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सुख-दुख

छात्रसंघ चुनाव जीतने के बाद पंडित हरिशंकर तिवारी मुझे अपनी कार से बाबू शीतला सिंह के यहां ले गए!

उपेंद्र नाथ पांडेय-

दोनों से मेरी पहली मुलाक़ात एक ही दिन हुई थी.. पंडित हरिशंकर तिवारी और बाबू शीतला सिंह दोनों ने ईश्वर की गोद में सिर रखकर चिरनिद्रा लीन होने के लिए आज का दिन चुना! दोनों को अंतिम प्रणाम!

संयोग से दोनों के साथ मेरी पहली भेंट एक ही दिन हुई थी, ठीक 40 वर्ष पूर्व 1983 में। दरअसल मैंने इसी वर्ष गोरखपुर विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव लड़ा और गोरखपुर की छात्र राजनीति के दोनों गाडफादर्स हरिशंकर तिवारी व वीरेंद्र शाही की शाबाशी लेकर अपने घर अयोध्या लौटने लगा तो तिवारी जी ने मुझे फैजाबाद तक लिफ्ट दे दी। तिवारी जी रास्ते भर मुझे राजनीति के मंत्र देते देते अनजाने में ही मेरे भीतर पत्रकारिता के बीज बो दिये। फैजाबाद पहुँचकर तिवारी जी बोले कि अब फैजाबाद तक साथ आए हो तो मैं तुम्हें यहां के सबसे बड़े अखबार के संपादक जी से मिलवाकर ही लखनऊ जाऊंगा।

उन्होंने सीधे जनमोर्चा अखबार का रुख किया और मुझे शीतला सिंह जी से रू-ब-रू कराया। शीतला जी को जब पता चला कि एक अयोध्या वासी छात्र ने गोरखपुर विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव जीता है तो फौरन अपने संवाददाता श्री सीके मिश्र को बुलाकर मेरा इंटरव्यू कराया और मेरे फोटो का ब्लाक बनवाकर जनमोर्चा के पहले पेज पर फोटो सहित खबर छाप दी।

कमाल यह कि उस दिन से पहले मैं न तो कभी हरिशंकर तिवारी जी से मिला था और न ही भाई शीतला सिंह से। जबकि पहले यह मान्यता सी बन गई थी कि गोरखपुर विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव हाता या मठ में से किसी एक के वरदहस्त के बगैर लड़ा ही नहीं जा सकता, जीतना तो दूर की बात है। किंतु मैं एम.एससी .का छात्र था और मुझसे पहले साइंस फैकल्टी के किसी छात्र ने छात्रसंघ चुनाव लड़ने की कभी सोचा भी न था। बहरहाल, संभवत है कि राजनीति और पत्रकारिता की इन दो हस्तियों की भेंट के दौरान ही मेरे मन में पत्रकारिता के बीज पड़े हों, क्योंकि उससे पहले मैं कभी किसी अखबार के दफ्तर में घुसा भी न था।

यह भी अजीब सा संयोग है कि कालांतर में दैनिक जागरण ज्वाइनिंग के बाद मुझे पहला ब्यूरो चीफ पददायित्व फैजाबाद ब्यूरो का ही मिला, 1992-93 के उस दौर में दैनिक जागरण के फैजाबाद प्रमुख व प्रभारी होने के नाते हमारे व्यापारिक हित टकराए, दैनिक जागरण को नंबर वन बनाने की राह जनमोर्चा ही रोके खड़ा था। हमारे बीच तल्खियां भी हुईं और कई बार सार्वजनिक नोकझोंक भी, किंतु वैचारिक मतभिन्नता और कारोबारी मनभेद के बावजूद भाई शीतला सिंह सदा मेरे अग्रज ही बने रहे, उनका स्नेह ही नहीं मार्गदर्शन भी मिला।

एक शाम केंदीय मंत्री अर्जुन सिंह के आगमन पर उनके सम्मुख ही हमारी तीखी झड़प हुई, खबरें निपटाकर मैं आधी रात को भाई शीतला सिंह से मिलने गया और उसी रात हमारे गिले शिकवे दूर हुए, शीतला सिंह जी ने समझा कि उपेंद्र के एक्शन रिएक्शन दैनिक जागरण के स्थानीय मुखिया होने के नाते स्वाभाविक और अनिवार्य हैं। उसके बाद शीतला सिंह जी का शीतल रूप भी मैने खूब देखा,

यहां कि भीष्म पितामह की तरह उन्होंने मुझे पत्रकारीय जंग में खुद को पछाड़ने के रहस्य व मर्मस्थल भाई शीतला सिंह ने खुद बताए। उसके कुछ दिनों बाद ही मैं रॉकफेलर फाउंडेशन फेलोशिप पर शोध के लिए फैजाबाद से विदा होने लगा तो शीतला सिंह जी ने अपनी कलम मुझे आशीर्वाद स्वरूप भेंट की, और मेरी दिल्ली चंडीगढ पोस्टिंग के दौरान जब भी मौका मिला, मिलने जरूर आए। मेरी आखिरी मुलाकात द ट्रिब्यून आफिस चंडीगढ में ही 2016-17 के दौरान हुई थी।

बीच-बीच में भाई परमानंद पाण्डेय जी से शीतला सिंह जी की अक्सर चर्चा होती रहती थी, दोनों ने इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स को राष्ट्रीय फलक पर स्थापित करने में नींव के पत्थरों की भूमिका संगसंग निभाई है।

अभी हाल में ही 16 अप्रैल को अयोध्या रेडियो की वेबसाइट लांचिंग और स्टूडियो शिलान्यास कार्यक्रम में अयोध्या जाना हुआ तौ उनके पुत्र से भेंट हुई और शीतला जी का संदेश भी मिला। किंतु मैं भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक प्रोफेसर संजय द्विवेदी के साथ दिल्ली वापसी के कारण चाहकर भी शीतला भाई के दर्शन करने न जा सका। सोचा था कि जागरण पत्रकारिता संस्थान के ब्रांडिंग सेमिनार के लिए जून में अयोध्या जाउंगा और भाई शीतला सिंह से नव दायित्व हित मार्गदर्शन व आशीर्वाद लूंगा, किंतु आज भाई शीतला सिंह और उनसे मेरा परिचय कराने वाले हरिशंकर तिवारी जी दोनों ही संगसंग इस तरह बिछुड़ जाएंगे, सोचा भी न था।

ईश्वर दोनो अग्रजों को निज धाम में स्थान दें, यही प्रार्थना है!

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