आज़ादी के आंदोलन और उसके नायकों पर बनाई गई अब तक की सबसे बेहतरीन फिल्म है ये!

जितेंद्र नारायण-

शुजित सरकार द्वारा निर्देशित ‘सरदार उधम’ फ़िल्म भारत की आज़ादी के आंदोलन और उसके नायकों पर बनाई गई अब तक की सबसे बेहतरीन फिल्म है…पूरी फिल्म तथ्यपरक और पूरी तरह यथार्थवादी है…

विकी कौशल ने अपने बेहतरीन अभिनय से उधम सिंह के चरित्र को जीवंत कर दिया है…जालियाँवाला बाग कांड सहित कई महत्वपूर्ण दृश्यों के फ़िल्मांकन में इसने ‘गाँधी’ फिल्म को बहुत ही पीछे छोड़ दिया है…!


अभिषेक पाराशर-

सरदार उधम बेहद शानदार फिल्म है. थोड़ी लंबी है, लेकिन बांध कर रखने वाली. ऐसी फिल्में बनती रहनी चाहिए, विशेषकर आज के समय की युवा पीढ़ी के लिए, जिनकी राजनीतिक चेतना का निर्माण व्हाट्सएप से हो रहा है.

ऐसी फिल्में देखकर लगता है कि जिन लोगों ने बिना कोई हिसाब लगाए या परिवार की परवाह किए बिना इस देश की आजादी के लिए अपनी जान दे दी, वह देश आज किन लोगों के हाथों में है और वहां रहने वाले लोगों की चेतना किस कदर भ्रष्ट हो चुकी है कि वह कुछ रुपयों के लिए अपनी जमीर और अपना ईमान तक बेच दे रहे हैं.

ऐसे लोग इस फिल्म को आधे घंटे भी बर्दाश्त न कर पाएंगे. अभी तक भारतीय इतिहास को लेकर जो लेखन हुआ है, उसमें कुछ गिने चुने नायकों को प्रमुखता से जगह मिली है. ऐसा नहीं है कि उधम सिंह का जिक्र उसमें नहीं है, लेकिन उन्हें वह जगह नहीं मिली, जिसके वह हकदार थे.

कई बार मुझे लगता है कि यह जानबूझकर भी किया गया ताकि भारत के युवाओं की राजनीतिक चेतना में उग्रता न हावी हो जाए. ऐसे नायकों को जब आप पढ़ते हैं और उनके बारे में समझने की कोशिश करते हैं तो आपको लगता है कि बेहद कम उम्र में ये सोच और विचारधारा को लेकर कितने स्पष्ट थे. उनके लिए आजादी का मतलब समानता और न्यायपूर्ण व्यवस्था थी.

केवल आजादी इनका लक्ष्य नहीं था, क्योंकि बिना स्पष्ट विचारधारा के आजादी, गुलामी से ज्यादा खतरनाक होती है. कुछ दिनों पहले एक और शानदार फिल्म देखने का मौका मिला. मलयाली भाषा में बनी कुरुथी. इस पर किसी दिन विस्तार से लिखेंगे. समय मिले तो आपको यह दोनों फिल्म अपने परिवार के साथ देखनी चाहिए. (दोनों फिल्में एमेजॉन प्राइम पर उपलब्ध हैं.)


जयदीप कार्णिक-

शूजीत सरकार के ‘सरदार उधम’ को एक बार तो देख ही लेना चाहिए।

जिन्होंने महान क्रांतिकारी और राष्ट्रनायक उधम सिंह के बारे में पढ़ा-सुना है उनके लिए दिक्कत कम है, जो नहीं जानते उनके लिए थोड़ी मुश्किल होगी, सिरे पकड़ने में। शूजीत के फ्लैशबैक और कट्स इतने शार्प हैं कि कई दफे उलझा देते हैं। वो फिल्मकार की ऐसा कर सकने की काबिलियत को तो बखूबी सामने लाते हैं पर सरदार उधम सिंह को समझने की कोशिश में लगे दर्शक को लगातार इस घुमाव से निकलने की मशक्कत में लगाए रखते हैं।

इसमें भी कोई शक नहीं कि क्रांतिकारी उधम सिंह को लेकर हमेशा से एक अजीब सा रहस्य बरकरार रहा है। बहुत से तथ्यों को तो अंग्रेज़ सरकार ने षड्यंत्रपूर्वक छुपाया और आज तक उजागर नहीं किया। इस बात का जिक्र फिल्म के आखिर में भी है।

फिल्म निर्देशक का माध्यम है। वो लोकमानस में बसी या फिर ऐतिहासिक छवियों को भी अपने लेंस से गुजारकर ही प्रस्तुत करता है। वो उपलब्ध तथ्यों, मान्यताओं और साक्ष्यों का सहारा अवश्य लेता है पर उसका कहन ही प्रस्तुतिकरण पर हावी होता है।

इतिहास के नायकों की प्रस्तुति को लेकर एक महत्वपूर्ण बात ये होती कि जिन्होंने उन नायकों को पढ़ा – देखा – समझा है, वो तो इसे फिल्मकार की प्रस्तुति और उसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व के एक और चित्रण के रूप में देखते और परखते हैं, पर जो संबंधित व्यक्ति के बारे में नहीं जानते उनके लिए तो फिल्म ही महत्वपूर्ण माध्यम होती है।

जैसे, बहुतों के लिए महान राष्ट्रनायक और अजेय योद्धा बाजीराव पेशवा केवल एक दिलफेंक आशिक हैं जो ७० से ज्यादा बड़े युद्ध लड़ने और अपराजेय रहने की बजाय बस प्रेम की गिरफ्त में रहकर फना हो गए, बकौल संजय लीला भंसाली।

वैसे ही तानाजी मालुसरे भी बहुतों के लिए वही हैं जो अजय देवगन ने बताया।

बहरहाल, शूजीत सरकार को बधाई – कि उन्होंने इस चर्चित लेकिन फिर भी कम देखे – पढ़े राष्ट्रनायक को यों परदे पर साकार किया। विक्की कौशल ने भी पूरी जान लगाई है शूजीत के अंदाज ए बयां को जीवंत करने में। कुछ दृश्यों में तो उन्होंने कमाल ही कर दिया है।

सरदार उधम सिंह (शेर सिंह) के जीवन के क्लाइमैक्स – जनरल ओ ड्वायर को लंदन के कैक्सटन हॉल में गोली मार देने की घटना को शुरुआत में ही दिखा दिया है जिस बड़ी ऐतिहासिक घटना का बदला लेने के लिए सरदार उधम सिंह ने ऐसा किया – जलियांवाला बाग कांड, उसको फिल्म के क्लाइमैक्स में बहुत अलग तरीके से फिल्मा कर दिखाया है, उस मंजर की भयावहता और उस वजह से उपजे आक्रोश जिसे इतने सालों तक सरदार उधम सिंह ने पाले रखा।

ये कथानक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इजराइल द्वारा म्यूनिख में मारे गए अपने खिलाड़ियों की हत्या का चुन चुनकर बदला लिए जाने या फिर अमेरिका द्वारा दस साल बाद भी ओसामा बिन लादेन को ढूंढ कर मार दिए जाने के किस्से तो बहुत चाव से देखे सुने और कहे जाते हैं, पर हमारे देश के एक क्रांतिकारी की ये शौर्य यात्रा कम ही चर्चा में आती है। वो भी एक ऐसे बर्बर हत्याकांड के बदले में जिसका दूसरा उदाहरण इतिहास में नहीं मिलता।

ये फिल्म उनको भी ज़रूर देखनी चहिए जिनको जनरल डायर और जनरल माइकल ओ ड्वायर का अंतर नहीं मालूम।

जनरल रेजीनाल्ड एडवर्ड डायर – जिसने इस गोलीकांड को अंजाम दिया और जो खुद जलियांवाला बाग में मौजूद था।

जनरल माइकल ओ ड्वायर – तत्कालीन पंजाब प्रांत का गवर्नर जिसने इस तरह के गोलीकांड के लिए जनरल डायर को ना केवल खुली छूट दी, बाद में बेशर्मी से इसका बचाव भी किया। लगातार। मारे जाने के दिन तक!!

क्रांतिकारी उधम सिंह शायद जनरल डायर से भी बदला लेते, पर वो उनके लंदन पहुंचने से पहले ही मर चुका था। इसीलिए फिल्म में सरदार उधम के उसकी कब्र पर जाने का एक दृश्य भी है।

बहरहाल, महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी सरदार उधम सिंह की स्मृति को सलाम करने के लिए ही सही, फिल्म तो देख ही लीजिए।

और हां, एक प्रश्न जो मुझे हरदम सताता है, और जब भी जलियांवाला कांड का जिक्र आता है तो वो एक टीस की तरह उभर आता है, उस प्रश्न का उत्तर ढूंढने का प्रयत्न अवश्य कीजिए –

गोली चलाने की छूट तो ड्वायर ने दी, आदेश जनरल डायर ने दिया, पर गोलियां चलाने वाले हाथ?? वो तो हिंदुस्तानी थे!! इस बर्बर आदेश के बाद वो बंदूकें उल्टी भी तो घूम सकती थीं?? डायर और जो अंग्रेज थे वो वहीं तो मर सकते थे? ना सरदार उधम सिंह को इंतजार करना पड़ता ना देश की आजादी को ….. अंग्रेज़ों को उनके लिए काम करने वाले, गोली चलाने वाले हाथ मिल कैसे गए? क्या आज भी मिल जाएंगे??

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