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‘द जंगल बुक’ वाले रुडयार्ड किपलिंग तब दी पॉयोनियर इलाहाबाद में असिस्टेण्ट एडिटर थे

Sant Sameer : रुडयार्ड किपलिंग की मशहूर रचना ‘द जंगल बुक’ पर बनी बहुप्रतीक्षित फ़िल्म आज रिलीज हो रही है। बनी कैसी है, यह तो देखने के बाद पता चलेगा, पर इस रिलीज ने रुडयार्ड किपलिंग की याद ज़रूर दिला दी। किपलिंग सन् 1888 और 1889 के दो बरस इलाहाबाद में भी रहे थे। तब वे पॉयोनियर अख़बार में असिस्टेण्ट एडिटर थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सामने ही उनका बंगला था और पास में ही अख़बार का दफ़्तर।

Sant Sameer : रुडयार्ड किपलिंग की मशहूर रचना ‘द जंगल बुक’ पर बनी बहुप्रतीक्षित फ़िल्म आज रिलीज हो रही है। बनी कैसी है, यह तो देखने के बाद पता चलेगा, पर इस रिलीज ने रुडयार्ड किपलिंग की याद ज़रूर दिला दी। किपलिंग सन् 1888 और 1889 के दो बरस इलाहाबाद में भी रहे थे। तब वे पॉयोनियर अख़बार में असिस्टेण्ट एडिटर थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सामने ही उनका बंगला था और पास में ही अख़बार का दफ़्तर।

संयोग से सन् 1990 से सन् 2003 तक अपनी भी ज़िन्दगी का क़रीब तेरह-चौदह साल का ज़्यादा समय उसी मकान के पड़ोस में बीता है। 21-बी मोतीलाल नेहरू रोड हम आन्दोलनकारियों का अड्डा था, तो 19 या 20 नम्बर का बंला रुडयार्ड का था। आज की तारीख़ में मकान जर्जर हो चुका है। अगर दीवार के किनारे एक शिलापट्ट न लगा होता तो कोई जान भी न पाता कि ब्रिटिश लेखक के रूप में साहित्य का पहला नोबुल पुरस्कार पाने वाले एक महान लेखक का यह कभी आवास हुआ करता था।

मैं उस परिसर में जाता तो अक्सर उस शिलापट्ट के सामने खड़ा हो जाता और आज़ादी के पहले के उस दौर को महसूस करने की कोशिश करता। कई लोगों से मैंने कहा भी कि क्यों न यहाँ रुडयार्ड किपलिंग की याद में कोई छोटा-मोटा स्मारक बना दिया जाय, पर आजकल के राजनीतिक नक्कारख़ाने में ऊँची चीख भी कहाँ सुनाई देती है। परिसर का हाल देख कर ऐसा लगता है कि शिलापट्ट कोई उखाड़ ले जाय तो उस जगह की रही-सही पहचान भी ख़त्म हो जाएगी और बोर्ड देखकर यही समझेंगे कि यहाँ अध्यापकों का एक प्रशिक्षण संस्थान चलता है, बस।

पत्रकार संत समीर के फेसबुक वॉल से.

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