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करप्शन किस कदर हमारे खून में समाया है, समझा रहे हैं आजतक के पत्रकार विकास मिश्र

Vikas Mishra : मेरे एक मित्र अभी एक शहर में एसपी सिटी हैं। एक रात जब हम मिले, चर्चा छिड़ी तो उन्होंने कहा-‘भाई मैं तो बस ईमानदारी से काम कर रहा हूं, कोई तीन-पांच नहीं।’ मुझे लगा कि शायद मोदी के प्रभाव में ईमानदार हो गए हैं। बात बढ़ी तो वो बोले-‘किसी को सताकर नहीं कमाना है भाई, बिना पैसे दिए पोस्टिंग मिली है, मैं तो बाहर का पैसा छूता नहीं हूं, बस महीने के जो ढाई-तीन लाख बंधे हुए आते हैं, उसी से काम चलाता हूं।’

Vikas Mishra : मेरे एक मित्र अभी एक शहर में एसपी सिटी हैं। एक रात जब हम मिले, चर्चा छिड़ी तो उन्होंने कहा-‘भाई मैं तो बस ईमानदारी से काम कर रहा हूं, कोई तीन-पांच नहीं।’ मुझे लगा कि शायद मोदी के प्रभाव में ईमानदार हो गए हैं। बात बढ़ी तो वो बोले-‘किसी को सताकर नहीं कमाना है भाई, बिना पैसे दिए पोस्टिंग मिली है, मैं तो बाहर का पैसा छूता नहीं हूं, बस महीने के जो ढाई-तीन लाख बंधे हुए आते हैं, उसी से काम चलाता हूं।’

ये यूपी के पुलिस अफसर की वो ‘ईमानदारी’ की कमाई है, जब वो कुछ भी न करे, तो तनख्वाह के अलावा महीने का ढाई-तीन लाख रुपये बन जाता है। ये सिस्टम है। पिछले साल 8 नवंबर को जब प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया तो मेरे एक बेहद करीबी सज्जन बड़ी परेशानी में आ गए। दिक्कत ये थी कि उन्होंने अपने छोटे भाई की एक स्कूल में सरकारी नौकरी की बात कर रखी थी। अफसर को 7 लाख रुपये रिश्वत में देना था। नोटबंदी आ गई। खातों से निकासी की नसबंदी हो गई। अफसर न तो चेक लेने को तैयार और न ही ऑनलाइन पेमेंट। आखिरकार उसने पूरा पैसा नकद लिया।

हैरान मत होइए। ताजा हाल सुनिए। मेरे एक परिचित का बहुत बड़ा मेडिकल कॉलेज है। एमबीबीएस की 150 सीटें थीं, लेकिन पिछले दिनों मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया ने घटाकर 100 सीटें कर दीं। अब फिर से 50 सीटें बढ़ाने के लिए अफसरशाही ने कितनी रिश्वत की मांग की है, आप जानते हैं..? पूरे 6 करोड़ रुपये। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार बोलते-बोलते मुंह से चाहे जितना झाग फेंक लें, लेकिन इस सिस्टम का दीमक ऐसा है, जिसके लिए उनके पास कोई पेस्ट-कंट्रोल नहीं है।

भ्रष्टाचार देश की आत्मा में बस चुका है। भ्रष्टाचार कायदा है, भ्रष्टाचार कानून है। कुछ साल पहले नौगढ़ में मैंने जमीन का छोटा सा टुकड़ा खरीदा था। रजिस्ट्री करवाने वाले वकील मेरे एक मामा ही थे। उन्होंने रजिस्ट्री चार्ज के अलावा 4 हजार रुपये की और डिमांड की। बताया कि रजिस्ट्रार को देना पड़ता है। मैंने कहा-कौन सा सरकारी अफसर है जो मुझसे रिश्वत ले लेगा? मामा बोले-ये रिश्वत नहीं, बस यूं ही मिठाई खाने के लिए लोग दे देते हैं। मैंने कहा, चलिए रजिस्ट्रार से बात मैं करूंगा। मामा बोले-तुम तो नहीं दोगे, चले जाओगे, दुकानदारी हमारी खराब होगी। खैर, मैंने रिश्वत नहीं दी, काम भी हो गया, रजिस्ट्रार साहब दांत निपोरे देखते रहे।

मैं एक पत्रकार के अलावा एक मध्यमवर्गीय गृहस्थ भी हूं। मेरा पासपोर्ट मेरे पते पर पहुंचा, डाकिया मिठाई के नाम पर 100 रुपये ले गया। इसके बाद मेरी पत्नी, मेरे बेटे और मेरी भानजी का पासपोर्ट बनने की बारी आई। मेरा मामला तो तत्काल का था, क्योंकि विदेश यात्रा पहले फाइनल हुई, पासपोर्ट बाद में बना। खैर, इन्क्वायरी के लिए पुलिस वाले आए, फिर एलआईयू वाले और आखिर में पासपोर्ट लेकर डाकिया आया। पुलिस वाले अगर पेपर में कुछ भी दाएं-बाएं लिख दें तो पासपोर्ट नहीं बनेगा, बनकर आ भी गया तो डाकिया गायब भी कर सकता है। कौन सी उस पर कार्यवाही हो जाएगी। सबका ‘मिठाई’ का रेट बंधा है। तो बाकी के तीनों पासपोर्ट में हर चुंगी पर मिठाई के लिए पैसे पकड़ाए गए, क्योंकि डर था कि अगर इन्हें पैसे नहीं मिले तो पासपोर्ट नहीं मिलेगा।

भ्रष्टाचार का हाल तो ये है कि जब तक अफसर, थानेदार पैसे न पकड़ ले, लोगों को भरोसा ही नहीं होता कि उसका काम हो जाएगा। कभी थाने में जाइए रिपोर्ट लिखाने तो आपको अनुभव होगा कि आप फरियादी नहीं बल्कि मुल्जिम है। अक्सर पुलिस वाले फरियादी को क्लाइंट समझते हैं, फरियादी अपनी व्यथा सुनाता है, पुलिस वाला सोचता है कि इससे पैसे कैसे ऐंठें, क्योंकि अक्सर जालिम पैसे वाला होता है और पीड़ित गरीब। ऐसे में गरीब पैसे कहां से लाएगा, लिहाजा पुलिस पैसे वाले से मिल जाती है। पत्रकारीय जीवन में मैंने ऐसी कई घटनाएं देखी हैं, कई लोगों को इंसाफ भी दिलाया है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक थाने में मेरे एक जानने वाले कुछ महीने पहले थानेदार बनकर आए हैं। पता नहीं किसकी कृपा से उन्हें वो थाना मिल गया, जहां से एक थानेदार ने तो 13 महीने में चार करोड़ रुपये कमा लिए थे। खैर, वो भाई साहब पुलिस में भी अनोखेलाल हैं, तनख्वाह से काम चलाना चाहते हैं। थाने से भाग निकलने की जुगत भिड़ा रहे हैं। उस थाने में होता ये था कि पहले एक पार्टी रिपोर्ट दर्ज करवाती थी, फिर दूसरी जबरन रिपोर्ट दर्ज करवाती थी। फिर थानेदार समझौता करवाता था, मोटी रकम पीटता था। वो इलाका है भी धन्नासेठों का। हमारे ये परिचित परेशान हैं, कहते हैं कि कमाई बहुत है यहां, लेकिन भाई साहब, मैं तो यहां से भागना चाहता हूं। कभी पॉलिटिकल प्रेशर बनाने वाले फोन आते हैं तो कभी पैसे लेकर गलत काम करने का ऑफर।

ये तो इस सिस्टम के चंद उदाहरण है, भ्रष्टाचार से तो हर किसी का रोजाना सामना होता रहता है। इस सड़े हुए सिस्टम को कौन कहां से सुधारेगा, डिजिटल क्रांति आई, ऐलान हुआ कि भ्रष्टाचार बंद हो जाएगा, डिजिटल सिस्टम नया है, लेकिन सिस्टम में बैठे लोग तो वही हैं। इस सिस्टम का समाज से बड़ा पुराना याराना है। आज भी पिता अपनी बेटियों की शादी करने के लिए लाखों की सैलरी पीटने वाले प्राइवेट सेक्टर वालों पर सरकारी नौकरी वाले क्लर्क को तरजीह देते हैं।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से.

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