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सुख-दुख

मैं पत्रकार हूँ, दलाल नहीं!

संजय सिन्हा

संजय सिन्हा-

च्छा लगता है…बहुत साल पहले हमारे ऑफिस की एक मीटिंग ‘जेपी ग्रीन्स’ के ग्रेटर नोएडा के टाउनशिप में हुई थी। रिपोर्टर वहां एक फाइव स्टार ‘हट’ में ठहराए गए थे। ये मीटिंग हर साल दिसंबर में होती थी। देश भर के रिपोर्टर दिल्ली हेड ऑफिस आते थे। दो दिनों तक ये बैठक चलती थी। रिपोर्टर के काम का मूल्यांकन होता था और भावी रणनीति पर संपादक, मालिकों के साथ चर्चा होती थी।

साल था 2006 और महीना था दिसंबर। घनघोर सर्दी में मैं पहली बार दिल्ली से ग्रेटर नोएडा स्थित जेपी के उस टाउनशिप में गया था। वहां की हरियाली, वहां आसमान का रंग देख कर मेरे मन में आया कि अगर ऐसा ही एक हट (बहुत छोटा-सा घर) आदमी को मिल जाए तो फिर उसे किसी और घर की ज़रूरत नहीं होगी।

बैठक खत्म होने के कुछ दिनों बाद मैंने नंबर ढूंढ कर जेपी के उस टाउनशिप में फोन किया। मैंने वहां एक हट खरीदने में अपनी दिलचस्पी दिखलाई।

उन लोगों ने मुझे वहां बुलाया। मैं अपने साथी प्रमोद चौहान के साथ पहली बार वहां इस सिलसिले में बात करने गया। उन लोगों ने मेरी खूब खातिर की और मुझसे पूछा कि आप क्या खरीदना चाहते हैं?

मेरे पास बहुत पैसे नहीं थे लेकिन मुझे वहां की हरियाली पसंद थी। सोचा था दिल्ली का अपना फ्लैट बेच कर यहीं खरीद लूंगा। यहीं रहूंगा। छोटा-सा घर।

मुझे वहां बताया गया कि यहां मल्टी स्टोरी फ्लैट बनेंगे। कुछ दिनों बाद किसी ब्रोकर का फोन आया कि संजय सिन्हा जी, आपने जो प्रोजेक्ट ग्रेटर नोएडा में देखा है, वैसा ही प्रोजेक्ट नोएडा में लांच होने जा रहा है। गोल्फ कोर्स होगा और ये जगह दिल्ली के अधिक करीब होगी। प्रश्न ये है कि संजय सिन्हा आज ये कहानी क्यों सुना रहे हैं?

कहानी ये है कि साल 2008 में मैंने जेपी टाउनशिप में एक फ्लैट बुक कराया। जैसी मेरी आदत है, मैंने ऑफिस में इस बात का खूब गाना गया कि मैंने गोल्फ कोर्स के बीच एक फ्लैट बुक कराया है।

मेरी तारीफ से प्रभावित होकर मेरे एक दो अन्य साथियों ने इस प्रोजेक्ट में दिलचस्पी दिखलाई। कुछ लोग मेरे साथ वहां आए। अब तक मेरा परिचय मालिकों से हो गया था। मैंने उन्हें सीधे मालिकों से मिलवा दिया (दलाल का चक्कर ही खत्म)।

प्रोजेक्ट उन्हें अच्छा लगता और लोग फ्लैट बुक करा लेते।

अपने रिश्तों का कारवां इतना छोटा तो है नहीं। फैलते-फैलते बात फैल गई कि संजय सिन्हा ने नया फ्लैट बुक कराया है।

मेरी जान-पहचान के कई लोगों ने मुझसे पूछना शुरू कर दिया कि कैसा फ्लैट है? जो आता, मैं उन्हें मालिकों, अधिकारियों से मिलवाता। एक-एक करके उनके भी फ्लैट बुक होने लगे। मुझे खुशी थी कि बुढ़ापे में हम सब साथ रहेंगे। एक परिवार की तरह।

असल में आज कहानी ये भी नहीं है कि कितने लोगों ने मुझसे प्रभावित होकर फ्लैट बुक कराया। कहानी ये है कि जब लोग मेरे साथ रोज वहां जाने लगे तो एक दिन जेपी प्रबंधन ने मुझे ऑफर दिया कि संजय जी, आप हमारे लिए इतने ‘ग्राहक’ ला रहे हैं तो हम कुल कीमत से 2 फीसदी कमीशन आपको देना चाहते हैं।

“ग्राहक? कमीशन? ये लोग मेरे दोस्त हैं। मेरे लिए ग्राहक नहीं। और कमीशन क्यों?”

मैं हैरान था। 2 फीसदी? मतलब एक करोड़ के फ्लैट पर दो लाख? उन्होंने कहा कि हां।
“लेकिन ये तो दलाली हुई।” “हां, ये सामान्य नियम है।”

“तो जिस दलाल ने मेरे लिए फ्लैट बुक किया था, उसे भी आपे पैसे दिए?”
“बिल्कुल।”

“उसने तो मुझसे पूरे पैसे लिए। पूरे दाम पर फ्लैट बुक किया है। खैर, छोड़िए। आप ऐसा कीजिए कि जो फ्लैट आप मेरे जरिए बुक करा रहे हैं, उस सभी को 2 फीसदी या जो भी दलाली की रकम हो, उतना डिस्काउंड दे दीजिए। लाभ खरीदार को मिलना चाहिए। लाने वाले को नही। वो मुझ पर भरोसा करके यहां आए।”

अब प्रबंधक हैरान थे। आज तक कोई मिला नहीं जो अपने हिस्से के पैसे उन्हें बांटने को कह रहा हो।
“आप खुद क्यों नहीं रखते ये पैसे? मोटी रकम होगी।”

“मैं पत्रकार हूं। दलाल नहीं। मैं मकान खरीदने आया हूं दलाली कमाने नहीं। क्योंकि आप मुझे ये ऑफर दे रहे हैं, इसलिए मैं चाहता हूं कि आप उन्हें ये पैसे बतौर डिस्काउंट दे दें। उन्हें फायदा पहुंचाइए, जो खरीद रहे हैं। उनके लिए ये राहत अच्छी होगी। मैं जिस दिन पत्रकारिता छोड़ कर मकान खरीदने-बेचने की दलाली करने निकलूंगा, उस दिन दलाली कमाऊंगा। आज नहीं। मैं जिस रोल में होता हूं, वही भूमिका निभाता हूं। मैं अपने दोस्तों को ला रहा हूं, भविष्य में साथ रहने के लिए। पैसे कमाने के नहीं। यही करना होता तो बहुत से पत्रकार सत्ता के दलाल बन गए हैं (तब कांग्रेस का राज था) मैं वहीं कमाता। मेरा सिद्धांत है, जो हूं वही काम करूंगा। आप प्लीज़ मेरे जरिए जिनके फ्लैट बुक करा चुके हैं, उन्हें डिस्काउंट दे दीजिए। आगे जो कराएंगे उन्हें भी मेरे डिस्काउंट दीजिएगा। प्रबंधक मेरी बात मान गए।

खुल्ले में लिख रहा हूं कि मैंने जितने फ्लैट (कुल 140 फ्लैट) बुक कराए, उन सभी को उस समय मुझसे कम कीमत पर फ्लैट मिले। मैंने अपने लिए जो अधिक पैसे दिए थे, उसका कभी मैंने अफसोस रहा लेकिन जिन्हें मैंने डिस्काउंट दिलवाया, उसकी सदैव खुशी रही।

बाद में कुछ ज्ञानियों ने मुझसे कहा भी था कि संजय सिन्हा आपने आती लक्ष्मी को ठुकरा दिया। मैंने कहा था मैंने लक्ष्मी घर-घर पहुंचा दी। जितने लोगों ने मेरे साथ फ्लैट बुक कराया वो सभी आज भी मुझे दुआ देते हैं। अब हम साथ रहते हैं। वो लोग खुशी से कहते हैं कि उन्हें अच्छा डिस्काउंट मिला। बस इतनी ही कहानी है।

दलाली कोई बुरी बात नहीं। लेकिन उसके लिए कह कर दलाल बनना होगा। किसी और पेशे में होकर दलाल होना बुरी बात है। तब मैं पत्रकार था। मैं दलाली कैसे कमा सकता था? भले वो करोड़ों रुपए थे।
‘धर्म’ का पता भी तो तब ही लगता है, जब हम ‘ना’ कहना जानते हैं।

जेपी के प्रबंधकों, अधिकारियों से मेरी अब भी दोस्ती है। कुछ दिन पहले मैं उनसे मिलने गया था। वो अपने किसी परिचित से मेरा परिचय देते हुए कह रहे थे कि संजय जी पैसे नहीं कमाते, रिश्ते कमाते हैं। इतने वर्षों में जो कहानी मैं भूल गया था, वो अपनी जुबानी उन्हें सुना रहे थे। उन्होंने कहा कि पहली बार हुआ था कि फ्लैट बुक कराने के बदले इन्होंने अपने साथ आए लोगों डिस्काउंट देने की पेशकश रखी थी।

ये सब सुन कर मुझे अच्छा लगा। सोचा कि पैसे कमाए होते तो वो मेरा क्या परिचय देते? मुझे खुशी हुई कि उन्हें ये सब याद था, इतने वर्षों बाद भी। अच्छा कीजिए, अच्छा लगेगा। रिश्ते कमाइए। रिश्तों की अहमियत किसी और कमाई से अधिक होती है।


गिरिजेश वशिष्ठ-

लेकिन जेपी ने खरीदारों को बहुत सताया और आपका वो यश अपयश में बदल गया. लोग पीछे से कहते थे कि संजय सिन्हा के चक्कर में फंस गए. अगर आपने वो दो फीसदी ले लिया होता तो आपके लिए जीवन बहुत कठिन होने वाला था. दिल्ली में ऐसी कमीशनखोरी आम है. आप को किस्सा याद रह गया ये बड़ी बात है. मैं नोएडा वाली अपनी सोसाइटी में मकान मालिकों का एक सानिध्य आयोजित करता हूं. मकसद डीलरों की लूट से मिल जुलकर बचना. इस सिलसिले में जब किसी का मकान खाली होता है तो डीलर्स को सूचना दे दिया करता हूं. वो अक्सर पूछते हैं कि आपका कितना होगा बगैरह. अपना उसूल है नए साल और दिवाली पर भी किसी से एक पेन तक उपहार में न लेना.

मैं अपने चैनल पर शेयर वाली एप्लीकेशन, ऑनलाइन लॉटरी, गेमिंग जैसे विज्ञापन नहीं लेता. बड़े बड़े क्रिकेटर भी रमी और क्रिकेट एप का विज्ञापन करते है. मुझे एक बार जिक्र (मेंशन) करने पर लाखों रुपए की फीस मिल सकती है. वो भी स्पष्ट रूप से विज्ञापन है ये बताते हुए.

मैंने हमेशा इसे ठुकराया है. Influancer मार्केटिंग वालों को अचरज भी होता है. पर संजय जी हम उस दौर में गढ़े गए हैं जब उसूल ही सबसे बड़ी कमाई थी. आपको तो याद भी रह गया. अनगिनत बार हम स्वतः स्फूर्त ढंग से ये काम करते हैं. सोसाइटी का प्रेसिडेंट रहा हूं. हर वेंडर काम हो जाने के बाद शुक्राना ऑफर करने आ जाता था. एक बार तो हमारा अपना गार्ड पूछने चला आया. आपने हम लोगों का वेतन बढ़ाया है ठेकेदार पूछ रहा है कि आपका कितना होगा. मैंने उतनी रकम उनके वेतन में जुड़वा दी.

मुझे लगता था कि मैं ही ऐसे सोचता हूं लेकिन शायद हमारे दौर के सभी लोग शायद इन्हीं मूल्यों के साथ जिए. बरकत भी खूब हुई . सब याद दिलाने के लिए आपका आभार.

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