ANI वाले पीएम के चाटुकार हैं, मोदी की जयजय करने में झूठी खबरें गढ़ कर फैला रहे हैं!

श्याम सिंह रावत

देश का मुख्यधारा का मीडिया जनता को किस तरह गुमराह कर रहा है, एक उदाहरण देखें…

देश में मुख्यधारा का मीडिया जनता को किस तरह झूठी खबरें परोस कर गुमराह कर रहा है, इसकी बानगी है एशिया की प्रमुख समाचार एजेंसी एशियन न्यूज इंटरनेशनल―एएनआइ (ANI) द्वारा फैलाया गया ताजा झूठ। जिसमें इसने आगरा की एक लड़की को इलाज के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय (प्रमंका―PMO) से 30 लाख रुपये की सहायता देने की अफवाह फैलाई। इस समाचार एजेंसी से देश के कई मीडिया हाउस खबरें लेते रहते हैं। एएनआइ पहले भी पूर्व सैनिक अधिकारियों सम्बंधी झूठी खबर फैलाते हुए पकड़ी गई है।

आगरा निवासी ललिता कुमारी (17 साल) पिछले 19 महीनों से अप्लास्टिक एनीमिया से पीड़ित है। परिवार को उसके इलाज के लिए 10 लाख रुपये की आवश्यकता थी, जिसके लिए पिछले साल जुलाइ में प्रमंका. से मदद की अपील की गई थी। जहां से दो महीने बाद सितंबर 2018 में ललिता को 3 लाख रुपये की आंशिक वित्तीय सहायता प्रदान की गई।

तब से उसका परिवार शेष 7 लाख रुपये इकट्ठा करने के लिए संघर्ष कर रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने 22 जून, 2019 को रिपोर्ट किया कि धन की व्यवस्था करने में असमर्थ परिवार ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लिखित अनुरोध में अपनी बेटी के लिए इच्छामृत्यु की मांग की। इसके तुरंत बाद मीडिया रिपोर्टों ने यह दावा करना शुरू कर दिया कि प्रधानमंत्री ने बीमार बच्ची के लिए 30 लाख रुपये की सहायता राशि दी है। जबकि पिछले साल बीएमटी आरके बिड़ला कैंसर एसएमएस. अस्पताल जयपुर ने ललिता के इलाज के लिए 10 लाख रुपये का अनुमानित व्यय बताया था लेकिन एएनआइ (ANI) ने प्रमंका. (PMO) द्वारा 30 लाख रुपये की मंजूरी बता दिया।

22 जून को ANI ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया था कि परिवार को प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा 30 लाख रुपये की वित्तीय सहायता दी गई। ANI की उक्त रिपोर्ट के आधार पर टाइम्स नाउ, द क्विंट, एशियन एज, इंडिया टुडे, रिपब्लिक टीवी, फाइनेंशियल एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, डीएनए और डेक्कन क्रॉनिकल जैसे समाचार माध्यमों ने समाचार प्रकाशित किया। द क्विंट ने दावा किया कि परिवार को पहले ही 30 लाख रुपये की सहायता मिल चुकी थी और वह अधिक फंड के लिए नए सिरे से अपील कर रहा था।

दैनिक जागरण और जनसत्ता ने भी ’30 लाख रुपये’ की यह कहानी छापी। दैनिक जागरण ने तो एक कदम आगे बढ़कर लिखा―’पीएम ने उनके कॉल का जवाब दिया, ललिता अब मृत्यु की कामना नहीं करती क्योंकि उसे जीवन का उपहार मिल गया है।’

पश्चिम बंगाल से भाजपा सांसद बाबुल सुप्रियो ने इंडिया टुडे की कहानी को ट्वीट किया, जिसे लगभग 6,000 लाइक्स और 900 से अधिक लोगों ने इसे इस दावे के साथ रीट्वीट किया कि ‘पीएम मोदी ने बीमार बच्ची को 30 लाख रुपये का अनुदान मंजूर किया’।

23 जून के टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार उक्त परिवार ने समाचार रिपोर्टों को ‘नकली’ करार दिया और कहा―”एटा के सांसद राजवीर सिंह के हस्तक्षेप के बाद, जिन्होंने वित्तीय सहायता के लिए पीएमओ. को एक पत्र लिखा था, अंतिम रूप से केवल 3 लाख रु. पिछले वर्ष 30 सितंबर को स्वीकृत हुए थे। 30 लाख रुपये के अनुदान की रिपोर्ट फर्जी है और इसने हमारी बेटी की मदद पाने के हमारे प्रयासों को चोट पहुंचाई है। हमें अपनी बीमार लड़की के लिए मदद चाहिए। इस फर्जी खबर से हमारी बेटी की जान जा सकती है।”

ललिता ने टीओआई से कहा―”अगर पीएमओ. ने 10 लाख रुपये की आवश्यकता के खिलाफ 30 लाख रुपये दिए, तो मुझे जीवन का नया पट्टा मिल जाएगा। यह क्रूर है। जिसने भी यह फर्जी खबर फैलाई है, वह मुझसे मिलने और मेरी हालत देखने के लिए जरूर आए। मेरे परिवार ने अपनी पूरी बचत, खेत खो दिये हैं और मेरे मेडिकल बिल का भुगतान करने के लिए हमारे घर को गिरवी रख दिया है।”

इससे पहले 12 अप्रैल, 2019 को भारतीय सेना के 400 से ज्यादा सेवा-निवृत्त अधिकारियों ने एशियन न्यूज इंटरनेशनल (ANI) के खिलाफ इसकी झूठी रिपोर्टिंग की शिकायत इसकी मूल संस्था अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी थॉमसन रॉयटर्स को पत्र लिखकर की थी। एएनआइ ने लिखा था कि कुछ रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों ने सेना के राजनीतिक इस्तेमाल के खिलाफ राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को लिखे पत्र का समर्थन करने से इनकार किया है। यह वही पत्र है जिसमें राष्ट्रपति से अपील की गई थी कि वे चुनाव में राजनीतिक दलों को मुद्दा बनाने से रोकें।

एएनआइ ने दावा किया था कि पत्र लिखने वालों में बताए गए नामों में कुछ पूर्व शीर्ष अधिकारियों ने कहा है कि उन्होंने कोई पत्र नहीं लिखा है और न ही वे इसका समर्थन करते हैं। उनमें से एक नाम पूर्व उप-सेनाप्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एमएन. नायडू का भी था। एएनआइ ने नायडू का हवाला देते हुए लिखा था कि ‘ऐसा कोई पत्र लिखने से पहले मेरी सहमति नहीं ली गई और न ही मैंने ऐसा कोई पत्र लिखा है।’ इसके दो दिन बाद 14 अप्रैल को नायडू ने ऐसा कोई बयान देने से अपने हाथ पीछे कर लिए थे। अन्य पूर्व सैनिकों ने भी कहा था कि बीती आठ अप्रैल को रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल नायडू ने ईमेल के जरिये राष्ट्रपति को पत्र लिखने का समर्थन किया था।

इस तरह की अफवाह फैलाने से न केवल समाचार एजेंसी, बल्कि प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की विश्वसनीयता ही दांव पर लग जाती है। आखिर इस एजेंसी ने देश के प्रधानमंत्री के कार्यालय की प्रतिष्ठा से इतना बड़ा खिलवाड़ करने का दुस्साहस क्यों किया? या ये कहा जाए कि पीएम की चाटुकारिता में एएनवाले फर्जी खबरें गढ़ने और फैलाने में जुटे हैं? इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने का दायित्व किसका है?

लेखक श्यामसिंह रावत उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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