देश विरोधी नारे टीवी पर दिखाना संपादकीय स्वतंत्रता है?

सत्य हिन्दी डॉट कॉम पर नीरेन्द्र नागर का एक आलेख है, “सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, देशविरोधी नारे लगाना राजद्रोह नहीं है”। इसे पढ़कर मेरे दिमाग में एक सवाल उठा। यह सवाल मेरे दिमाग में तब भी था जब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों द्वारा देश विरोधी नारे लगाने का आरोप लगा था और इससे संबंधित वीडियो दुनिया को दिखाए गए थे। अगर किसी ने देश विरोधी नारे लगाए, आपको पता है कि वह गलत है तो आप उसका प्रचार करेंगे या उसे दबाएंगे / छिपाएंगे। ऐसा तो है नहीं कि देश-दुनिया में जो कुछ भी हो सब कुछ दिखाया ही जाता है। बहुत सारी चीजें नहीं दिखाई जाती हैं और क्या दिखाना है यह सोच-समझ कर, विवेक से तय किया जाता है। यही नहीं, देश विरोधी नारे लगाने का वीडियो टेलीविजन पर दिखाया जाए तो आपको अच्छा लगेगा? या आप इसे पसंद नहीं करेंगे? जाहिर है, पसंद नहीं करेंगे। फिर टेलीविजन पर दिखाने का उद्देश्य? टेलीविजन खबरें दिखाए, मनोरंजन करे यह तो समझ में आता है पर देश विरोधी नारे लगाने वालों को दिखाए, नारे लगाते हुए दिखाए – यह अभिव्यक्ति की आजादी है या संपादकीय स्वतंत्रता।

मेरे ख्याल से इस मामले में दलील यही दी जा सकती है कि ऐसी खबरें दिखाने से प्रशासन सतर्क होता है, उसे सूचना मिलती है और वह दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करता है। मीडिया का एक काम यह भी है। अगर इसे मान भी लें तो क्या चैनल का काम नहीं था कि वह रिकार्डिंग संबंधित अधिकारियों को भेज देता और दर्शकों को यह सूचना भर देता कि आज जेएनयू में ऐसा हुआ और हमारे पास इसकी रिकॉर्डिंग है। हमने उसकी प्रति संबंधित अधिकारियों को कानूनी कार्रवाई के लिए भेज दी है। जिस वीडियो से आम जनता का कोई संबंध नहीं है जो मनोरंजन या सूचना नहीं है (नारा लगाने वाले को पहचानना) आम आदमी का काम नहीं है ना उसकी जरूरत या दिलचस्पी, उसे दिखाने का क्या मतलब? मेरे ख्याल से ऐसा वीडियो दिखाया जाना ही गलत है। नारे लगाना गलत हो या नहीं, इसपर तो फैसला होना चाहिए। खासकर इसलिए भी कि वीडियो ही डॉक्टर्ड बताया जा रहा था। फैसला इसपर भी होना चाहिए कि देश विरोधी नारे लगाने का वीडियो दुनिया को दिखाना देश भक्ति है क्या?

अभी मैंने इन तर्कों की चर्चा नहीं की है कि नारा लगाने से देश का कोई नुकसान नहीं होता है और देश कोई छुई मुई नहीं है। इसमें अपमान का तत्व जरूर है पहले वह एक कैम्पस में सीमित था। इसे टीवी पर दिखाकर विस्तार देना गलत है या नहीं। इसलिए भी, दिखाने से पहले सोच-समझने का समय था। नारे तो जोश में, बहुत कम समय के निर्णय में और कुछ खास क्षण या माहौल में ही लगाए जाएंगे और अगर यह अपराध हो तो उन परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए। इसकी जरूरत एक उदाहरण से समझते हैं। हमारा राष्ट्रीय झंडा – या तिरंगा झंडा हमारी आन बान शान का प्रतीक है। हम इसका अपमान नहीं कर सकते। इसे फहराने के नियम हैं उनका पालन करना होता है। इनमें एक नियम यह भी है कि आप कटा-फटा, जला, क्षतिग्रस्त, पुराना-रंग उतरा झंडा नहीं फहराएंगे। कोई फहराता भी नहीं है। पर क्या झंडे पुराने नहीं होते, कटते-फटते, खराब नहीं होते। जरूर होते हैं। उन्हें नष्ट कर दिया जाता है और उसके भी नियम हैं।

वह यह कि आप इसे एकांत में करेंगे। सार्वजनिक रूप से नहीं। मान लीजिए कोई एकांत में किसी क्षतिग्रस्त या पुराने झंडे को नष्ट कर रहा है और यह सुनिश्चित करने के लिए कि नष्ट करना जरूरी था और उसे बाकायदा एकांत में नष्ट कर दिया गया उसका वीडिया बना कर सुरक्षित रख लेता है। कोई शैतानी में या अनजाने में उसका वह अंश सार्वजनिक कर देता है जिससे पता नहीं चले कि क्षतिग्रस्त झंडे को नष्ट करने का वीडियो है। तो एक नेक या जरूरी काम करने वाला शख्स वीडियो देखने वाले की नजर में अपराधी बन गया। जाहिर है उसे सजा नहीं होगी पर क्या उसे छोड़ दिया जाना चाहिए जो ऐसे वीडियो के संपादित अंश सार्वजनिक करे। क्या हमारा कानून ऐसा होगा और अगर हो तो कानून को ठीक करने की जरूरत है या अपराधियों को सजा देने की। और सजा ही देनी हो तो अपराधी कौन?

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की फेसबुक पोस्ट।

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