बकरी चराने वाले को जिंदा जलाना और कूड़ा बीनने वालियों के साथ गैंगरेप

Mitra Ranjan : हमारे समाज में मौजूद जातिगत दर्जेबंदी ने किस कदर लोगों को वहशी बना दिया है उसके बारे में कुछ भी कहना कम है। अभी बिहार में हुई दो घटनाएँ इसी ओर इशारा कर रही हैं – किसी दबंग साहब के खेत में एक दलित परिवार की बकरी चले जाने पर १५ साल के किशोर के साथ मार-पीट और बाद में उसको जिन्दा जला देने का अमानवीय कृत्य और कूड़ा बीनने वाली ५ दलित बच्चियों /महिलाओं के साथ गैंगरेप की क्रूर घटना ! किस संवेदना की बात करते हैं साहब। और मीडिया- चैनल और प्रिंट, इन खबरों को संजीदगी एवं तत्परता से सामने लाने से मुंह चुराते रहे।

एक दलित मुख्यमंत्री के राज्य में भी ये हाल है। सामाजिक संरचना में ऊपरी पायदान पर काबिज लोगों की जुबान ये कहते हुए नहीं थकती कि जातिवाद ख़त्म होता जा रहा है, कि अब तो दलित / पिछड़े / वंचित / आदिवासी ही जातिवाद और शोषण की झूठी कहानियां रच रहे हैं, कि ये ही लोग असल में जातिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, कि हमारे सभ्य समाज की सुव्यवस्था में बढ़ते खून-खराबे के लिए ये लोग ही जिम्मेदार हैं और न जाने क्या -क्या !

लेकिन असलियत तो सबके सामने है जो हर दो-चार दिन में गाहे-बगाहे इस परम सहिष्णु व दयालु देश और हिन्दू समाज के किसी न किसी कोने में मवाद से भरे फोड़े की तरह फूट निकलती है. क्या सामंती / पितृसत्तात्मक मूल्यों के पैरोकारों की ये गलाजत और सत्ता तमाम केन्द्रों द्वारा इकट्ठे होकर प्राणपण से उनकी रक्षा में जुट जाने की अनदेखी की जा सकती है? विविध स्तरों पर शोषण-उत्पीड़न की निरंतर बढ़ती घटनाओं के असली दोषियों शिनाख्त क्या अब भी बाकी है? और बेहद दुखद आश्चर्य है कि इन घटनाओं के पुरजोर विरोध में सांझी लड़ाई में उतरने को लेकर तमाम दलित संगठनों के भीतर भी वो एकजुटता नहीं नजर आती जिसकी उनसे अपेक्षा है।

भाकपा माले ने ताकतवर प्रतिरोध के लिए जो पहल की है उसके साथ तमाम प्रगतिकामी चेतना वाले संगठनों, लेखकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों समेत सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी एकजुट होना चाहिए और दक्षिणपंथी राजनीति के साथ-साथ सामाजिक न्याय का छद्म रचनेवाले नौटंकीबाजों का भी पर्दाफाश करना चाहिए. कहना न होगा कि आरएसएस के मुखिया श्री मोहन भागवत जी के ताजा बयान, जिसमे वो महिलाओं को हाउसवाइफ बने रहने की नेक व सद्भावपूर्ण सलाह दे रहे हैं, को भी उसी कड़ी में देखा जाना चाहिए जो पूरे समाज को सामंती व पितृसत्तात्मकता के नृशंस जकड़न से बाहर नहीं निकलने देना चाहती।

http://timesofindia.indiatimes.com/…/articlesh…/44829446.cms

http://epaper.jansatta.com/c/3665187

http://khabar.ibnlive.in.com/news/129061/3

पत्रकार, लेखक और सोशल एक्टिविस्ट मित्र रंजन के फेसबुक वॉल से.

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