पत्रकार पर रासुका लगवाने की बात कहने वाला ये शख्स है कौन, सुनें आडियो

के. सत्येंद्र-

बलात्कार के आरोपी का पत्रकार के खिलाफ साजिश का ऑडियो… चाटुकारिता और दलाली से इन्कार करने वाले पत्रकार को ठिकाने लगाने की साजिश का यह ऑडियो सुनिए

गोरखपुर : एक अकेले से निर्बल छोकरे ने जब अपने जुझारूपन के साथ गोरखपुर की पत्रकारिता में कदम रखा तो बड़े बड़े लाइजनरों और दलालों के पांव डगमगाने लगे। साज़िशें हुई, डराया गया, जेल और मौत का भय दिखाया गया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मौजूदा ऑडियो रिकॉर्डिंग गोरखपुर में बलात्कार और छेड़खानी के आरोपी विकास सिन्हा का है जो अपने खिलाफ खबर चलाने वाले पत्रकार को ठिकाने लगाने की साज़िश कर रहा है। दलाल भी विकास सिन्हा को अपनी ऊंची पहुंच और रसूख का हवाला देकर उसे आश्वस्त कर रहा है।

पत्रकारिता नहीं दलाली करिए, दलालों की चरण वंदना करिए, वो दिन कहे तो दिन और रात कहे तो रात कहिए, तब आप कहलायेंगे सच्चे पत्रकार। वरना आपके खिलाफ साजिश करने वाले दलालों की पहुँच मंत्री संतरी अध्यक्ष वद्यक्ष पता नहीं कहाँ कहाँ तक है।

ये आपको अपनी छतरी के नीचे सरेंडर करने के लिए डरा सकते हैं, नहीं डरे तो फंसा सकते हैं, और यदि फंसे भी नहीं तो मरवा सकते हैं। गोरखपुर में लुटेरे अस्पतालों की खबर के साथ अस्पताल में काम करने वाली पीड़ित से अश्लीलता की खबर को प्रमुखता से दिखाने वाले एकमात्र चैनल को यदि आप दलाल कहते हैं तो फिर शराब माफिया के पीछे पड़ने वाले सुलभ श्रीवास्तव को आप क्या कहेंगे। यदि पीड़ितों के पक्ष में खबर दिखाने वाला दलाल है तो उनको क्या कहेंगे जो इस बलात्कार और छेड़खानी के दो अलग अलग आरोपों का सामना कर रहे अस्पताल संचालक के बड़े बड़े विज्ञापन छापते हैं और पीड़ितों की खबर छापने के नाम पर कन्नी काट जाते हैं।

शराब माफिया की नाक में दम करने वाला सुलभ श्रीवास्तव भी तो अकेला ही जान हथेली पर लेकर चला था रिपोर्टिंग करने। तो क्या वो बेईमान था? और जो शराब माफिया के खिलाफ खबरें नहीं दिखा रहे थे …डर या दलाली के मारे सरेंडर कर चुके थे, क्या वो ईमानदार थे? बिल्कुल भी नहीं। सीधा सा मतलब है, अपने खुद के बीच के टट्टू यही चाहते हैं कि जो कहा जाए वही छापो, वही दिखाओ, नहीं तो भुगतो।

मुझे पता है कि अपना अंजाम सुलभ श्रीवास्तव जैसा तब तक नहीं होगा जब तक साजिशकर्ताओं के अंदर वो दम नहीं आ जाता कि वो सामने से मेरा सामना कर सकें। यदि मैं मर भी गया तो इससे अपन को कोई फर्क नहीं पड़ता है। अपन तो चाहते हैं कि हिजड़ों और नपुंसकों के बीच कीड़े मकोड़ों की तरह जीने से अच्छा है सच्चाई के लिए लड़ते हुए जान दे दूं।

आडियो सुनें…

गोरखपुर से के. सत्येन्द्र की रिपोर्ट.

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