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सुख-दुख

अख़बारों को ओबीच्युरी के नाम पर इस तरह के विज्ञापन नहीं छापने चाहिए

शंभूनाथ शुक्ला

मृत्यु का उत्सव!

कोई मिस्टर सिंगला गुरुवार, 8 अक्तूबर को नहीं रहे थे। आज उनके शोक में पंजाबी बाग की बाबा नत्था सिंह वाटिका में श्रद्धांजलि सभा रखी गई है। इसका विज्ञापन दिल्ली से प्रकाशित ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ और ‘ टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में पूरे-पूरे पेज पर है, वह भी रंगीन पेज पर।

मेरे अनुमान से इन दोनों ही अख़बारों में पूरे एक पेज का कलर्ड विज्ञापन पाँच-सात लाख से कम का नहीं होगा।मुझे सुबह से ही यह विज्ञापन व्यथित कर रहा है। ये मिस्टर सिंगला मात्र 43 वर्ष की उम्र में काल कवलित हो गए। एक तरह से यह युवा उम्र है। उनकी शोक सभा के लिए इतना बड़ा विज्ञापन देख कर मुझे लगा, यह मृत्यु का उत्सव मनाना है।

इस विज्ञापन की शुरुआत में गीता का एक श्लोक दिया गया है,- “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः” (अर्थात् आत्मा को न हथियार काट सकते हैं, न आग जला सकती है। न ही जल जल इसे गला सकता है, न वायु इसे सोख सकती है।) यह श्लोक आत्मा को शास्वत बताता है, शरीर के धर्म को नहीं। आत्मा धर्म और आस्था का विषय है लेकिन मृत्यु धर्म-अधर्म से परे है और कष्टकारी भी है। परिवार व्यथित होता है। साथ ही मृत्यु को प्राप्त जातक की पत्नी व संतति भी। यही लोकाचार है।

शोक सभा से बेहतर था, कि यह समृद्ध परिवार इस विज्ञापन के धन से कई भूखों को रोटी दे देता। कई रोज़ी-विहीन लोगों को रोज़गार के लिए धन देता तो कम से कम लोग आत्महत्या न करते। यह परिवार कोई ऐसा काम करता, जिससे उस मृतक की स्मृतियाँ लोगों के दिल-दिमाग़ में अंकित रहतीं।

मुझे नहीं पता कि इन सिंगला की मृत्यु कैसे हुई? उन्हें कोरोना हुआ या वे किसी अज्ञात मृत्यु के शिकार हुए अथवा दुर्घटना में मारे गए? क्योंकि अख़बार में यह सब नहीं छपा। एक तरह से अख़बार ने उनकी मृत्यु को न्यूज़ मटीरियल नहीं समझा, लेकिन पैसा पाकर एक पेज का विज्ञापन छाप दिया।

अख़बारों को ओबीच्युरी के नाम पर इस तरह के विज्ञापन नहीं छापने चाहिए। यह किसी मृतक का अपमान है।

बहरहाल मई 1977 को जनमे और अक्तूबर 2020 को दिवंगत हुए इन श्री सिंगला को मेरी तरफ़ से विनम्र श्रद्धांजलि!

लेखक शंभूनाथ शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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1 Comment

1 Comment

  1. Rajesh

    October 20, 2020 at 6:52 pm

    हिंदी पट्टी के लगभग सभी अखबारों की विज्ञापन को लेकर यहीं दशा हो गई है पैसा मिले तो गु भी चाट लें।

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