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सियासत

आप मोदी को मुद्दा बनाकर मोदी से नहीं जीत सकते!

मोदी को जिताने में सबसे बड़ी भूमिका महागठबंधन की होगी। आप मोदी को मुद्दा बनाकर मोदी से नही जीत सकते। अखिलेश यादव और मायावती अगर चुनाव से ठीक पहले एक रोज़ नींद से जागते हैं और ये सोचते हैं कि आओ हाथ मिलाकर मोदी को हरा दें तो ये दुधमुंहे बच्चे को सेरेलक खिलाकर ताली बजाने जैसा तमाशा ही होगा। इस एक कदम ने एक झटके में नरेंद्र मोदी के समर्थकों को एकजुट कर दिया और ये चुनाव मोदी हटाने बनाम मोदी बचाने की लड़ाई बन गया।

बेरोजगारी का मुद्दा तेल लेने चला गया। राम मंदिर का मुद्दा फैज़ाबाद की धर्मशाला में सो गया। कश्मीर मुद्दे को लोगों ने बोल दिया कि अभी सुस्ताओ तुम, आगे देख लेंगे। सारे मुद्दे बौने हो गए और मोदी महानायक बनकर उभरे। गज़ब की सिम्पैथी मिली जो undercurrent में तब्दील हो गयी। आसान भाषा मे समझें तो ये चुनाव छोटा भीम का खेल हो गया जिसमें कालिया, ढोलू-भोलू और कीचक जैसे कार्टून छोटा भीम को हराने के लिए दिन रात साज़िश करते हैं और वो एक रोज़ सबका बाजा बजाकर आगे निकल जाता है।

मोदी जिस वक्त गुजरात के सीएम हुआ करते थे, उस वक़्त गुजरात ब्यूरो का प्रमुख रह चुका हूँ। मोदी की इस ताक़त को बहुत करीब से देखा है। जब भी आप मुद्दे छोड़कर मोदी को मुद्दा बनाओगे तो डूब जाओगे। यही मोदी ने गुजरात मे किया जब केंद्र में 10 साल कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार थी। चुनाव आयुक्त वे बनाते थे। तब ईवीम को सही वे ठहराते थे। पर फिर भी मोदी को हरा नही पाए। यही इस बार होने जा रहा है।

इसे आसान भाषा मे यूँ भी समझ सकते हैं कि राहुल ममता को नकारा बताते हैं। ममता राहुल को बच्चा बताती आयी हैं। अखिलेश मायावती को टिकट बेचने वाली कहते आए हैं। मायावती उन लोगों को गुंडा बताती आयी हैं। राहुल तेजस्वी के पिता लालू यादव को चुनाव लड़ने की आज़ादी देने वाला अध्यादेश खुलेआम फाड़कर फेंकते आए हैं। नायडू केसीआर को गरियाते आए हैं। केसीआर नायडू के कपड़े फाड़ते आए हैं। मगर ये सभी एक रात अचानक ही इसफगोल की भूसी खाकर एक साथ हो लिए। सिर्फ मोदी को हराने के लिए। फिर क्या था?

मोदी को आखिर वो गेंद मिल ही गयी जिसे क्रिकेट की भाषा मे फुलटॉस कहते हैं। अब ऐसी गेंद पर कोई छक्का न मारे तो क्या करे? राम धुन गाए!

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