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सुख-दुख

लेखन की नई चुनौती!

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

नौवीं क्लास से पहले शायद किसी क्लास में ही जब मैं पढ़ रहा था तो पिता जी के पुस्तक संग्रह में से महात्मा गांधी की आत्मकथा माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ पढ़ने को मिल गई. उसमें गांधी ने जिस साफगोई और निडरता से बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक अपने ही जीवन की अंतरंग घटनाओं को बयां करते हुए अपनी सोच- विचार के उतार-चढ़ाव को उजागर किया था, वह उसके बाद किसी भी लेखक या महापुरुष की आत्मकथा पढ़ते समय फिर मैंने कभी नहीं पाया.

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सत्य की कसौटी पर अपने ही जीवन के अतीत को तौलकर पूरी बेबाकी और ईमानदारी से लिखी गई आत्मकथा पढ़ने या अपने दिल की बात कहने – सुनने का दिल हममें से बहुत लोगों का करता है. शायद इसीलिए गांधी की आत्मकथा की पूरी दुनिया ही कायल है. आज भी पूरी दुनिया की बेहतरीन किताबों में शीर्ष किताबों में इसकी गिनती होती है. गांधी की अहिंसा के ठीक विपरीत ध्रुव यानी हिंसा के ‘महापुरुष’ कहे जाने वाले हिटलर की आत्मकथा भी गांधी की आत्मकथा की तरह दुनिया में पॉपुलर तो है मगर उसमें भी ऐसा लगता है मानों हिटलर ने बहुत कुछ छिपाते या गढ़ते हुए अपने जीवन की घटनाओं को लिखा है.

बहरहाल, मैंने गांधी को तो नहीं देखा लेकिन बरसों पहले से एक आधे – अधूरे गांधी को बनते- संघर्ष करते और भटकते- विचलित होते हुए भी क्रांति करते हुए देखा है. मीडिया जैसी भयंकर शोषण और भ्रष्टाचार वाली फील्ड में Yashwant Singh जी ने बरसों पहले एक ब्लॉग शुरू किया , जिसका नाम ही उसका दर्शन भी है. मैंने गांधी की आत्मकथा और मीडिया में यशवंत जी के आधे – अधूरे गांधी होने की तुलना भी उनके इसी दर्शन के कारण की.

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गांधी ने अपने दिल, दिमाग, चरित्र और अपने जीवन को अपनी ही आत्मकथा में नंगा कर दिया क्योंकि झूठ के कपड़े पहना कर वह अपनी आत्मकथा नहीं लिख पाए. यशवंत जी भी कुछ हद तक ऐसे ही हैं. भड़ास नाम से ब्लॉग और भड़ास फॉर मीडिया Bhadas4media नाम से जो मुहिम उन्होंने छेड़ी, उसका दर्शन भी यही था कि जो कुछ आपके दिलो- दिमाग में इकठ्ठा होकर बदहजमी और बीमारियां पैदा कर रहा है, उसे अपनी भड़ास समझ कर उनके ब्लॉग और वेबसाइट में निकाल दीजिए. फिर चाहे इससे आपकी छवि बने बिगड़े या किसी और फन्ने खान की बिगड़ जाए.

खुद यशवंत सिंह ने भी यही किया. बरसों वह अपनी और अन्य लोगों की भड़ास निकालते/ निकलवाते रहे. इसके लिए वह अक्सर मदिरापान करके सिद्घावस्था में भी जाते रहे ताकि भड़ास उस अवस्था में और भी बेहतरीन तरीके से निकलती रहे. इसके नतीजे भी यशवंत जी ने भुगते और थाना- कोर्ट, मार- कुटाई, जेल यात्रा तक इसी भड़ास की वजह से गांधी की तरह अपने जीवन में देखते रहे. मजे की बात देखिए कि जेल जाकर वहां जमा हुई भड़ास भी उन्होंने एक किताब जानेमन जेल के नाम से लिखकर निकाल दी.

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अब एक नई चुनौती उन्होंने हम सभी को दी है कि दम है तो एक ऐसा लेटर या पोस्ट लिखो, जो आपको तब लिखना हो , जब आपको पता हो कि यह आपकी आखिरी भड़ास है. यानी इसके बाद आप मरने वाले हों.

आत्मकथा भी अमूमन मौत की दहलीज पर बैठकर यानी वृद्ध होकर ही लिखी जाती है. उस वक्त भी लोग अपनी छवि आदि को लेकर डरे रहते हैं जबकि मरने के बाद उनके बारे में कोई अच्छा बुरा सच जान भी लेगा तो उनका क्या बिगड़ेगा? अब आत्मकथा लिखना तो हर किसी के बस की बात नहीं लेकिन कोरोना काल में दनादन मरते लोगों के बीच एक पोस्ट लिखकर यह बताना कि मरने से ठीक पहले वह क्या सोचते या बोलना चाहते, यह अद्भुत प्रयोग है.

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खुद मैं इसे पूरी ईमानदारी से या बेबाकी से लिख पाऊंगा या नहीं, इसमें मुझे शत प्रतिशत संदेह है. क्योंकि जहां सत्य की कसौटी होगी, वहां दूसरों पर नहीं बल्कि खुद की कमियों, गलतियों, पापों या बुराइयों पर नजर पड़ ही जाएगी. जैसा कि मैंने कहा कि गांधी बनना आसान नहीं है इसलिए मौत से पहले भी हम अपने जीवन के हर गलत को छिपाकर महज दूसरों की उंगलियां उठाते रहेंगे तो वह पोस्ट मौत से पहले की नहीं बल्कि जिंदगी में हर रोज कही जाने वाली एक चलताऊ बात ही होगी….

यशवंत की चुनौती वाली पोस्ट ये है-

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आखिरी बात

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