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समरेंद्र कहिन- रामनाथ गोयनका के नाम पर इन पुरस्कारों के जरिए इंडियन एक्सप्रेस समूह दो काम करता है…

समरेंद्र सिंह-

पुरस्कारों की अपनी राजनीति होती है। दुनिया का हर पुरस्कार एक राजनीति का हिस्सा है। हाल ही में जब गांधी शांति प्रतिष्ठान ने कुलदीप नैयर सम्मान दो चिरकुट पत्रकारों को दिया तो गांधी शांति प्रतिष्ठान ने ओछी और भद्दी राजनीति की। गांधी के नाम पर पाखंडी और सांप्रदायिक लोगों को सम्मान बांटना एक बेहूदी और फूहड़ हरकत थी और वो भी गुजरात चुनाव से ठीक पहले। ऐसी राजनीति से गांधीवाद का कोई भला नहीं होना था और वही हुआ भी। गुजरात में कांग्रेस रसातल में चली गई।

उसी तरह हर साल इंडियन एक्सप्रेस समूह के द्वारा दिया जाने वाला गोयनका सम्मान भी राजनीति का हिस्सा है। इंडियन एक्सप्रेस समूह एक दक्षिणपंथी मीडिया समूह है। रामनाथ गोयनका भारतीय जनसंघ के सांसद थे। इंडियन एक्सप्रेस के सभी संपादक मूलत: दक्षिणपंथी रहे हैं। और एकाध जो कांग्रेसी रहे हैं वो भी घनघोर ब्राह्मणवादी रहे हैं। लेकिन गोयनका पुरस्कार ज्यादातर पाखंडी लिबरल पत्रकारों को बांटे गए हैं। स्वघोषित कांग्रेसी और वामपंथी पत्रकारों को बांटे गए हैं। उन्हें भी जो धान से गेंहू निकालने की महारत रखते हैं। और वो भी जो बाढ़ में पॉलिटिकल रिपोर्टिंग करने की क्षमता रखते हैं।

आखिर कोई दक्षिणपंथी मीडिया समूह किसी वामपंथी और कांग्रेसी पत्रकार को पुरस्कार क्यों बांटता है? या फिर कोई वामपंथी और कांग्रेसी मीडिया संस्थान किसी दक्षिणपंथी पत्रकार को सम्मान क्यों देगा और जब देगा तो उसकी राजनीति क्या होगी? क्या पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए? क्या पत्रकारिता मर रही है और उसके पुरस्कार से ही जिंदा रहेगी? या फिर ऐसे पुरस्कारों को बांटने की कोई और वजह होती है? इसे समझने के लिए आपको उस समूह के बिजनेस मॉडल पर गौर करना होगा।

और इसे समझने के लिए पहला सवाल इंडियन एक्सप्रेस के सर्कुलेशन से जुड़ा सवाल होगा। मसलन इंडियन एक्सप्रेस हर रोज कितना छपता है? जनसत्ता और फाइनेंसिएल एक्सप्रेस की प्रति दिन कितनी छपाई होती है? फिर सर्कुलेशन और विज्ञापन से होने वाली आय का अध्ययन होगा। फिर कंपनियों के विज्ञापन और सरकारी विज्ञापन के रेशियो का अध्ययन होगा। उसके बाद ये देखा जाएगा कि इंडियन एक्सप्रेस ने कितने शहरों में मीडिया संस्थान के नाम पर कितनी जमीन हासिल की है? और उस जमीन का इस्तेमाल क्या और कैसे किया है? वो जमीन उसके पास है भी या उसने बेच दी है? मसलन फिल्म सिटी में एक्सप्रेस टॉवर दरअसल इंडियन एक्सप्रेस समूह का है या फिर उसका सौदा हो चुका है? आईटीओ के एक्सप्रेस टॉवर में इंडियन एक्सप्रेस का दफ्तर है या किसी और का है?

ये मेरा दावा है कि जब इन सवालों को केंद्र में रख कर इंडियन एक्सप्रेस समूह के बही खातों का ऑडिट होगा तो पूरी दाल काली नजर आएगी। लगेगा कि साहस की पत्रकारिता का नारा दरअसल उच्च कोटि का पाखंड और फर्जीवाड़ा है। ऐसा पाखंड, ऐसा फर्जीवाड़ा जिसकी आड़ में सारे कारोबारी कुकर्म छिपाए जा रहे हैं। मीडिया कंपनी रिएल स्टेट कंपनी बन चुकी है।

रामनाथ गोयनका के नाम पर इन पुरस्कारों के जरिए इंडियन एक्सप्रेस समूह दो काम करता है। एक – वो अपने लिए प्रवक्ता तैयार कर रहा होता है। और दूसरा उन आवाजों को अपने खिलाफ उठने से रोक रहा होता है जो कभी उठ सकती हैं। अब गोयनका पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार और इस समूह से एक लाख रुपये हासिल करने वाला पत्रकार क्या कभी इस समूह के खिलाफ लिखने का नैतिक साहस या फिर कोई और साहस जुटा सकेगा? मुझे नहीं लगता कि जुटा सकेगा। जिस ससुरे ने अपने माथे पर गोयनका पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार लिख दिया – वो क्या खा कर इसके खिलाफ बोलेगा!

खैर… जिन लोगों को भी इस साल का पुरस्कार मिला है। उन सभी को खूब सारी बधाई। जिन्हें नहीं मिला है, वो धैर्य बनाए रखें। एक खांची पुरस्कार हैं। धान से गेंहू निकाल कर रोटी बनाने का हुनर सीखें … सीख लेंगे तो देर सबेर गोयनका और मैगसेसे (मैगसायसाय) भी मिल ही जाएगा। कोई न कोई मुहर लग ही जाएगी।


गोयनका अवार्ड जैसे किसी भी कार्यक्रम में सबसे हास्यास्पद स्थिति केंद्र सरकार के मंत्रियों की और सत्ताधारी दल के नेताओं की होती है। लेकिन वो खुद को प्रगतिशील और लोकतांत्रिक बताने के लिए वहां जाते हैं। हंसी का पात्र बनते हैं। और जब हंसी उड़ाई जाती है तो दांत चियार कर दूसरों को देखते हैं। इस बार भी वही हुआ। राजकमल झा जब हंसी उड़ा रहे थे तो विरोधी दल के सभी नेता तालियां बजा रहे थे और केंद्र सरकार और सत्ताधारी दल के नुमाइंदे दांत चियार रहे थे।

वो क्लिप यू-ट्यूब पर मौजूद है और आप भी देख सकते हैं। आपकी सहूलियत के लिए वो लिंक लगा रहा हूँ-

https://www.youtube.com/watch?v=rc8Zg9AWcLw

ऐसे तमाशे रोचक होते हैं। जब मंच पर नेता बैठे हों और न्यायपालिका पर चर्चा हो जाए और जब मंच पर मुख्य न्यायाधीश बैठे हों और तब उनकी शान में, न्यायपालिका की शान में कसीदे पढ़ते हुए फ्री स्पीच पर एक जोरदार भाषण दे दिया जाए – जश्न में कुछ भी कड़वा नहीं होना चाहिए। माननीय के मिजाज का भी ख्याल रखना पड़ता है। ख्याल रखा भी गया। भाषण जोरदार हुआ और तालियां खूब बजी। उसके बाद सत्ता के सभी अंगों पर बैठे लोगों ने एक दूसरे के साहस को सलाम किया। चाय पी। नाश्ता किया। और फिर कपड़ा झाड़ कर, अपनी गाड़ियों में अपने काफिले के साथ बैठ कर अपने रास्ते चल दिए। सबकुछ अच्छा है! क्या कुछ अच्छा नहीं है!

(इस बीच देश की एक अदालत ने राहुल गांधी के मामले में “शानदार” फैसला दिया है। मुझे लगता है कि मुख्य न्यायाधीश को इस फैसले पर “गर्व” होगा! हमारे देश की न्यायपालिका के इसी “शानदार चरित्र” की शान में राजकमल झा कसीदे पढ़ रहे थे। राजकमल झा महान हैं। राहुल गांधी के मामले में फैसला देने वाला जज महान है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई भी महान हैं। और मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ भी महान हैं। कुल मिला कर भारत के पत्रकार और भारत के जज महान है।)


कुछ दिन पहले मैं कहीं बैठा हुआ था। उस महफिल में कांग्रेस के कुछ लोग भी थे। उनसे पूछा गया कि कांग्रेस अडानी पर इतना आक्रामक क्यों है? एक विद्वान नेता ने कहा कि अडानी, मोदी का पेन (दुखती नस) है। उसे दबाओ तो मोदी को दर्द होता है। दर्द होता है तो आदमी का दिमाग हिल जाता है। कुछ सोचता नहीं है। ब्लंडर (बड़ी गलती) करता है। मोदी भी जल्दी ही ब्लंडर (बड़ी गलती) करेंगे। पता नहीं था कि इतनी जल्दी ब्लंडर हो जाएगा। कल से ही कई लोगों से बात हुई है। उनमें कुछ बीजेपी से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। सभी की सहानुभूति राहुल के साथ है।

समरेंद्र लम्बे समय तक एनडीटीवी में रहे हैं। सोशल मीडिया पर बेबाक़ लेखन के लिए चर्चित हैं।

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1 Comment

1 Comment

  1. Ravindra nath kaushik

    March 27, 2023 at 2:23 am

    भाई, तुम्हारी दुनिया तुम जानो। जनता इस सबसे कब की ऊपर उठ चुकी। इसीलिए उसके बारे में भविष्यवाणी करने की नादानी मत किया करो। हर बार अपना जुलूस निकलवा लेते हो

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