स्नेहा, इमरान, मोदी, बाइडन : कहीं हार है कहीं जीत, कहीं शह है तो कहीं मात!

अमित चतुर्वेदी-

स्नेहा दुबे को तो अब सब जान ही चुके होंगे, कोई उन्हें हिंदू शेरनी बता रहा है तो कोई सुपर वुमन बता रहा है, और ये सब इसीलिए क्यूँकि उन्होंने भारत की तरफ़ से पाकिस्तान के प्राइम मिनिस्टर इमरान ख़ान के भाषण के जवाब में राइट टू रिप्लाई अधिकार का प्रयोग करते हुए अपने देश का पक्ष रखा और इमरान की बात का विरोध किया।

हालाँकि मासूम भक्तों को तो तय रूप से ये लगता होगा कि ऐसा पहली बार हो रहा है, जबकि ऐसा है नहीं, पाकिस्तान लगभग हर साल यूनाइटेड नेशन के इस मंच से कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है और मुँह की खाता रहा है, चाहे सरकार किसी भी रही हो, यानि देवेगौड़ा की रही हो या आई के गुजराल की…

ख़ैर अभी बात स्नेहा दुबे की…स्नेहा दुबे इंडियन फ़ॉरेन सर्विसेज़ की 2012 बैच की ऑफ़िसर हैं, और UN में भारत की फ़र्स्ट सेक्रेटेरी के पद पर हैं…चूँकि वो 2012 बैच की ऑफ़िसर हैं यानि बहुत ज़्यादा जूनियर हैं, और ऐसे में वो जो भाषण उन्होंने पढ़ा वो उन्होंने ख़ुद लिखा हो इसकी सम्भावना है तो लेकिन बहुत कम है, सामान्यतः ऐसे भाषणों के ड्राफ़्ट तैयार होते हैं और मल्टी लेवल स्क्रूटिनी के बाद फ़ाइनल किए जाते हैं…

स्नेहा दुबे को उस भाषण या इमरान का जवाब देने के लिए चुना भी इसीलिए ही गया क्यूँकि वो वहाँ सबसे जूनियर थीं, भारत पाकिस्तान और बाक़ी दुनिया को ये मेसेज देना चाहता था कि हम पाकिस्तान के प्राइम मिनिस्टर को जवाब देने के लिए अपना एक सबसे छोटा ऑफ़िसर ही बहुत समझते हैं, इससे ज़्यादा वेटेज भारत पाकिस्तान को नहीं देता…

बिल्कुल वैसे ही जैसे बाइडन ने मोदी को रिसीव करने एयरपोर्ट पर अपने एक बहुत जूनियर अधिकारी को भेजा और जब मोदी जी वाइट हाउस गए तब भी बाइडन ने उन्हें दरवाज़े तक लेने और वापस छोड़ने एक अधिकारी को ही भेजा, और ऐसा इसीलिए क्यूँकि बाइडन प्रशासन एकदम साफ़ कर देना चाहता था कि वो अबकी बार ट्रम्प सरकार भूला नहीं है…

तो कुल मिलाकर ऐसा है, स्नेहा दुबे ने बेशक़ अच्छा जवाब दिया लेकिन वो उन्होंने ख़ुद लिखा हो इसकी सम्भावना बहुत कम है, इसीलिए बेहतर होगा ये कहना कि स्नेहा दुबे ने बेहतरीन जवाब पढ़कर सुनाया जिसे भारत के विदेश मंत्रालय की टीम ने लिखा था।

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One comment on “स्नेहा, इमरान, मोदी, बाइडन : कहीं हार है कहीं जीत, कहीं शह है तो कहीं मात!”

  • Shrikant Asthana says:

    बढ़िया! जिन लोगों को राजनयिकों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों और प्रक्रियाओं के बारे में धेला भर नहीं पता उन्हें उछलने से फुर्सत मिले तो इसे पढ़ लेना चाहिए।

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