मुलायम के ‘माय’ को हड़पने की मायावी सियासत

सियासी रिश्ते कितने महीन होते हैं इसका नजारा आजकल यूपी की वीथिकाओं में खूब हो रहा है। करीब 40 दिन पहले की वो तस्वीर याद कीजिये जब मुलायम सिंह की बहू औऱ अखिलेश यादव की पत्नी डिंम्पल ने सभी जातीय व्यवस्थाओं को दरकिनार कर मायावती के सार्वजनिक रूप से पैर छुए थे। मैनपुरी में मायावती के भतीजे और अब नेशनल कॉर्डिनेटर बसपा आकाश आनन्द को नेताजी यानि मुलायम आशीर्वाद दे रहे थे। अखिलेश, मुलायम, मायावती, अजीत सिंह से सजी मैनपुरी की सभा भारत के नए राजनीतिक-सामाजिक अभ्युदय की पटकथा लिख रही थी। ऐसा लग रहा था भारत की संसदीय राजनीति उस करिश्मे को आकार दे रही है जिसे गांधी, लोहिया, अम्बेडकर और दीनदयाल भी नही दे पाए। मुस्लिम, दलित, पिछड़े, (कुछ हद तक सवर्ण) यह एक ऐसा राजनीतिक फार्मूला था जो समाज मे हजारों साल की जातीय वैमनस्यता को भी किनारे कर नए भारत कम से कम यूपी में तो लोगो को सोचने पर बाध्य कर देता।

लेकिन 40 दिन बाद लखनऊ में तस्वीर बदल गई है या यूं कहें जैसी थी वैसी ही हो गई। बुआ बबुआ का मेल सिर्फ एक रील लाइफ का ट्रेलर था, रियल नही। ये ट्रेलर तो पसन्द किया गया पर जब बॉक्स ऑफिस पर ट्रेलर के साथ पूरी फिल्म आई तो चारो खाने फ्लॉप हो गई। इसे उधार में दर्शक नही मिले। अब इस रील (फिल्मी) को रियल समझने की गलती पर मायावती अपने कैडर के सामने रक्षात्मक मुद्रा में हैं। लखनऊ में उन्होंने सपा के साथ समझौते को राजनीतिक भूल बताया। सपा सरंक्षक मुलायम, अध्यक्ष अखिलेश को सीधे निशाने पर लिया। यादव जाति को फिर उसी पुलिसिया अंदाज में गरियाया है मानो मायावती को वोट न देकर यादवों ने जघन्य अपराध कर दिया है।

इस सब से इतर जो बड़ा आरोपनुमा खुलासा मायावती अखिलेश को लेकर कर रही हैं वो यह बताता है कि मायावती यूपी में अपनी दुश्मनी सपा से रखना चाहती हैं। वे बता रही हैं कि अखिलेश यादव ने उन्हें मुसलमान कैंडिडेट उतारने से रोका था लेकिन उन्होंने अखिलेश यादव की यह बात नहीं मानी। इस बात के मायने आसानी से समझे जा सकते हैं। यूपी में यादव-मुस्लिम का ‘माय’ फार्मूला ही सपा की राजनीतिक इमारत का आधार है। मायावती इसे जमीदोज कर उस पर अपना हाथी खड़ा करना चाहती हैं।

यूपी में अभी भी मुस्लिम वोटर समाजवादी पार्टी के पक्ष में ज्यादा हैं। 1990 में कारसेवकों पर गोली चलवाने का श्रेय मुलायम खुद को मौलाना कहलवा कर लेते रहे हैं। मायावती यह अच्छी तरह समझती हैं कि यूपी में उनके दलित बेस से अगर मूसलमान मिल गए तो उनकी सत्ता में वापसी संभव है क्योंकि जिस सर्व समाज को दलितों से जोड़कर वे 2007 में सत्ता में आई थी, उस करिश्मे को दोहरा पाना आज संभव नहीं है। बीजेपी ने ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, नॉन यादव पिछड़ा, नॉन जाटव दलित को अपने साथ मज़बूती से जोड़ लिया है। जाहिर है मायावती को यूपी में अपनी इमारत सपा की जमीन पर ही नजर आ रही है। इसीलिये उन्होंने न केवल यादवों को जानबूझकर गठबंधन की हार का जिम्मेदार ठहराया बल्कि अखिलेश के मुस्लिम विरोधी रवैये को भी यूपी के मुसलमानों में स्थापित करने की कोशिश की है।

वैसे भी मायावती ने जिन 38 जगहों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे उनमें वे ही सीटे थीं जहां मुस्लिम जाटव कॉम्बिनेशन काम कर सकता था। मेरठ, सहारनपुर, अमरोहा, घोसी। जबकि सपा के खाते में बुंदेलखंड, अवध, पूर्वांचल की वे सीटें थी जो इस समीकरण से परे थीं। इसके अलावा यूपी की सभी बड़े शहरों की सीटें प्रयागराज, बनारस, झांसी, कानपुर, लखनऊ, गोरखपुर सपा के खाते में रहीं जहाँ बीजेपी का हारना बहुत मुश्किल था।

मायावती समझ चुकी हैं कि ‘माई’ समीकरण की तरह ही ‘जाम’ यानी जाटव-मुस्लिम ही उनकी नैया पार लगा सकता है औऱ इसके लिये उन्हें सपा को जमीदोंज करना होगा। अपने कार्यकर्ताओं के साथ बैठक में मायावती का लगातार सैफई खानदान पर हमलावर रहना यह समझने के लिये काफी है कि मायावती किसी भी रिश्ते को सिर्फ सत्ता की कीमत पर ही कायम रखना जानती हैं। सपा को कटघरे में खड़ा कर मायावती अपने आप को यूपी की राजनीति में अखिलेश से ऊपर रखने का संदेश देना चाहती हैं। वे एक सुनियोजित रणनीति के तहत लगातार सपा, यादव जाति और अखिलेश को निशाने पर ले रही हैं ताकि अपने परम्परागत कैडर में सन्देश दे सकें। साथ ही मुसलमान तबके में सपा को इतना कमजोर साबित कर दिया जाए कि वह बीजेपी की खिलाफत में बसपा के साथ आने को मजबूर हो जाये।

मायावती बार बार सैफई खानदान की हार का जिक्र करके यही मैसेज कर रही हैं कि अब यादव बिरादरी तक अखिलेश के साथ नहीं है इसलिये मुसलमान बसपा के साथ आ जाएं। इसी रणनीति के तहत मायावती ने मुस्लिम बहुल सीटों का चुनाव महागठबंधन में किया था। मुसलमानों को टिकट न देने के सन्देश को सार्वजनिक करने की मंशा भी आसानी से समझी जा सकती है। बसपा के दस में से तीन सांसद मुस्लिम समाज के हैं। कमोबेश तीन सपा के टिकट पर भी जीते हैं।

मायावती के उलट अखिलेश ने अभी तक इस मामले में पूरी गंभीरता और शालीनता बरत रखी है। यहां तक कि जिस दिन दिल्ली में मायावती गठबंधन तोड़ने की बात कर रहीं थीं, उसी समय अखिलेश आजमगढ़ में मायावती की बड़ी फोटो लगाकर धन्यवाद दे रहे थे। अखिलेश ने कभी नहीं कहा कि जाटव बिरादरी के वोट उनके यादव या अन्य कैंडिडेट को नहीं मिले। जबकि हकीकत यह भी है बुंदेलखंड औऱ वेस्टर्न यूपी में ऐसा ही हुआ है। यहां तक कि अजित सिंह जिन्हें मायावती के आगे जूते उतारकर बैठना पड़ता था सभाओं में, उन्हें भी बसपा के कैडर ने वोट नहीं किया।

मायावती ने अपने कैडर के सामने एक तरह से सपा गठबंधन के लिये माफी मांगते हुए उन्हें सपा सरकारों के दमन चक्र की याद दिलाकर फिर से रिचार्ज करने की कोशिशें की हैं। वे यादवों पर हमलावर हैं लेकिन सतीश मिश्रा की तारीफ कर कर ‘हाथी नहीं गणेश’ का फार्मूला बचा कर रखना चाहती हैं। गैर यादव ओबीसी, ब्राह्मण, जाटव, और मुसलमान के अपने पुराने समीकरण से मायावती यूपी में अखिलेश को अलग थलग करने की जिस रणनीति पर काम कर रही हैं, उसे समझना कठिन नहीं है। यह सियासत में रिश्तों की निर्ममता की भी एक मिसाल है।

एक दूसरा पहलू मायावती का दिल्ली से भी जुड़ा है। महागठबंधन के प्रयोग के पीछे एक सोच यह भी थी कि अगर इस युति से 20 से 30 सीट बसपा ले आती तो माया के प्रधानमंत्री बनने का दाव चला जा सकता था और अगर ऐसा होता तो दलित चेतना के नाम पर मायावती इसे लंबे समय तक भुनातीं लेकिन ऐसा हुआ नहीं और आज की परिस्थितियों में दिल्ली दरबार में मोदी से निबटने की कोई गुंजाइश नहीं है। इसलिये मायावती ने यूपी को ही अपनी सियासी हसरतों के लिये फाइनली चुन लिया है जहां से वे 4 बार सीएम रह चुकी हैं।

मायावती यह अच्छे से जानती हैं कि यूपी में सपा की तुलना में आज बीजेपी ज्यादा ताकतवर है। परिवार के झगड़े ने सैफई परिवार को लगातार कमजोर कर रखा है। बीजेपी ने गैर यादव, गैर जाटव और सवर्णों को 2014, 2017, 2019 के चुनावों में करीने से मथ रखा है। ऐसे में मायावती को अपने जनाधार के लिये जाटवों के साथ सपा के मुस्लिम आवश्यक हैं इसलिये अखिलेश की छवि मुस्लिम विरोधी बनाई जायेगी, यह तय है। बसपा चीफ का एकमात्र मिशन अब सपा के जनाधार को अपने कब्जे में लाना ही है। अखिलेश बुनियादी रूप से कई मोर्चों पर लड़ रहे हैं। उनको परिवार के अलावा अपने यादव और मुस्लिम वोटरों को सहेजकर रख पाना कठिन चुनौती है। यूपी की सियासी जंग में फिलहाल माया अखिलेश की जंग बीजेपी के लिए फायदा का सौदा है। अखिलेश को आज अपने पिता की बात बहुत कचोट रही होगी जिन्होंने इस महागठबंधन पर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा था कि आपने पार्टी आधी कर दी। अब आधी पार्टी को कैसे बचाएंगे अखिलेश?

डॉ अजय खेमरिया का विश्लेषण.

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