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सियासत

केजरीवाल की खांसी और मोदी की चायवाले की पोलिटिकल मार्केटिंग के मायने

Vineet Kumar : मैं मान लेता हूं कि अरविंद केजरीवाल ने अपनी खांसी की पॉलिटिकल मार्केटिंग की..शुरुआत में जो खांसी हुई और उसके प्रति लोगों की जो संवेदना पैदा हुई, उसे उन्होंने सिग्नेचर ट्यून में बदल दिया..ये अलग बात है कि बनावटी खांसी के लिए भी कम एफर्ट नहीं लगाने पड़ते..लेकिन एक दूसरा शख्स अपने को चाय बेचनेवाला बताता है, बचपन के संघर्ष के किस्से सुनाता है जो कि उसकी असल जिंदगी से सालों पहले गायब हो गए तो आप हायपर इमोशनल होकर देश की बागडोर उनके हाथों सौंप देते हैं.

Vineet Kumar : मैं मान लेता हूं कि अरविंद केजरीवाल ने अपनी खांसी की पॉलिटिकल मार्केटिंग की..शुरुआत में जो खांसी हुई और उसके प्रति लोगों की जो संवेदना पैदा हुई, उसे उन्होंने सिग्नेचर ट्यून में बदल दिया..ये अलग बात है कि बनावटी खांसी के लिए भी कम एफर्ट नहीं लगाने पड़ते..लेकिन एक दूसरा शख्स अपने को चाय बेचनेवाला बताता है, बचपन के संघर्ष के किस्से सुनाता है जो कि उसकी असल जिंदगी से सालों पहले गायब हो गए तो आप हायपर इमोशनल होकर देश की बागडोर उनके हाथों सौंप देते हैं.

आपको तब कहीं से नहीं लगता कि इन्होंने चायवाला होने की पॉलिटिकल मार्केटिंग की है..आप उनके अतीत पर इमोशनल होते हैं, वर्तमान के प्रति असहमत नहीं होते..ये बंटाधार समझ चमचे, चाटुकार या वो लोग करें जिन्हें ठेके लेने-देने हैं तो भी समझ आती है लेकिन आपका काम विशुद्ध बौद्धिक का है, आपकी रोजी-रोटी समाज को विचार और समझ देने से चलती है..आप भी ऐसी ही आड़ी-तिरछी क्षुद्रताओं में फंसकर खांसी-मफलर तक राजनीति को समेट लेंगे तो हम किस बूते कुछ भी बदलने की उम्मीद कर सकेंगे.

खांसी, मफलर और धरने को लेकर एफएम चैनल जिस तरह से मजाक उड़ाते आ रहे हैं..एक चैनल ने तो बाकायदा “धरना कुमार” नाम से स्पार्क्लर ही शुरु कर दिया है, मैंने कभी भी अरविंद केजरीवाल को अपने इस तरह मजाक उड़ाए जाने पर रॉबर्ट बाड्रा बनते नहीं देखा..आगे अगर रिएक्ट करते हैं तो दुर्भाग्यपूर्ण होगा. हम चैनलों को इस काम से रोक नहीं कर सकते क्योंकि उनका अर्थशास्त्र इन्हीं सारी चीजों के बीच पनपते हैं..

लेकिन आपको भी राजनीति का मतलब सिर्फ किसी की खांसी और मफलर पर तंज कसना ही समझ आता है तो फिर तो कोई बात ही नहीं हो सकती..क्या प्रधानसेवक की बंड़ी,कुर्ते और कॉस्ट्यूम पर होनेवाले खर्च, रैलियों के लागत अध्ययन का विषय नहीं है..तब तो आप प्रेजेंस भर से लहालोट हो जाते हैं..आपको मफलर में जितनी चुटकुलेबाजी सूझती है, हजारों-हजारों रूपये की एक-एक बंड़ी में उतनी चुटकुले क्यों नहीं नजर आते?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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