प्रभाष जोशी जी को रिटायरमेंट के वक़्त 30 हजार रुपये के करीब मिलते थे!

-शम्भूनाथ शुक्ल-

जब मैंने जनसत्ता बतौर सब एडिटर ज्वाइन किया था, यानी 1983 में। तब मैं सब एडिटर था और प्रभाष जी संपादक। मेरी तनखा उस समय 1463 रुपए थी और प्रभाष जी को 4200 रुपए मिलते थे। प्रभाष जी को 1995 में रिटायरमेंट के समय 30 हज़ार के क़रीब मिलते थे और मैं तब DNE था। मुझे 14542 रुपए मिलते थे। प्रभाष जी को करोड़ों का पैकेज तो दूर लाखों का पैकेज नहीं मिला।

बाद में मैं जब जनसत्ता में चंडीगढ़ का RE बना तो 25000 रुपए मिले। और फिर जब अमर उजाला से रिटायर हुआ 2013 की फ़रवरी में तब 1.30 लाख मिलते थे।

जबकि कोरोना के पहले मैं दो जगह बतौर सलाहकार था, तब डेढ़ लाख के क़रीब मिलता था। अधिकांश प्रिंट के पत्रकार इसी वेतन से मुक्त हुए। किसी के पास भी न कोई कमाई न पेंशन।

-शंभूनाथ शुक्ल

मूल खबर-

खुद करोड़ों का पैकेज लेने वाले संपादक पत्रकारिता के मिशन का बोझ दूसरों के कंधों पर डाल देते हैं!

  • भड़ास की पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए आपसे सहयोग अपेक्षित है- SUPPORT

 

 

  • भड़ास तक खबरें-सूचनाएं इस मेल के जरिए पहुंचाएं- bhadas4media@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *