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सियासत

हमारे दौर में क्रांति अठन्नी चवन्नी में बिकती है!

सत्येंद्र पी एस-

गांधी ने जब 1915 में भारत में कदम रखा, तभी तय कर लिया था कि अस्पृश्यता नहीं माननी है. जब उन्होंने अपने आश्रम में दलित परिवार को रखा तो तूफान मच गया. आश्रम के लिए धन मुहैया कराने वाले उनके सवर्ण साथियों ने पैसे देने बंद कर दिए. उनकी पत्नी से ऐसा झगड़ा हुआ कि उन्होंने कह दिया कि तुम अलग जाकर रहो. इस हद तक जाकर उन्होंने अछूत परिवार को अपने साथ रखने का फैसला किया. दलितवादियों और संघियों में इस मोर्चे पर कोई फर्क नहीं है कि गांधी ही देश के खलनायक थे. यह 1915 की घटना है। उस समय डॉ भीमराव अंबेडकर अपनी पढ़ाई कर रहे थे और तमाम डिग्रियां ले रहे थे। गांधी ने उनसे डरकर यह सब नहीं किया था।

महात्मा गांधी के बारे में आइंस्टाइन ने कहा था कि सदियों बाद लोग याद करेंगे कि क्या ऐसा हाड़ मांस का मानव इस धरती पर आया था? अभी कल ही साझा किया था कि गांधी जब भारत आये, अहमदाबाद में किराए का मकान लेकर आश्रम बनाया तो घोषणा कर दी कि आश्रम के नियम का जो भी पालन करेगा, उसे इस आश्रम में रहने की अनुमति होगी। लोग आश्चर्यचकित थे कि गांधी किसी अछूत परिवार के साथ कैसे रह सकते हैं? 2 महीने भी नहीं बीते थे कि ठक्कर बापा ने एक चिट्ठी लिख भेजी कि एक अछूत परिवार आपके आश्रम में रहना चाहता है। और दुदाभाई, उनकी पत्नी दानी बहन और उनकी दूध पीती बच्ची लक्ष्मी आश्रम में पहुँच गए।

हालत यह हो गई कि आश्रम वाले जिस कुएं से पानी भरते थे उससे पानी निकालने वाले को इतनी छूत लगी कि आश्रमवाले जब पानी निकालने जाते तो उसके छींटे से उसे छूत लग जाती थी। दुदा भाई को वह गालियां देता था।

गांधी के जो मित्र आश्रम के लिए खर्च के पैसे देते थे, उन्होंने पैसे रोक दिए। आश्रम में विद्रोह हुआ तो उन्होंने अपने सबसे विश्ववसनीय व्यक्ति को पत्नी सहित आश्रम से बाहर निकाल दिया। कस्तूरबा गांधी से झगड़ा हुआ तो कह दिया कि तुम स्वतंत हो, जहां चाहो चली जाओ। यह अछूत परिवार यहां से कहीं नहीं जाएगा।

मैं कल से ही यह सोच रहा हूँ कि गांधी की जगह मैं होता तो क्या करता? शायद उस दलित परियार को प्यार से समझता कि भाई अब यहां से निकल लो, बहुत हुई क्रांति। या आश्रम वालों की इच्छा बताकर उस अछूत परिवार को खदेड़ देता और कहता कि मैं हृदय से दलित समाज का हितैषी हूँ। लेकिन अन्य लोगों की बात भी माननी पड़ती हैं, मैं दुदाभाई के साथ हूँ और हमेशा उनके साथ रहूंगा। साल में एकबार उनके साथ खाना खाने उनके घर जाता। क्रांति भी बची रहती और परिवार भी बचा रहता, पैसे भी आते रहते। कम से कम मेरे वश की बात न थी कि एक अछूत परिवार के लिए मैं अपने सारे दोस्तों को दुश्मन बनाता। बीवी को चले जाने और तलाक देने की बात कह देना तो दूर की बात है। फ्री में आश्रम चल रहा था। उस दौर में 10 हजार रुपये महीने चंदा। और क्या चाहिए?

हमारे दौर में क्रांति अठन्नी चवन्नी में बिकती है। यूपी में अनुप्रिया पटेल क्रांति कर ही रही थीं। निषादराज भी क्रांति कर रहे थे। राजभर साहब भी क्रांति करने चले आए भाजपा में। हम ऐसे में कैसे कल्पना कर सकते हैं कि एक प्रधानमंत्री का बेटा, जाना माना बैरिस्टर, हर सुख सुविधाओं में पला व्यक्ति एक अछूत परिवार के लिए सबसे बैर मोल ले लेगा! यह कह देगा कि पैसे नहीं हैं तो अबसे अछूत बस्ती में कैम्प पड़ेगा, वहीं रहेंगे, जैसे वह मेहनत मजदूरी करके जीते हैं, वैसे हम भी आगे से जिएंगे! क्या ऐसा किया जाना संभव है, खासकर तब, जब कोई बन्दा अफ्रीका, ब्रिटेन घूमते हुए आया हो और भारत में रहने का एक ठिकाना तलाश रहा हो?

यह एक पीआर स्टंट भी लग सकता है कि गांधी ने ऐसा अखबार में छपवाया हो। उनके चेलों ने लिखा हो। और यह झूठी कहानी गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिख दी हो!

यानी गांधी के मरने के 70 साल के भीतर ही यह फील होने लगा कि क्या सचमुच ऐसा हाड़ मास का आदमी इस धरती पर पैदा हुआ था?

खैर… मैंने गांधी की इस कहानी का लिंक साझा किया। उसे अनुराधा मल्ल ने पढ़ा। अनुराधा मल्ल गुजरात कैडर की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं। उन्होंने मुझे मैसेज किया..

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“पढ़कर अच्छा लगा। बहुत सी बातें बार बार सुनने में भी अच्छी लगती है। दूदाभाई के परिवार और लक्ष्मी मौसी (दूदा भाई की बेटी) के साथ हम काफी संपर्क में रहे। इत्तेफाक से कओचरब आश्रम मेरे माता-पिता के घर के पास ही है। विनोद जी लक्ष्मी जी के बच्चों के साथ नियमित संपर्क में हैं। सभी आज भी गांधी आदर्शों का पालन करने की पूरी कोशिश करते हैं।”
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अनुराधा मल्ल के इस मैसेज से पता चलता है कि सचमुच कोई दुदाभाई, दानी बहन और उनकी बिटिया लक्ष्मी थी। यह कोई काल्पनिक कथा नहीँ है। वही लक्ष्मी, जिन्हें अनुराधा मल्ल ने लक्ष्मी मौसी नाम से संबोधित किया है, जिनके साथ वह लम्बे समय तक रही हैं। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। डॉ Vinod Mall साहब लक्ष्मी मौसी के बच्चो के नियमित सम्पर्क में हैं। मैंने भी पेशकश कर दी कि वक्त और जिंदगी ने साथ दिया तो दुदाभाई के नाती पनातियो से जाकर मिलेंगे। अनुराधा जी से उनकी लक्ष्मी मौसी के बारे में और ज्यादा बात करेंगे।
यह सच है कि आज भी लोग खून के बदले खून का नारा देते हैं। उसमें जोश है, उत्साह है। उन्हें 400 साल बाद गांधी समझ में आएंगे कि आंख के बदले आंख बर्बर अवधारणा है और अगर ऐसा हो तो पूरी दुनिया अंधी हो जाएगी।

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