जजों पर छापे के पीछे क्या संदेश छिपा है?

अजय कुमार, लखनऊ

लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक न्यायपालिका इंसाफ के लिए दर-दर भटकते किसी शख्स के लिए इंसाफ की अंतिम ‘चौखट’ होती है। भारतीय न्यायपालिका में इंसाफ मिलने में देर जरूर हो सकती है, लेकिन यहां अंधेर बिल्कुल नहीं है। हमारी न्यायपालिका का स्तर विश्व में काफी ऊंचा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि न्यायपालिका में सेवारत माननीय न्यायाधीश / अधिकारी / कर्मचारी भी उसी समाज का हिस्सा है जो अक्सर तरह-तरह के भ्रष्टाचार आदि आपराधिक कृत्य में लिप्त रहता है। बात खासकर न्यायविदों की कि जाए तो अक्सर कुछ न्यायाधीश अपने अधिकारों का दुरूपयोग करके न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाते से बाज नहीं आते हैं। कभी कोई जज न्यायपालिका के नियम-कायदों के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस करने लगता है तो कोई फैसले देते समय दबाव या लालच में आकर इंसाफ को ‘बेच’ देता है। यहां तक कि जज साहब पर यौन उत्पीड़न तक के आरोप लग जाते हैं।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की खबर जब कभी सामने आती है तो आम जनता सबसे अधिक दुखी होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जनता, न्यायाधीशों को ‘इंसाफ का देवता’ समझती है। ऐसा ही तब हुआ जब गत दिनों उच्च न्यायालय इलाहाबाद के न्यायधीश एस एन शुक्ला तथा रिटायर जज आई एम कूद्दीसी के ठिकानों पर सीबीआई ने छापा मारा। सीबीआई ने कुछ समय पूर्व ही एक निजी मेडिकल कॉलेज का कथित तौर पर पक्ष लेने पर भ्रष्टाचार के एक मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस एन शुक्ला एवं कूद्दीसी को नामजद किया था। दोनों के नई दिल्ली, लखनऊ और मेरठ स्थित ठिकानों पर छापेमारी की गई। यह छापा प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को अनुचित लाभ पहुंचाने से जुड़े मामले से संबंधित है। छापे में चल-अचल संपत्तियों के अलावा मामले से जुड़े कागजात बरामद हुए हैं। न्यायमूर्ति शुक्ला के लखनऊ के रायबरेली रोड पर स्थित वृंदावन कॉलोनी के आवास और न्यायमूर्ति कुद्दुसी के लखनऊ में हजरतगंज और नई दिल्ली में ग्रेटर कैलाश स्थित आवास पर मारे गए।

सीबीआई अधिकारियों ने बताया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायाधीश शुक्ला, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आई एम कुद्दूसी के अलावा प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के भगवान प्रसाद यादव और पलाश यादव, ट्रस्ट तथा निजी व्यक्तियों भावना पांडेय और सुधीर गिरि को भी मामले में नामजद किया है। आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी (आपराधिक षड्यंत्र) और भ्रष्टाचार रोकथाम कानून के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है। सीबीआई ने एंटी करप्शन विंग-द्वितीय के डीएसपी मुकेश कुमार की जांच रिपोर्ट के आधार पर मुकदमा दर्ज किया था।

यह पहली बार हुआ है जब किसी सेवारत जज के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज हुई है। विवादित रिटायर न्यायाधीश कूद्दूसी के विरुद्ध एफआईआर होना तो स्वाभाविक था। सीबीआई ने अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति आईएम कुद्दूसी के ठिाकने पर वर्ष 2017 में भी छापा मारा था। वह सितंबर 2017 में दर्ज की गई सीबीआई की एफआईआर में भी नामजद है। कूद्दीसी के बारे में अक्सर यह चर्चा सुनने को मिल जाती है कि कूद्दूसी जज ना होते तो कब के जेल के सलाखों के पीछे पहुंच चुके होते।

बात विवादों के कारणों की कि जाए तो सूत्र बताते हैं कि प्रसाद इंस्टीट्यूट ट्रस्ट देश के उन 46 मेडिकल कालेजों में से एक है जिनमें मानकों की कमी के कारण केंद्र सरकार ने एक या दो साल तक प्रवेश लेने पर रोक लगा दी थी। सीबीआई को ऐसी सूचना मिली थी कालेज संचालित करने वाले प्रसाद एजूकेशन ट्रस्ट लखनऊ का प्रबंधन बीपी यादव व पलाश यादव संभालते है। ट्रस्ट ने कालेज में प्रवेश रोके जाने के आदेश के खिलाफ कोर्ट में याचिका भी दायर की थी। इस मामले में कोर्ट से कालेज के पक्ष में आदेश कराने के लिए बीपी यादव व पलाश यादव प्रयासरत थे। आरोप है कि दोनो ने अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति कुद्दूसी के सहयोग से मामले को निपटाने का प्रयास किया और केंद्र सरकार के जिम्मेदार अधिकारियों को रिश्वत देने की साजिश की।

वैसे बताते चलें रंजन गंगोई से पहले के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने भी जस्टिस शुक्ला के खिलाफ जांच की सिफारिश की थी। उस समय उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित एक आंतिरक जांच कमेटी ने न्यायमूर्ति शुक्ला को गंभीर न्यायिक कदाचार का दोषी पाया था। कमेटी ने इस बात की जांच की थी कि न्यायमूर्ति शुक्ला ने क्या वास्तव में उच्चतम न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करते हुए प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में विद्यार्थियों के प्रवेश की समय-सीमा बढ़ा दी थी?

खैर, बात वर्तमान की कि जाए तो सीबीआई ने छापा मारा जरूर, लेकिन छापा मारने की हिम्मत उसे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गंगोई (अब रिटायर) के 31 जुलाई 2019 के एक आदेश से मिली। निश्चित ही गोगोई बधाई तथा साधुवाद के पात्र है। गौरतलब हो, आठ दस बरस पहले गाजियाबाद जिले में एक बड़ा अब पीएफ घोटाला हुआ था जिसमें जजों को गाजियाबाद के जिला जज के यहाँ से बहुत महँगे उपहार दिए गए थे और इसके लिए फर्जी तौर से पीएफ से पैसे निकाले गए थे। कुछ पैसे तो ऐसे कर्मचारियों के खाते से निकाले गए थे जो सेवारत ही नहीं थे। इस घटना से संबंधित नाजिर को जेल भेज दिया गया था। बाद में जेल में उसकी संदिग्ध हालात में मौत हो गई।

नाजिर की संदिग्ध मौत के बाद इस पूरे मामले पर परदा डाल दिया गया था। लेकिन अब सेवारत जज के विरुद्ध एफआईआर से यह उम्मीद जगी है कि अन्य भ्रष्ट न्यायाधीशों के विरुद्ध भी कार्रवाई होगी और उनके द्वारा भ्रष्ट तरीके से अर्जित गई संपत्ति भी जब्त होगी। जज शुक्ला, कूद्दूसी तो एक बानगी हैं। फेहरिश्त काफी लम्बी है। कुल मिलाकर न्यायपालिका पर छापा यह संदेश है कि कानून से ऊपर कोई नहीं हैं। न्याय करने वाला भी अगर न्याय के खिलाफ काम करेगा तो उसे छोड़ा नहीं जाएगा।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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