बिहार के महामहिम, बाड़मेर की महिला, दलित उत्पीड़न का केस और वरिष्ठ पत्रकार की गिरफ्तारी…. सच क्या है?

Shrawan Singh Rathore : बाड़मेर के वरिष्ठ पत्रकार दुर्गसिंह राजपुरोहित को बाड़मेर पुलिस ने गिरफ्तार किया और बिहार पुलिस को सौंप दिया। न कोई नोटिस , न सुनवाई का मौका न FIR की जानकारी। व्हाट्सएप पर पटना के एसएसपी के नम्बर से बाड़मेर एसपी मनीष अग्रवाल को एक वारंट की फोटोकापी मिली। किसी आतंकी को भी उसका गुनाह बताए बिना सजा या गिरफ्तारी नहीं हुई लेकिन 18 वर्षों से पत्रकारिता कर रहे पत्रकार को एक सेकेंड में उठा कर अपने पुलिसकर्मियों के साथ पटना भेज दिया। Continue reading

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बिहार में मीडिया पर घोषित प्रतिबंध

Vinayak Vijeta : मुख्यमंत्री का सख्त निर्देश, ईटीवी को कोई बाईट नहीं दें जदयू नेता… राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जदयू नेताओं और अपने प्रवक्ताओं को यह सख्त निर्देश दिया है कि वह ईटीवी को न तो कोई बाईट दें और न ही ऑन या ऑफ द रिकार्ड इस चैनल के किसी संवाददाता से बात करें। सुत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री का इस चैनल पर गुस्सा पिछले दिनों पंचायत प्रतिनिधियों के सम्मेलन को लेकर था। बताया जाता है कि इस सम्मेलन के प्रचार के लिए सूचना और जनसंपर्क विभाग ने पटना के तीन निजी चैनलों को विज्ञापन दिया था। पर ईटीवी ने इस विज्ञापन को इसलिए स्वीकार नहीं किया कि विज्ञापन का दर चैनल के निर्धारित दर से काफी कम था।

इसके वावजूद ईटीवी ने उस सम्मेलन का लाईव किया जहां मंच के टेबल पर ईटीवी का माईक भी लगा था पर मुख्यमंत्री ने ईटीवी के माईक को हटवा दिया। बुधवार को जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ट नारायण सिंह ने मुख्यमंत्री के निर्देशनुसार सभी प्रवक्ताओं को तलब किया और उन्हें यह सख्त निर्देश दिया कि न ही कोई प्रवक्ता या जदयू का कोई नेता ईटीवी को अपना बाईट देगा न ही कोई इस चैनल के पैनल डिस्कशन में भाग लेगा। अपरोक्ष रूप से मीडिया को अपने बंदिश में रखने की लगातार कोशिश करने वाले नीतीश कुमार के इस निर्देश की गुप्त चर्चा जगह जगह हो रही है।

अपने पहले शासन काल में से ही काफी अहंकारी बन गए नीतीश कुमार के उस रूप की चर्चा भी मीडिया जगत में हो रही है जब तत्कालीन आबकारी मंत्री जमशेद अशरफ के हवाले से पटना से प्रकाशित एक प्रमुख हिन्दी दैनिक के वरीय पत्रकार ने सुशासन (शराब शासन) पर एक खबर लिखी थी जिसमें पूरे बिहार में हर चौक चौराहे पर शराब की दुकान खुलने और गलत आबकारी नीती की चर्चा थी। तब यह  खबर उस अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रमुखता से छपी थी।

उस खबर को लेकर नीतीश कुमार उस अखबार और उसके प्रबंधन पर इतने क्रोधित हुए कि प्रबंधन को उस वरीय पत्रकार को नौकरी से हटाने तक का दवाब बना दिया था। कई दिनों तक इस अखबार को सरकारी विज्ञापन देने पर रोक लगा दी गई। नीतीश का गुस्सा देख तब इस अखबार के मालिक तक पटना आए और नीतीश कुमार से मिलने की कोशिश की पर खफा नीतीश ने उन्हें मिलने का समय नहीं दिया। बाद में किसी तरह इस अखबार के  प्रबंधन ने इस मामले को पैचप करते हुए अपने उस वरीय पत्रकार का तबादला दिल्ली कर दिया। बाद में काफी मान-मनौव्वल के बाद नीतीश कुमार माने जिसके बाद उन वरीय पत्रकार को फिर पटना पदस्थापित किया गया।

बिहार के स्वतंत्र पत्रकार विनायक विजेता की फेसबुक वॉल से. 

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जिस हत्यारे शहाबुद्दीन को फांसी होनी चाहिए, उसे सलामी देने जेल में अपना मंत्री भेजते हैं नीतीश कुमार, सोशल मीडिया चुप्पी साधे है

Yashwant Singh : दो भाइयों को तेजाब से नहला कर मारने और तीसरे की गवाही देने जाते वक्त हत्या करने के आरोपी कुख्यात शहाबुद्दीन को फांसी देने की जगह इसके जेल के दरबार में हाजिरी लगाने जाते हैं नीतीश कुमार के एक मंत्री… आप चुप हैं क्योंकि ये मामला भाजपा और मोदी से जुड़ा नहीं है… इस पर भी बोलिए लिखिए अभियान चलाइए जनाब… बिहार के सीवान जिले के चंदा बाबू जिस हत्यारे शहाबुद्दीन और उसके गिरोह के कारण तीन बेटे गंवा चुके हैं, उस शहाबुद्दीन से जेल में मिलने बिहार के एक मंत्री महोदय जाते हैं. जेल में बाकायदा चाय नाश्ता होता है. फोटो सोटो खींचे खिंचवाए जाते हैं. शहाबुद्दीन सांसद रहा है, हार्डकोर क्रिमिनल है, दर्जनों मामले उस पर हैं. वह लालू और नीतीश कुमार का प्रिय पात्र माना जाता है. यही कारण है कि नीतीश-लालू की मिली जुली सरकार के मंत्री महोदय बाकायदे हाजिरी लगाने जेल में जाते हैं और शहाबुद्दीन से मिलकर आते हैं.

इस शहाबुद्दीन ने चंदा बाबू के दो बेटों को तेजाब से नहला कर मार डाला था और तीसरे बेटे को गवाही देने जाते वक्त मार दिया था. शहाबुद्दीन को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है तो चंदा बाबू दुखी हुए लेकिन उनके पास सुप्रीम कोर्ट जाने भर को पैसा नहीं है. इसको लेकर खबरें कई जगह चलीं और उसी बहाने शहाबुद्दीन के आतंक और हत्याओं का जिक्र चल पड़ा. इस सबसे बेपरवाह नीतीश कुमार ने अपने मंत्री महोदय को जेल में जाकर शहाबुद्दीन का हालचाल पूछने को भेज दिया.

क्या आपको लगता नहीं कि ‘गंगाजल’ या ‘जय गंगाजल’ जैसी फिल्में इसी बिहार के इसी शहाबुद्दीन जैसों पर आधारित होती हैं. कोई एक बिहार के पत्रकार महोदय फेसबुक पर लिख रहे थे कि ‘जय गंगाजल’ टाइप फिल्मों से प्रकाश झा बिहार का इमेज बिगाड़ देते हैं. अरे भइया ये शहाबुद्दीन तो बिहार का ही है न. दो बेटों को तेजाब से नहला कर मारने और तीसरे को गवाही देने कोर्ट जाते वक्त मारने का ये मामला बिहार का ही है न. इतने दुर्दांत अपराधी को हाईकोर्ट से जमानत मिल जाने का मामला बिहार का ही हैं. जेल में जाकर इस दुर्दांत हत्यारे से मंत्री महोदय के मिलने का मामला बिहार का ही है न.

चंदा बाबू वाली अपनी पिछली पोस्ट में मैंने लिखा था कि चंदा बाबू और उनके परिवार के साथ जो जो हुआ, उसे देख सुन कर यकीन नहीं होता कि कोई एक जन्म में इतना दुख देख झेल सकता है. चंदा बाबू की हिला देने वाली कहानी से ज्यादा हिला देने वाली राजनीति नीतीश कुमार ने की है. जिस शहाबुद्दीन को फांसी पर चढ़ाकर उसका काम तमाम कर देना चाहिए, उसे न सिर्फ जमानत दे दी गई बल्कि उससे मिलने मंत्री महोदय भी पहुंच गए. जेल में जमी शहाबुद्दीन की महफिल में नीतीश के मंत्री ने जो हाजिरी लगाई, उससे समझ में आता है कि राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के पूर्व बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन अपने गिरोह से जो जो कांड मर्डर लूट करवाते हैं, उसका हिस्सा उपर तक के नेताओं को भी भिजवाते हैं ताकि कुर्कम बेरोकटोक जारी रहे.

जो तस्वीरें आई हैं उसमें दिखता है कि शहाबुद्दीन का दरबार जेल में सजा है. जेल में शहाबुद्दीन को फाइव स्टार होटल जैसी सुविधाएं मिली हुई नजर आती हैं. जब जेल में शहाबुद्दीन से मिलने सत्ता पक्ष के मंत्री पहुंचे तो उनकी अच्छी खासी खातिरदारी की गई. 6 मार्च को बिहार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री अब्दुल गफूर आरजेडी के एक विधायक के साथ सीवान जेल में शहाबुद्दीन के पास हाजिरी लगाने पहुंचे. टेबल कुर्सी लगाकर शान से बैठे बाहुबली शहाबुद्दीन ने उन्हें प्लेट में सजाकर मिठाइयां मंगवाई और उनके साथ बातचीत की. सियासी गलियारों में चर्चा है कि शहाबुद्दीन की पावर और प्रभाव फिर से बढ़ने लगा है.

बेशर्म मंत्री अब्दुल गफूर इस मुलाकात को मानवीय आधार पर की गई मुलाकात बताता है. और इस सबका नतीजा देखिए कि सीवान में शहाबुद्दीन के शूटर ने चिमनी मालिक की गोली मारकर की हत्या कर दी. जाहिर सी बात है, ये रंगदारी के लिए और दहशत फैलाने के लिए किया गया कांड है ताकि लोग जान जाएं कि शहाबुद्दीन का सूर्य अस्त नहीं हुआ है. वह पहले जितना ही पावरफुल है. पता चला है कि सीवान के एक गांव में मो. शहाबुद्दीन के शूटर के रूप में चर्चित अबरे आलम और उसके सहयोगियों ने चिमनी व्यवसायी को गोलियों से भून दिया. हत्या से आक्रोशित चिमनी व्यवसायी के परिजनों व ग्रामीणों ने शव को अपराह्न एक बजे तक घेर कर रखा. परिजनों ने मुखिया पति पर शहाबुदीन के शूटर होने का आरोप लगाया और कहा कि उन्हें स्थानीय थाने पर भरोसा नहीं है.

दो सगे भाइयों को अगवा कर तेजाब से मारने और तीसरे को गवाही देते वक्त मारने वाले अपराधी शहाबुद्दीन के साथ मंत्री के मुलाकात मामले में वो लोग चुप्पी साधे रहेंगे जो रोजाना दर्जनों बार मोदी और भाजपा के खिलाफ लिखते लड़ते रहते हैं. शायद इसलिए कि ये मामला मुस्लिम, यादव, पिछड़ा, दलित समीकरण से जुड़ा है. अपने घर का अपराधी और अपराध अनदेखा कर देना चाहिए, यह पुरानी प्रथा परंपरा है. लेकिन जो लोग नैतिकता, इमानदारी, लोकतंत्र, वैल्यूज, कानून आदि की बात करते हैं उन्हें अपराधी अपराधी में भेद नहीं करना चाहिए. सरकार चाहें मोदी की हो या नीतीश की या अखिलेश की, जहां भी गलत हो रहा है, वहां विरोध करिए वरना ये लोकतंत्र कबाड़तंत्र में तब्दील हो जाएगा और देश में राजनीतिक पार्टियां नहीं बल्कि अपराधी गिरोह सरकारें चलाया करेंगे. इसके लक्षण उपर से लेकर नीचे यानि केंद्र से लेकर राज्यों तक में दिखने लगे हैं.

#ShameNitishKumar #ShameLaluYadav #ShameShahabuddin

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


शहाबुद्दीन की हकीकत जानने के लिए इस खबर को जरूर पढ़ें…

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बिहार के जहानाबाद में आईबीएन7 संवाददाता पर प्राणघातक हमला

जिला युवा राजद अध्यक्ष धर्मपाल यादव पर हमले का आरोप

बिहार में नई सरकार के गठन के बाद यूं तो अपराध में बढ़ोतरी हुई ही, अब पत्रकारों की भी जान सुरक्षित नहीं दिख रही। बुधवार को जहानाबाद नगर थाना क्षेत्र के टेनीबिगहा गांव में आईबीएन-7 के जिला संवाददाता मुकेश कुमार पर जानलेवा हमला किया गया। गंभीर रूप से घायल मुकेश ने हमले का आरोप अपने गांव टेनीबिगहा के ही रहने जिला युवा राजद के अध्यक्ष धर्मपाल यादव और उसके एक करीबी अनिल यादव पर लगाते हुए नगर थाना में भादवि की धारा 307, 341 व 323 के तहत प्राथमिकी (32/16) दर्ज करायी है।

मुकेश ने दोनों आरोपितों पर राइफल के कुंदे से प्रहार करने का आरोप लगाया है। इस घटना के बाद इस गांव में एक ही जाति के दो गुटों के बीच तनाव गहरा गया है। इधर आरोपितों ने भी नगर थाना में पत्रकार मुकेश के खिलाफ एक आवेदन देकर उसपर अपने साथियों के साथ घर पर चहड़कर गाली-गलौज और जान से मार देने की धमकी देने का आरोप लगाते हुए थाने में एक शिकायत दर्ज कराई है।

जहानाबाद नगर थानाध्यक्ष नागेन्द्र कुमार ने बताया कि पत्रकार पर हमले के आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए देर रात टेनी बिगहा गांव में छापेमारी की गई पर दोनों आरोपित फरार निकले। इस घटना के विरोध में राजधानी पटना के पत्रकारों का एक दल आज शाम 3 बजे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलकर उनसे हमलावरों की अविलम्ब गिरफ्तारी की मांग करने वाले हैं। सूत्र बताते हैं कि गांव की ही एक छात्रा जो आरोपित अनिल की बेटी है से संबंधित समाचार के प्रसारण से दोनों मुकेश से खफा थे और पूर्व में भी मुकेश को मोबाइल पर धमकी मिली थी।

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार विनायक विजेता की रिपोर्ट.

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काटजू ने ऐलान किया- बिहार में होगी महागठबंधन की एकतरफा जीत

Sweep in favour of the Mahagathbandhan in Bihar

Markandey Katju : I predict not just a bare victory but a sweep in favour of the Lalu-Nitish alliance in the coming Bihar elections. This is based on simple mathematics. As I had said in an earlier post, voting in most states in India, including Bihar, is on the basis of caste and religion. The exception to this rule is when there is a wave.

In the May 2014 elections there was a Modi wave, as people, particularly the youth, were captivated by the magic slogan of ‘vikas’, which promised millions of jobs to our huge population of unemployed youth, whose voting age had been reduced from 21 to 18 by a Constitutional amendment of 1988.

This slogan, however has proved hollow, as jobs have not been created, and the youth have been left high and dry. While there has been a lot of big talk, hardly anything has been done by Modi except stunts like ‘Swatchata Abhiyan’ ( I visited Varanasi yesterday and found it as dirty as ever, and I spoke to many citizens there who said the same ), Yoga Day, etc and meaningless foreign trips which must have cost a huge amount of money and whose end result is ‘ khoda pahaad, nikli chuhiya’.

So the Modi wave has totally dissipated, and now voting in Bihar will be on the traditional lines of caste and religion.
Here are the caste demographics of Bihar which I got from the net :

Population (%)

OBC/EBC 51% ( Yadavs -14%, Kurmis- 4%,[24][25]( EBCs – 30%[26][27][28][29][30] -includes

kushwahas – 6% Koeris -8%,[31] Teli-3.2%))

Mahadalits* + Dalits(SCs) 16%[32][33]

Muslims 16.9%[10]

Forward caste 15% [34](Bhumihar -3%, Brahmin-5%,[35] Rajputs- 6%, Kayasth- 1%)

Adivasis(STs) 1.3% [36][37]

Others 0.4% (include Christians,Sikhs,Jains)

As per, 2011 Census of India , Scheduled Castes constitute 16% of Bihar’s 104 million population.[38] The census identified 21 of 23 Dalit sub-castes as Mahadalits.[39] Mahadalit community consists of the following sub castes – Bantar, Bauri, Bhogta, Bhuiya, Chaupal, Dabgar, Dom (Dhangad), Ghasi, Halalkhor, Hari (Mehtar, Bhangi), Kanjar, Kurariar, Lalbegi, Musahar, Nat, Pan (Swasi), Rajwar, Turi, Dhobi, Pasi, Chamar and Paswan (Dusadh).[40] Paswan caste was initially left out of the Mahadalit category.[41][42] Adivasis (Scheduled Tribes) constitute around 1.3% of Bihar population.[43][44] Tribals include Gond, Santhal and Tharu communities in Bihar.[45][46]

Extremely Backward Class (EBCs) are also sometimes referred to as Most Backward Class(MBCs). There are 130-odd EBC castes in Bihar. Yadavs and Kurmis constituting 19% and Muslims about 17% will solidly vote for the Lalu-Nitish alliance, which makes it 36%. Muslims will vote for it ( despite Owaisi, who is regarded as a BJP vote splitter by Muslims, and who will therefore not be misled by him ) because Muslims are feeling very insecure after love jihad, ghar wapasi, speeches of Adityanath, Sadhvi Niranjan Jyoti ( calling them haramzadas) and incidents like in Muzaffarnagar, Ballabhgarh, and the latest one at Dadri.. So they will solidly vote for the alliance. A section of the other backward castes, say 8-10%, will also vote for the alliance, as Lalu has successfully described it as a fight between the backwards and the forward castes. Thus the tally of the Nitish-Lalu aalliance comes to about 45% votes, which represents a sweep ( BJP got a majority in the Lok Sabha with only 31% votes )

As regards, the NDA, its support is from the upper castes, and a section of EBCs( also called MBCs ) and a section of dalits, because of Paswan, Manjhi and Upendra Kushwaha. The upper castes in Bihar, as can be seen from the above chart, are altogether only 15%. Paswan does not have the support of all the dalits ( who are divided into a large number of sub castes) in Bihar, unlike Mayawati who has the support of almost all the dalits in U.P. So he may get the NDA about 6-7% votes. Manjhi may get 7-8% MBC votes, and Kushwaha may get 4%votes.

Thus the total tally of NDA votes is 15+7+8+4=34%

There is clearly going to be a sweep in favour of the Mahagathbandhan in Bihar.

सुप्रीम कोर्ट के चर्चित जज रहे और प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन रह चुके बेबाक शख्सियत मार्कंडेय काटजू के फेसबुक वॉल से.

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बिहार में सामूहिक दलित संहार पर कोबरा पोस्ट का स्टिंग – ‘ऑपरेशन ब्लैक रैन’

‘कोबरा पोस्ट’ ने बिहार में दलित जन-संहार पर ‘ऑपरेशन ब्लैक रैन’ स्टिंग किया है। उसने राज्य के छह सामूहिक दलित संहार के अपराधियों पर कैमरा फोकस करते हुए खुलासा किया है कि किस तरह मध्य बिहार में रणवीर सेना मिलिशिया तक कानून के लंबे हाथ पहुंचने से बच रहे हैं। उन्हें किस तरह राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है और ऐसे संहारों के लिए उन्हें एक खास वर्ग से लगातार आर्थिक सहयोग और समर्थन भी मिल रहा है।

घटनाक्रमों पर प्रकाशित ‘कोबरा पोस्ट’ की ये कवर स्टोरी इस प्रकार है, अंग्रेजी में पढ़ें –

OPERATION BLACK RAIN: REVISITING THE KILLINGS OF DALITS OF BIHAR AND CONFESSIONS OF THEIR KILLERS

Cobrapost captures on-camera the confessions of perpetrators of six major massacres of poor, unarmed Dalits in Central Bihar, revealing how the Ranveer Sena militia planned and conducted these indiscriminate killings with impunity and how they twisted the long arm of the law, who trained them, who armed them, who financed them and who lent them political support. 

In an year long investigation undercover operation, Cobrapost captures on-camera six commanders of the dreaded outfit Ranveer Sena, two of them declared innocent and set free by the Patna High Court for lack of evidence, confessing to their involvement in Six major massacres of Dalits in Central Bihar, namely,Sarthua(1995), Bathani Tola (1996), Laxmanpur Bathe (1997), Shankar Bigha (1999), Miyanpur (2000) and Ikwari (1997). In all, 144 were killed in these six massacres including several women and children. The six RS men are Chandkeshwar, Ravindra Chaudhary, Pramod Singh, Bhola Singh, Arvind Kumar Singh and Siddhnath Singh. These mass murderers not only reveal how they planned and carried out killings on such scale with precision and ruthlessness of a war machine but also candidly admit who trained them, who armed them, who financed them and who lent them political support, naming some big-time politicians. It was not a coincidence that the Justice Amir Das Commission of Inquiry was abruptly dismissed as soon as the JDU–BJP alliance came to power in Bihar, and Justice (Retd.) Amir Das categorically states that it was because his report could have implicated some prominent politicos for their support to the private army he was asked to close the shop without submitting a report. Perhaps, never in the history of Independent India was an inquiry commission investigating mass murders asked to demit office.

Their confessions also reveal the diabolical intention of the Ranveer Sena of carrying out massacres in 50 villages in a single day. Equipped with modern lethal weapons such as AK-47s, LMGs and SLRs, among others, and a capacity to strike at will at the place of their choosing, it is not difficult to imagine what havoc the private army of upper caste landlords could have wreaked on their miserable targets had they put the plan into operation.

Posing as a film-maker, supposedly working on a film on Ranveer Sena, Cobrapsot Associate Editor K. Ashish interviewed Chandkeshwar alias Chandreshwar, Pramod Singh, Bhola Singh Rai, Arvind Kumar Singh, Siddhnath Singh and Ravindra Chaudhry. All except Ravindra Chaudhry, were accused in Laxmanpur Bathe massacre. Ravindra Chaudhry was however mainly involved in the Sarthua(Bhojpur),massacre.which had taken place in the year 1995. Chandkeshwar and Pramod Singh have been set free by the Patna High Court, while Bhola Singh, Arvind Kumar Singh and Siddhnath Singh were let off the kook by the lower courts. Bhola Singh is still wanted by the Bihar Police and is hiding in the steel city of Tata Nagar in Jharkhand.

These confessions also make it clear that Ranveer Sena had the tacit support from political quarters both at the centre and at the state level. While a former prime minister purportedly helped them get modern lethal weapons such as LMGs, SLRs and semi-automatic rifles the Indian Army rejects and sells as scrap, a former finance minister apparently helped the outfit with finances. Another politician evacuated them in his car when they found the police closing in on them after a mass murder. Consisting largely of Bhumihar and Rajput landlords, the Sena cadre received training from army jawans either on leave or retired, as private donations from their supporters helped them buy weapons such as AK-47 by the dozen that were part of the Purulia arms drop in December 1995.

But before listening to the blood-curdling confessions of these mass murderers, a throwback to the emergence of the dreaded Ranveer Sena would be in order. To ostensibly counter the rising unrest among the farm labour who had started organizing themselves under the banner of CPI-ML (Liberation), an underground leftist outfit, and had started to refuse to do begar or unpaid labour in the farmlands of the upper caste landowners while demanding minimum wages, Dharicharan Singh of Belaur village in Bhojpur district formed a private army of the landowners. He christened this outfit Ranveer Sena after his kin, Ranveer Chaudhry, a retired army man. No sooner its command fell on Barmeshwar Singh, head of Bhojpur-Khopira village, it became a well-oiled machine, trained to kill, ruthlessly and indiscriminately, equipped with modern weapons like AK-47, LMGs, semi-automatic, SLRs and Mousers, with its support base spreading far and wide among the landowning upper castes. Within a span of next six years, the outfit executed 16 massacres killing 300 Dalits, men, women and children, even the unborn, across six districts of Bihar, namely, Arrah, Arval, Bhojpur, Gaya, Aurangabad and Jahanabad. The nation bowed its head in shame when the outfit killed 58 Dalits on the cold night of December 1, 1997. Among those killed were 27 women and 16 children. The ruthless killers of the dreaded Sena did not spare even the pregnant women, tearing their wombs open and putting the unborn to death.

This kind of psychopathic butchery was witnessed again in 2002 Gujarat riots when rioters tore open the wombs of pregnant Muslim women and cut the unborn into pieces in full public view as they rejoiced at their barbaric feat.

In another shocking judgment on January 14th, in this year. A lower court yet again acquitted all 24 accused of killing 23 Dalits in Shankar Bigha in Arwal district in 1999 on the eve of the Republic day. Similarly, in October 2013 the Patna High Court had acquitted all 26 Ranveer Sena men – including 16 who had been put on death row by the lower court – accused of killing 58 Dalits in worst-ever massacre at Laxmanpur Bathe on December 1, 1997. The Bathani Tola massacre case met the same fate on April 17, 2012, when the Patna High Court set all 23 RS men free who were accused of killing 21 Dalits, including 11 women and six children on July 11, 1996. The 32 victims of Miyanpur massacre of June 2000 must have turned and twisted in their graves when the Patna High Court allowed all 10 accused except one to walk free on July 3, 2013. These decrees have assumed a pattern and one wonders if the rest of the cases would meet the same fate in days to come for the recurring theme of these judicial pronouncements is lack of evidence.

Although we have dissenting voices among those who investigated the massacres. For instance, Dy SP CID (Retd.) Mirza Maqsood Alam Beg is quite categorical while averring that there was clinching evidence against all accused: “Dekhiye usmein direct evidence toh unke against tha hi eyewitness … logon ne dekha pehchana … uske alawa iss occurrence ke pehle un logon ke yehan meeting bhi hua karti thi meeting mein ye log attend karte the na haan inhi logon ke yehan meeting hua karti thi wo sab cheezein diary mein hain (You see, there is direct evidence against them … eyewitness … people saw them and identified them … apart from that before the occurrence [of a massacre] these people would hold meetings at their places … all these things are recorded in case diary).” Beg was the IO of the major massacre Laxmanpur Bathe and was responsible for filing the charge sheet. Based on such evidence the lower courts had awarded many of these murders death sentence and others life imprisonment.

These acquittals make one wonder if they did not kill more than 300 Dalits then who did? Shall one say then, although so many were murdered in these massacres, no one killed them?

In order to find if the perpetrators of such heinous mass murders were really as innocent as these pronouncements made them look, Cobrapost decided to track some of them down and see if they too declared they had no blood in their hands.

Assuming an alias and supposedly working on a film on Ranveer Sena, Cobrapsot Associate Editor K. Ashish travelled the length and breadth of Central Bihar and interviewed six RS strongmen who far from pleading their innocence confessed to have been part of five big massacres that their outfit executed: Bathani Tola, Laxmanpur Bathe, Shankar Bigha, Miyanpur and Ikwari. They in fact bear their inhuman deeds something like a badge of honour and relish the details of each massacre they executed. The six RS men are Chandkeshwar alias Chandreshwar, Pramod Singh, Bhola Singh, Arvind Kumar Singh, Siddhnath Rai and Ravindra Chaudhry. All except Ravindra Chaudhry were accused in Laxmanpur Bathe massacre. Ravindra Chaudhry was however mainly involved in the Sarthua(Bhojpur),massacre.which had taken place in the year 1995. Chandkeshwar and Pramod Singh have been set free by the Patna High Court, while Bhola Singh, Arvind Kumar Singh and Siddhnath Rai were let off the kook by the lower courts. Bhola Singh is still wanted by Bihar Police and is hiding in Tata Nagar, Jharkhand.

The on-camera confessions of these members of the Sena make it amply clear that the dreaded private army had political patronage both at the state and at the centre, and they drop a few big names including those of a former prime minister who helped the outfit get modern weapons that the Indian Army sells as rejected scrap, a former finance minister who is alleged to have helped the Sena with money and some political bigwigs belonging to the BJP who tried to influence the police probe.

Here are excerpts of the interviews that K. Ashish had with these mass murderers.

Chandkeshwar Singh:

A commander of Ranveer Sena who led these massacres from the forefront is Chandkeshwar Singh. Put on life imprisonment by the lower courts for his involvement in Laxmanmur Bathe massacre but let off by the Patna High Court in Oct, 2013. Chandkeshwar Singh confesses not only to his involvement in the Bathani Tola massacre in 1996 in which he claims the private militia massacred 22 Dalits but also to have single-handedly beheaded five low-caste fishermen with his knife.

The assault on Bathani Tola was mounted in broad daylight at 3:00 o’clock in the afternoon and it happened in the presence of a police chowki close-by. The details of how the massacre was carried out are as chilling as the nonchalance with which Chandkeshwar pouts them out.

Claims Chandkeshwar: “Teen baja aur humara sena goli chalana chaloo kar di… teen baje din mein narsanghar hua kar diya wahan police chowki bhi tha (As the clock struck 3, the Sena began firing … it was 3:00 at daytime …the massacre was carried out…there was a police chowki too).” Chandkeshwar gives the headcount of the victims: “Kuch laash usmein se bahar kheench liya tha farari admi ka tab par bhi laash wahan par bais spot par tha … haan bais log ka laash wahan par tha (Some bodies of those who were part of the assault had been cleared from there, but still there were 22 bodies on the spot … yes there were 22 dead bodies lying about).” The massacre was executed at the behest of one Gupteshwar Singh of Khandau village who sent a missive to Chandkeshwar informing him how the CPI-ML cadres were harassing the landlords and it was high time the Sena took action. But Chandkeshwar held a meeting in the village and took signature of all the villagers agreeing to the assault on Bathani Tola. “Uss gaon mein lejakar meeting karaye aur kahe ki aisa toh nahi ho sakta hai na ki hum kaam karwa ke Sena se aise chal de aap log doosre arth lagaiyega toh nahi toh poore gaonse signature kiya isme baad mien hum un sabka time diye teen baje Male waalon ke saath mein humara Sena teen baje ekdum gurantee ladega un sabke saath mein (We held a meeting in that village telling them that the Sena will not take up the assignment this way. Otherwise you may draw your own inferences about it. So we got the signature of the entire village and then we told them we will take on the (CPI)ML people at 3 o’clock).” In this daylight assault, the Sena also lost some of its militiamen.

The blood-curdling account does not stop here. Cocksure the long arms of the law would never reach him, particularly after the Patna High Court set him free for lack of evidence, Chandkeshwar goes on to confess with pathologic nonchalance how he beheaded five poor fishermen, supposedly CPI-ML supporters, at the Sone River, a few hours into the night when 58 poor Dalits, men, women, children and even the unborn, were gunned down or hacked to death in Laxmanpur Bathe, after his team of 32 Sena militiamen had made good their escape in a boat over to Bhojpur. 

Claims Chandkeshwar Singh when the Cobrapost reporter asks him if they had killed five more people whose headless bodies were found about the river the next day: “Haan mundi kata tha (Yes, they were beheaded).” These poor fellows were running for their life after escaping from the scene of massacre but were caught by the murderous lot of the Sena. He did not deem it fit, says Chandkeshwar, to waste bullets on them. He simply beheaded them with his knife: “Gussa aa gya jaise goli se kyon maarega hum kyon goli kharch karenge chakoo mere paas hai hi sau do sau ki goli barbad karenge hum chakoo se hi isko kato … kaat diye (I was very angry at them. Why should I waste a bullet on them that is worth Rs 100 or so, I thought. Better use the knife I have. So I cut them down with it).” Confessing to his involvement in the most heinous of mass murders, Chandkeshwar gives an account of how they escaped to Bhojpur via the Sone after the Sena went on its killing spree in Laxmanpur Bathe that fateful night on December 1, 1997. He vividly remembers the time when the Sena launched its assault on the poor Dalits of the village with LMGs, automatics, SLRs and Mausers. “Samay dus … Hum log charh gaye the humara Sena jo tha 10 bajey wahan par hamla kar diya 29 minute net firing ka time hoga goli chala… (It was 10 when we arrived there and the Sena began the assault. The firing went for 29 minutes). The assault left 58 dead.

Siddhnath :

Another Sena commander whose name figures prominently in the investigations conducted by the state CID is that of Siddhnath, an aide of the Sena chief Barmeshwar Singh Mukhiya, Rai was in the decision-making body of the Sena and hence his involvement in all massacres either as a mastermind or as an executor is beyond doubt. However, Siddhnath proved to be a notch above law and is now a free bird. So self-assured Siddhnath is of the fact that they have circumvented the law of the land that he does not bat an eyelid when he owns up to his involvement in six major massacres of Dalits that Sena executed. Churning out details with cold-blooded apathy that only hardened criminals are known to possess, Siddhnath not only recounts the night of bloodbath that Sena had in Laxmanpur Bathe and who were behind it and who executed it but also names a former Prime Minister who had helped his outfit to procure arms.

“Toh ye hua ki bhai usko wahan se hatana ki zaroorat hai kahe ki mazboot pada hua hai wahan pe toh wahi hum log apna party ke sena kahiye satta kahiye kahiye un logon ko wahan ye kiya aur oo log wahan pe ghere donon taraf se counter hua jismein wo log mare gaye (So we decided to eliminate them (the CPI-ML). We should not allow them go stronger. So, our party, I mean the Sena, surrounded them. There was assault and counterassault in which they got killed).”

But before the assault on Laxmanpur Bathe, Sena held a meeting at Belaur village at Arrah to plan the move. Apart from him, present in this meeting were all the members of the core group including Barmeshwar Mukhiya, Vakeel Chaudhry, Bhola Singh, Shiv Narayan Singh and Krishna Nand Chaudhry. “Meeting toh huyi thi kaand se doh roj pehle … hua tha aapke Arrah district mein meeting … gaon toh Belaur mein huyi thi (The meeting took place two days before the massacre … the meeting was held in the Arrah district … took place in Belaur village).”

Opening further up to the Cobrapost team, Siddhnath reveals what he told the police while in custody how they got deadly weapons which only Indian military is authorized to possess and use. “Hum kahe oo hai LMG, MMG kaha oo aap kahan se uplabdh kiya hum kaha main uplabdh kiya tha jab humara pradhan mantri state ka huye the tab toh wo military ka rejected saman tha wahi hum logon ko uplabdh hua tha wo aapas mein baatcheet karta toh aap log deshdrohi hai kisi doosre se mangwa karke rakha hai hum kahe aisa nahi ho sakta hum log deshdrohi nahi ho sakte qatai nahi hum log desh hit ki baat karte hain toh tabhi saman kaise uplabdh hua hum kahe uplabdh hua tha jab pradhan mantri humare huye the kaun pradhan mantri hum kahe Chandra Shekhar … (I told them we have LMGs. They asked how we got them. I told them our Prime Minister got us it from Indian military as rejected lot. They called us traitors. I said no we are not traitors. We are doing it in the interest of the country. That is why we got the arms with help from our Prime Minister. They asked which Prime Minister. I said Chandra Shekhar …).”

And the conduit who got the so-called rejected lot of military weapons, according to Siddhnath, was Surya Dev, a powerful politician from Dhanbaad: “…ek nazdiki the … Surya Dev, Dhanbaad … toh Surya Dev babu wahan se military ka dher sara saman rejected le aye the aur unke paas se hum logo ko prapt hua tha (There was a close supporter of ours … Surya Dev from Dhanbad … it is Surya Dev who brought us a lot of rejected military weapons).” Sidhnath adds further: “Wo ghari pradhan mantri the Chandra Shekhar Singh aur Chandra Shekhar Singh se inka ekdum bhaichara ke jaisa sambandh tha wo aate the toh inhi ke yahan rukte the Surya Dev Babu ke yahan toh wahi hum log ko madad kiye the (In those days, Chandra Shekhar Singh was prime minister and Chandra Shekhar Singh was a very close friend of Surya Dev Babu and upon visiting he would stay at his place. This is how they both helped us).”

Refuting such a claim, Neeraj Shekhar, son of former Prime Minister Chandra Shekhara, claimed that his father did not hide anything from his family, although they knew Surya Dev very well. “Jaisa hum jante hain poora desh janta hai aisa kaam wo nahi kar sakte kisi sena ke liye (As I know so does the whole country, he would not do such favour to any Sena),” says his father of Chandra Shekhar. 

Siddhnath also spoke about another of his confessions he had made to the police in custody of his involvement in Aibatpur massacre: “Hum kahe ki wo kaand hua tha wahan Aibatpur Kanpath thana mein wahan saat wo Mushar jaati ke log mare gaye the wo humare samarthakon ke dwara mara gaya tha ye baat satya hai theek na … (I told them about the massacre that took place in Aibatpur under Kanpath police station. Our men had killed seven people of Mushar caste …).”

This massacre was conducted by nine Sena militiamen, but 64 people were named in the FIR by the local police which ultimately helped the murderers get off the hook.

According to Siddhnath, there were nine leaders who formed the core decision-making body of the Sena. He confesses to his involvement in six massacres.

“Hum logon ne … hum log toh ek uss par mein Bathe Belaur huyi thi ghatna aur ek wo Chauri huwa tha aur (Laxmanpur) Bathe, Shankar Bigha, Narayanpur teen Miyanpur chaar Hyderpur paanch Jalpur chheh … Shankar Bigha Bathani Shankar Bigha Bathe ek ghatna hai aur Narayanpur teen ghatna tha …Arval mein aur chheh ghatna yehan hai yehi toh hai (We … one massacre was in Bathe Belaur, one was in Chauri, then (Laxmanpur) Bathe, Shankar Bigha, third was Narayanpur, fourth was Miyanpur, Hyderpur was the fifth … Jalpura was the sixth … Shankar Bigha Bathani Shankar Bigha Bathe was one … the third was Narayanpur and one was in Arval … in all six massacres).” Although it is somewhat difficult to decipher what he is jumbling out, the count of massacres that he purveyed is six, undoubtedly.

When the police asked him when he was in their custody how they could commit such murders with so much butchery, Sidhnath gave this bizarre logic behind indiscriminate killing of women and children: “Humare India mein humara dharm jo hai aisa nahi batata hai ki burhe ko marega toh paap nahi lagega aur jawan ko marega toh paap lagega … aisa koi kanoon nahi hai ki aap jawan ko maroge tabhi bees saal saja aur burhe ko maroge toh doh saal saja aur larka ko maroge tho pachas saal saja. Aisa koi kanoon nahi hai (In India, our religion does not say that if you kill an old man, you won’t become a sinner or that if you kill a young man you will become a sinner … then there is no such law which says that if you kill a boy, you will face imprisonment for 20 years, if you kill an old man you get 2 years jail or if you kill a child you get a term of 50 years. There is no such law).”

If Siddhnath could wriggle out of murder charges with some help from the police who named 64 people in the FIR thus making it difficult, nay impossible, to nail the real culprits, Arvind Kumar Singh of Ikwari village and his fellow Sena men browbeat the eyewitnesses and families of victims to settle for a compromise in two mass murders of Dalits and Muslims that they executed in 1996 and 1997.

Arvind Kumar Singh:

As if committing a mass murder was something to gloat over, Arvind Singh relishes every detail of the killings of his own fellow villagers first in 1996 and then in 1997. Confessing to his involvement in both murders, the Sena strongman from Ikwari tells when and how he and his fellow Sena murderers killed in Ikwari: “Haan Ikwari mein doh narsamhar hua tha … saat log aur nau log mare gaye the (Yes, two massacres took place in Ikwari … seven and nine people were killed).” Adding further he says: “Pehla narsamhar mein saat log mare gaye … doosra mein aath-nau log tha … ek 96 mein hua ek 97 mein hua (Seven were killed in the first massacre … in the second eight–nine people were killed … one happened in 1996 and the other took place in 1997).” Arvind Singh maintains that both Ikwari massacres were the handiwork of the local Bhumihar villagers only. They were planned and executed locally by them, Barmeshwar Mukhiya and the Sena had no role, as Arvind Singh says in a self-implicating manner: “Usmein mukhiyaji nahi the … ismein toh Ikwari ke log hi the … haan total Ikwari ke bahar ka koi nahi … na na Sena toh khud Ikwari mein paanch sau ghar hum log the … aur ek-ek ghar se ek-ek aadmi nikal jata tha toh aise hi Sena ban jata tha … Sena ka humko koi zaroorat nahi tha … jahan paanch sau ghar Bhumihar ho aur maan lo ki do sau ghar se bhi ek-ek aadmi nikal gaya toh aise hi Sena ban jaati thi (Mukhiyaji [Barmeshwar] was not there … only the villagers of Ikwari were involved … yes total[ly] from Ikwari, there was no outsider involved … no no Sena … we have 500 households in Ikwari … and when a member from each family would come out we would have the Sena ready … we never needed the Sena … when you have 500 families of Bhumihar and if only a man each from 200 families volunteered we had the Sena assembled).” Arvind Singh not only could thus assemble a force as big as this on short notice but also had ready a stockpile of modern weapons to accomplish a mission, and when the caste-class enemy was within the precincts of their village the task was easy. Says Arvind Singh of their preparedness: “Hathiyar wagerah sab ghar mein tha … hathiyar toh … bachav ke liye toh sab kuchh khareed rakha tha na … kuchh mehnga hathiyar khareeda tha (Weapons and other things were already stocked at our homes … we had bought weapons for safety … we had also bought some expensive weapons … ).”

Although an accused in both massacres, Arvind Singh and other murderers managed to wriggle out of the reach of the long arms of the law by forcing a compromise on the families of the victims. Claiming that there are no cases pending either against him or against other murderers of Ikwari, he tells how they managed to stay free: “Na na hum sab compromise karwa liye … hum log gaon mein jitna case tha … hum log ke ooper chahe un logon ke ooper keh sun kar chahe laathi danda ke bal se … sab samajha bujha ke sab compromise hai (No, no. We managed to clinch a compromise with them in all cases … we persuaded them with cajoling or show of force to come around and arrived at a compromise with them).” As a result all cases were withdrawn.

Pramod Singh:

Another member of this gang of ruthless killers is Pramod Singh. An accused in the mass killing of Dalits in various massacres that his outfit carried out, Pramod Singh too has been let off by the Patna High Court. But he is still incarcerated in Arrah jail for his involvement in some other crime. Cobrapost reporter met him in the jail, and in this interview the murderer did not flinch even for moment while recounting his involvement in these mass murders. He unabashedly confessed to his involvement in the Miyanpur massacre that his outfit carried out in June 2000 in Aurangabad district. Here is why and how the Ranveer Sena conducted the assault on Miyanpur and killed 32 Dalits and Muslims, in his own words: “Gaon jo tha Naxali support gaon tha Ranveer Sena ke target par bahut pehle tha uss karya ko log anzam diya (That [Miyanpur] village was the supporter of the Naxals and was thus on the target of the Ranveer Sena. We executed that massacre).” The assault was led by none other than Barmeshwar Mukhiya himself as Pramod Singh mumbles an affirmative double “Hoon, hoon” when he is asked if the Sena supremo led the massacre.

When the Cobrapost reporter asks him if he could tell him of any such massacre in which he took part along with Barmehswar Mukhiya and others, he replies: “Miyanpur tha … bahut log tha wo bhi tha (It was Miyanpur [massacre] … there were many … he too [Barmehswar Mukhiya] was there).” The assault party had 10 members of the Sena led by Barmehswar Mukhiya of whom nine were sentenced to life imprisonment but only to be allowed to walk free by the Patna High Court some years later.

The Ranveer Sena’s acquisition of modern weapons like LMGs as army scrap gave it an overwhelming edge over the CPI-ML whose support base mainly came from the socially and economically marginalized sections of rural Bihar, mostly landless Dalits and other low-caste farmhands. A prominent BJP leader supported the dreaded outfit with finances. Says Pramod Singh: “Bhajapa ka sarkar jiss samay tha … Atal Behari Vajpai the … uss samay the Yashwant Sinha … barabar aate the … mukhiya ji se barabar milte the … wo toh humare gaon mein hi … jiss samay chhapemari ho rahi thi uss samay barabar humare gaon mein the (It was when there was the BJP government [at the centre] … there was Atal Behari Vajpai [as prime minister] … there was Yashwant Sinha … he would visit regularly … meet the Mukhiya [Barmeshwar Singh] regularly … he was there in my village when the police were hot on our heels and raiding our places. ” We again get an affirmative double “Hoon, hoon” when we ask him if Yashwant Sinha knew what they were doing or what they were up to. What kind of support they got from Sinha?

Both monetary and political, we get the reply. Here is what he claims of the help the then finance minister purportedly lent the outfit: “Paise se … sarhe paanch lakh ([He] gave us money … Five and half lakh).” Any other kind of support? “Aur kya support karega … jo bhi rajnaitik support jo hota hai (What else support he could lend … other than political support),” quips Pramod Singh somewhat piqued.

The fact that Ranveer Sena had ample political support is borne out not only by the on-camera confessions of these functionaries of the dreaded outfit but also by the interview that Cobrapost had with Justice Amir Das, the former judge of the Patna High Court and the chairman of the commission of inquiry the state government had set up on December 27, 1997 in the wake of Laxmanpur Bathe massacre and outrage it had caused across the country.

Although reticent in his response, Justice Das does not shirk away from naming those who tried to scuttle the probe or influence the police: “Kuchh ka naam toh bata sakte hain jaise Shivanand Tiwary hain, C.P. Thakur hain. Murli Manohar Joshi hain aur Sushil Kumar Modi aur ek mikhiya the naam tha unka uss gaon mein Laxmanpur Bathe ke bagal mein conclusion aya hai ki wo bhi support karte the (I can tell some names, for instance, Shivanand Tiwary, C.P. Thakur, Murli Manohar Joshi and Sushil Kumar Modi. Then there was a head of a village in the neighbourhood of Laxmanpur Bathe about whom we had drawn the conclusion that he too supported [the Ranveer sena]).”

The former chairman of the enquiry commission elaborates how these leaders, particularly Murli Manohar Joshi, tried to browbeat the police to fall in line: “Ab jaise ek gawah aya kaha ki Murli Manohar Joshi aaye the humko dhamka gaye hain ki jara theek se rahiyega theek se investigation toh kijiyega power mein ayenge aapko batate hain … iska matlab ye hua ki wo under pressure jakar ki wo hum unse kuchh karwa lein (We had a witness who said that Murli Manohar Joshi had threatened him asking him to behave and if you conducted investigations properly when we come to power you will have it. This all meant to get things done favourably by putting the fellow under pressure).” The witness was an Investigating Officer of the stare police. The commission issued a notice to Murli Manohar Joshi. Justice Das reveals how Murli Manohar Joshi intervened to influence the police investigations: “Yahan pe ek IO ko aap aye hain massacre ke baad … Senari gaon mein ye gaye hain raid karne aapko khabar mili aur aap aate hain aur IO ko dhamkate hain ki agar aapne aisa kiye toh hum power mein ayenge toh aapko batate hain aur parinam ye hua ki under threat aapne usko rukwa diya baad main jab jirah hua toh palat gaye (He visited after the massacre. The IO had gone to Senari to conduct a raid. He came to know about it and came to see the IO threatening him if he did what he was set to do he would have it when they would come to power. This is how he stopped him from discharging his duty under threat and when he was cross-questioned he denied it).”

Apart from political support right from the ruling dispensation at the centre, the Ranveer Sena had staunch supporters in strongmen like Anand Mohan Singh and Arun Kumar. Pramod Singh recounts how Jahanabad LJP MP Arun Kumar would help them escape the police net after they had executed a mass murder: “Farar stithi mein … jaise maan lijiye police gher li … paanch chheh logon ko nikalna hai jsaise Arun Kumar the saansad Jahanabad saansad wahan pahunch jaate the apni gadi se jo log tha sabki nikal dete the … (When on the run … suppose the police had laid siege of us … five–six people were to be evacuated … then Arun Kumar, the MP of Jahanabad, would reach the spot and would escort away all of them in his car … ).”

However, when the Cobrapost sought his reaction to the claims made by the former Ranveer Sena commander, Arun Kumar was candid in his admission to his acquaintance with Pramod Singh. The Rashtriya Lok Samata Party MP would have nothing to do with Ranveer Sena either, saying: “Humne kisi ki koi madad nahi ki aur na hi Ranveer Sena ki kabhi koi madad ki (I never helped anybody … and I never helped the Ranveer Sena).”

When the nation wondered aloud about the source and purpose of the Purulia arms drop on December 17, 1995, an immediate beneficiary was the Ranveer Sena which got such lethal weapons as AK-47 by the dozen. Says Pramod Singh: “Jaise Purulia mein gira … Purulia se bahut hathiyar aya yahan par (There was this arms drop in Purulia … we got a lot of weapons from there).”

Bhola Rai:

Another Ranveer Sena strongman who has blood of scores of innocent in his hand and whose name figures prominently in the CID report is Bhola Singh. After many days of search across Bhojpur district, Cobrapost team got a tip off on his whereabouts. Still wanted by Bihar Police, the former commander of Ranveer Sena is now living incognito with his family in the steel city of Tata Nagar. Cobrapost reporter interviewed him there in his hideout, in which he confesses to have taken part in the killing of 58 Dalits at Laxmanpur Bathe: “Saath pachas ko wahi par mara tha Laxmanpur Bathe mein (We killed about 50–60 people then and there in Laxmanpur Bathe).” He says this was the most important massacres of all that his outfit carried out:

“Laxmanpur Bathe ko hi bolta hai wo do gaon hai ek hi hai Laxmanpur Bathe ko hi bolta hai … adhikansh hatya kiya humne wahan par bahut (I consider Laxmanpur Bathe the most important [of all massacres] … that is a twin village … there I killed many people).” According to him there were 100 members of the Sena who launched the assault that was led by one of his nephews: “Uska lead kiya tha Ekwari ka hi humara ek bhatija tha Santu naam tha (The attack was led by one of my nephews, Santu, from Ekwari village).” Barmeshwar Singh, the Sena chief popularly called Mukhiya, was also part of the assault team as Bhola Singh replies in an affirmative “Ji (Yes),” when the reporter asks if Barmeshwar Singh and he himself were among the attackers. “Haan hum bhi the (Yes I too was there),” he says with a sense of pride.

Bhola Singh recounts the assault on Laxmanpur Bathe: “Nadi ke uss paar Bathe hai aur iss paar hum log hain toh … idher se udher wo apna aata jaata tha Sone mein ussi ka nav tha nav se idhar udhar aa jaata tha aur idhar kuch crime karke chala jata tha … hum logon ko bhi aisa laga ki udhar se aa raha hai toh kahe nahi uss ke gaon mein charh jai wahi par chhipa hoga charh jai plan bana diyye charh gaye aur jakar soye hue the sab soye mein sab pakda gaya sab mara gaya hum logon ka wahan par kuch casualty nahi hui (There is [Laxmanpur] Bathe across the river and we live on this side of the river. They [CPI-ML] would come here and go back. They had their own boat by which they would cross the Sone, come to our place and commit some crime and return. We thought since they come from that side of the village, why should we not mount an assault on it. They must be taking shelter there. We worked out a plan and launched the attack. All were sleeping and were caught by surprise and killed. We suffered no casualties).”

The assault on Laxmanpur Bathe was launched with semi-automatic weapons as Bhola Singh claims: “Hum logon ke paas tha semi-automatic (We were carrying semi-automatic [weapons]).” Undoubtedly, such weapons cannot be owned legally.

In our pursuit to dig more and more about murderers of Ranveer Sena, the Cobrapost team met Sanjiv Singh, general secretary of the Akhil Bharatiya Rashtravadi Kissan Sangathan, the Sena in its new avatar after it was banned, and Shailedra Vatsayan, spokesperson of the outfit. Sanjiv told us about one Upendra Magiha who he says was commander-in-chief of the Ranveer Sena who at the behest of its chief Barmeshwar killed hundreds of people: “Upendra Magiha Ranveer Sena ke jo hathiyar band log the unka wo command karte the un karraviyon mein aur wo hain … Magiha bahut seedha aadmi hai … jo sahi mein jo saikadan hatya kiya hai wah aadmi bahut seedha aur saccha aadmi hai (Upendra Magiha used to command the armed squad of the Ranveer Sena during those operations … and he … Magiha is a simple fellow … the man who has murdered hundreds is really a very simple and innocent fellow).” Cobrapost team was able to locate Magiha, the Most Wanted murderer of the lot, he refused the interview, however. 

However we approached Bhola Singh for his reaction he blatantly denied about his involvement in any of the massacres and in fact stated that he was paralytic during the occurrence of those events and was not present on ground zero. He however acknowledged the fact that members of Ranveer Sena were indeed involved in those massacres.

Ravindra Chaudhry:

One of the prime accused in the massacres of Dalits in 1995, but set free by the courts, Ravindra Chaudhry has no qualms while confessing to his involvement in all major massacres of Dalits in Bihar which were executed by his outfit Ranveer Sena upon his nod. He proudly accepts the role he played in planning, of course along with the then Sena chief Barmeshwar Mukhiya, such massacres. We come to know from him that the Ranveer Sena had actually planned to execute as many as 50 massacres in a single day.

“Hum log toh aisa ranneeti banaye the ki ek hi din mein pachas gaon mein narsamhar ho tab jaaker sarkar ki need tootegi nahi toh sarkar toh bas yehi soch rahi hai ki ek desh mein alpsankhyak hain ati pichhri hain pichhri hai iske alawa koi jaati hi nahi hai (We had in fact worked out a strategy to execute massacres across 50 villages in a single day to wake up the government from its torpor. Otherwise, the government will always think that no castes other than the minorities, most backward and backward live in this country),” says Chaudhry of the diabolical plan of the Sena, spewing the caste hatred that has left thousands of Dalits dead so far in Bihar.

The Cobrapost reporter met Chaudhry at Belaur village in Bhojpur who opens up to divulge all what was unknown to the larger world about the working of Sena, training of its cadre by active army men on leave and the support it garnered not only from its sympathizers to buy arms and put in place required logistics for a planned operation but also from the likes of Anand Mohan Singh.

He says of the role Anand Mohan Singh played in instigating the upper caste landlords and their militiamen while offering them arms of any kind and caliber: “Jo naujawan neta ata tha bujurg nahi naujawan neta jaise Anand Mohan aaye bechare poora keh gya ki humare paas hathiyron ka jakhira hai jo jo hathiyar lena chahte ho aaker le jao (One young leader called Anand Mohan came and told us that he has a cache of all kinds of arms. Whatever you need you can pick).”

Anand Mohan Singh is incarcerated for the murder of a District Magistrate. So, Cobrapost spoke to his wife Lovely Anand. Claiming such allegations were a conspiracy, the MP’s wife, who herself is a former MP said: “Humara in logon se koi relation nahi raha hai (We had no relation whatsoever with them)”

In this interview, Chaudhry comes across as the one who used to order the death squads of the Sena to undertake a particular operation as his confession makes it undoubtedly clear what role he played: “Humare kehne se anzam mane anzam maan lijiye hum anzam nahi diye lekin huqam toh humi na diye maan lijiye kaam humen nahi kiya hatya nahi karte hain lekin kahe ki hatya karo toh hum hi na kiye ([the massacres were] executed upon … you can say I did not execute them but it was me who ordered. You can say I did not execute the job, I did not kill, but when I ordered to commit a murder then I did it).”

A couple of minutes later he makes it even more clear thus: “Saath pachas logon ko hum log bheje the doosre gaon mein lekin wahan koi nahi mila toh doosre gaon mein kiya (I dispatched a squad of 50–60 members to a particular village, but they did not find a single soul there and execute the order in another village).” Such missions were carried out with modern weapons like LMGs and SLR which were procured with help from all possible quarters: “Sab hai sab hathiyar hai sare logon ne madad kiya hai donate kiya hai daan mein diya hai paisa se bhi (We have all kinds of weapons. All people have helped us, donated us the arms. We have also bought with money).”

The Sena militia was trained in the use of such armory by jawans of Indian army on leave or retired. Says Chaudhry: “Training military ke jawan log karate the … jo hum logon ke military ke aadmi hain wo chhutti par aate the toh oo dete the … maan lijiye ki itna bada gaon hai toh chaar sau do sau military ke jawan hain … gaon mein agar ek do bhi aa gaya toh kaam chal gaya ladne le liye log … (We have men in military and they used to give training when on leave … this village is large enough and there are about 200–400 men in military … if we get one or two men from each family we get enough men to fight ).” This kind of training and modern weaponry was put to a deadly effect by the outfit in massacre after massacre.

Chaudhry has no remorse of killing women and children in such raids by the Sena. Says Chaudhry, “Haan haan karan ki jahan bheja jaata tha wahin log jaate the ab maan lijiye ki aapko bheja gaya ki doh thoh paka aam tod ke laiye aur oo danda chalaya ped par toh aath tho paka gira panch tho kachcha gir gaya toh usko kaat diya jayega ki kachcha tod diya … bheja gaya ki hatya kijiye jawanon ki aur jawanon ke saath bachcha mil gaya toh uska bhi safai kiya toh kauno payment par nahi hai ki uska payment kaat liya jayega usko dandit kiya jayega (Yes, the reason is our men will go wherever they were told to go … now suppose you are asked to pick a couple of ripe mangoes? You hit the mango tree with a stick … as a result eight ripe mango fall and along with them 5 raw mangoes also fall. Now should you be punished for felling raw mangoes? we send our men to kill the young able-bodied and if some children also get killed along with them should they be punished … they are not on payroll so as to punish them by cutting their payments).” This is how a neurotic Chaudhry put the collateral damage that his militia caused as they went about butchering defenseless women and children, even unborn.

We find an echo of what Chaudhry says in our interview with Shailendra Vatsayan,

The spokesperson of the Akhil Bharatiya Rashtravadi Kissan Sangathan: “Idhar se logon ne kaha teri chhattees inch ki atadi hai na … chhattees ke jawab mein chhattees inch phad denge hum tumko kya tumhari auraton tak ko phad doonga jisase kabhi koi bhavishya mein baccha na jane (Our men also said if you got an intestine of 36 inches … we will tear up the whole of 36 you got. And not just you, we will also tear your women … so that they will never give birth in future).”

And the Sena murder squads did just that: killed their women and tore up their wombs so they would never bear children who would embrace Naxalism when grown up and become a source of threat to their hegemony, both social and economic. Someone had called these kinds of mass murders ethnic cleansing, and in India there are certain communities which have been persecuted for ages as their blood is expendable, so is their right to life and dignity, held inviolable in the country’s Constitution, and still there would be no mass protests against such barbaric acts or clamour for an SIT probe by civil society of any hue.

If the state police of Bihar fumbled on probing these crimes against humanity, for obvious reasons, so that the cases could not be taken to their logical conclusion, as is obvious from the confessions of the Ranveer Sena commanders interviewed by Cobrapost on how they managed the law, the state political executive saw to it that nothing clinching was established against the perpetrators of these massacres or their mentors in the political establishment. As a result, the Justice Amir Das Commission of Inquiry was bundled up one fine day abruptly. The reason of this sudden volte-face on part of the state executive under the new dispensation of the JDU—BJP alliance was unmistakable: the commission had got to the bottom of the political support that the Ranveer Sena was getting and there were many bigwigs from the BJP both at the centre and at the state level whose names were doing the rounds as mentors of the monstrous private army raised by Bhumihar—Rajput landlords. Justice Das explains why the government wrapped up the commission unceremoniously: “Uss samay achanak ruk gai, bina kisi notice ka bina kisi report ka. Aap isse submit kar dijiye matlab without any ultimatum … Chief Minister Nitish sarkar ka gathan hua usmein Deputy Chief Minister Sushil Kumar Modi the, toh Nitish toh ismein involve nahi the toh unka naam nahi aya tha, lekin Sushil Kumar Modi ka naam aya tha, Sushil Kumar Modi RSS ke, RSS kya, RSS ke kaha jaye, uske ki BJP party ke bahut saare log jo aye the, un logon ka naam bhi tha… (It was closed down all of a sudden, without any report or notice. I was not asked to submit the report either. I mean it was done without any ultimatum. When Chief Minister Nitish Kumar’s government was formed, Sushil Kumar Modi was Deputy Chief Minister. Nitish was not involved in it so his name did not crop up. But Sushil Kumar Modi’s name did crop up along with many from the RSS or say from the BJP).” The Cobrapost has a copy of the report of the commission.

The acquittals have been challenged in the Supreme Court and thus the cases are subjudiced. This investigation was undertaken by Cobrapost only to bring forth some dark truths about such crimes against humanity which would have remained in dark otherwise.

Cobrapost contacted Murli Manohar Joshi, CP Thakur and Susheel Kumar Modi for their reaction to Justice Ameer Das commission but didn’t receive any comments from them till the time of going to the press. Ex finance Minister Yashwant Sinha didn’t respond to Cobrapost emails.

‘कोबरा पोस्ट’ से साभार

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रेस क्लब किया पत्रकारों के हवाले

पटना : राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पंद्रह अगस्त को प्रदेश के पत्रकारों की प्रेस क्लब की मांग पूरी कर दी. उन्होंने पटना में प्रेस क्लब का उद्धाटन किया.

गौरतलब है कि छज्जूबाग के एक सरकारी भवन को प्रेस क्लब घोषित किया गया है. इस पर सरकार ने 79 लाख रुपये खर्च किया है. इसके साथ ही  नीतीश ने बिहार के 31 जिलो में भी प्रेस क्लब के नए भवनों के निर्माण कार्य का  भी शुभारम्भ किया.

बिहार के 38 में से 31 जिलों प्रेस क्लबों के निर्माण पर सरकार ने प्रति भवन 77.12 लाख रुपये आवंटित कर दिया है. इनका निर्माण बिहार राज्य भवन निर्माण निगम लिमिटेड कर रहा है। पटना प्रेस क्लब के उद्घाटन के अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि पटना में इसकी बेहद आवश्यकता थी जो सरकार ने पूरी कर दी है. उन्होंने कहा कि अब पत्रकार इस भवन का अपनी जरूरत के अनुसार उपयोग करें.

प्रेस क्लब में कैंटीन और सभागार के अलावा वाईफाई की सुविधा भी होगी. यहां से पत्रकार अपने मीडिया संस्थानों को खबरें भेजने के अलावा सम-सामायिक विषयों पर चर्चा भी कर सकेंगे. उद्घाटन समारोह में सूचना व जन सम्पर्क विभाग के मंत्री विजय चौधरी और विभाग के सचिव प्रत्यय अमृत भी मौदू थे.

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बिहार-झारखण्ड भास्कर के एडिटोरियल हेड बने ओम गौड़

ओम गौड़ ‘भास्कर’ बिहार-झारखण्ड के स्टेट एडिटोरियल हेड बनाये गए  हैं. सम्पादकीय  सारे कार्य इनके निर्देशन में होंगे. 

गौड़ की लीडरशिप में ही झारखण्ड में भास्कर की लांचिंग हुई थी. रांची में इन्होंने काफी काम किया था. बाद में इनका तबादला जोधपुर कर दिया गया था. ओम गौड के पहले नवीन  जोशी को दोनों प्रान्तों का स्टेट हेड बनाया गया था. पटना इनका मुख्यालय  था लेकिन वे टिक नहीं पाए. भास्कर की प्रिंट लाइन में संपादक (बिहार-झारखण्ड) ओम गौड़ का नाम कल  से छपने लगा है. भागलपुर, गया और मुजफ्फरपुर में भास्कर की लांचिंग गौड़ के नेतृत्व में हुई  है. गौड़ की पोस्टिंग को दूसरी नजर से देखा जा रहा है. मसलन, कुछ लोगों की यहाँ से या तो छुट्टी होगी या बिहार झारखण्ड से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है.  

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सीएम के जिले में थानेदार की गुंडई, कोर्ट का आदेश ठेंगे पर रखकर पत्रकार की जमीन पर कब्जा करा दिया

नालंदा (बिहार) जिले का नगरनौसा-चंडी अंचल क्षेत्र सुशासन बाबू के नाम से मशहूर बिहार के सीएम नीतिश कुमार के गृह जिले की राजनीति का एक प्रभावशाली अंग माना जाता है लेकिन यहां सुशासन का जो ताजा दृश्य सामने है, वह आम जनता की अंतरात्मा को अंदर तक झकझोर जाता है। एक गुंडा थाना प्रभारी ने कोर्ट के आदेश को परे रखकर पत्रकार की जमीन पर कब्जा करा दिया। 

ऐसे तो सुशासन के ढोल की पोल खोलने वाले सैकड़ों उदाहरण हैं लेकिन वरिष्ठ वेब पत्रकार मुकेश भारतीय से जुड़े ताजा मामले ने सीधे सुशासन बाबू पर ही सवाल खड़ा कर जाता है क्योंकि भारतीय द्वारा सीएम नीतिश कुमार से कई बार हर संभव माध्यमों द्वारा शिकायत भेजी गई लेकिन फोनिक आश्वासनों के सिवा कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इन दिनों झारखंड की राजधानी रांची में रह रहे भारतीय ने नगरनौसा अंचल के तात्कालीन सीओ दिव्या आलोक को लिखित आवेदन दिया। आवेदन में उन्होंने गांव के असामजिक तत्वों द्वारा उनकी पैत्रिक जमीन पर अतिक्रमण किये जाने की शिकायत करते हुए जमीन मापी करा कर सीमाकंन की मांग की लेकिन इधर जैसे ही सीओ की मापी प्रक्रिया शुरु हुई, उधर विरोधियों ने भूमि के एक हिस्से पर पक्का निर्माण कार्य शुरु कर दिया। इस दौरान भारतीय ने सीओ को बिना नापी के निर्माण कार्य होने की सूचना दी। हर बार सीओ संबंधित चंडी थाना प्रभारी धर्मेन्द्र कुमार को मापी होने तक वस्तुस्थिति कायम रखने के निर्देश देते रहे और थाना प्रभारी उस हर निर्देश को रद्दी की टोकरी में फेंकते रहे।

करीब ती माह तक यह सिलसिला चलता रहा। इस दौरान उक्त भूमि पर  मकान की पक्की दीवार उठा ली गई। प्रथम एवं अन्य पक्षों के नीजी अमीनों की मौजूदगी में सरकारी अमीन की नापी के सीओ ने सीमांकन की कार्यवाही की गई। उसके बाद एसडीओ, हिलसा कोर्ट में शिकायत की गई। एसडीओ ने मामले की सुनवाई करते हुए उक्त भूमि पर धारा 144 लगा दी और चंडी थाना प्रभारी को फैसला होने तक वस्तुस्थिति बनाये रखने के निर्देश दिए। एसडीओ के इस आदेश का पालन भी थाना प्रभारी ने नहीं किया और उसके हस्ताक्षर से कोर्ट को यह सूचना भेजी गई कि वहां 144 जैसी कोई स्थिति नहीं है और विवादित स्थल पर कोई निर्माण कार्य नहीं किया गया है। जबकि सच्चाई यह है कि धारा 144 लागू होने के दौरान विरोधी पक्ष ने चंडी थाना पुलिस के खुली संरक्षण और गांव के असमाजिक तत्वों की मदद से उक्त भूमि पर पक्का मकान की ढलाई कर ली गई।

उसके बाद भारतीय ने हिलसा एसडीओ कोर्ट में पुलिस की रिपोर्ट को मनगढ़ंत और झूठी होने की चुनौती दी। उसके बाद हिलसा एसडीओ ने चंडी के सीओ राजीव रंजन को घटनास्थल पर जाकर त्वरित जांच रिपोर्ट देने को कहा। चंडी सीओ ने न सिर्फ उक्त मकान पर धारा 144 के दौरान पक्का मकान बना डालने की पुष्टि की बल्कि मौके पर निर्माण कार्य कर रहे कई राजमिस्त्रियों और मजदूरों को भी पकड़ा और उन्हें बतौर गवाह रिपोर्ट दर्ज की।

चंडी, सीओ के इस रिपोर्ट के बाद विवादित स्थल पर दो चौकीदार तैनात कर दिए गए। फिर भी उक्त स्थल से छेड़छाड़ होती रही। कई काम किए गए। चंडी सीओ के जांच के नव ढली मकान में सेंटिंग के पटरे लगे थे, जिसे थाना प्रभारी ने वगैर किसी लिखित आदेश के अचानक चौकीदार को हटा कर दिनदहाड़े खुलवा दिया। थाना प्रभारी के खुला संरक्षण का आलम यह है कि तमाम आदेश-निर्देश के बावजूद समाचार प्रेषण तक उक्त जमीन की बोरिंग पर दबंगों द्वारा अवैध बिजली के सहारे चोरी के मोटर पम्प चलाए जा रहे हैं।

अब देखना हैं कि नालंदा के डीएम, एसपी से लेकर सीएम तक की इस मामले पर बरती गई उदासीनता की चपेट में सुशासन और मुकेश भारतीय के मामले का आलम क्या होता है। फिलहाल, एक तरफ इस प्रक्ररण में एसडीओ कोर्ट से तारीख पर तारीख मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ जातीयता के चरम पर एक चंडी थाना प्रभारी की गुंडागर्दी सर चढ़कर बोल रहा है।  

पत्रकार मुकेश भारतीय से संपर्क : nidhinews1@gmail.com

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पत्रकार आयोग के गठन पर विचार करेगी बिहार सरकार

विक्रमगंज (रोहतास) : पत्रकारों की मांग पर बिहार सरकार ने नियमावली में संशोधन कर, पत्रकार आयोग के गठन और कैशलेस मेडिक्लेम दुर्घटना बीमा योजना लागू करने सहित 18 सूत्री मांगों को संज्ञान लिया है। बिहार वर्किंग जर्नलिस्ट एसोसिएशन के संयोजक एवं वरिष्ठ पत्रकार दुर्गेश किशोर तिवारी ने बताया कि सरकार के संज्ञान लेने से आंचलिक पत्रकारों में हर्ष व्याप्त है। –

 

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रणवीर सेना और बिहार के अखबार

रणवीर सेना के संस्थापक बरमेश्वर नाथ सिंह (ब्रह्मेश्वर सिंह) ऊर्फ मुखिया की तीसरी बरसी पर पटना में 1 जून, 2015 को आयोजित कार्यक्रम के संबंध में बिहार के मीडिया में प्रसारित समाचारों का विश्लेषण करने से पूर्व समाचार की रचना प्रक्रिया और समाचार बनाने वालों की सामाजिक पृष्ठभूमि से उसके अंतर्संबंध से संबंधित कुछ मूलभूत बातों को ध्यान में रख लेना चाहिए।

 

कोई भी समाचार न तो तटस्थ होता है और न ही महज किसी घटनाक्रम का आंखों देखा हाल। किसी भी समाचार के कथ्य और रूप का निर्माण इस पर निर्भर करता है कि समाचार बनाने की प्रक्रिया से जुड़े लोगों ने वास्तविक घटना में से किन तथ्यों का चयन किया तथा उन्हें किस प्रकार की भाषा और रूप में प्रसारित करने का फैसला किया। किसी समाचार के निर्माण में जितनी भूमिका तथ्य की होती है, उससे कहीं अधिक भूमिका तत्कालीन समाज पर प्रभावी वैचारिक शक्तियों की होती है। यही वैचारिक शक्तियां परोक्ष रूप से तय करती हैं कि क्या समाचार है और क्या नहीं। इस निर्धारण के बाद समाचार बनाने वाले लोगों का दृष्टिकोण यह तय करता है कि वास्तविकता का कौन सा हिस्सा समाचार है और कौन सा नहीं। समाचार की भाषा, उसका रूप आदि इन्हीं लोगों की पक्षधरता पर निर्भर करता है। हालांकि आदर्श स्थिति तो यह है कि एक पेशेवर पत्रकार को अधिकतम तटस्थता प्रदर्शित करनी चाहिए लेकिन वास्तव में किसी भी समाचार से पूर्ण तटस्थता की उम्मीद करना एक काल्पनिक स्थिति ही है। असली चीज है पक्षधरता। किसी समाचार का विश्लेाषण कर हम यह जान सकते हैं कि समाचार तैयार करने वाले की पक्षधरता क्या है। वह कमजोरों के पक्ष में है या शक्तिशालियों के। वह नैतिकता और न्याय के पक्ष में है या अपने क्षुद्र व्यक्तिगत अथवा सामाजिक हितों के पक्ष में।

‘फैसला लेने वाले’ 100 फीसदी पदों पर द्विज 

हिंदी क्षेत्र के मीडिया पर उच्चवर्ण के लोग काबिज हैं। दुर्भाग्यवश इनमें से अधिकांश की पक्षधरता प्राय: जाति के आधार पर तय होती रही है। यद्यपि बिहार निचले तबकों के सामाजिक आंदोलनों की भूमि रहा है लेकिन यहाँ के मीडिया संस्थानों की सामाजिक पृष्ठभूमि उच्चवर्णीय ही बनी हुई है। वर्ष 2009 में किये गये सर्वेक्षण के अनुसार बिहार के मीडिया संस्थानों में ‘फैसला लेने वाले’ 100 फीसदी पदों पर द्विज समुदाय का कब्जा था। यानी सभी बड़े पद इन्हीं के कब्जे में थे। संवाददाता, उप संपादक आदि कनिष्‍ठ पदों पर भी वंचित तबकों के लोग बहुत कम थे। इन कनिष्ठ पदों पर पिछड़ी (अति पिछडी जाति को मिलाकर) के पत्रकार 10 फीसदी थे। पसमांदा मुसलमान (उर्दू अखबारों समेत) 4 फीसदी और दलित महज 1 फीसदी।

बिहार के मीडिया में कनिष्‍ठ पदों पर सामाजिक प्रतिनिधित्‍व : उच्‍च जाति हिंदू 73 प्रतिशत, पिछडी व अति पिछडी जाति 10 प्रतिशत, दलित 1 प्रतिशत, अशराफ मुसलमान 12 प्रतिशत, पसमांदा मुसलमान 4 प्रतिशत। (स्रोत : प्रमोद रंजन, ‘मीडिया में हिस्‍सेदारी’, प्रज्ञा सामाजिक शोध संस्‍थान, पटना, 2009)

बिहार के पत्रकारों की सामाजिक पृष्ठभूमि का असर ‘समाचारों’ की पक्षधरता पर स्पष्ट रूप से दिखलाई देता है। बिहार के अखाबार और समाचार चैनल प्राय: हर उस शक्ति के विरुद्ध खड़े होते हैं, जो इन तबकों की आवाज को कमजोर करने में भूमिका निभाती हैं। उनकी पक्षधरता हर उस विचार, सामाजिक-राजनैतिक शक्ति के साथ रहती है, जो उच्चावर्णीय वर्चस्व को बनाये रखने में मददगार हो सकती है।

1990 के दशक में बिहार की कुख्यात रणवीर सेना का जन्म भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) द्वारा वंचितों के पक्ष में चलाए गए आर्थिक न्याय और सामाजिक सम्मान के आंदोलन को कुचलने के लिए हुआ था। इसका सरगना था आरा जिला के खोपिरा गांव का मुखिया रह चुका भूमिहार जाति का बरमेश्वर नाथ सिंह। अलग-अलग गांवों में किए गए नरसंहारों व हत्याकांडों में करीब 300 से अधिक दलितों-पिछड़ों की हत्या का आरोप इस सेना पर है। (देखें तालिका -2) इन नरसंहारों की नृशंसता का वर्णन कठिन है। इन लोगों ने बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों की हत्या की क्योंकि इनका मानना था कि दलितों-पिछड़ों की महिलाएं नक्सलवादियों को जन्म देती हैं तथा बच्चे बड़े होकर नक्सलवादी बन सकते हैं। 

1 जून, 2012 को इसी बरमेश्वर नाथ सिंह ऊर्फ मुखिया, जिसे प्राय: ‘ब्रह्मेश्वर सिंह’ ऊर्फ मुखिया कहा जाता रहा है, की रहस्यमय तरीके से हत्या कर दी गयी (देखें, फारवर्ड प्रेस की कवर स्टोरी, ‘किसकी जादुई गोलियों ने ली बिहार के कसाई की जान’, जुलाई 2012)। हत्या के बाद मुखिया के समर्थकों ने तो बिहार की सडकों पर उत्पात मचाया ही, उसके बाद कई दिनों तक बिहार के अखबारों और न्यूज चैनलों ने मुखिया के महिमामंडन और प्रशस्ति का ऐसा अश्लील दृश्य किया, जिसे देखकर नैतिकता और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता रखने वाला हर व्यक्ति विचलित हुआ होगा।

यहीं हम पक्षधरता का अंतर देख सकते हैं। मुखिया की हत्या के बाद दलित लेखक कंवल भारती ने लिखा, ‘मुखिया दलितों का हत्यारा था और हत्यारे की हत्या पर दलितों को कोई दुख नहीं है। जिस व्यक्ति ने दलित मजदूरों के दमन के लिए रणवीर सेना बनायी हो, उनकी बस्ती पर धावा बोलकर उन्हें गोलियों से भून दिया हो, दुधमुंही बच्ची को हवा में उछाल कर उसे बंदूक से उड़ा दिया हो और गर्भवती स्त्री का पेट फाड़कर भ्रूण को तलवार से काट डाला हो, उस दरिन्दे की हत्या पर कोई दरिन्दा ही शोक मना सकता है।’ (फारवर्ड प्रेस, जुलाई, 2012)

उसी मुखिया की हत्या का तीसरा ‘शहादत दिवस’ पटना में उसके पुत्र इंद्रभूषण सिंह ने गत 1 जून को मानाया, जिसमें मुखिया की जाति के अनेक राजनेता शामिल हुए। मौजूदा मानकों के अनुसार जिस कार्यक्रम में राजनेता शरीक होते हैं, वह समाचार बनने के योग्य मान लिया जाता है। यह स्वभाविक था कि इस कार्यक्रम को कवर किया जाए। लेकिन इसे सिर्फ कवर ही नहीं किया गया, बिहार के मीडिया ने इसे मुखिया के महिमामंडन के एक और मौके के रूप में लिया। ‘दैनिक जागरण’ को छोड़कर सभी हिंदी अखबारों ने इस आयोजन को ‘ब्रह्मेश्वर मुखिया जी’ का ‘शहादत दिवस’ दिवस कहा। अगर आयोजनकर्ताओं ने इस कार्यक्रम को ‘शहादत दिवस’ का नाम दिया भी था तो भी क्या समाचारपत्रों को सैकड़ों गरीब लोगों की हत्याओं के आरोपी को ‘शहीद’ कहना चाहिए? क्या इसे ‘मुखिया की बरसी’ अथवा उसकी ‘हत्या के तीन साल पर आयोजित कार्यक्रम/समारोह’ नहीं कहा जाना चाहिए? महज इस शब्दावली के अंतर से आप समझ सकते हैं कि बिहार में खबर बनाने वाले लोगों की पक्षधरता क्या है।

आइए, अखबारों द्वारा ‘कथ्य के चयन’ पर नजर डालने से पहले हम देखें कि इस समाचार को उन्होंने ने किस तरह ‘प्रस्तुत’ किया। विभिन्‍न समाचारपत्रों के पटना संस्करणों में 2 जून, 2015 में समाचार की प्रस्तुति : प्रभात खबर – ब्रहमेश्‍वर मुखिया का शहादत दिवस मना, दैनिक भास्‍कर- सीपी ठाकुर सीएम प्रत्‍याशी तभी भाजपा को देंगे समर्थन, ब्रह्मेश्‍वर मुखिया के शहादत दिवस पर नेताओं ने दिखाए सियासी तेवर, मुखिया जी व्‍यक्ति नहीं, अंजुमन थे।

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यूपी, बिहार के व्यापम की तस्वीर तो और अधिक भयावह

जो कुछ “व्यापम” नाम से मध्य प्रदेश में हुआ और जो अन्य प्रदेशों में भी दूसरे नामों, दूसरे प्रकारों, दूसरी सीमा तक हो रहा है वह भयावह है । बिहार में एक बार में ही चौदह सौ अध्यापक स्वयं नौकरी छोड़ ग़ायब हो गये । ये सब अवैध ढंग से नौकरी में आये थे । उत्तर प्रदेश में एक चौथाई प्राइमरी स्कूलों में डुप्लीकेट अध्यापक तैनात हैं (नौकरी किसी के नाम है पढ़ाने कोई और आता है)।

देश के सबसे मशहूर और प्रतिष्ठित दिल्ली के सेंट स्टीफ़न्स कालेज के प्रिसिंपल वालसन थम्पू की पी एच डी की डिग्री के जाली होने के आरोप हैं। वह इलाहाबाद के झूँसी स्थित किसी डीम्ड यूनिवर्सिटी से ली हुई है और theology पर है !

दिल्ली राज्य सरकार का क़ानून मंत्री जाली डिग्री के आरोप में जेल में हैं और केन्द्रीय मंत्रिमंडल समेत राजस्थान महाराष्ट्र के दर्जनों मंत्रियों की Affidavit पर दी गई शैक्षणिक सूचनाएँ ग़लत हैं !

देश की शिक्षा मंत्राणी (एच आर डी मिनिस्टर) कुल सेकंडरी स्तर की शिक्षित हैं और बाकी सब अंड बंड है । वे मोदी जी की “राष्ट्रभक्ति”की प्रतीक हैं कि मोदी जी को देश के जुवाओं की कितनी चिंता है !

देश के आध्यात्मिक नेता आसाराम हैं, उनका अपना व्यापम है जो राष्ट्रव्यापी है । उनके कुकर्मों के गवाह या तो स्वर्ग में ठेले जा चुके हैं या हड्डियाँ तुड़वा चुके हैं, कुछ छुपते घूम रहे हैं । इनकी चरित्र पंजिका डा० सुब्रह्मण्यम स्वामी की यूनिवर्सिटी से जारी हुई है ” आसाराम निर्दोष हैं !”

देश में 90% आबादी की प्राथमिक शिक्षा ऊपर वर्णित कारकुनों के हवाले है । क़रीब ७०% सेकंडरी शिक्षा का भी यही हाल है और क़रीब ९०% उच्च शिक्षा केन्द्र इस हाल में हैं कि वे न भी होते तो सिर्फ ये फ़रक पड़ता कि तमाम स्नातक/परास्नातक/पी एच डी सेकेंडरी पास कहलाते जैसे शिक्षा मंत्राणी !

प्रधानमंत्री परदेस गये हैं और मैं क्या अनाप शनाप भाख रहा हूँ भोरइ भोर ।

शीतल पी सिंह के एफबी वाल से

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हिन्दुस्तान में भगदड़, 37 ने दिया भास्कर में इंटरव्यू, शशिशेखर मनाने पहुंचे बिहार

हिन्दुस्तान की मुश्किल कम होने का नाम नहीं ले रही है। इस बार उसकी परेशानी का कारण बिहार में दैनिक भास्कर बना है। बिहार में अपने विस्तार में जुटे दैनिक भास्कर ने हिन्दुस्तान को बड़ा झटका देने की तैयारी कर ली है।

भागलपुर और मुजफ्फरपुर यूनिट लांच करने के लिए दैनिक भास्कर बड़ी संख्या में हिन्दुस्तान के रिपोर्टरों को तोड़ने की जुगत में लगा है। इसके लिए एक साथ हिन्दुस्तान के 37 लोगों के इंटरव्यू दैनिक भास्कर ने अपने यहां करा लिया है। इसमें सब एडिटर से लेकर न्यूज एडिटर तक शामिल हैं। 

इसकी भनक लगते ही समूह संपादक शशि शेखर अपने सहयोगी सुधांशु श्रीवास्तव समेत पटना में जा डटे और लोगों को मनाने की जुगत में लगे हैं। माना जा रहा है कि डैमेज कंट्रोल की अपनी नीति को सफल बनाने के लिए शशि शेखर इन लोगों को बेहतर करने का आश्वासन दे रहे हैं।

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फुलवारीशरीफ में प्रेस फोटो ग्राफर के सिर में गोली मारी, हालत गंभीर

पटना : फुलवारीशरीफ थाना क्षेत्र में महावीर कैंसर अस्पताल के पास बदमाशों ने स्वतंत्र प्रेस फोटोग्राफर पवन सिंह को गोली मार दी। स्थानीय लोगों ने पवन को अस्पताल पहुंचाया। हालत चिंताजनक बताई गई है। घटनास्थल से पुलिस को जिंदा कारतूस बरामद हुआ है। नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स, बिहार, ने इस घटना की कठोर शब्दों में निंदा की है। 

फुलवारीशरीफ के आदर्श कॉलोनी में रहने वाले स्वतंत्र फोटोग्राफर पवन सिंह शनिवार रात करीब नौ बजे घर लौट रहे थे। तभी चार लोगों ने उन्हें महावीर कैंसर अस्पताल के पास रोक लिया। वह उनसे बात करने लगे। इतने में बाइक सवार दो लोगों ने पहुंचकर नजदीक से पवन के सिर में गोली मार दी और फरार हो गए। सूचना मिलते ही पुलिस अधिकारी दलबल के साथ मौके पर पहुंचे। लुटेरों की तलाश में शहर की नाकाबंदी कर दी गई। संभावित ठिकानों पर छापेमारी चली लेकिन पुलिस के हाथ अपराधी नहीं लगे। 

घायल फोटोग्राफर को गंभीर हालत में पटना के पीसीएमएम में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है। नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स, बिहार, कठोर शब्दों में निंदा करते हुए कहा है कि यह घटना सूबे में यह कानून व्यवस्था की खस्ताहाली को दर्शाती है। 

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बांका के ऐसे मीडिया कर्मियों के तो दोनो हाथ में लड्डू

बांका (बिहार) : अखबार में एक नए अवैध परंपरा की यहां शुरूआत हो गयी है। सरकार में बहाल लोग मजे से अखबारों व चैनलों में संवाददाता की नौकरी कर रहे हैं। यह परंपरा मुख्यतः जिला और प्रखंड स्तर पर देखी जा रही है। हैरानी की बात है कि दैनिक जागरण, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान जैसे बड़े अखबार यह जानते हुए भी कि उनके संवाददाता सरकारी नौकरी में हैं, उनको पाल रहे हैं। ऐसा करें भी क्यों नहीं। तकरीबन मुफ्त में या कम पैसे में इन्हें संवाददाता जो मिल रहे हैं। इस तरह के शिक्षक, कंम्प्यूटर ऑपरेटर अपने सरकारी कार्यालय से फरार होकर पूरे दिन समाचार संकलन में लगे रहते हैं। मुद्दा ये है कि अगर यह परंपरा चल निकली तो इसके परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं इसका सहज हीं आकलन किया जा सकता है। 

बिहार के बांका जिला में एमआरडी हाई स्कूल में कार्यरत सरकारी शिक्षक राहुल कुमार दैनिक जागरण के मुख्य संवाददाता बने हुए हैं। उनका बायलाइन समाचार लगातार दैनिक जागरण में प्रमुखता से प्रकाशित होता है। अधिवक्ता दीवाकर झा ने सूचना के अधिकार के तहत जब इसकी शिकायत बांका के जिला पदाधिकारी के जनता दरबार में की। तब यह मामला उजागर हुआ। दैनिक जागरण ने अपने जवाब में कहा कि राहुल कुमार हमारे अखबार में डेढ़ वर्ष पूर्व तक कार्यरत थे। वर्तमान में उनका दैनिक जागरण से कोई लेना देना नहीं है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इन सारे इनक्वायरी के बावजूद राहुल कुमार दैनिक जागरण कार्यालय बांका में वर्तमान में कार्य कर रहे हैं। उनकी लगातार बायलाइन खबरें प्रकाशित हो रही है। मैनेजमेन्ट को मुफ्त में चाकरी करने वाला एक व्यक्ति मिल गया है।  सरकारी विद्यालय छोड़कर समाचार संकलन में दिन भर व्यस्त रहता है। पदाधिकारी उसके रौब के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। शिक्षा विभाग का स्पष्ट निर्देश है कि कोई भी शिक्षक और पत्रकार नहीं हो सकता है।  

प्रभात खबर अखबार के बांका कार्यालय का ब्यूरो चीफ प्रियरंजन उर्फ शशि वर्तमान में राज्य खाद्य निगम के बांका कार्यालय में कम्प्यूटर ऑपरेटर के पद पर कार्यरत है। कोई भी सरकारी विभाग में कार्यरत कम्प्यूटर ऑपरेटर कार्यालय का प्रमुख हिस्सा होता है। वह सरकार फाइलों से रोज खेलता रहता है। ऐसी स्थिति में सरकार की गोपनीयता भंग होने और मीडिया में प्रचारित होने का खतरा अकसर बना रहता है। नियमानुसार वह किसी अखबार में काम नहीं कर सकता है। सरकारी नियमों की खुलेआम यहां धज्जियां उड़ रही है। किसी भी अखबार के आउट स्टेशन का ब्यूरो चीफ के अंदर में दस संवाददाता, दो तीन छायाकारों और डाटा ऑपरेटरों की टीम होती है।  बांका जिला में ऐसे दर्जनों उदाहरण है। अखबार और पत्रकारिता का यह स्वरूप हास्यासपद होता जा रहा है।

प्रदीप चक्रवर्ती, अध्यक्ष, मीडिया मिशन, बांका से संपर्क : 9431463088 

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राजनीति को मनुष्य के पक्ष में काम करने की जरुरत है- डॉ. विभूति नारायण राय

लखीसराय (बिहार) : बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के दो दिवसीय राज्य सम्मलेन विभूति नारायण राय ने कहा कि हम साहित्य को समाज से जोड़कर देखते हैं. पिछ्ला सौ वर्ष असाधारण समय रहा. दुनिया में नास्तिकता चौथे सबसे बड़े धर्म के रूप में उभरी है. पहले ईश्वर निर्विरोध होते थे. पिछले सौ वर्षों में ईश्वर के साथ-साथ परिवार को भी चुनौती मिली है. आज दुनिया के बहुत से देशों में समलैंगिकता को मान्यता मिल रही है. कुछ वर्ष पहले जिसे स्वीकारा नहीं जाता था, उसे स्वीकारा जा रहा  है.  संस्थाएं बनाना कठिन होता है, उसे तोड़ना आसान। बड़े सपने देखना राज्यविरोधी हो रहा है। राजनीति को मनुष्य के पक्ष में काम करने की जरूरत है.

वरिष्ठ आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने 09 अप्रैल की ऐतिहासिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के दिन ही लखनऊ में प्रेमचंद और सज्जाद ज़हीर ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी। पं.  राहुल सांकृत्यायन का जन्म दिवस भी आज ही है। प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. अली जावेद ने कहा की इतिहास को वैज्ञानिकता की कसौटी पर लिखा जाना चाहिए. इस्लाम में इस बात की पाबंदी है कि औरतें अपना चेहरा ढंक कर रखे. राम के नाम पर  लोगों को गुमराह किया जाता है. प्रलेस उस परम्परा को मानता है जिसमें सूर, तुलसी, मीर और ग़ालिब एक चश्मे से देखे जाते हैं। 

बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव राजेन्द्र राजन ने अपने प्रतिवेदन में कहा कि आज वैश्विक पूंजी देश के कारपोरेट पूंजी के साथ सहमेल बनाकर उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ा रही है जिससे मनुष्य बाजार  में बिकनेवाला माल बन गया है। आज आप बौद्धिक प्रतिभासम्पन्न हैं लेकिन बाजार में बिकाऊ माल नहीं बन सकते तो आपकी कोई कीमत नहीं है। मनुष्य और मनुष्यता की जगह अर्थ ने अनर्थकारी स्थान हासिल कर लिया है। आज पद, पैसे, सुख एवं ऐश्वर्य के  के चुम्बकीय शक्ति से कमजोर होने वाले खासकर नामधारी एवं पदधारी लेखकों की संख्या कम नहीं है।  ऐसे होशियार लेखक छद्म  क्रांतिकारी बनाने  के लिए संगठन को लिवास की तरह धारण करते हैं।  वे प्रतिरोध की संस्कृति को कुशलतापूर्वक तर्कजाल से  कमजोर बनाते हैं।

सम्मलेन में आये प्रतिनिधियों एवं अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रो. विजयेंद्र नारायण सिंह ने कहा कि हम तमाम साहित्यप्रेमियों के शुक्रगुजार हैं. यह धरती राहुल सांकृत्यायन, पं जगन्नाथ चतुर्वेदी, डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, बाबा नागार्जुन, रामधारी सिंह दिनकर आदि से प्रभावित रही है।  आचार्य विनोबा भावे, आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आदि कर्मयोगी का भी प्रभाव क्षेत्र रहा है।  मगही कवि मथुरा प्रसाद नवीन, साहित्यकार कुमार विमल, नंदन शास्त्री एवं अख्तर उरैनवी की तो जन्म एवं कर्मस्थली ही है, जिन्होंने भाषा साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया है। 

बिहार प्रलेस के अध्यक्ष डॉ. ब्रजकुमार पाण्डेय एवं कॉ. सत्यनारायण सिंह ने प्रलेस की भूमिका पर प्रकाश डाला. इस अवसर पर अतिथि साहित्यकारों ने बिहार प्रलेस की पत्रिका ‘रोशनाई’ एवं ‘दखल’ का लोकार्पण भी किया. संध्याकालीन सत्र में ‘सांस्कृतिक यात्रा’ के अंतर्गत राहुल सांकृत्यायन  विचार ‘भागो नहीं  दुनिया को बदलो’  शीर्षक बैनर तले राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए  साहित्यकार एवं रंगकर्मियों ने नगर में भ्रमण किया. 

सम्मलेन में सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल पतंग का एकल नाट्य ‘डेविड की डायरी’ का मंचन किया गया. तत्पश्चात जमुई जिला प्रलेस की ओर से ईशा और साक्षी कुमारी ने नृत्य पेश किया। सत्र का संचालन अरविन्द श्रीवास्तव ने किया.

सम्मलेन के प्रथम दिवस का महत्वपूर्ण सत्र ‘कवि सम्मलेन’ था, कवि शहंशाह आलम की अध्यक्षा एवं राजकिशोर राजन के संचालन में दर्जनों कवियों  ने अपनी कविता का पाठ किया. बक्सर से पधारे कुमार नयन ने सुनाया – खौलते पानी में डाला जाएगा, यूँ हमें धोया  खंगाला जाएगा, लुटाने में लड़ पड़े आपस में हम, इस तरह सिक्का उछाला जाएगा.

जमुई के शायर पैगाम सादिक ने कहा – तुम सजा तो देते हो हौसला नहीं देते, आजतक न जाने किस कसमकस में है मुंसिफ, बहस रोज सुनते फैसला नहीं देते।  ए. दिव्या ने सुनाया – वो कैसी फिजां होती, वो कैसा जहां होता, मैं होती बेगम मुमताज, तू मेरा शाहजहाँ होता।  पूर्णिया से नूतन आनंद ने अपनी -साइकिल चलाती लड़की, बक्सर के शशांक शेखर ने जलाते शहर को देखकर, पटना के श्रवण कुमार ने – माँ शीर्षक कविता का पाठ किया। कवियों में अरुण हरलीवाल (गया) , विभूति कुमार (पटना), कुमार  विजय गुप्त ( मुंगेर), गंगादयाल सिंह (गोपालगंज), राजेन्द्र राज (सूर्यगढ़ा), सौरभ शाण्डिल्य (गया), सुधाकर राजेन्द्र (जहानाबाद) , उमेश पंडित उत्पल (पूर्णिया), सुरेन्द्र भारती (त्रिवेणीगंज), शशिबाला रानी (लखीसराय) , अरविन्द श्रीवास्तव (मधेपुरा)  आदि ने अपनी-अपनी  कविताओं का पाठ किया।

सम्लेन के दूसरे दिन ‘प्रगतिशील आंदोलन परम्परा और चुनौतियाँ’ विषयक सेमीनार में  प्रो. रवीन्द्रनाथ राय ने कहा कि प्रगतिशीलता का प्रथम बीज कबीर ने डाला था.  प्रेमचंद सौंदर्य को श्रमिकों के पास ले जाना चाहते थे. सदगत, ठाकुर  का कुआं , पूस की रात में जो शोषित वर्ग थे वे प्रेमचंद के नायक बने।  निराला ने अपने प्रतिरोध की मशाल को जलाए रखा।  बिहार के लेखकों को भी प्रेमचंद जागृत करते रहे।  सज्जाद जाहिर, मुल्कराज आनंद और प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ की नींव रखी।  जब सोज़ेवतन 1909 में प्रकाशित  हुआ, सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। फैज पाकिस्तान की जेलों में वर्षों बंद रहे।  प्रगतिशील आंदोलन नें प्रतिरोध को शक्ति दी। आज हम देखते हैं कि इतिहास और मिथक को एक बताया जा रहा है।

उप्र प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव डॉ. संजय श्रीवास्तव ने प्रगतिशील आंदोलन की भूमिका एवं लेखकों की प्रतिवद्धता को रेखांकित किया।  डॉ शचीन्द्र महतो ने कहाकि हमारी महान परम्परा हमें चेतावनी देती है.

प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. अली जावेद  ने स्पष्ट किया कि तसलीमा नसरीन हो या  सलमान रुश्दी,  हम किसी पर अंकुश लगाने का विरोध करते हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के गला घोंटने का विरोध करते हैं लेकिन वे हमारे आदर्श नहीं हैं. हम लेखन के जरिए वैज्ञानिक सोच बढ़ाने की बात करते हैं, धर्म को हथियार बनाकर सत्ता हासिल करना गलत मानते हैं.

इस सत्र की अध्यक्षा करते हुए डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि साहित्य का स्रोत जनता ही है. आधुनिक युग चेतना के प्रवर्तक भारतेंदु थे, भारतेंदु ने समाज के नए लक्षण को पहचाना..  हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हमें अपने समय को पहचानना चाहिए.  आज समाज में उनका वर्चस्व बढ़ रहा है जो प्रगतिशीलता के विरोधी हैं जनतंत्र के विरोधी हैं. सम्मलेन में जिला इकाईयों  द्वारा लगाया गया कविता-पोस्टर, पुस्तक प्रदर्शनी आदि भी आकर्षण में रहे. इस  यादगार  आयोजन के लिए प्रतिभागियों ने लखीसराय की जनता का आभार व्यक्त किया.

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शब्दों से खेलने के शौकीन नीतीश कुमार

‘न्याय के साथ विकास’ नीतीश सरकार का बहुप्रचारित नारा अब असली रूप में सामने आने लगा है. नीतीश सरकार दस वर्षों के शासनकाल के अंतिम पड़ाव पर है। मूल्यांकन का समय तो नहीं आया है, लेकिन छल की शिकार आम अवाम की आह को कौन रोक सकता है.

आज नियोजित शिक्षक सड़क पर हैं, सांख्यिकी-सेवक सड़क पर हैं, जो घर पर हैं, वे भी चैन में नहीं हैं. इनकी जायज मांगों को गौर करने का समय सरकार को नहीं है. सरकार के मुखिया नीतीश कुमार ‘परमपिता परमेश्वर’ की शैली में ‘सब मंगल हो’ का भाव लिए ‘न्याय के साथ विकास’ की सवारी कर रहे हैं. बिहार म्यूजियम के निर्माण को लेकर पटना उच्च न्यायालय में एक लोकहित याचिका दायर की गई है. बिहार सरकार ने पैरवी के लिए सर्वोच्च न्यायालय के वकील नागेश्वर राव को लगाया है. दो दिन इनकी बहस हो चुकी है, 17 मार्च 2015 और 7 अप्रैल को राव ने बिहार सरकार की पैरवी की है। प्रतिदिन 30 लाख रुपये की दर से दो दिन की फ़ीस 60 लाख हुई। भुगतान के लिए स्वीकृति की संचिका मंत्री के समक्ष प्रस्तुत की गई है.

बिहार म्यूजियम के शिलान्यास के मौके पर नीतीश कुमार ने अपने संबोधन में कहा था कि चंचल कुमार को मैंने कला, संस्कृति एवं युवा विभाग और भवन निर्माण का ब्यौरा-प्रभार जान-बूझकर दिया है. ये मेरा ‘टेस्ट’ जानते हैं, उसके अनुरूप ही काम कराएँगे. जनता भ्रष्टाचार से त्राहिमाम कर रही है और अधिकारी ‘परमपिता परमेश्वर’ के ‘टेस्ट’ को कार्यरूप देने में व्यस्त हैं. इसे महज मुख्यमंत्री की फिजूलखर्ची कहना उचित नहीं होगा, एक सामंत का सामंती मिजाज, जो अपने ‘टेस्ट’ के लिए जनता की हर जायज जरूरत की क़ुरबानी देने पर तुला है.

नीतीश कुमार ‘बिहार म्यूजियम’ के छद्मनाम से ताजमहल बनवा रहे हैं और उसमें अपना अमरत्व देख रहे हैं. दुर्भाग्य कि ताजमहल मृतात्मा की याद में बना मकबरा है. एक जीवित व्यक्ति अगर ऐसा करता है तो इसे शुभ तो नहीं ही माना जायेगा! नीतीश कुमार को शब्दों से खेलने का शौक है, ‘न्याय के साथ विकास’, ‘धर्मनिरपेक्षता’, ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस’, ‘जनता के दरबार में मुख्यमंत्री’ (उसमें बेचारी बनी जनता!), ‘विशेष राज्य का दर्जा’ आदि न जाने कितने ही शब्द हैं, जिनसे खेलते हुए नीतीश कुमार अपनी दो कार्य-अवधि पूरा करने के कगार पर हैं, लेकिन उन्हें कौन बताये कि अक्षर ब्रह्म होता है और दंभ से खेलना काफी विध्वंसक होता है !

लेखक अशोक कुमार ईमेल संपर्क : ashokkumarrajendernagar@gmail.com

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वाह रे भिखारी ठाकुर का बिहार ! गया में भिखारियों ने खोला ‘मंगला बैक’ और पटना में बनाई नाटक मंडली

बिहार तो बिहार है, हर फन में अलखनिरंजन। वहीं के थे भिखारी ठाकुर। वहां जेपी जैसे आंदोलनकारी और लालू जैसे नेता ही नहीं हुए, आज भी आला-निराला कुछ न कुछ आए दिन वहां सुनने-देखने को मिल ही जाता है। गया जिले में भिखारियों ने अपना ‘मंगला बैंक’ खोल लिया है तो पटना में खुद की नाटक मंडली बनाकर जगह जगह भिखारी नुक्कड़ मंचन कर रहे हैं।

‘शांति कुटीर’ के संरक्षण में सात भिखारियों ने भिक्षाटन से निजात दिलाने के लिए ये नाटक मंडली बनाई है। वे अपने नाटक – ‘जिसे कल तक देते थे बददुआ, उसे आज देते हैं दुआ’ का शहर के कई नुक्कड़ों पर मंचन कर चुके हैं। ज्यादातर मंचन उन स्थानों पर करते हैं, जहां भिखारियों का जमावड़ा रहता है। बिहार सरकार की भिखारियों को मुख्यधारा में लाने की पहल का एक उपक्रम बताया जाता है। दिग्विजय उनको प्रशिक्षित करते हैं। सभी कलाकार अनपढ़ हैं तो खुद ही अपना संवाद बना लेते हैं।

गया शहर में भिखारियों के एक समूह ने अपना एक बैंक खोल लिया है, जिसे वे ही चलाते हैं और उसका प्रबंधन करते हैं, ताकि संकट के समय उन्हें वित्तीय सुरक्षा मिल सके। गया शहर में मां मंगलागौरी मंदिर के द्वार पर वहां आने वाले सैकड़ों श्रद्धालुओं की भिक्षा पर आश्रित रहने वाले दर्जनों भिखारियों ने इस बैंक को शुरू किया है। भिखारियों ने इसका नाम मंगला बैंक रखा है। इस अनोखे बैंक के 40 सदस्य हैं। बैंक प्रबंधक, खजांची और सचिव के साथ ही एक एजेंट और बैंक चलाने वाले अन्य सदस्य  सभी भिखारी हैं। हर एक सदस्य बैंक में हर मंगलवार को 20 रुपए जमा करता है। इसकी स्थापना छह माह पहले हुई है। बैंक आपात स्थिति आने पर भिखारियों की मदद करता है। बैंक के रुपए डूबने से बचाने के लिए कर्ज पर दो से पांच प्रतिशत तक ब्याज देना अनिवार्य होता है।

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Journalist Kashi Prasad honoured at Munger

Munger, March 04.The Munger Commissioner,Sunil Kumar Singh on March 03 evening honoured the seniormost journalist of Munger,Kashi Prasad by presenting him a ‘shawl’ as a token of love for his  contribution to the society for several decades at the launch of a city news channel  at Munger.The D.I.G(Munger Range),S.P.Shukla,the  District & Session Judge(Munger), Santosh Kumar Shrivastawa,the Collector(Munger), Amrendra Pd Singh and   other senior officials of Munger were present on the occasion. 

 

Munger Commissioner,Sunil Kumar Singh presents the seniormost journalist ,Kashi Prasad  a ‘shawl’ as a token of love  for his contribution to the society at Munger on March 03 evening.

 

  Mr.Kashi Prasad has been now serving  The Times of India   from the headquarters of Munger for several decades.He has also worked for different Englsih and Hindi dailies of Bihar for four decades.He is also a lawyer  at Munger.

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इंटरव्यू के लिए ‘पहले मैं पहले मैं’ के चक्कर में नीतीश कुमार के सामने आपस में ही भिड़ गए न्यूज चैनल वाले

मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार के आवास सात सर्कुलर रोड इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के लिए आपसी युद्ध का अखाड़ा बन गया। मीडिया वालों की आपसी तू-तू मैं-मैं इतनी तेज थी कि दर्शकों की भीड़ जमा हो गयी। यह सब हंगामा प्रदेश अध्‍यक्ष वशिष्‍ठ नारायण सिंह और नीतीश के पिछले कार्यकाल के सुपर सीएम माने जाने वाले सांसद आरसीपी सिंह के समक्ष हो रहा था। शपथ ग्रहण के बाद नीतीश कुमार का पहला प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करीब सात बजे आयोजित था।

प्रेस कॉन्‍फ्रेंस के बाद चैनलवाले भाइयों में पहला इंटरव्‍यू लेने की होड़ लग गयी। स्‍वाभाविक भी था। प्रिंट वाले सब जा चुके थे। लेकिन बाइट वालों के लिए अफरातफरी का माहौल था। उधर नीतीश के दरवाजे के बाहर काफी भीड़ थी। वह भीड़ को शांत करना चाहते थे। जबकि चैनलवालों में पहले इंटरव्‍यू लेने की होड़ थी। नीतीश के कार्यालय के एक कक्ष में सभी चैनलवाले जमा हो गए। नीतीश ने खुद कहा कि आप लोग बारी-बारी से आइए। सबको बाइट देंगे। लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था।

इस बीच नीतीश कुमार दरवाजे के बाहर लोगों से मिलने चले गए। इधर कमरे में नीतीश के मीडिया प्रभारी ने एक लिस्‍ट दी, जिसमें चैनलों के लिए क्रम तय किया था। कमरे में पत्रकारों को भीड़ बढ़ती गयी। खड़ा होना भी मुश्किल हो गया था। उधर नीतीश लोगों से मिलकर कमरे में आए तो कैमरों की भीड़ से उनका माथा ठनका और वह सीधे बाहर शेड में आ गए। वहां सभी पत्रकार पहुंचे। मजमा यहां भी लग गया था। यहां भी पत्रकार लिस्‍ट के अनुसार कुर्सियों पर जम गए थे।

उधर सबसे आगे बैठने वाले चैनल का ओबी वेन से शेड तक का तार कम पड़ रहा था। उसके प्रतिनिधि ने सीएम से आग्रह किया कि शेड से बाहर चलते हैं। वहीं से लाइव से करना है। नीतीश उनके आग्रह पर बाहर चले गए। बाकी और लोग बैठे रहे कि सीएम लौट कर आएंगे। बाहर में लाइव की तैयारी चल रही थी। इधर शेड में बारी के लिए दो पत्रकारों के बीच पहले विवाद, फिर तू-तू-मैं-मैं और हाथापाई तक की नौबत आ गयी। हालांकि बीच बचाव के बाद मामला शांत हो गया।

विवाद की शुरुआत दिल्‍ली से आए एक पत्रकार की वजह से हुई। उनका कहना था कि सीएम लौट कर आएंगे तो पहला इंटरव्‍यू वह ही लेंगे। दूसरे लोग इसके लिए तैयार नहीं थे और कह रहे थे कि बारी का इंतजार कीजिए। दिल्‍ली वाले इसके लिए तैयार नहीं थे। इसी बात पर देखने और देख लेने की नौबत आ गयी। उधर नीतीश कुमार का लाइव शुरू हो गया। और लाइव के लिए लोग अपनी-अपनी सीट जमा चुके थे। लेकिन इस सीटिंग अरजमेंट में दिल्‍ली वाले कहीं नजर नहीं आ रहे थे।

पटना से वरिष्ठ पत्रकार बीरेंद्र कुमार यादव की रिपोर्ट.

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व्यापार मेला देखने अवश्य जाएं और इस एडवाइजरी पर गौर करें

कुछ संभलकर ही ट्रेड फेयर जाएं क्योंकि जो दिखता है वही सुंदर नहीं है! यह पोस्ट मैं नहीं भी डाल सकता था क्योंकि यह एक सामान्य-सी निजी घुमक्कड़ी है जिसे आप चाहें तो विंडो शापिंग भी कह सकते हैं। लेकिन डाल रहा हूं। दरअसल मुझे इस बात से कभी संतोष नहीं होता कि एक सामान्य दर्शक की भांति एक पत्रकार व्यवहार करे। पत्रकार के कुछ सामाजिक दायित्व होते हैं और चुनौतियां भी। वह महज एक प्रचारक या जस का तस दिखाने वाला, बताने वाला संजय नहीं कि हर धृतराष्ट्र उससे पूछे कि बताओ संजय क्या हुआ कुरुक्षेत्र में।

खैर हुआ यह कि आज दोपहर 12 बजे मैं प्रगति मैदान में लगे ट्रेड फेयर को देखने-घूमने गया। और शाम सात बजे तक वहीं रहा। हर पैवेलियन तथा हर स्टाल को देखा। किसी के अंदर गया और किसी के नहीं। रक्षा मंत्रालय का निराकार पैवेलियन देखने के बाद मैं उसके ठीक सामने के जेएंडके पैवेलियन गया। मुझे वहां से कुछ सामान खरीदना था। एक तो मेरी प्रिय केसर और बादाम। बादाम मनचाहा नहीं मिला तो मैने एक कश्मीरी टोपी खरीदी और बाहर आकर एक कप कहवा खरीदा और कहीं बैठने का जुगाड़ तलाशने लगा। उसके बगल में बिहार पैवेलियन था जिसके बाहर एक चबूतरा-सा बना था और उस पर घास लगाई गई थी। पैवेलियन खाली था, कोई भी उधर का रुख नहीं कर रहा था इसलिए खाली देख मैं उस चबूतरे पर जाकर बैठा और मजे से कहवा पीने लगा। कहवा स्वादिष्ट था, उसमें केसर भी पड़ी थी और कुछ ड्राई फ्रूट्स भी। तभी एक अधेड़ महिला की कर्णकटु आवाज सुनाई पड़ी- ओए, तू उत्थे किद्दर जा रही ए? वो तो बिहार है उत्थे कुच्छ नहीं ए।

यह वाक्य मुझे खला और कहवा का कप डस्टबिन में फेक मैं बिहार पैवेलियन के अंदर चला गया। अंदर भी जो दर्शक आए थे उसमें से अधिकांश ऐसा सलूक कर रहे थे मानों वे बिहार पैवेलियन को उपकृत करने के मकसद से अंदर आए हों। दिल्ली के छोकरे हरियाणवी लहजे में कह रहे थे कि यहां तो सत्तू मिलेगा। पर मैं जब अंदर गया तो सनाका खा गया। बहुत ही सुंदर पैवेलियन बनाया हुआ है। वहां जाकर मधुबनी कला की तमाम कलाकृतियां मैने खरीदीं और खासकर राजबाड़ी चाय। बहुत अच्छी और बिहार की पुरानी चाय। जीविका से कुछ हस्तकला की सामग्री खरीदी और बाहर निकलते समय गैलरी में मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की आदमकद फोटो देखीं और साथ में श्री मांझी द्वारा किए गए कार्यों का भी उल्लेख था। उनसे पता चला कि बिहार के मुख्यमंत्री ने तो वहां के अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। मसलन बिहार ने कन्या भ्रूण हत्या रोकने का ही काम नहीं किया है बल्कि कन्या के जन्म पर परिवार को 2000 रुपये का अनुदान मांझी सरकार उदारतापूर्वक दे रही है। इसके अलावा कन्या शिक्षा तथा विवाह तक सरकार कुछ न कुछ करती ही रहती है। मेरा दिल भर आया और बिहार के मुख्यमंत्री श्री जीतनराम मांझी के प्रति मेरा मन कृतज्ञ हो उठा।
खैर आप टीवी और अखबारी पत्रकारों के झांसे में मत आइएगा। मैं लोक कल्याणार्थ कुछ एडवाइजरी डाल रहा हूं। आप यह व्यापार मेला देखने अवश्य जाएं और खूब घूमें पर मेरी एडवाइजरी के हिसाब से चलेंगे तो कम खर्च कर और कम थक कर इस मेले का पूरा मजा लेंगे। एडवाइजरी पर गौर करें-

1. ध्यान रखें मेला परिसर में बहुत चलना पड़ता है इसलिए मेले में जाते समय आप कैजुयल ड्रेस पहनें। फार्मल जूतों की बजाय स्पोर्टस शू ही पहनें।
2. पीने का पानी अवश्य ले जाएं।
3. अगर कुछ खरीदारी करनी है और जरूर करनी चाहिए तो अपने घर से एक बड़ा-सा झोला जरूर ले जाएं। वहां के कैरीबैग बहुत छोटे और जल्दी ही फट जाते हैं।
4. आप बेहतर रहे कि अपने साथ किसी साथी को भी ले जाएं। परस्पर बातचीत करते रहने से आप कम थकेंगे और कम बोर होंगे।
5. हर पैवेलियन में कुछ खाएं-पिएं जरूर। खासकर राजस्थान और महाराष्ट्र के पैवेलियन में। राजस्थान में आप खाखड़ा के साथ लहशुन की चटनी खा सकते हैं और मीठे में तिलपट्टी तथा महाराष्ट्र में पाव-भाजी, पाव बड़ा या बटाटा बड़ा। और गर्मागर्म चाय।
6. जेएंडके में आप कहवा पीकर आएं। यह कम ही मौका मिलेगा।
7. खरीदारी करनी हो तो आप जेएंडके से गर्म कपड़े, फिरन, और शालें खरीद सकते हैं। हिमाचल में भी गर्म ऊनी कपड़े तथा सेब का जूस भी ले सकते हैं।
8. असम से चाय जरूर खरीदें। खासकर अगर आप चाय की किस्मों के शौकीन हैं तो टी बोर्ड के स्टाल से किस्म-किस्म की चाय पत्ती खरीदें।
9. मणिपुर से रंग-बिरंगे स्वेटर और बांस का सामान खरीद सकते हैं तथा बांस का अचार भी लें।
10. नगालैंड से स्वेटर, रंग-बिरंगे मफलर और बांस का हस्तशिल्प ले सकते हैं।
11. सिल्क की साडिय़ां व कुर्ते खरीदना चाहें तो बंगाल व असम का टसर और बिहार के भागलपुर स्टाल से ले सकते हैं।
12. कुछ और पैसा खर्च करना चाहें तो कर्नाटक से हस्तशिल्प की तमाम नायाब चीजें खरीद सकते हैं। सिल्क भी और एक से बढ़कर एक सुंदर और मंहगी साडिय़ां भी। चंदन की लकड़ पर उत्कीर्ण मूर्तियां और जड़ाऊ गहने व कपड़े।
13. आंध्र से आप फ्रूट हलवा जरूर खरीदें और मदरासी मैथा भी। यह मैथा डायबिटीज के लिए उपयोगी है। लेकिन वहां पर मैथा बेचने वाला व्यक्ति उत्तर भारतीय है और उससे बारगेन जरूर करिए। जो दाम वह बताए उससे आधा दाम लगाएं।
14. तेलांगना से आप यूनानी दवाएं खरीद सकते हैं। यहां घुटने के दर्द और जुखाम तक के ड्राप मिल जाएंगे।
15. तेलांगना पैवेलियन में आप बेहद खूबसूरत लेकिन बुर्के में ढकी, सिर्फ चेहरा छोड़कर तन्वंगी हैदराबादी बालाओं को देखकर दंग रह जाएंगे।
16. केरल के पेय, सूखी मछली के अचार, समुद्री जल-जंतुओं की चटनी खरीद सकते हैं पर मुझ सरीखे शाकाहारियों के लिए ये लाजवाब लुभावनी पर लजीज चीजें बस देखने भर की हैं। यहां आप आयुर्वेदिक दवाएं और मालिश के लिए तेल किस्म-किस्म के खरीद सकते हैं। यहां से आप काली मिर्च और जावित्री जरूर खरीदें।
17. तमिलनाडु मुझे बहुत पसंद है। आप यहां से इडली, सांभर बनाने का सामान, तमाम तरह के मसाले और आर्ट ज्वेलरी जरूर लें। महंगी से महंगी और ईमानदारी भी।
18.यूपी, हरियाणा, दिल्ली और पंजाब तथा गुजरात में खरीददारी न ही करें। यहां कोई चीज असली नहीं दिखी।
19. जूतों पर लूट मची है। पर अगर आपको जूते खरीदने हों तो महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्टाल से ही लें।

बाकी आप ठगाही से बचें और जेबकतरों से भी तथा अन्य जिनसे भी आपको एलर्जी हो। पर जाएं जरूर। मेला सुंदर है स्थल के लिहाज से भी और आने वालों के लिहाज से भी।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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पत्रकार विजय कुमार वर्मा का निधन

समस्तीपुर। बिहार में समस्तीपुर जिले के सरायरंजन प्रखंड के नरघोघी गांव में पत्रकार विजय कुमार वर्मा का ह्वदय गति रूक जाने से निधन हो गया । वह 50 वर्ष के थे । वर्मा पटना, रांची और कोलकता से प्रकाशित एक हिन्दी दैनिक से जुड़े हुए थे। नरघोघी स्थित आवास पर ह्वदय गति रूक जाने से उनका निधन हो गया।

वर्मा के दो पुत्र और एक पुत्री है । वर्मा के निधन पर बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के जिलासंयोजक कृष्ण कुमार, वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव सोलंकी, शिव शंकर वर्मा, शिवचंद्र झा, गौरी शंकर झा समेत अन्य पत्रकारों ने शोक व्यक्त किया और कहा कि वर्मा युवा पत्रकारों के मार्गदर्शक थे। गौरतलब है कि एक माह पूर्व वर्मा के पिता और जिले के वरिष्ठ पत्रकार भोला प्रसाद वर्मा का भी निधन हो गया था।

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बकरी चराने वाले को जिंदा जलाना और कूड़ा बीनने वालियों के साथ गैंगरेप

Mitra Ranjan : हमारे समाज में मौजूद जातिगत दर्जेबंदी ने किस कदर लोगों को वहशी बना दिया है उसके बारे में कुछ भी कहना कम है। अभी बिहार में हुई दो घटनाएँ इसी ओर इशारा कर रही हैं – किसी दबंग साहब के खेत में एक दलित परिवार की बकरी चले जाने पर १५ साल के किशोर के साथ मार-पीट और बाद में उसको जिन्दा जला देने का अमानवीय कृत्य और कूड़ा बीनने वाली ५ दलित बच्चियों /महिलाओं के साथ गैंगरेप की क्रूर घटना ! किस संवेदना की बात करते हैं साहब। और मीडिया- चैनल और प्रिंट, इन खबरों को संजीदगी एवं तत्परता से सामने लाने से मुंह चुराते रहे।

एक दलित मुख्यमंत्री के राज्य में भी ये हाल है। सामाजिक संरचना में ऊपरी पायदान पर काबिज लोगों की जुबान ये कहते हुए नहीं थकती कि जातिवाद ख़त्म होता जा रहा है, कि अब तो दलित / पिछड़े / वंचित / आदिवासी ही जातिवाद और शोषण की झूठी कहानियां रच रहे हैं, कि ये ही लोग असल में जातिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, कि हमारे सभ्य समाज की सुव्यवस्था में बढ़ते खून-खराबे के लिए ये लोग ही जिम्मेदार हैं और न जाने क्या -क्या !

लेकिन असलियत तो सबके सामने है जो हर दो-चार दिन में गाहे-बगाहे इस परम सहिष्णु व दयालु देश और हिन्दू समाज के किसी न किसी कोने में मवाद से भरे फोड़े की तरह फूट निकलती है. क्या सामंती / पितृसत्तात्मक मूल्यों के पैरोकारों की ये गलाजत और सत्ता तमाम केन्द्रों द्वारा इकट्ठे होकर प्राणपण से उनकी रक्षा में जुट जाने की अनदेखी की जा सकती है? विविध स्तरों पर शोषण-उत्पीड़न की निरंतर बढ़ती घटनाओं के असली दोषियों शिनाख्त क्या अब भी बाकी है? और बेहद दुखद आश्चर्य है कि इन घटनाओं के पुरजोर विरोध में सांझी लड़ाई में उतरने को लेकर तमाम दलित संगठनों के भीतर भी वो एकजुटता नहीं नजर आती जिसकी उनसे अपेक्षा है।

भाकपा माले ने ताकतवर प्रतिरोध के लिए जो पहल की है उसके साथ तमाम प्रगतिकामी चेतना वाले संगठनों, लेखकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों समेत सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी एकजुट होना चाहिए और दक्षिणपंथी राजनीति के साथ-साथ सामाजिक न्याय का छद्म रचनेवाले नौटंकीबाजों का भी पर्दाफाश करना चाहिए. कहना न होगा कि आरएसएस के मुखिया श्री मोहन भागवत जी के ताजा बयान, जिसमे वो महिलाओं को हाउसवाइफ बने रहने की नेक व सद्भावपूर्ण सलाह दे रहे हैं, को भी उसी कड़ी में देखा जाना चाहिए जो पूरे समाज को सामंती व पितृसत्तात्मकता के नृशंस जकड़न से बाहर नहीं निकलने देना चाहती।

http://timesofindia.indiatimes.com/…/articlesh…/44829446.cms

http://epaper.jansatta.com/c/3665187

http://khabar.ibnlive.in.com/news/129061/3

पत्रकार, लेखक और सोशल एक्टिविस्ट मित्र रंजन के फेसबुक वॉल से.

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बिहार में आरटीआई कार्यकर्ता पर रंगदारी मांगने का आरोप लगाकर जेल भिजवाया

समस्तीपुर (बिहार) : पंचायत में चल रही विभिन्न विकासात्मक योजनाओं की जानकारी आरटीआई के तहत मांगे जाने से बौखलाये मुखिया ने वांछित जानकारी तो नहीं उपलब्ध कराई उल्टे आवेदक के खिलाफ रंगदारी की प्राथमिकी दर्ज कराकर उसे जेल जरूर भेज दिया. मामला समस्तीपुर जिला के हसनपुर प्रखंड का है.  फुलहारा पंचायत की मुखिया द्वारा हसनपुर थाना में रंगदारी मांगे जाने से संबंधित दर्ज कांड सं.-118/14 पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने आरटीआई कार्यकर्ता ओमशंकर पोद्दार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है.

पुलिस अभिरक्षा में मंगलवार को ओमशंकर ने मामले की विस्तृत जानकारी मीडियाकर्मियों को देते हुए बताया कि उसने पंचायत में चल रही विकासात्मक योजनाओं एवं उससे संबंधित राशि की जानकारी हेतु बीडीओ एवं पीओ के समक्ष आरटीआई के तहत आवेदन दिया था. आवेदन देने के बाद योजनाओं की आड़ में सरकारी राशि का गबन किये सिस्टम में खलबली मच गई. मांगी गई सूचना से बढ़ती परेशानी को देख स्थानीय मुखिया ने कई तरह के प्रलोभन देकर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास किया लेकिन विफल रहे. फिर भी योजनाओं के क्रियान्यवयन में लगे मुखिया के परिजनों एवं सरकारीकर्मी द्वारा बराबर ही समझौता कर लिये जाने अथवा अंजाम भुगते जाने की धमकी दी जाती रही. इस बीच ओमशंकर के आवेदन पर जिलाधिकारी ने पंचायत में चल रही कई योजनाओं की जांच करवाई और दोषियों के विरूद्ध कार्रवाई भी हुई. मगर आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी आज तक नहीं मिल सकी है.

बताया जाता है कि आरटीआई कार्यकर्ता की सजगता, जागरूकता और निर्भीकता को देखकर मुखिया एवं सरकारीकर्मियों ने साजिश के तहत रंगदारी का झूठा मुकदमा दर्ज कराकर उसे गिरफ्तार किया गया है. रोसड़ा शहर के एक कम्प्यूटर दुकान में ऑपरेटर के रूप में कार्य कर रहे ओमशंकर पर लगे रंगदारी के आरोप से ग्रामीण और उसके सहयोगी भी हतप्रभ रह गये. गिरफ्तारी के विरोध में नाराज ग्रामीणों की गोलबंदी अब तेज होने लगी है. पंचायत के कई वर्तमान एवं पूर्व जनप्रतिनिधियों के अलावे मुन्ना राम, रामप्रवेश सिंह, संजय कुमार, विकास कुमार, अमितेश सुमन (सभी ग्रामीण) ने मामले की आलोचना करते हुए इसे घृणित राजनीति करार दिया. 

दूसरी ओर पीड़ित आरटीआई कार्यकर्त्ता के पिता रामविलास पोद्दार ने भी इस मामले में हसनपुर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाये हैं. परिजनो के आरोप हैं कि आईओ बब्बन चौधरी की संलिप्पता भ्रष्टाचारियों के साथ है, इस कारण उन्होनें झूठे आरोप की निष्पक्ष जांच किये बिना एकतरफा कार्रवाई कर दी. हसनपुर थानाध्यक्ष से इस सबंध में पक्ष जानने की कोशिश की गई लेकिन सम्पर्क नहीं हो सका.

समस्तीपुर से विकास कुमार की रिपोर्ट.

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चुनाव ख़त्म तो काम और धंधा ख़त्म, तैयारी साधना-हरियाणा न्यूज़ चैनल को बंद करने की

न्यूज़ चैनल मालिकों के लिए ये कोई नइ बात नहीं है। मन आया तो कभी भी न्यूज़ चैनल खोल लिया और जब मन हुआ चैनल बंद करके कर्मचारियों को रस्ते पर ला कर खड़ा कर दिया। जब साधना को जरुरत थी साधना-हरियाणा की तो साधना-बिहार बंद कर के रिपोर्टर्स को रस्ते पर ला खड़ा किया। और अब जब जरुरत पूरी हो गइ तो साधना-हरियाणा को भी इलेक्शन के बाद बंद करने की तयारी चल रही है। बेचारे रिपोर्टर और चैनल के सारे लोग फिर रस्ते पर आ जाएंगे। मालिको ने चैनल में काम करने वाले लोगो का मजाक बना कर रख दिया है।

साधना-हरियाणा के एक अधिकारी का अपने खास लोगों से कहना है कि हमारा कॉन्ट्रैक्ट सिर्फ इलेक्शन तक के लिए था। इलेक्शन के बाद चैनल बंद करना ही पड़ेगा और हमने जो वर्कर साधना-बिहार से लिया था हम उन्हें वापस कर देंगे। कोई पूछे, जब साधना-बिहार चैनल है ही नहीं, चैनल बंद हो चुका है तो साधना वाले अपने पुराने वर्कर को वापस ले कर क्या करेंगे। बात यहीं पर अटकी हुइ है।  20 अक्टूबर से चैनल ऑफ एयर होने के बात चल रही है। इधर सारे वर्कर्स का ऑफ कैंसल कर दिया गया है और कहा गया है के इलेक्शन के बाद सब को ऑफ दे दिया जायेगा।

भाई साहब इलेक्शन के बाद चैनल ही नहीं रहेगा तो ऑफ किस बात का?

भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित।

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