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सुख-दुख

वेदों की भाषा ही नहीं, जनेऊ तक ईरान की निशानी!

अनिल सिंह-

वेदों की भाषा को पुरानी संस्कृत कहा जाता है। लेकिन असल में वों संस्कृत नहीं है। वेदों की भाषा और ईरान की भाषा अवेस्ता में एक ही मुख्य फर्क है। अवेस्ता में स या श के बदले में ह लिखा जाता है। बाकी लगभग सारे शब्द वेदों की भाषा के साथ मिलते-जुलते हैं। वेदों में गाथा हैं, अवेस्ता में भी गाथा हैं। वेद की भाषा संस्कृत तो कतई नहीं है। हां, लिपि तो अब सबकी नागरी ही हो गई है। वेद की भाषा को पहले छान्दस कहा जाता था। यह तो हर कोई स्वीकार करेगा कि वेद पाणिनि कृत संस्कृत से सदियों पुराने हैं।

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दरअसल, तीन-चार हज़ार साल पहले के ईरान, अरियन या आर्यन (प्राचीन अरबी लिपि के अनुसार) देश की सीमा और प्राचीन बृहत्तर भारत की सीमा एक दूसरे से मिली हुई थी। धर्म और जीवनचर्या के मामले में वे एक-दूसरे से अलग नहीं थे। दोनों अग्नि पूजक थे और जनेऊ पहनते थे। भले ही जनेऊ की मोटाई आजकल अलग दीखती है।

पालि में श, ष, क्ष, ज्ञ, श्र, ऋ और त्र शब्द नहीं होते। साथ ही उसके स्वरों में औ, ऐ और अ: भी नहीं शामिल है। पालि में कुल 41 अक्षर हैं – आठ स्वर और 33 व्यंजन। संस्कृत और हिंदी की वर्णमाला में कुल दस अक्षर और जोड़ दिए गए। साथ ही ळ भी कभी-कभी उसमें शामिल बताया जाता है। हालांकि ळ का प्रयोग गुजराती और मराठी में ज्यादा होता है। मसलन, हम जिसे टिटवाला बोलते हैं, वह असल में टिटवाळा है।

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मागधी से पालि, पालि से निकली संस्कृत; न है देवभाषा न ही जननी

बचपन से अब तक मानता आया था कि संस्कृत ही सभी भारतीय भाषाओं की जननी है और वह सामान्य नहीं, बल्कि देवभाषा है। लेकिन तीन महीने से पालि भाषा सीख रहा हूं तो जाना कि वह तो पालि से ठोंक-पीटकर गढ़ी गई भाषा है। खुद देख लीजिए। अहं गच्छामि, सो गच्छति, त्वं गच्छसि, मयं गच्छाम – ये सभी पालि के वाक्य हैं। संस्कृत में सो को सः और मयं को वयं कर दिया गया, बस! कुछ दिन पहले एक मित्र को मैंने बताया कि संस्कृत तो पालि से निकली है तो उन्होंने कहा कि ‘बुद्धं शरणम् गच्छामि, धम्मं शरणम् गच्छामि, संघम् शरणम् गच्छामि’ तो संस्कृत वाक्य हैं। लेकिन पालि सीखने के दौरान मैंने पाया कि ये शुद्ध रूप से पालि के वाक्य हैं।

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दरअसल पालि उत्तर भारत और विशेष रूप से मगध जनपद की प्राचीन प्राकृत है। इसे मागधी भी कहते हैं, बल्कि कहा जाए तो यह मूलतः मागधी प्राकृत ही है। गौतम बुद्ध छह साल साधना करने के बाद वापस लौटे तो अनुभव से हासिल अपना ज्ञान घर-घर पहुंचाना चाहते थे। तब आम लोगों में लोकभाषा और खास लोगों में वेदों की छान्दस भाषा चलती थी। बुद्ध ने वैदिक छान्दस को न अपनाकर लोकभाषा का ही सहारा लिया। जहां उन्होंने अपने उपदेशों का छान्दस में अनुवाद करने से मना किया, वहीं दूसरी ओर “अनुजानामि भिक्खवे, सकाय निरुत्तिया” कहकर सभी प्राकृत भाषाओं में अपने उपदेशों को पेश करने की खुली अनुमति दे दी।

बाद में चूंकि सारी बुद्धवाणी मागधी प्राकृत में पालकर रखी गई (पहले कंठस्थ करके और फिर लिपिबद्ध करके) तो मागधी के इस अंश को पालि कहा जाने लगा। बुद्ध ने 45 साल तक मगध से लेकर गांधार तक इसी भाषा में लोगों के बीच अपनी बात रखी तो यह भाषा समूचे इलाके में प्रचलित हो गई। उसके शब्द अन्य प्राकृत भाषाओं में शामिल होते गए। मसलन पालि में मां के लिए बोला गया अम्मा शब्द अवधी बोलनेवाले हम लोगों के लिए बड़ा सहज है। पालि का पाहुन शब्द आज भी भोजपुरी में अतिथि के लिए इस्तेमाल होता है।

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तब के भारतीय समाज में बुद्ध की बातों का इतना असर था तो भारत के पहले राजद्रोही ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग के दरबारी पाणिनि को इसकी काट के लिए पालि का ही सहारा लेना पड़ा, लेकिन उसे संस्कृत बनाकर। कहा जाता है कि कालिदास के नाटकों में जहां संभ्रांत चरित्र संस्कृत बोलते हैं, वहीं महिला व आम लोगों के पात्र पालि बोलते हैं। लेकिन यह भी दरअसल एक तरह का भ्रम है क्योंकि संस्कृत तो मूलतः पालि ही है और पालि की मूल भाषा मागधी है। हालांकि संस्कृत के पाणिनि व्याकरण में जहां लगभग 4000 सूत्र है, वहीं पालि के सबसे बड़े व्याकरण – मोग्गल्लान व्याकरण में सूत्रों की संख्या 800 के आसपास है। बनावट वाली चीज़ में ज्यादा तामझाम तो जोड़ना ही पड़ता है।

इस समय देश में जितने राज्य हैं, हर राज्य में जितने जिले हैं, उन जिलों में जितने शहर व तहसीलें हैं, इनकी संख्या से भी ज्यादा सस्कृत की पाठशालाएं हैं। मूल पालि के गिने-चुने पुछत्तर हैं। देश ही नहीं, विदेश तक के 99.99 प्रतिशत आम व खास लोग संस्कृत को सारी भारतीय भाषाओं की जननी मानते हैं। मैक्समुलर जैसे विदेशी विद्वान तो इसे आर्य परिवार की भाषा मानते हैं और इसका रिश्ता लैटिन तक से जोड़ते हैं।

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21वीं सदी में अब हमें इस झूठ से मुक्त हो जाना चाहिए। तभी हम भारतीय जनमानस पर सदियों से लादे गए झूठ के पहाड़ को तिनका-तिनका काट सकते हैं। नकल को छोड़ हमें असल को अपनाना होगा। भारत के प्राचीन इतिहास को जानने के लिए संस्कृत के बजाय पालि को मूलाधार बनाना होगा, तभी हम अतीत की हकीकत जान पाएंगे।

लेखक अनिल सिंह वरिष्ठ पत्रकार और अर्थकाम डॉट कॉम के फ़ाउंडर हैं.

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10 Comments

10 Comments

  1. प्रमोद पांडेय

    September 11, 2021 at 12:32 pm

    इस आलेख पर एक शेर याद आया-
    कोई अपनी ही नजर से तो हमें देखेगा
    एक कतरे को समंदर नजर आए कैसे?
    इससे अधिक टिप्पणी लायक मामला भी नहीं है। बस यही सालता रहेगा कि भड़ास कहाँ से चला कहाँ पहुँच गया।

  2. krishna Singh

    September 11, 2021 at 1:40 pm

    ऐसे अनमोल व सत्य शोधी लेख के लिए आप का हृदय से धन्यवाद एवं अभिनंदन। सत्य सदैव चमकता है।

  3. Amit lal

    September 11, 2021 at 3:44 pm

    अगर पालि भाषा शुद्ध और प्राचीन है तो बौद्ध और जैन विद्वानों ने संस्कृत में अपने बहुत सारे काम क्यों किये यहां तक कि व्याकरण में भी बहुत मेहनत की….

  4. Rohit Arjariya

    September 11, 2021 at 10:10 pm

    पूर्व धारणा से ग्रसित इंसान अंधा हो जाता है
    ३महीने से पाली पढ़कर ज्ञान पास लिए
    पहले ३महीने संस्कृत पढ़ लो —-
    पट्टलकार जी

  5. Manjari Sharma

    September 12, 2021 at 12:29 pm

    Most useless and baseless article that I have ever read…no facts..

  6. गौरव मागधी

    September 12, 2021 at 1:10 pm

    पाणिनि 400-600 ई.पू. हुए थे, पुष्यमित्र शुंग 185 ई.पू. में राजा बने। “राजद्रोही” पुष्यमित्र समय यात्रा कर के पाणिनि के समय में गए थे?

  7. D prakash

    September 13, 2021 at 9:17 pm

    खैर आपकी मंशा जो कुछ भी सिद्ध करने की हो , मैं आपको जानकारी दूं कि संस्कृत के सामान्य विद्यार्थी भी जानते हैं कि यह पालि से परिष्कृत हुई है । लेकिन किसी का इसे यूरेका कहना हास्यास्पद है , फिर भी यह आपके राजनीतिक तर्क के लिए होगा , यह मैं समझता हूं ।

    रही बात मूलाधार बनाने की , भले ही पालि विश्वविद्यालय में गौरव के साथ पढ़ाई जाती है , फिर भी , आपका यह कहना इस बात के लिए भी प्रेरित करेगा कि हिंदी की जगह अपभ्रंश को मूलाधार बनाया जाय ।

    भले ही आपका शीर्षक , आर्य अनार्य लड़ाई की तरफ ज्यादा रुझान दिखाता है । लेकिन यह बस विचारों कि बात है ,जो निश्चित तौर पर एकमत नहीं रही है और किसी एक विचार पर स्थिर रहने का ये मतलब नहीं है कि वह कुरान कि आयात है ।

    दोनों के साथ आने के प्रमाण मिले हैं। साथ लड़ने के प्रमाण मिले हैं । और इतिहास से राजनीतिक तर्क ढूंढने ज्यादा आसान होते हैं क्योंकि उस समय का कोई व्यक्ति अभी जवाब देने को मौजूद नहीं होता।

    रही बात ब्राह्मण नाम की जाति पर निशाना साध कर खुद को समाजवादी सिद्ध करने की तो मैं आपको एक और जानकारी दूं कि उन्हीं वेदों में राजनय वर्ग का उल्लेख मिलता है जिसमें सिर्फ ब्राह्मण वर्ग ही शामिल नहीं था और उसकी जाति बाद में दो भागों में अलग हुई।

    निश्चित तौर पर आपसब यह मानते होंगे की किसी भी समय के बौद्धिक वर्ग को प्रभावित करने की क्षमता किसमें होती है वह भी तब जब उसे नियमन करने के कार्य में रखा गया हो।

    इतिहास पुनर्व्याख्यायित होगा , लेकिन उसका सिर्फ एक परिप्रेक्ष्य होगा यह कहना संभव नहीं है।

    इतिहास की कई व्याख्याएं संभव हैं, कोई ईरान और कोई अफ्रीका से भी समानता साबित करेगा। और वह चूंकि इतिहास है इसीलिए वर्तमान उसमें बाज़ी मार ले जाएगा ।

    तो अलगाव को आगे करने और एक को बलि का बकरा बनाने का प्रयास तब तक ही सफल है जबतक दूसरा आपको समाजवादी समझने की भूल कर रहा है।

  8. Sunil kumar jha

    September 17, 2022 at 9:41 am

    नव बुद्धू वैज्ञानिक बहुत तार्किक होते हैं बस उस मण्डली में सब मानसिक रूप से विकलांग होने चाहिए ,सार्थक कार्य करना इनके बस में है नहीं दूसरे की बनाई मलाई खाओ और मौज़ करो बस ये सिद्धांत है इनका नव बुद्धू तीन महीने में पाली के विद्वान् बन सकते है लेकिन तीन साल में UPSC की परीक्षा पास नहीं कर सकते तब इनको आरक्षण चाहिए दूसरे के सौ नंबर और इनके तीस नंबर बराबर मान लिए जाये हज़ारो वर्षो से शोषित है मानसिक विकलांग

  9. Sunil kumar jha

    September 17, 2022 at 9:42 am

    नव बुद्धू वैज्ञानिक बहुत तार्किक होते हैं बस उस मण्डली में सब मानसिक रूप से विकलांग होने चाहिए

  10. Kamal

    October 1, 2022 at 2:57 pm

    Writer is Mother fucker

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