इस तरह यूपी के शर्मा जी प्रसंग का पहला अध्याय समाप्त हुआ!

रंगनाथ सिंह-

पीएमओ में तैनाती, आईएएस की नौकरी छोड़कर यूपी में राजनीति करने गये शर्मा जी को यूपी बीजेपी में उपाध्यक्ष बना दिया गया है। शर्मा जी यूपी पहुँचते ही एमएलसी बन गये थे। तब मीडिया ने दावा किया कि वो डिप्टी सीएम बनाये जाएंगे। अभी यूपी बीजेपी की वेबसाइट पर जाकर देखा तो 16 प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। अब पता नही शर्मा जी इनमें ही किसी की जगह लेंगे या वो 17वें होंगे।

खैर इस तरह यूपी के शर्मा जी प्रसंग का पहला अध्याय समाप्त हुआ। जब से शर्मा जी यूपी के सीन में आए थे, अटकलें लगा लगा कर मीडिया हलकान था। नेता यह कभी नहीं सोचते कि उनके किसी कदम से मीडिया पर विश्लेषण का कितना बोझ पड़ेगा! खैर, अब तो आदत सी हो गयी है…


यूपी के शर्मा जी वाली उपरोक्त टिप्पणी मित्रों को काफी जायकेदार लगी। यह देखकर सन्डे स्पेशल के तौर पर मैं योगी-बनाम-मोदी एकांकी के शर्मा अंक के दो अन्य गौण पात्रों का भी चरित्र चित्रण प्रस्तुत कर रहा हूँ।

राजनीतिक टीका-टिप्पणी के शौकीन कुछ लोग यह बिल्कुल भूल चुके हैं कि शर्मा सरनेम कई धार वाली तलवार है। एके शर्मा जब यूपी पहुँचे थे तो बहुत से लोगों ने हल्ला उड़ाया कि शर्मा जी यूपी में कथित ठाकुर-ब्राह्मण संघर्ष के नए सिपाही के तौर पर भेजे गये हैं। तब यूपी की राजनीति में गहरी पैठ रखने वाले एक सीनियर पत्रकार से मैंने मामला समझना चाहा तो उन्होंने पहला जुमला यही कहा कि ‘लेकिन वो तो भूमिहार है’। कल एक वरिष्ठ पत्रकार से पुष्टि की तो उन्होंने कहा, “हाँ, मऊ के रहने वाले राय साहब हैं।”

जाहिर है कि मऊ वाले शर्मा जी को दिल्ली के कुछ लोग कुछ भी कहें यूपी के खांटी ब्राह्मण उन्हें ब्राह्मण मानने से रहे। अतः शर्मा जी की कथित ठाकुर-ब्राह्मण संघर्ष में कोई परमानेंट प्लेसिंग शुरू से पॉसिबल नहीं थी। पूरी एकांकी में उनका उतना ही वजन था जितना लंका में अंगद का था कि मैं राम दूत हूँ।

यूपी भाजपा वाले किसी बाबू से ज्यादा पीएम मोदी की सुनते हैं जो संसद में कह चुके हैं कि “आईएएस हो गया तो…वो हवाईजहाज भी चलाएगा… बाबुओं के हाथ में देश देकर हम क्या करने वाले हैं?…” खैर, इस मामले पर विशेषज्ञ टिप्पणी के लिए आपको आखिरी पैरा पढ़ना पड़ेगा। हम मूल विषय शर्मा पर लौटते हैं।

एके शर्मा के यूपी पहुँचने के चंद रोज बाद ही यूपी के ही शर्मा सरनेम धारी ब्राह्मण समझे जाने वाले एक पुराने चावल पत्रकार की आत्मा अचानक फेसबुक पर जागी। उन्होंने सभी को हतप्रभ करते हुए घोषणा की कि कोरोना ने उनकी आँखें खोल दी हैं। अब तक वो अधम पत्रकारिता कर रहे थे! उन्होंने उसी पोस्ट में कसम खायी कि अब वो जनता की आवाज बनेंगे और उसके बाद उन्होंने सोशलमीडिया पर योगी जी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

रँगा सियार ज्यादा देर तक हुआँ-हुआँ किये बिना नहीं रह पाता तो दूसरे शर्मा जी कुल जमा चार पोस्ट भी न टिक पाये और योगी जी पर अग्नि बाण चलाते चलाते एके शर्मा जी के चरणामृत में सार्वजनिक रूप से डुबकी मारने लगे। कठौती रूपी गंगा से जब वो ऊपर उतराए तब तक सभी लोग जान चुके थे कि शर्मा जी की आत्मा जगी नहीं अलार्म लगाकर जगायी गयी है। तुलसी बाबा यूँ ही नहीं कह गये, सबहि नचावत राम गोंसाईं!

इस खेल में एक तीसरे शर्मा भी रुचि ले रहे थे जिनकी पत्रकारिता पर भले लोग लांछन लगा लें उनके ब्राह्मण होने पर कोई दाग नहीं है। वैसे तो वो योगी जी की पार्टी के खैरख्वाह हैं लेकिन महाराज से नाराज रहते हैं। वजह छोटी सी बतायी जाती है। योगी जी खुद एक अखिल भारतीय पीठ के महंत हैं तो अपने राज में उन्होंने राजगुरु का पद नहीं रखा है। कुछ लोगों का मानना है कि राजन के बगल में राजगुरु का खाली सिंहासन देखकर कुपित होना ब्राह्मण स्वभाव है। आज के नेता राम के पूर्वज हरिश्चन्द्र के जमाने के तो हैं नहीं जो सपना सुनकर किसी ऋषि को राजपाट सौंप दें। इन शर्मा जी के झोले में एक सूत से गुँथे कई रंग के पत्रकारीय मोती पड़े रहते हैं। इसलिए जब युद्धघोष हुआ तो विभिन्न देशों के विभिन्न विचारधारा के पत्रकारों की अक्षौहिणी सेना ने मिलकर धावा बोला। नतीजा महाभारत वाला ही हुआ। कौरव ज्यादा थे, पाण्डव कम थे फिर भी पाण्डव जीते थे। लोग कहते हैं, असल खेल कृष्ण कर गये।

जाहिर है तीन शर्मा के अलावा इस कथा के 303 और किरदार होंगे। सबकी ऐसी ही उपकथा होगी। राजनीतिक गलियारों में ऐसी महाभारत जब नहीं तब लिखी जाती रही है। महाभारत का युद्ध भी 18 राउण्ड (दिन) चला था। अतः मौजूदा प्रसंग को भी पहला राउण्ड समझें।

एक वरिष्ठ पत्रकार ने इस पूरे घटनाक्रम पर जो टिप्पणी की वह तलवार की ऊपर बतायी गयी तीन धार पर सबसे गहरी मार है। उन्होंने कहा कि ज्यादातर पत्रकारों को यह भ्रम रहता है कि जनता का मूड वह नेता से ज्यादा जानता है। ब्यूरोक्रेट को लगता है कि नेता को कुछ नहीं आता वह देश चलाता है लेकिन नेता हर बार साबित करता है कि पत्रकारों और नौकरशाहों को कब किस जेब से निकालकर किस जेब में रखना है यह केवल नेता जानता है।

वैधानिक सुरक्षा के लिए लिख देता हूँ कि ऊपर कही गयी कथा में किसी वास्तविक व्यक्ति या घटना से समानता महज संयोग है।



गौरव त्यागी-

एके शर्मा को मंत्री न बनाकर यूपी बीजेपी का उपाध्यक्ष बनाया गया है । मतलब साफ है… मोदी बनाम योगी के बीच मुकाबले में योगी ही विजयी साबित हुए हैं । एके शर्मा को डिप्टी सीएम बनाए जाने की चर्चाएं थी ।

अरविंद शर्मा नौकरशाह रहे हैं उन्हें राजनीति की ज्यादा समझ नहीं होगी । बतौर नौकरशाह सरकार में काम करने का उनके पास अच्छा खासा अनुभव था । एके शर्मा गुजरात में मोदी के सीएम रहते 2001 से 2013 के बीच सीएम कार्यालय में रहे । मोदी पीएम बने तो अपने साथ अरविंद कुमार शर्मा को भी पीएमओ लेकर आ गए। 2014 में एक शर्मा पीएमओ में संयुक्त सचिव के पद पर रहे । बाद में प्रमोशन पाकर सचिव बन गए थे ।

एके शर्मा के पास संगठन में काम करने का अनुभव शून्य है । पूर्व नौकरशाह संगठन में रहकर क्या ही योगदान दे पाएगा ? एके शर्मा को संगठन में उपाध्यक्ष पद सिर्फ इज़्ज़त बचाने के लिए दिया गया है । इससे ज्यादा कुछ नहीं है । क्योंकि अनुभव के आधार पर शर्मा संगठन के बजाय सरकार में बेहतर भूमिका निभा सकते थे ।

शुरुआत से ही जब बहुत से लोग योगी को हटाए जाने की बात लिख रहे थे । मैं तभी से लिख रहा था… योगी को नहीं हटाया जाएगा । कई पोस्ट में भी मैंने इसका ज़िक्र किया था । अब तय हो चुका है… योगी को हटाना मुश्किल ही नहीं… नामुमकिन है । 2022 का चुनाव भी योगी के नाम पर ही लड़ा जाएगा ।

लेकिन हाल ही के घटनाक्रमों से मिल रहे संकेत एक सवाल जरूर खड़ा कर रहे हैं ! क्या मोदी भविष्य में बीजेपी के नए आडवाणी बनने की तरफ चल पड़े हैं ?

सौजन्य- fb

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