बानी का विरोध करते हैं वो आपके मांसाहार का विरोध नहीं कर रहे हैं.. कोई क्या खाता है ये हम नहीं तय करने वाले हैं.. इसलिए ये विरोध मांसाहार का नहीं है.. बल्कि ये विरोध है “अंधविश्वास” का.. उस अंधविश्वास का जो आपके भीतर बैठा हुवा है कि “आप एक जानवर काट देंगे तो अल्लाह ख़ुश हो जाएगा और आप उस जानवर पर बैठकर पुल सिरात पर कर के जन्नत चले जायेंगे”.. ये निरी बकवास है और अंधविश्वास की पराकाष्ठा है.. एक दिन में आप “अरबों” जानवर काट दें आसमान में बैठे किसी “देवता” को ख़ुश करने के लिए तो आपको इस नशे से निकालना हम जैसों का फ़र्ज़ हो जाता है

क़ुर्बानी अमानवीय है.. और इसका विरोध तब और अधिक बनता है जब आप इसे “इस्लाम” के नाम पर करते हैं.. जितनी आयतों की दलील आप देते हैं वो सब “हज” की आयतें हैं जहां क़ुर्बानी की बात हो रही है.. किसी अच्छे इस्लाम के जानकार से पूछिए, जो धर्म के नाम पर झूठ न बोलता हो और सच्चा हो, वो आपको बतायेगा कि ये परंपरा है क्या और कहां से आई

इसका न तो हज़रत इब्राहीम से कोई लेना देना है और न किसी और पैग़म्बर से.. ये तो अचानक ढाई सौ सालों बाद हदीसों में बताया जाने लगा कि ये इब्राहीम की परंपरा है.. न तो क़ुरआन इसे इब्राहीम की परंपरा कहता है और न उस समय के इतिहास की कोई भी किताब इसे इस परंपरा से जोड़ती है.. अरबों ने जो भी गढ़ लिया उसे आपने इस्लाम समझ कर स्वीकार कर लिया.. भले वो कितना भी अमानवीय और बेवकूफ़ी भरा हो

अब चूंकि न तो आपके पास इसको जस्टिफाई करने की कोई दलील होती है और न किसी मौलाना के पास इसलिए अगर कोई विरोध करे तो आपको गुस्सा आ जाता है.. क्यूंकि एक दस साल का बच्चा भी आपसे पूछ बैठेगा कि “इब्राहीम जब अपना बेटा काट रहे थे तो फरिश्ते ने भेड़ रख दी ताकि बच्चा न कट जाए.. तो अल्लाह ने उनकी उनकी आस्था और विश्वास की क़ुर्बानी स्वीकार की या भेड़ की?”.. और अल्लाह ने उनसे कहा था अपनी प्यारी चीज़ क़ुर्बान करने को तो आप लोग क्यूँ बकरा काट रहे हैं भाई? क़ुरआन की किस आयत में कहा गया है कि मुसलमानो तुम सब ईद के दिन जानवर काटो?”.. ये निरी बचकानी दलीलें हैं

तो चूंकि मामला झूठ का है.. इसलिए आपको गुस्सा आता है.. आप जानते हैं कि कहीं नहीं लिखा है कि ईद उल अज़हा पर बकरा काटना है.. जिस आयत को आप पानी पी पी कर कट पेस्ट करते घूमते हैं वो सब हज के समय होने वाली क़ुर्बानी की आयत है.. ये हज के समय क़ुर्बानी की परंपरा सदियों पुरानी थी.. हज की समाप्ति पर देवी उज़्ज़ा की मूर्ति के आगे हर हाजी एक बलि देता था.. बलि के साथ हज समाप्त होता था.. इसी परंपरा को इस्लाम मे शामिल कर लिया गया.. बस देवी की मूर्ति हटा दी गयी और अल्लाह का नाम लिया जाने लगा.. ये सच्चाई है.. अब चूंकि बाद के लोग जो मुसलमान बन रहे थे वो इस क़ुर्बानी की परंपरा को “मूर्तिपूजक” परंपरा मानते थे और इसे करने में हिचकिचाते थे इसलिए धीरे धीरे अरबों ने चालाकी से हज़रत इब्राहीम की किवदंती को इसमें जोड़ दिया और कहा कि ये उनकी परंपरा है और इसे करो अब.. हिचकिचाओ मत.. अब देवी उज़्ज़ा नहीं हैं इब्राहीम की परंपरा बन गयी है ये.. अल्लाह को ख़ुश करो अब

हज के समय तक तो क़ुर्बानी चली आ रही थी मगर इसको दुनिया के सारे मुसलमानो पर लादने का श्रेय जाता है दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर पर.. आज प्रचलित लगभग सारा ही इस्लामिक कर्मकांड उन्ही के द्वारा ही है इसलिए इस पर बात की जाएगी तो आर्टिकल लंबा हो जाएगा.. मगर एक बात तय है कि सारे मुसलमानो द्वारा बख़रीद पर बकरे काटने की परंपरा इस्लामिक नहीं है.. ये अरबों की मूर्तिपूजक परंपरा थी.. और न इसका इस्लाम से कोई लेना देना है.. इस्लाम इन्ही सब ढोंग के ख़िलाफ़ आया था और फिर उसी ढोंग को आपने इस्लाम बना लिया

ये अंधविश्वास है.. और एक अंधविश्वास में सदियों से डूबे रहना कोई समझदारी की बात नहीं है.. इस से बाहर निकालिये

फेसबुक के चर्चित राइटर ताबिश सिद्दीकी की वॉल से.

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Comments on “ईद पर कुर्बानी : ख़ूनी खेल को चैरिटी का जामा न पहनाइये!

  • अब्दुल हमीद says:

    ताबिश भाई आदाब। आपने एकदम सही व बेहतरीन बात कही है। आपकी सोच को सलाम।
    – अब्दुल हमीद जयपुर
    संपादक – हमारी आवाज़ सुनो

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