पीएम मोदी की संपत्ति पर सवाल उठाती याचिका को रोकने में जुटे हैं सुप्रीमकोर्ट के रजिस्ट्रीवाले!

क्या उच्चतम न्यायालय में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को पक्षकार नहीं बनाया जा सकता? या फिर नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई याचिका नहीं दायर की जा सकती? या यदि याचिका दाखिल भी कर दी गयी तो क्या उच्चतम न्यायालय की रजिस्ट्री को यह निर्देश है कि उसे आपत्तियां लगाकर सुनवाई के बिना ही ख़ारिज कर दे?

यह सब सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं क्योंकि उच्चतम न्यायालय की रजिस्ट्री ने याचिकाकर्ता साकेत गोखले को स्पष्ट करने के लिए कहा है कि उसने मोदी की अचल संपत्ति से जुड़ी कथित अनियमितताओं की जांच के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मामले में पार्टी क्यों बनाया है? क्या यही निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायपालिका है? क्या न्याय अँधा है या चीन्ह चीन्ह कर न्याय देता है? प्रतिबद्ध न्याय किसे कहते हैं?

याचिकाकर्ता, साकेत गोखले ने एक फेसबुक पोस्ट अंग्रेजी में डाला है जिसका हिंदी अनुवाद यूं है-

मोदी के खिलाफ मेरी जनहित याचिका पर महत्वपूर्ण अपडेट… जनहित याचिका दायर करने के बाद उच्चतम न्यायालय की रजिस्ट्री ने मुझे उन कमियों की एक सूची दी, जिन्हें मुझे स्पष्ट करने को कहा गया.. इसमें ज्यादातर कागजी कार्रवाई जैसे पीजी संख्या, स्याही बहुत हल्की है… आदि. इसके बाद अचानक मुझे झटका देते हुये उच्चतम न्यायालय की रजिस्ट्री ने आपत्तियों का दूसरा सेट दिया जिसमें मुझे यह स्पष्ट करने के लिए कहा गया है कि “माननीय प्रधान मंत्री” को मेरे मामले में एक पक्ष / प्रतिवादी क्यों बनाया गया है। यह प्रधान मंत्री हैं जिन्होंने कथित रूप से अपने हलफनामे में झूठ बोला था। यह प्रधान मंत्री हैं जिन्होंने कथित रूप से भूमि के एक भूखंड को छिपाया था। यह प्रधान मंत्री हैं जिनकी व्यक्तिगत भूमि सार्वजनिक रिकॉर्ड में अस्पष्ट और अप्राप्य है. लेकिन उच्चतम न्यायालय की रजिस्ट्री अभी भी मुझसे सवाल कर रही है कि नरेंद्र मोदी इस मामले में पक्षकार क्यों है।

देखें मूल पोस्ट-

Saket Gokhale

Important update on my PIL against Modi

After filing my PIL, the SC registry gave me a list of defects that I need to clear (mostly paperwork stuff like Pg number X is not dark enough etc.).

And now here’s the shocker – the Supreme Court registry has suddenly submitted a 2nd set of objections in which I’ve been asked to clarify why the “Honorable Prime Minister” has been made a party/respondent to my case.

It is the Prime Minister who allegedly lied on his affidavit. It is the Prime Minister who allegedly hid a plot of land. It is the Prime Minister whose personal land holdings are unclear and untraceable in public records.

But the Supreme Court registry still wants me to clarify why he’s a party to the case. The power of determining culpability or innocence lies with the Honorable Judges.

Here it is the registry (whose responsibility is to file and list matters for hearing) questioning me on why PM Modi has been made a party in a PIL related to his own dodgy land holdings.

Always knew it’s gonna be an uphill battle. I’m slowly learning the degree of how uphill it is in New India. Of course the fight continues. And there’s no way Modi is escaping this no matter how hard he tries.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपने स्वामित्व वाली संपत्तियों के बारे में चुनावी हलफनामों में कथित तौर पर छिपाने के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाने वाले पत्रकार से रजिस्ट्री इस तरह के सवाल पूछ रही है। याचिकाकर्ता ने पीआईएल में आरोप लगाया है कि नरेंद्र मोदी ने साल 2014 के चुनावी हलफनामे और साल 2015, 2016 और 2017 में संपत्ति की घोषणा में एक प्लॉट की जानकारी नहीं दी. एक महीना पहले पूर्व पत्रकार साकेत गोखले ने उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक अचल संपत्ति से जुड़ी कथित अनियमितता की जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) से करने की मांग की है। साकेत गोखले ने याचिका में आरोप लगाया है कि नरेंद्र मोदी 1998 से गुजरात सरकार की एक विवादित भूमि आवंटन नीति के लाभार्थी थे, जिसके तहत सार्वजनिक जमीनों को विधायकों को कम कीमत पर आवंटित किया गया था।

याचिका के अनुसार, मोदी को 2002 में इस नीति का लाभ मिला और 25 अक्टूबर, 2002 को गांधीनगर सिटी (प्लॉट नं. 411, सेक्टर1, गांधीनगर) में सिर्फ 1.3 लाख रुपये में एक प्लॉट उन्हें दिया गया था। जब मोदी ने 2007 में गुजरात विधानसभा का चुनाव लड़ा था तो उन्होंने अपने हलफनामे में प्लॉट नं. 411 की जानकारी दी थी। हालांकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी द्वारा दायर किए गए हलफनामा में और 2015, 2016 तथा 2017 में प्रधानमंत्री द्वारा अपने संपत्ति की घोषणा में इस प्लाट की जानकारी कथित तौर पर नहीं दी गई है।

याचिकाकर्ता ने कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कथित रूप से ग़लत शपथ पत्र दिया जाना नागरिकों के जानने के अधिकार का उल्लंघन है जिसमें उन्हें अपने उम्मीदवार के बारे में पूरा जानने का अधिकार है। याचिका में माँग की गयी है कि सेवानिवृत्त मुख़्य न्यायाधीश के नेतृत्व में विशेष जाँच टीम यानी एसआईटी गठित कर पूरे मामले की जाँच की जाये।

गौरतलब है कि विधायकों को सस्ते कीमत में जमीन आवंटित करने की नीति का गुजरात हाईकोर्ट ने वर्ष 2000 में स्वत: संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज किया था। दो नवंबर 2012 को उच्चतम न्यायालय ने गुजरात हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वे जल्द इस मामले की सुनवाई करे। उच्चतम न्यायालय ने ये भी निर्देश दिया था कि इस नीति के तहत और कोई भी आवंटन नहीं होना चाहिए और बिना गुजरात हाईकोर्ट की सहमति के पहले से आवंटित किए गए प्लॉट के ट्रांसफर की इजाजत नहीं दी जाएगी।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि नरेंद्र मोदी ने हलफनामा में प्लॉट नं. 411 की जगह गांधीनगर में प्लॉट नंबर 401/ए के एक चौथाई हिस्से का मालिक बताया है, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। गोखले ने कहा है कि प्लॉट नंबर 401/ए जैसी कोई जगह है ही नहीं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि गुजरात सरकार की नीति के तहत प्लॉट नंबर 401 को वित्त मंत्री अरुण जेटली को आवंटित किया गया है। गोखले ने खुद के द्वारा किए गए दौरे के आधार पर दावा किया है कि प्लॉट नंबर 401 अन्य भाजपा नेताओं को आवंटित किए गए प्लॉट के बगल में ही है और ये सभी प्लॉट गांधीनगर के बेहद खास स्थान पर हैं। उन्होंने आगे कहा कि सरकारी दस्तावेजों से इस बात की पुष्टि होती है कि प्ल़ॉट नंबर 411 के मालिक अभी भी नरेंद्र मोदी ही हैं।

याचिका में उच्चतम न्यायालय के फैसलों का हवाला दिया गया है, जिसमें उम्मीदवारों को जरूरी जानकारी का खुलासा करने को कहा गया है। अगर कोई उम्मीदवार जमीन, संपत्ति की जानकारी का खुलासा नहीं करता है तो जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 1951 के तहत आपराधिक मामला होगा। याचिका के अनुसार मोदी ने 2002 में इस योजना का लाभ लिया था। इसमें मोदी को गाँधीनगर शहर के बीचोबीच सेक्टर-1 में प्लॉट नं- 411 सिर्फ़ 1.3 लाख रुपये में 23 अक्टूबर 2002 को आवंटित कर दिया गया। इस प्लॉट का ज़िक्र उन्होंने गुजरात विधानसभा चुनाव लड़ने के दौरान 2007 के चुनावी शपथ पत्र में किया था।

चुनावी हलफनामे में मानी सरकारी ज़मीन की बात

इस बीच 26 अप्रैल 19 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वाराणसी सीट से लोकसभा उम्मीदवार के तौर पर नामांकन भरा। नामांकन के साथ दायर हलफनामे में दी गई जानकारी और हाल की उनकी सार्वजनिक घोषणाओं से इस बात की पुष्टि होती है कि बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गांधीनगर के एक पॉश इलाके में खुद को जमीन उपहार में दी थी। इस जमीन की कीमत आज एक करोड रुपए से ज्यादा है, जो इसके लिए चुकाई गई कीमत से तकरीबन 100 गुना अधिक है। इसके अलावा हलफनामे से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि 2007 में राज्य की ओर से उच्चतम न्यायालय को दी गई जानकारी में मीनाक्षी लेखी ने इस तथ्य को उच्चतम न्यायालय से छुपाया था। लेखी ने उच्चतम न्यायालय को बताया था कि साल 2000 के बाद गुजरात सरकार ने इस प्रकार का भू आवंटन नहीं किया है। जमीन पाने की पात्रता मोदी को 2001 में मिली जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री नियुक्त हुए। फरवरी 2002 में राजकोट दो निर्वाचन क्षेत्र से उपचुनाव जीत कर मोदी राज्य विधानसभा में चुने गए थे।

इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार जेपी सिंह की रिपोर्ट.

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