मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई बोले- स्वतंत्र न्यायपालिका को अस्थिर करने के लिए बड़ी साजिश रची गई है!

चीफ जस्टिस पर यौन उत्पीड़न के आरोपों से पूरा देश सन्न, न्यायपालिका की स्वतंत्रता बेहद गंभीर खतरे में, मीडिया से संयम बरतने की अपील

जेपी सिंह

उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर उनके कार्यालय में काम करनेवाली एक पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप लगाये जाने से पूरे देश में सनसनी फ़ैल गयी है और आमजन हतप्रभ हैं। बिना किसी सबूत के वर्षों पहले के कथित यौन उत्पीडन की शिकायतों का न्यायपालिका द्वारा संज्ञान लेने की प्रवृत्ति पर विधि क्षेत्रों में कड़ी प्रतिक्रिया हो रही है। यही नहीं, अतिआधुनिकता में मात्र बलात्कार के आरोपों पर ही पुरुषों को दोषी मान लेने की प्रवृत्ति अब बहुत ही कुत्सित रूप में सामने आने लगी है जिसकी आंच मुख्य न्यायाधीश जैसे संवैधानिक पद तक पहुंचने लगी है। यदि न्यायपालिका और विधायिका ने इस पर ठोस दिशानिर्देश नहीं बनाये तो आने वाले समय में पुरुषों और महिलाओं का एक साथ काम करना अत्यंत कठिन हो जायेगा। विशाखा के दिशानिर्देश वर्तमान समय में निष्प्रभावी दिखने लगे हैं।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ एक महिला द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों पर शनिवार को उच्चतम न्यायालय में विशेष सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आरोपों पर एक उचित पीठ (अन्य जजों की पीठ) सुनवाई करेगी। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता ‘बेहद गंभीर खतरे’ में है। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश ने आरोपों को निराधार बताते हुए इसे अगले हफ्ते कुछ अहम मामलों की होने वाली सुनवाई से उन्हें रोकने की कोशिश करार दिया।

विशेष सुनवाई की वजह बताते हुए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि मैंने आज अदालत में बैठने का असामान्य और असाधारण कदम उठाया है क्योंकि चीजें बहुत आगे बढ़ चुकी हैं। न्यायपालिका को बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने कहा कि आरोपों के पीछे कोई बड़ी ताकत होगी, वे सीजेआई के कार्यालय को निष्क्रिय करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वह अगले हफ्ते महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करने वाले हैं और यह उन्हें उन मामलों की सुनवाई से रोकने की कोशिश है। सीजेआई ने कहा कि स्वतंत्र न्यायपालिका को अस्थिर करने के लिए बड़ी साजिश की गई है। उन्होंने कहा कि मैं इस कुर्सी पर बैठूंगा और बिना किसी भय के न्यायपालिका से जुड़े अपने कर्तव्य पूरे करता रहूंगा।

गौरतलब है कि सीजेआई अगले हफ्ते राहुल गांधी के खिलाफ अवमानना याचिका, पीएम मोदी की बॉयोपिक के रिलीज के साथ-साथ तमिलनाडु में वोटरों को कथित तौर पर रिश्वत देने की वजह से वहां चुनाव स्थगित करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने वाले हैं। हालांकि, तमिलनाडु में वेल्लोर को छोड़कर सभी लोकसभा सीटों पर वोटिंग हो चुकी है।

मुख्य न्यायाधीश ने आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा कि यह अविश्वसनीय है। मुझे नहीं लगता कि इन आरोपों का खंडन करने के लिए मुझे इतना नीचे उतरना चाहिए। आरोपों से आहत सीजेआई ने कहा कि उन्हें न्यायपालिका में 20 साल की निःस्वार्थ सेवा का यह इनाम मिला है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में 20 सालों की निःस्वार्थ सेवा के बाद उनके पास 6.8 लाख रुपये बैंक बैलेंस हैं और पीएफ में 40 लाख रुपये हैं। मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने कहा कि जब उनके खिलाफ कुछ नहीं मिला तो मेरे खिलाफ आरोप लगाने के लिए इस महिला को खड़ा किया गया।

मुख्य न्यायाधीश ने चार वेबसाइटों का नाम लिया। स्क्रॉल, लीफ़लेट, वायर और कारवां, जिन्होंने आपराधिक इतिहास वाली इस महिला के असत्यापित आरोपों को प्रकाशित किया और कहा कि इनके तार आपस में जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि महिला की आपराधिक पृष्ठभूमि की है और वह अपने क्रिमिनल रिकॉर्ड की वजह से 4 दिनों तक जेल में रह चुकी है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पुलिस भी महिला के व्यवहार को लेकर उसे चेतावनी दे चुकी है।

मामले की रिपोर्टिंग में मीडिया संयम बरते

पीठ में शामिल जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना ने मीडिया से कहा कि वह जिम्मेदारी और सूझबूझ के साथ काम करे और सत्यता की पुष्टि किए बिना महिला के शिकायत को प्रकाशित न करे। उन्होंने कहा, ‘हम कोई न्यायिक आदेश पारित नहीं कर रहे हैं लेकिन यह मीडिया पर छोड़ रहे हैं कि वह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदारी से काम करे।’ जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि न्यायिक प्रणाली में लोगों के विश्वास को देखते हुए हम सभी न्यायपालिका की स्वंतत्रता को लेकर चिंतित हैं। इस तरह के अनैतिक आरोपों से न्यायपालिका पर से लोगों का विश्वास डगमगाएगा।

महिला के खिलाफ दो एफआईआर

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि जिस महिला ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए उसका आपराधिक इतिहास रहा है। उनके मुताबिक महिला के खिलाफ दो एफआईआर पहले से दर्ज हैं। गौरतलब है कि महिला पुख्य न्यायाधीश के घर में बतौर जूनियर असिस्टेंट काम करती थी. पिछले साल रजिस्ट्री कार्यालय में उसके खिलाफ अनुचित व्यवहार करने की शिकायत की गई थी। उसके बाद उसे निकाल दिया गया था। सुनवाई के दौरान जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि इसकी भी जांच होनी चाहिए कि इस महिला को उच्चतम न्यायालय में नौकरी कैसे मिल गई जबकि उसके खिलाफ आपराधिक केस है। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि पुलिस द्वारा कैसे इस महिला को क्लीन चिट दी गई।

इस महिला कर्मचारी ने शपथ पत्र देकर उच्चतम न्यायालय के सभी जजों को आरोप लगाने वाला यह पत्र भेजा था। इसमें कहा गया है कि जब चीफ जस्टिस की यौन प्रताड़ना की कोशिश का उसने विरोध किया तो उन्होंने उसे अपने रेजिडेंस ऑफिस से हटा दिया। इस ऑफिस में वह अगस्त 2018 से ही काम कर रही थी। 35 साल की इस महिला कर्मचारी ने 19 अप्रैल को लगाए आरोप में कहा है कि चीफ जस्टिस ने पहले उसका यौन उत्पीडन किया। फिर उसे नौकरी से बर्खास्त करवा दिया। 22 जजों को भेजे गए शपथपत्र में महिला ने कहा है कि मुख्य न्यायाधीश ने पिछले साल 10 और 11 अक्टूबर को अपने घर पर उसके साथ यौन दुर्व्यवहार किया।

इलाहाबाद से वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट.

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