फारवर्ड प्रेस का प्रिंट संस्‍करण का प्रकाशन जून, 2016 से स्‍थगित

प्रिय महोदय

हम फारवर्ड प्रेस का प्रिंट संस्‍करण का प्रकाशन अपरिहार्य कारणों से जून, 2016 से स्‍थगित कर रहे हैं। मई, 2016 में पत्रिका के नियमित प्रकाशन्‍ के आठ वर्ष पूरे हो रहे हैं। हम उम्‍मीद करते हैं कि इस बीच फारवर्ड प्रेस टीम द्वारा किये गये कामों का उचित मूल्‍यांकन भविष्‍य में किया जाएगा।

प्रिंट संस्‍करण के बंद होने जाने वावजूद हमारा वेब संस्‍करण चलता रहेगा। बल्कि इसे इस प्रकार देखें कि  प्रिंट संस्‍करण में लग रहे श्रम व संसाधनों का उपयोग हम फारवर्ड प्रेस के वेव संस्‍करण को मजबूत करने में करेंगे। इसके अतिरिक्‍त हम हर तीन महीने में 6 किताबें भी प्रकाशित करेंगे, जिनमें से तीन हिंदी में होगी और 3 अंग्रेजी में होगी। ये पुस्‍तके मुख्‍य रूप से विषयवार उन विशिष्‍ट लेखों का संग्रह होंगी, जो फारवर्ड प्रेस की वेवसाइट पर आएंगे। फारवर्ड प्रेस के प्रिंट संस्‍करण में पिछले वर्षों में प्रकाशित हो चुके लेख भी इन किताबों को संकलित किये जाएंगे। वेब संस्‍करण के लिए लेखों/ रिपोर्टों के लिए हम यथासंभव पारिश्रमिक का भुगतान भी करेंगे। इस संबंध में आपके सुझाव हमारे लिए बहुत उपयोगी होंगे।

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प्रमोद रंजन
संपादक
फारवर्ड प्रेस

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‘पांचजन्य’ को ‘बहुजन’ अवधारणा से चिढ़ है… बहुजन विमर्श के कारण निशाने पर है जेएनयू…

-प्रमोद रंजन-

यह जानना जरूरी है कि 1966 में भारत सरकार के एक विशेष एक्ट के तहत बना यह उच्च अध्ययन संस्थान वामपंथ का गढ़ क्यों बन सका। इसका उत्तर इसकी विशेष आरक्षण प्रणाली में है। इस विश्वविद्यालय में आरंभ से ही पिछड़े जिलों से आने वाले उम्मीदवारों, महिलाओं तथा अन्य कमजोर तबकों को नामांकन में प्राथमिकता दी जाती रही है। कश्मीरी विस्थापितों और युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के बच्चों और विधवाओं को भी वरीयता मिलती है। (देखें: बॉक्स) यहां की प्रवेश परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्न भी इस प्रकार के होते हैं कि उम्मीदवार के लिए सिर्फ  विषय का वस्तुनिष्ठ ज्ञान पर्याप्त नहीं होता। जिसमें पर्याप्त विषयनिष्ठ ज्ञान, विश्लेषण क्षमता और तर्कशीलता हो, वही इस संस्थान में प्रवेश पा सकता है। विभिन्न विदेशी भाषाओं के स्नातक स्तरीय कोर्स इसके अपवाद जरूर हैं, लेकिन इन कोर्सों में आने वाले वे ही छात्र आगे चल कर एम. ए., एमफिल आदि में प्रवेश ले पाते हैं, जिनमें उपरोक्त क्षमता हो। इस प्रकार, वर्षों से जेएनयू आर्थिक व सामाजिक रूप से वंचित तबकों के सबसे जहीन, उर्वर मस्तिष्क के विद्यार्थियों का गढ़ रहा है। यहां के छात्रों की कमतर आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि और इसे लेकर उनकी प्रश्नाकुलता, उन्हें वामपंथ के करीब ले आती है।

अरावली की श्रृंखला के हरे भरे झुरमुटों में लगभग 1000 एकड़ में बसे इसे पूर्ण अवासीय विश्वविद्यालय ने कभी भी अभिजात तबके को ज्यादा आकर्षित नहीं किया। हॉस्टलों का खान-पान साधारण है और मेस में पानी पीने के लिए ग्लास की जगह जग का इस्तेमाल होता है। एक अनुमान के अनुसार जेएनयू में आनेवाले कम से कम 70 फीसदी विद्यार्थी या तो गरीब तबके के होते हैं या फिर निम्न मध्यवर्ग के। विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति की मुख्यधारा वामपंथी होने के बावजूद 2006 के पहले तक यहां आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन सामाजिक रूप से उच्च तबकों का दबदबा था क्योंकि यहां अधिक संख्या इसी तबके से आने वाले विद्यार्थियों की थी। दलितों और आदिवासियों की संख्या उनके लिए आरक्षित अनुपात 22.5 फीसदी तक ही सीमित रह जाती थी। हालांकि यहां वर्ष 1995 से ही ओबीसी विद्यार्थियों को भी नामांकन में वरीयता दी जा रही है, जिसका श्रेय ख्यात छात्र नेता चंद्रशेखर (1964-1997) द्वारा किये गये आंदोलनों को जाता है। (देखें, सामाजिक क्रांति के सूत्रधार, आशोक कुमार सिन्हा, शब्दा प्रकाशन पटना, 2012) लेकिन इसके बावजूद 2006 तक इस विश्वविद्यालय में सामाजिक रूप से वंचित तबकों की कुल संख्या 28-29 फीसदी से ज्यादा नहीं हो पाती थी। 2006 में उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षित हुई सीटों ने इस तबके को उच्च शिक्षा के प्रति उत्साहित किया।

जेएनयू में सभी विद्यार्थियों को मिलने वाले वजीफे का भी आकर्षण इसके पीछे था। जैसा कि फारवर्ड प्रेस के अगस्त, 2015 अंक में प्रकाशित लेख ‘दलित बहुजन विमर्श का बढ़ता दबदबा’ में अभय कुमार ने बताया था कि ”विश्वविद्यालय की वार्षिक रपट (2013-14) के अनुसार, यहां के 7,677 विद्यार्थियों में से 3,648 दलितबहुजन (1,058 अनुसूचित जाति, 632 अनुसूचित जनजाति, 1,948 ओबीसी) हैं। अगर हम सीधी भाषा में कहें तो आज विश्वविद्यालय के 50 प्रतिशत विद्यार्थी, गैर-उच्च जातियों के हैं। अगर इसमें ‘सामान्य’ कैटेगरी के तहत चुने जाने वाले एससी, एसटी व ओबीसी उम्म्मीदवारों तथा अन्य वंचित सामाजिक समूहों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को भी शामिल कर लिया जाए तो ऊँची जातियों व उच्च वर्ग से संबंधित विद्यार्थियों का प्रतिशत नगण्य रह जाएगा।

नतीजा यह है कि पिछले तीन सालों (2013-14 से) में जवाहरलाल नेहरू विवि छात्रसंघ के अध्यक्ष पद पर समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों के विद्यार्थी चुने जाते रहे हैं- वी. लेनिन कुमार (2012), एसएफआई-जेएनयू या डीएसएफ, जो कि तमिलनाडु के ओबीसी थे, अकबर चौधरी (2013), एआईएसए, जो कि उत्तर प्रदेश निवासी एक मुस्लिम थे और आशुतोष कुमार (2014) एआईएसए, जो बिहार के यादव हैं।’ 2012 में तो जेएनयू छात्र संघ के चारों पद ओबीसी तबके से आने वाले उम्मीदवारों ने ही जीते थे। (देखें, ‘जय जोति, जय भीम, जय जेएनयू’, फारवर्ड प्रेस, अक्टूबर, 2012) वर्ष 2015 में छात्र संघ के चुनाव में विजयी रहे उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि में भी यही बात परिलक्षित होती है। अध्यक्ष – कन्हैया कुमार, एआईएसफ (उच्च हिंदू जाति भूमिहार), उपाध्यक्ष- शलेहा रासिद, आइसा (मुसलमान), जनरल सेक्ररेट्री – रामा नागा, आइसा (दलित), ज्वाईंट सेकेरेट्री – सौरभ कुमार शर्मा, एबीवीपी (ओबासी) हैं। गौरतलब है कि जेएनयू छात्र संघ केइस चुनाव में 14 साल बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) का कोई उम्मीदवार जीता है, इस जीत के पीछे स्पष्ट रूप से उसके उम्मीदवार की ओबीसी सामाजिक पृष्ठभूमि भी काम कर रही थी। इसी तरह, उपरोक्त कांड में देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार वर्तमान छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार (उच्च जाति हिंदू) के भाषणों के विडियो आपने देखे होंगे। वे न सिर्फ  एक प्रखर वक्ता हैं, बल्कि उनके भाषण फूले-आम्बेडकरवाद और माक्र्सवाद का खूबसूरत संगम होते हैं। जेएनयू के विद्यार्थी बताते हैं कि उनकी जीत का श्रेय उनके इन्हीं भाषणों को है।

ध्यातव्य यह भी है कि पिछले साल हुए नामांकनों के बाद जेएनयू में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी की संख्या लगभग 55 फीसदी हो गयी है। जेएनयू में अरबी, परसियन समेत विभिन्न भाषाई कोर्सों में बड़ी संख्या में मुसलमान विद्यार्थी हैं। उनसे संबंधित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। अगर उनके साथ अशराफ  मुसलमानों व अन्य अल्पसंख्यकों की संख्या भी जोड़ दी जाए तो निश्चित ही आज जेएनयू में अद्विजों संख्या कम से कम 70 फीसदी हो चुकी है।

यह भी गौर करें कि 2006 से 2015 के बीच जेएनयू में सिर्फ ओबीसी विद्यार्थियों की संख्या 288 से बढ़कर 2434 हो गयी है। यानी पिछले 9 सालों में विवि में ओबीसी छात्रों की संख्या लगभग 10 गुणा बढ़ी है। महिलाओं की संख्या भी काफी बढ़ी है।

2005-06 में 1426 छात्रों का भर्ती के लिए चयन किया गया। जहां तक छात्रों की शहरी-ग्रामीण पृष्ठभूमि प्रश्न है, यह अनुपात 524: 902 था। साथ ही केवल 417 छात्र पब्लिक स्कूलों में पढ़े हुए थे, जबकि 1009 छात्रों की स्कूली शिक्षा नगरपालिका अथवा अन्य गैर पब्लिक स्कूलों में हुई थी। सन् 2006-07 में ओबीसी के कुल 286 (अर्थात 9.44 प्रतिशत) छात्रों का विभिन्न पाठ्यक्रमों में भर्ती हेतु चयन हुआ। ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण के विरूद्ध 24.90 प्रतिशत ओबीसी छात्रों ने विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। इनके अतिरिक्त, आरक्षित श्रेणियों के कुछ छात्रों ने मेरिट के आधार पर सामान्य उम्मीदवार की तरह प्रवेश लिया उनकी संख्या निम्नानुसार है:

अनुसूचित जाति: 37, अनुसूचित जनजाति: 35 विकलांग: 07 ओबीसी: 177

ओबीसी वर्ग के 27 प्रतिशत आरक्षण के विरूद्ध 26.33 प्रतिशत ओबीसी  छात्रों ने विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। इनके अतिरिक्त, आरक्षित श्रेणियों के कुछ छात्रों ने मेरिट के आधार पर सामान्य उम्मीदवार की तरह प्रवेश लिया उनकी संख्या निम्नानुसार है: 

अनुसूचित जाति: 44 अनुसूचित जनजाति: 26 विकालंग: 07 ओबीसी:  186

श्रोत: जेएनयू प्रशासन द्वारा प्रस्तुत 36 वां, 37 वां, 44 वां और 45 वां वार्षिक प्रतिवेदन

नए नारे, नयी इबारत, नए विमर्श

जेएनयू के विद्यार्थियों की सामाजिक संरचना में आए इस बदलाव ने सिर्फ छात्र संघ को ही नहीं बदला बल्कि यहां होने वाले विमर्श भी बदल गये। प्रमुख छात्र संगठनों पर वामदलों का आवरण तो चढ़ा रहा, लेकिन उनके नारे बदलने लगे। दीवारों पर लगे चित्र और इबारतें बदलने लगीं। माक्र्स, लेनिन और माओ की जगह छात्र संगठनों के नारे बिरसा, फूले और आम्बेडकर के नाम पर बनने लगे। दीवारों पर मनुवाद और जातिवाद का विरोध करने वाले बहुजन नायकों की तस्वीरें लगायीं जाने लगीं। नये सामाजिक समीकरण को देखते हुए इन प्रतीकों के बिना कोई भी संगठन जेएनयू परिसर में अपना अस्तित्व नहीं बनाए रख सकता था। सिर्फ नारे और चित्र ही नहीं बदले, शोध के लिए चुने जाने वाले विषयों में भी भारी बदलाव आया। वंचित तबकों से आने वाले विद्यार्थी अब तक अकादमिक क्षेत्र के लिए अछूते रहे जीवनाभुवों तथा विचार प्रणाली के साथ आए थे। उन्होंने मानविकी विषयों के ठस पड़े अकादमिक क्षेत्र को अपनी एक नयी उर्जा से आलोकित करना शुरू कर दिया। यही ‘वाम’ की वह नई दिशा थी, जो उसे उसके अब तक के उच्चवर्णीय रूचि के विमर्शों से अलग करती थी। अन्यथा, जेएनयू में तो रेडिकल वाम की भी उपस्थिति हमेशा रही है। नक्सलवाद, माओवाद अथवा कश्मीर की आजादी से जुड़े विमर्श वहां के लिए कोई नयी बात नहीं है। इन मुद़दों पर वहां हुए अब तक हुए छोटे-बड़े कार्यक्रमों की संख्या निश्चित ही हजारों में रही हैं।

महिषासुर आंदोलन और ‘खाने की आजादी’ (फूड फ्रीडम) से संबंधित आंदोलन उपरोक्त नये विमर्शों की सुगबुगाहट का सार्वजनिक प्रस्फुटन थे, जिसने सारे देश का ध्यान खींचा। वाम संगठनों ने इन आंदोलनों को थोड़ी ना-नुकूर के बाद या तो स्वीकार कर लिया या कम से कम इतना तो घोषित ही कर दिया कि वे अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में खड़े रहेंगे तथा वंचित तबकों से आने वाली इन आवाजों का विरोध नहीं करेंगे। यह प्रकारांतर से यह वाम और बहुजन विचाधाराओं का साथ आना था या कम से कम एक कॉमन मिनीमम प्रोग्राम तक पहुंचना तो था ही।

बचाव की मुद्रा में संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं को एक सांस्कृतिक संगठन कहता भी है और ब्राह्मणवादी संस्कृति के संरक्षण के लिए निरंतर सक्रिय भी रहता है। बहुजन बौद्धिक इस ब्राह्मणवादी संस्कृति पर निरंतर प्रहार करते रहे हैं, जिसे जेएनयू मेंं वाम का भी समर्थन हासिल होने लगा। फूले, आम्बेडकर, पेरियार और नारायण गुरू की विचार प्रणाली का माक्र्स, लेनिन और माओ के विचारों के साथ संगम की प्रक्रिया में जो तर्क, तथ्य और जनभावना जेएनयू पैदा कर रहा था, उसका कोई उत्तर संघ के पास नहीं था। जिस ब्राह्मणवादी संस्कृति को वे हिंदू धर्म की आड़ में छिपाए रखना चाहते थे, उसे हिंदू धर्म के ही वंचित तबकों से कम से कम आजाद भारत में इतनी बड़ी चुनौती पहली बार मिल रही थी, और इसके पीछे था जेएनयू में पढ़ रहे बहुजन शोधार्थियों का बौद्धिक बल। वे अब उच्च अकादमिक मानदंडों के अनुरूप भी अपनी बात रखने में सक्षम थे। संघ की अब तक की कार्रवाइयां ईश निंदा, गौ हत्या आदि के विरोध पर चलती रही हैं। वे मध्यकालीन यूरोप या कहें आज के कुछ अरब देशों की तर्ज पर ईश निंदा आदि को पाप ठहराते और कथित नास्तिकों/धर्म विरोधियों के विरूद्ध मोर्चा खोल देते थे। इसमें उन्हें व्यापक समाज का समर्थन भी हासिल हो जाता था। लेकिन इस बार यह बाजी नहीं चल सकी। जिस हिंदू धर्म के नाम पर वे ब्राह्मणवाद चलाये रखना चाहते थे, उसी के भीतर से यह आवाजें आने लगीं थीं कि हम आदिवासियों, पिछड़ों, दलितों की संहारक देवी की अराधना से इंकार करते हैं। जेएनयू में महिषासुर आंदोलन के प्रस्तावक कह रहे थे कि ”तुमने हमारे नायकों को अपने ग्रंथों में भले ही खलनायक के रूप में पेश किया है, हम ब्राह्मेणत्तर स्रोतों से अपने नायकों को ढूंढेंगे तथा उन्हें पुनर्स्थापित करेंगे।

संथाल, भील, गोंड आदि जनजातियों के अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा आदिम जनजाति के रूप में मान्यता प्राप्त झारखंड असुर जनजाति हजारों वर्षों से खुद को महिषासुर का वंशज मानती रही हैं तथा उनकी पूजा करती रहीं हैं। अन्य दलित बहुजन जातियों में भी असुर परंपरा से जुड़े अनेक टोटेम रहे हैं। ऐसे में महिषासुर की हत्या का उत्सव मनाया जाना कतई उचित नहीं है। उन्होंने यह तथ्य भी सामने रखा कि स्त्री शक्ति की मान्यता इस देश में हजारों वर्षों से रही है, जो मूलत: आदिवासी-बहुजन परंपरा का ही हिस्सा थी। लेकिन ब्राह्मणवादी प्रभाव ने उस स्त्री शक्ति के रूप को विकृत कर, उसे हिंसक और स्त्री-विरोधी रूप दे दिया। आज जिस तासीर की दुर्गापूजा मनायी जाती है, उसकी शुरूआत महज 260 साल पहले 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद लार्ड क्लाइव के सम्मान में कोलकाता के नबाव कृष्णदेव ने की थी। इस प्रकार यह त्योहार न सिर्फ  बहुत नया है बल्कि इसके उत्स में मुसलमानों का विरोध और साम्राज्यवाद परस्ती भी छुपी हुई है।’’

यानी जिस दुर्गापूजा के आधार पर संघ के लोग इस देश के मूलनिवासियों व वंचित तबकों को दुष्कर्मी और राक्षस आदि बताते हैं, उसका अर्थ ही इन युवा बौद्धिकों ने बदल दिया। इसी तरह वे जिस बीफ और पोर्क के नाम पर देश में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे का खेल खेलते रहे थे, जेएनयू के हिंदू-मुसलमान विद्यार्थियों ने उसे ‘खाने की आजादी’ का मसला बना डाला। बीफ और पोर्क फेस्टिवल के संबंध में उनके अकाट्य तर्क मीडिया के सहारे दूर तक पहुंचने लगे। उन्होंने जमीनी हकीकत से दूर रहने वाले भारतीय मध्यवर्गीय हिंदुओं और मुसलमानों को बताना शुरू किया कि ”बीफ और पोर्क हिंदू दलितों के भोजन का न सिर्फ अविभाज्य अंग रहा है बल्कि गरीब लोगों के लिए सस्ते प्रोटीन का यह सबसे बड़ा माध्यम है। लगभग पूरा पूर्वोत्तर भारत इन दोनों खाद्यों का उपभोग करता रहा है। जेएनयू में चूंकि देश भर के विद्यार्थी पढ़ते हैं, इसलिए उन पर भोजन की आदतों को छिपाये रखने का मनोवैज्ञानिक दबाव बनाये रखना गलत है।’’ बहरहाल, संघ ने इस बार ‘ईश निंदा’ के स्थान पर कथित ‘राष्ट्र निंदा’’ के आधार पर हमला किया। उन्होंने ईश्वर के स्थान पर राष्ट्र को स्थापित किया, जिसके बारे में कोई भी सवाल करना, तर्क करना पाप है और पापी को प्रताडि़त करना पूण्य। शिक्षण संस्थानों में सरस्वती मंदिर की स्थापना की मांग करने वाली भारतीय जनता पार्टी इन दिनों सत्ता में हैं। भाजपा सरकार ने जेएनयू में कथित देशद्रोह की घटना का संदर्भ देते हुए गत 18 फरवरी को आदेश दिया है कि हर विश्वविद्यालय में 207 फीट उंचा राष्ट्र ध्वज तिरंगा लगाया जाए, जिसकी शुरूआत जेएनयू से हो। कहने की आवश्यकता नहीं कि अगर उनकी यह योजना निर्विरोध सफल हुई तो राष्ट्र ध्वज स्थल पर बाद में ‘भारत माता’ की शेर सवार मूर्ति बनाने का भी ज्यादा विरोध नहीं हो पाएगा। आजादी के बाद शक्ति के जो ब्राह्मणवादी मिथ गढ़े गये हैं, उनमें ‘माता शेरावाली दुर्गा’ और ‘भारत माता’ एक ही हैं। सांस्कृतिक वर्चस्व के लिहाज से इन प्रतीकों के बड़े गहरे अर्थ हैं। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सांस्कृतिक वर्चस्व ही आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक वर्चस्व के मूल में रहता है। राष्ट्र ध्वज लगाना सभी भारतवासियों के लिए गौरव की बात है, लेकिन जिस परिस्थितियों और जिस मंशा से भाजपा सरकार इसे कर रही है, उसकी निंदा की जानी चाहिए। 

जेएनयू में बहुजन आन्दोलन

अगर हम जेएनयू में पिछले महीने घटे घटनाक्रम को उसकी पृष्ठभूमि समेत कड़ी दर कड़ी देखें तो पाएंगे कि ‘बहुजन और वाम’ के बीच बनती उपरोक्त एकता को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने खतरे की घंटी की रूप में लिया। इसकी पृष्ठभूमि को संपूर्णता में समझने के लिए हमें अक्टूबर, 2011 में जेएनयू में ‘ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट फोरम’ द्वारा पहली बार आयोजित हुए ‘महिषासुर शहादत दिवस’ तथा ‘द न्यू मटरियलिस्ट’ की ओर से सितंबर, 2012 में प्रस्तावित ‘फूड फ्रीडम’ आंदोलन की ओर लौटना होगा। इन दोनों आयोजनों को करने वाले अलग-अलग संगठनों के नामों पर ध्यान दें। महिषासुर दिवस मनाने वाला संगठन ‘ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट फोरम’ घोषित रूप से ओबीसी विद्यार्थियों का संगठन था। ‘फूड फ्रीडम’ को मुद्दा बनाने वाले संगठन ‘द न्यू मटेरियलिस्ट’ का नाम भी बहुजनों की विस्मृत दार्शनिक परंपरा ‘लोकायत’ से संबद्ध है। ‘द न्यू मैटरियलिस्ट’ के अगुआ वैज्ञानिक भौतिकवाद में रूचि रखने वाले ओबीसी और दलित छात्र ही थे।

‘खाने की आजादी’ वाले आंदोलन, जिसे कुछ लोगों ने ‘बीफ -पोर्क फेस्टिवल’ का नाम दिया था और जिस पर दिल्ली हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी। इसके खिलाफ  न्यायालय में ‘राष्ट्रीय गौरक्षिणी सेना’ ने याचिका दायर की थी तथा ‘विश्व हिंदू परिषद व संघ परिवार के अन्य प्रतिनिधियों’ ने जेएनयू के तत्कालीन कुलपति से मुलाकात कर आयोजकों पर कड़ी कार्रवाई की मांग थी। इस प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद कुलपति ने ‘द न्यू मटेरियलिस्ट’ के ओबीसी समुदाय से आने वाले छात्र नेता को निलम्बित कर दिया था तथा तीन अन्य को कारण बताओ नोटिस जारी किया था।

इस आयोजन के तहत विवि परिसर के एक मैदान में विभिन्न प्रदेशों के खाद्य पदार्थों के साथ इच्छुक छात्रों को बीफ और पोर्क परोसा जाना था। इससे पहले इस तरह का आयोजन हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में हो चुका था, तथा दोनों ही जगहों पर इसे बहुजन विद्यार्थियों के प्रिय प्रोफेसर कांचा आयलैया का वैचारिक वरदहस्त प्राप्त था।  महिषासुर और फूड फ्रीडम आंदोलन के बाद वर्ष 2011 और 2012 में विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभिन्न अनुषांगिक संगठनों के जो बयान और प्रतिक्रियाएं आईं, उन्हें पढऩे पर यह महसूस होता है कि वे आरंभ में समझ ही नहीं पा रहे थे कि यह हो क्या रहा है।

‘खाने की आजादी’ की मांग करने वाले प्रस्तावित आयोजन ने तो दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद वहीं दम तोड़ दिया लेकिन महिषासुर दिवस का आयोजन 2011 के बाद से हर साल न सिर्फ  जेएनयू में होता रहा, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी यह बहुत तेजी से फैला। वर्ष 2013 में इसका आयोजन विभिन्न विश्वविद्यालयों समेत लगभग 100 शहरों-कस्बों में हुआ। इनकी संख्या 2015 में बढ़कर 350 से भी अधिक हो गयी। इसी बीच मई, 2014 में केंद्र में संघ परिवार के राजनीतिक संगठन भारतीय जनता पार्टी की सरकार आ गयी थी। संघ ने महिषासुर आंदोलन के उत्स के तौर पर फारवर्ड प्रेस पत्रिका को चिन्हित किया तथा इसके खिलाफ  मोर्चा खोल दिया। अक्टूबर, 2014 में कुछ हिंदूवादी संगठनों से जुड़े लोगों ने फारवर्ड प्रेस पर इस प्रकरण को लेकर पुलिस में मुकदमा दर्ज करवाया। विभिन्न समाचार पत्रों ने इस संबंध में अपनी रिपोर्ट में पुलिस सूत्रों के हवाले से बताया था कि इस मामले को लेकर पत्रिका के कार्यालय पर छापा केद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर मारा गया था। इस दौरान जहां ‘द हिंदू’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘डेक्कन हेराल्ड’, ‘जनसत्ता’ आदि ने फारवर्ड प्रेस के इस पक्ष को भी सामने रखा कि जेएनयू में हुए आयोजन से पत्रिका का कोई सीधा संबंध नहीं है वहीं ‘पांचजन्य’, ‘आर्गेनाइजर’ के अतिरिक्त ‘पायनियर’, ‘दैनिक जागरण’ आदि दक्षिणपंथी पत्र फारवर्ड प्रेस के संबंध में निरंतर दुष्प्रचार में संलग्न रहे।

2015 में पांचजन्य

बहुजन विमर्शों के इस उभार पर संघ की ओर से वास्तविक हमले की शुरूआत उसके बाद शुरू हुई। संघ के हिंदी मुखपत्र ‘पांचजन्य’ ने 8 नवंबर, 2015 के अंक में आवरण कथा के रूप में एक सनसनीखेज व उत्तेजक रिपोर्ट छापी, जिसका शीर्षक था ‘जेएनयू : दरार का गढ़’। उन्होंने सिर्फ  यह रिपोर्ट छापी ही नहीं बल्कि समाचार माध्यमों को इसके बारे में विशेष तौर पर सुचित भी किया कि वे इसका संज्ञान लें। नवंबर, 2015 के पहले सप्ताह में विभिन्न समाचार चैनलों पर ‘पांचजन्य’ की यह रिपोर्ट सुर्खियां बनी रहीं। इसी रिपोर्ट से पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि जेएनयू में बढ़ रही वाम-बहुजन एकता ही संघ के असली निशाने पर है। आगे हम पांचजन्य की उपरोक्त रिपोर्ट के कथ्यों को देखेंगे तथा उनसे पुलिस केगुप्तचर विभाग की उस रिपोर्ट का मिलान करेंगे, जो फरवरी, 2016 में जेएनयू में कथित देश विरोधी नारे लगाये जाने के बाद गृहमंत्रालय को भेजी गयी है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि किस प्रकार संघ और पुलिस एक ही भाषा बोल रहे थे तथा किस प्रकार संघ के एजेंडे पर जेएनयू का कथित ‘देशद्रोह’ इसलिए आया ताकि इस बहाने ‘बहुजन विमर्शों’ को कुचल डाला जाए।

पांचजन्य और सरकारी गुप्तचर

जैसा कि हमने उपर संकेत किया कि जेएनयू की हालिया घटना सिर्फ कथित ‘देशद्रोही’ नारों के कारण नहीं घटित हुई है। उनका असली उद्देश्य मुसलमानों पर हमले के साथ-साथ ब्राह्मणवादी संस्कृति का प्रतिकार करने वाले हिंदू बहुजनों को बदनाम करना है।  आइए, पहले देखें कि पांचजन्य ने अपने 8 नवंबर, 2015 के अंक की आवरण कथा ‘जेएनयू : दरार का गढ़’ में क्या कहा था।  पांचजन्य लिखता है कि ”जेएनयू एकमात्र ऐसा संस्थान है, जहां राष्ट्रवाद की बात करना गुनाह करने जैसा है। इसे वामपंथियों का गढ़ कहा जाता है, भारतीय संस्कृति को तोड़-मरोड़ कर गलत तथ्यों के साथ प्रस्तुत करना यहां आम बात है। उदाहरण के तौर पर जब पूरे देश में मां दुर्गा की पूजा होती है तो यहां कथित नव वामपंथी छात्र और प्रोफेसर महिषासुर दिवस मनाते हैं। आतंकवाद प्रभावित कश्मीर से सेना को हटाने की मांग करते हैं। महिषासुर दिवस मनाने वाले अपने आप को पिछड़े, वंचित एवं वनवासियों का प्रतिनिधि बताते हैं तथा महिषासुर को पिछड़े, वंचित एवं वनवासियों के नायक-भगवान के रूप में प्रदर्शित करते हैं।’’

जेएनयू के बदलते स्वरूप को चिन्हित करते हुए पांचजन्य लिखता है कि ”कुछ समय पूर्व वामपंथियों की देश व समाज तोडऩे की नीति कुछ और होती थी लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव आया है। आज इन्होंने अपने चेहरे व अपनी वैचारिक लड़ाई के क्षेत्र बदल लिए हैं। अब वे लेनिन की प्रस्थापनाएं नहीं दोहराते बल्कि उनके स्थान पर वे सेकुलरवाद, अल्पसंख्यक अधिकार, मानवाधिकार, महिला अधिकार व समाज के वंचित तबके के अधिकारों का सहारा लेकर अपने कार्यों को बड़ी ही आसानी के साथ अंजाम देते हैं। इस जहर की लहलहाती फसल को विश्वविद्यालय के प्रत्येक स्थान पर देखा जा सकता है। जेएनयू परिसर दीवारों पर लिखे नारों, पंफलेट और पोस्टरों से पटा रहता है। इनमें से अधिकतर नारे व पोस्टर भारतीय संस्कृति, सभ्यता व समाज व देश को विखंडित करने वाले होते हैं।’’ पांचजन्य इस रिपोर्ट में नारों, पोस्टरों में आए इन बदलावों का दोष ‘फारवर्ड प्रेस’ द्वारा चलाये गये विमर्शों पर मढ़ता है तथा एक उपशीर्षक ‘फारवर्ड प्रेस का विवि कनेक्शन’ के तहत इसकी भत्र्सना करता है।

पांचजन्य को ‘बहुजन’ अवधारणा से चिढ़ है। वह लिखता है कि वे ”वंचित व वनवासी लोगों को मिलाकर एक नयी संज्ञा दे रहे हैं-बहुजन।…कुछ वर्ष पहले जेएनयू में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें वक्ता के रूप में उस्मानिया विश्वविद्यालय में सहायक प्रो. रहे कांचा आयलैया व जेएनयू के प्रोफेसर ए.के.रामकृष्णन, एस.एन.मालाकार ने अपने भाषणों में उच्च वर्ग के हिन्दुओं के खिलाफ  जमकर जहर उगला।’ दरअसल, संघ के मुख्यपत्र पांचजन्य, आर्गेनाइजर के अतिरिक्त पायनियर, दैनिक जागरण जैसे पत्रों तथा नीति सेंट्रल, सेंट्रल राइट इंडिया, इंडिया फैक्टस जैसी दक्षिणपंथी रूझान वाली वेबवसाइटों को भी ‘बहुजन’ अवधारणा से खासी परेशानी रही है। इनमें प्रकाशित लेखों में इस अवधारणा का इस आधार पर विरोध किया जाता रहा है कि ‘संविधान सम्मत अवधारणा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग’ है। उनके अनुसार इन सभी तबकों तथा जाति प्रथा का विरोध करने वाले द्विजों को साथ लेकर चलने वाली ‘बहुजन’ की अवधारणा हिंदुओं के खिलाफ  एक विदेशी षडयंत्र है। जेएनयू में वामपंथ की धारा जिस ओर जा रही थी, उसका झुकाव दूसरे शब्दों में कहें तो इसी ‘बहुजन’ अवधारणा की ओर था।

पांचजन्य अपनी कवर स्टोरी में जेएनयू को इसी कारण ‘देश को तोडऩे वाला’, ‘हिन्दू समाज के अभिन्न अंग वर्णव्यवस्था के बारे में भ्रामक बातें बोलकर भोले-भाले हिंदू नवयुवकों को बरगलाने’ वाला तथा ‘सवर्णों के खिलाफ  जहर उगलने वाला’ बताता है तथा प्रकारांतर से सवर्ण समाज और अपनी सरकार को इसके खिलाफ  मुहिम चलाने के लिए कहता है। यह अकारण नहीं है कि इस आवरण कथा का एक हिस्सा जेएनयू के पूर्वछात्र रवींद्र कुमार बसेड़ा के नाम से छापा गया है। बसेड़ा उन लोगों में से हैं, जिन्होंने 2014 में महिषासुर दिवस के खिलाफ  मुकदमा दर्ज करवाया था तथा पुलिस को दी गयी शिकायत में इस आयोजन को ‘ब्राह्मण और ओबीसी के बीच सामाजिक तनाव’ बढ़ाने वाला बताया था।  पांचजन्य ने अपनी उपरोक्त रिपोर्ट में आक्रमक ले-आउट के साथ ‘जेएनयू लीला’ शीर्षक से एक बॉक्स भी प्रकाशित किया, जिसमें जेएनयू की दुष्टताएं गिनायीं थीं :

”जेएनयू लीला:
* वर्ष 2000 में कारगिल में युद्ध लडऩे वाले वीर सैनिकों को अपमानित कर विवि में चल रहे मुशायरे में भारत-निंदा का समर्थन किया।
* वर्ष 2010 में बस्तर में नक्सलियों द्वारा 72 जवानों की हत्या पर जश्न मनाया गया।
* मोहाली में विश्वकप क्रिकेट के समय भारत-पाक मैच के दौरान भारत के विरुद्ध नारे लगाए गए।
* जेएनयू में भोजन के अधिकार की आड़ लेकर यहां गोमांस परोसने के लिए हुड़दंग किया जाता है।
* जम्मू-कश्मीर सहित पूर्वोत्तर राज्यों की स्वतंत्रता के लिए खुलेआम नारे लगाए जाते हैं।
* आतंकी अफजल की फांसी पर यहां विरोध में जुलूस व मातम मनाया जाता है।
* फारवर्ड प्रेस की आड़ में यहां कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें हिन्दुओं के देवी-देवताओं का अपमान एवं समाज को तोडऩे का षड्यंत्र मिशनरियों द्वारा रचा जाता है।’’
(पांचजन्य, 8 नवंबर, 2015)

आगे हम देखेंगे कि किस आश्चर्यजनक विधि से नवंबर, 2015 में पांचजन्य की रिपोर्ट में लगाये गये उपरोक्त आरोप चार महीने बाद फरवरी, 2016 में पुलिस के गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट में बदल गये। पांचजन्य की रिपोर्ट और गुप्तचर विभाग की निम्नांकित रिपोर्ट का भाव एक है, मूल कथ्य समान है, लगाए गये आरोप समान हैं, बहुजनवादी विचार धारा वाले छात्र संगठनों को कुछ अतिवादी समूहों से जोड़ डालने की साजिशें समान हैं। सिर्फ  फर्क है तो भाषा का। पांचजन्य की भाषा में जहां साहित्यिक झालरें हैं, वहीं गुप्तचर विभाग की भाषा स्वाभाविक रूप से शुष्क सरकारी भाषा है। 

दिल्ली पुलिस की रपट

9 फरवरी, 2016 को जेएनयू में लगाये गये कथित देशद्रोही नारे के बाद 15 फरवरी को दिल्ली पुलिस ने अपने गुप्तचर विभाग के अधिकारियों से प्राप्त सूचना के आधार पर भारत सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसे ‘गृह मंत्रालय के सूत्रों’ ने प्रेस को जारी कर दिया, जिसके आधार पर 17 और 18 फरवरी को फस्र्टपोस्ट, द हिदू, इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ  इंडिया, द टेलीग्राफ आदि समेत विभिन्न अखबारों तथा टीवी चैनलों ने जेएनयू में ‘नवरात्र के समय महिषासुर दिवस के आयोजन’ तथा ‘जेएनयू मेस में बीफ  की मांग’ से संबंधित खबरें प्रसारित कीं। हालांकि भाजपा समर्थक जी न्यूज व कुछ अन्य चैनलों/पत्रों को छोड़ कर अधिकांश समाचार माध्यमों ने इन आयोजनों को ‘देशद्रोह’ की श्रेणी में रखने को लेकर सरकार पर तंज ही कसा लेकिन तथ्यों की जानकारी न होने के कारण वे भी इसे पूरी तरह समझ नहीं सके।

आइए, देखें कि इस रिपोर्ट में क्या है। चार पेज की यह रिपोर्ट दिल्ली पुलिस के गुप्तचर विभाग ने बनायी है, जिसका शीर्षक है ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में 09.02.16 की घटना पर रपट’। रिपोर्ट के पहले दो पेज 9 फरवरी की घटना पर केंद्रित हैं। उसके बाद के दो पेज जेएनयू में ‘इससे पूर्व हुई घटनाओं’ के बारे में हैं, जिनमें सितंबर, 2014 में ‘नवरात्र फेस्टिवल के दौरान देवी दुर्गा की जगह महिषासुर दिवस’ मनाये जाने तथा ‘हॉस्टल मेस में बीफ  मांगने’, का उल्लेख है। पहला सवाल तो यही उठता है कि आखिर पुलिस ने अपनी रिपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा पूर्व की ऐसी घटनाओं पर क्यों खर्च किया, जिससे कथित ‘देशद्रोही’ नारों का कोई संबंध नहीं है? और यह रिपोर्ट किन कारणों से तुरंत प्रेस को उपलब्ध करवा दी गयी? इस रिपोर्ट के मीडिया में प्रकाशित होने से दो दिन पूर्व, 15 फरवरी को ही भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ का एक बयान विभिन्न अखबारों में छपा, जिसमें उन्होंने ‘बीफ पार्टी का आयोजन करने तथा महिषासुर जयंती’ को देशद्रोही कृत्य बताते हुए इसे मनाने वाले जेएनयू को तत्काल बंद किये जाने का सुझाव दिया।

पहले रिपोर्ट के आरंभिक दो पन्नों को देखें, जिसमें देशद्रोही नारों वाली घटना का जिक्र है:

गृह मंत्रालय को भेजी गयी उपरोक्त रिपोर्ट के इन दो पन्नो में कहा गया है कि ”यहां यह बताना महत्वपूर्ण होगा कि विशेष शाखा की युवा व छात्र इकाई द्वारा लगातार जेएनयू के विद्यार्थियों, विद्यार्थी संगठनों व जेएनयू से जुड़े युवाओं व अन्य व्यक्तियों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है।’’

रिपोर्ट में कहा गया है कि ”लगभग 5 बजे शाम को डीएसयू के छात्र, उनके नेता उमर खालिद, संयोजक, डीएसयू के नेतृत्व, में साबरमती ढाबे के पास एकत्रित हुए। कार्यक्रम स्थल पर लगभग 80-100 डीएसयू व वामपंथी छात्र थे।’’

साथ ही दावा किया गया है कि वाम समर्थित छात्र समूह नारे लगा रहे थे कि ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी’, ‘कश्मीर की आज़ादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी’, ‘इंडिया गो बैक’, ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’, कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफज़ल निकलेगा।’

‘इस बीच एबीवीपी के लगभग 30-40 कार्यकर्ता, जेएनयूएसयू के संयुक्त सचिव श्री सौरव कुमार शर्मा के नेतृत्व में वहां पहुंचे और डीएसयू के खिलाफ  ‘भारत माता की जय के नारे लगाने लगे।’
यहां यह भी ध्यान दें कि इस ‘सरकारी’ रिपार्ट में जहां वाम संगठनों से जुड़े सभी छात्रों के सिर्फ  नाम लिखे गये हैं, वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छात्र-संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के अध्यक्ष सौरभ कुमार शर्मा के नाम के आगे सम्मानसूचक ‘श्री’ लगाया गया है।

इसके अतिरिक्त रिपोर्ट यह भी बताती है कि ‘लगभग 7.30 बजे डीएसयू व एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने साबरमती ढाबे से गंगा ढाबे की ओर कूच किया। वे एक दूसरे के खिलाफ  नारे लगा रहे थे। 8.30 बजे डीएसयू व एबीवीपी के कार्यकर्ता शांतिपूर्वक तितर-बितर हो गए।’’

प्रश्न यह उठता है कि जब जेएनयू में कश्मीर को आत्मनिर्णय का अधिकार दिये जाने संबंधी ऐसे आयोजन, प्रदर्शन और नारेबाजी आम बात हैं तथा इस बार भी हमेशा की तरह दोनों गुुटों के लोग नारा लगाने के बाद ‘शांतिपूर्ण’ तरीके से अलग हो गये थे, तो इस बार ऐसा क्या खास था, जिस कारण इतना बड़ा हंगामा खड़ा किया गया? रिपोर्ट कहती है कि ”एबीवीपी यह आरोप लगा रही है कि डीएसयू व अन्य वाम-समर्थित छात्र समूह राष्ट्र-विरोधी गतिविधियाँ कर रहे हैं। वह चाहती है कि राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलग्न छात्रों के विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए।’’

उपरोक्त बातें रिपोर्ट के पहले दो पन्नों पर हैं।

पुलिस रपट पर संघ की छाप

अब इसके आगे के दो पन्नों को देखें, जिसे बिना किसी परिस्थितिजन्य संदर्भ के इस रिपोर्ट में जोड़ा गया है। इन दो पन्नों में रिपार्ट कहती है कि ‘16.10.2015 को एसीपीए युवा व छात्र इकाई, विशेष शाखा ने विश्वविद्यालय परिसर में तत्कालीन कुलपति सुधीर कुमार सोपोरी से मुलाकात की। इस बैठक में विभिन्न विषयों पर चर्चा की गयी, जिनमें परिसर में निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाने का प्रस्ताव शामिल था ताकि अवांछित गतिविधियाँ रोकी जा सकें। यह चर्चा भी हुई कि कुछ छात्र समूह जेएनयू परिसर में नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन करते हैं। कई बार ऐसे प्रदर्शनों-नारों की प्रकृति राष्ट्र-विरोधी होती है। कई बार कंप्यूटर से तैयार किये गए आपत्तिजनक पोस्टर होस्टल परिसर में लगाये जाते हैं। कई मौकों पर ये पोस्टर समाज के देशप्रेम/धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाने वाले होते हैं। यह भी तय पाया गया कि जेएनयू प्रशासन को पुलिस की मदद से डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन की आपत्तिजनक/राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों पर नियंत्रण किया जायेगा।’     

यहां ध्यान देने योग्य यह है कि स्पेशल ब्रांच के एसीपी स्तर के अधिकारी ने जेएनयू के कुलपति से 6 अक्टूबर, 2015 को मुलाकात की। महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन शरद पूर्णिमा को किया जाता है, जो पिछले साल 26 अक्टूबर को थी। स्पष्ट है कि विश्वविद्यालय कैंपस में सीसीटीवी कैमरा लगाने की कवायद इसी आयोजन के मद्देनजर की जा रही थी। रिपोर्ट की शब्दावली पर भी ध्यान दें। यहां कितनी सफाई से ‘देशप्रेम/धार्मिक भावनाओं’ और ‘आपत्तिजनक/राष्ट्र-विरोध’ को एक दूसरे का पूरक बना दिया गया है। हम यह सवाल यहां फिलहाल छोड़ भी दें कि क्या भावनाएं सिर्फ  ब्राह्मण संस्कृति के रक्षकों की ही आहत होती हैं या सिर्फ  उन्हें पसंद नहीं आने से कोई चीज ‘आपत्तिजनक’ हो जाती है, तब भी यह सवाल तो बचा ही रह जाता है कि क्या वंचित तबकों द्वारा ‘महिषासुर दिवस’ का आयोजन ‘राष्ट्रद्रोह’ है? गौरतलब है कि बाद में क्रमश: 24 और 2६ फरवरी को लोकसभा और राज्यसभा में इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर सरकार ने भी महिषासुर आन्दोलन पर हमला बोला और इसे देशद्रोही कृत्यों से जोड़ दिया। रिपोर्ट में यह भी ध्यातव्य है कि इस आयोजन को बड़ी चतुराई से डीएसयू से जोड़ दिया गया है, जबकि यह सर्वविदित है कि यह आयोजन फूले-आम्बेडकरवाद पर आधारित बहुजन विद्यार्थियों का संगठन ‘ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट फोरम’ करता था।

उपरोक्त रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि ‘जेएनयू में अनेक वाम-समर्थित छात्र संगठन सक्रिय हैं। इनमें से अधिकांश अप्रतिक्रियाशील व नरम प्रकृति के हैं। वे अक्सर विभिन्न राष्ट्रीय व स्थानीय मुद्दों पर नारेबाजी, विरोध प्रदर्शन करते हैं परन्तु उनके आयोजनों में उपस्थिति बहुत कम रहती है। परन्तु दो छुपे हुए छात्र समूह 1.) डीएसयू व 2.) डीएसफ  प्रतिक्रियाशील हैं। इनकी संख्या दस से कम है। कब-जब वे   कम्प्यूटर पर देवी-देवताओं की नग्न व आपत्तिजनक पोस्टर तैयार कर उन्हें दीवारों पर चिपकाते हैं, जिससे समाज की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाई जा सके। उनकी पूर्वकी गतिविधियों में शामिल है:  

1) उन्होंने अफज़ल गुरु की मौत पर शोक मनाया।
2) उन्होंने 2010 में दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़ में सीआरपीफ़  जवानों की हत्या का जश्न मनाया।
3) उन्होंने देवी दुर्गा के स्थान पर पिछले वर्ष नवरात्रि के दौरान 14 सितम्बर को महिषासुर की पूजा की।
4) उन्होंने कश्मीरी अलगाववादी नेता गिलानी को सभा में आमंत्रित किया परन्तु जेएनयू प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी।
5) उन्होंने हॉस्टल की मेस में बीफ की मांग की।
(गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट)

क्या पुलिस द्वारा रिपोर्ट में रखी गयी उपरोक्त आरोपों की सूची पांचजन्य की ‘जेएनयू लीला’ का भावानुवाद अनुवाद मात्र नहीं है? रिपोर्ट के इस हिस्से में यह भी कहा गया कि ‘ये समूह देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें दीवारों पर लगाते हैं, जबकि ऐसी कोई घटना जेएनयू में आज तक हुई ही नहीं। 2011 में ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट फोरम ने जो पोस्टर जेएनयू की दीवारों पर लगाये थे, वह फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित प्रेमकुमार मणि के एक लेख ‘किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन?’ की कटिंग थी, जिसमें महिषासुर के बहुजन समुदाय से होने का उल्लेख था। उसमें न किसी देवी-देवता के प्रति कोई आपत्तिजनक बात थी, न ही कभी किसी देवी-देवता की कथित नंगी तस्वीर जेएनयू में लगायी गयी। पुलिस की रिपोर्ट एक सुनियोजित साजिश के तहत यह कहती है कि ‘उन्होंने देवी दुर्गा के स्थान पर पिछले वर्ष नवरात्रि के दौरान 14 सितम्बर को महिषासुर की पूजा की।’ जबकि सच्चाई यह है कि महिषासुर दिवस जेएनयू समेत पूरे देश में शरद पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, दशहरा के दिन से पांच दिन बाद होता है और नवरात्र की तारीखें तो उससे भी पहले होती हैं। 2014 में भी जेएनयू समेत देशभर में महिषासुर दिवस 9 अक्टूबर को मनाया गया था, जबकि नवरात्र 25 सितंबर से लेकर 3 अक्टूबर तक था और दशहरा 4 अक्टूबर को था। जेएनयू में 2014 का महिषासुर दिवस फारवर्ड प्रेस पर मुकदमा होने के कारण काफी चर्चित रहा था। प्राय: सभी समाचार माध्यमों ने इससे संबंधित खबरें प्रसारित की थीं तथा पुलिस रिकार्ड में भी इसकी तारीख 9 अक्टूबर ही दर्ज है। ऐसे में यह समझना कठिन नहीं है कि ‘नवरात्र के दौरान महिषासुर दिवस के आयोजन’ की झूठी रिपोर्ट सिर्फ  भावनाओं को भड़काने के लिए दी गयी है।

इसी प्रकार, यह कहना कि किसी छात्र संगठन ने ‘हॉस्टल मेस में बीफ परोसे जाने की मांग की’, भी सरासर झूठ है। ‘द न्यू मटेरियलिस्ट’ द्वारा ‘बीफ पोर्क फेस्टिवल’ का आयोजन सिर्फ  कुछ घंटों के लिए एक मैदान में किया जाना था, न कि मेस में। यहां एक बार फिर से बहुत चतुराई से ‘बीफ-पोर्क’ में से ‘पोर्क’ को भी गायब कर दिया गया है, ताकि इसे एक धार्मिक रंग दिया जा सके। संविधान सम्मत सेकुरलवाद के स्थान पर हिंदू-सांप्रदायिकता को उकसाने वाली यह पुलिस रिपोर्ट इन दोनों आयोजनों के आयोजकों को छलपूर्वक डीएसयू तथा डीएसएफ से भी जोड़ देती है। इनमें से डीएसयू  भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) से जुड़ा छात्र संगठन माना जाता है। पुलिस और सरकार की कोशिश है कि बहुजन युवाओं को सरकारी सुरक्षा ऐजेंसियों के रडार पर रहने वाले संगठनों से जोड़ दिया जाए, जिनसे वास्तव में उनकी वैचारिक संगति भी नहीं रही है, ताकि वे समाज से मिल रहा समर्थन खो दें तथा बाद में उन्हें पुलिस प्रताडऩा का शिकार बनाया जा सके।
बहरहाल, जेएनयू को पुलिस, सरकार और मीडिया के एक हिस्से के गठजोड़ के तहत ‘देशद्रोही’ साबित कर डालने के अभियान के पीछे की ये सच्चाइयां अंतिम नहीं हैं। इन परतों के नीचे भी कई परतें हैं। लेकिन इतना तय है कि उच्च शिक्षा में बहुजन युवाओं की दस्तक ने वर्चस्वकारी खेमों में जो हलचल मचायी है, उसकी उथल-पुथल और थरथराहटें आने वाले वर्षों मे भी जारी रहेंगी। जीत तो सत्य, समानता और न्याय की ही होनी है, चाहे इसमें कितना भी समय लगे।

विशेष आरक्षण प्रणाली

१. जेएनयू में दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा में शामिल होने वाले विद्यार्थियों को अनुसूचित पिछड़े जिलों के आधार पर विशेष अंक दिये जाते हैं। इसके लिए अलग जेएनयू के प्रोस्पेक्टस में 2011 के जनगणना के अनुरूप दो श्रेणियों में पिछड़े जिले अनुसूचित किये गये हैं । प्रथम श्रेणी के अनुसूचित पिछड़े जिले के विद्यार्थियों को 5 विशेष अंक और द्वितीय श्रेणी के अनुसूचित पिछड़े जिले के विद्यार्थियों को विशेष 3 अंक दिये जाते हैं। इसके लिए उनका उन जिलों का निवासी होना जरूरी है। इसके अलावा जिन्होंने जे एन यू में दाखिले के लिए अहर्ता परीक्षा दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम के जरिये उत्तीर्ण की है, वे भी 3 या 5 विशेष अंकों के पात्र होते हैं।

२. कश्मीरी विस्थापितों को भी दस्तावेजी प्रमाण या सक्षम प्राधिकारी द्वारा उनके कश्मीरी विस्थापित होने का प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने पर 5 विशेष अंक दिये जाते हैं

३. सैन्यकर्मी श्रेणी के निम्न उम्मीदवारों को 5 विशेष अंक दिये जाते हैं :
अ) युद्ध में मारे गए सैन्यकर्मियों की विधवा एवं संतान
ब) युद्ध में अपंग हुए सेवारत व पूर्वसैन्यकर्मियों की विधवाएं/ संतान
स) शांतिकाल में सैनिक कार्यवाही में मारे गए सैन्यकर्मियों की विधवाएं/ संतान
द) शांतिकाल में सैनिक कार्यवाही में अपंग हुए सैन्यकर्मियों की विधवाएं/ संतान
इ) सभी महिला उम्मीदवारों को 5 वंचन अंक प्रदान किये जायेगें
(किसी भी उमीदवार को 10 से अधिक वंचन अंक नहीं दिए जायेगें)

(नोट: उपरोक्त प्वाईट केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित एससी, एसटी, ओबीसी व विकलांग विद्यार्थियों के लिए निर्धारित आरक्षण के अतिरिक्त दिये जाते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर कोई ओबीसी विद्यार्थी पिछड़े जिले से आता है तो केंद्र सरकार द्वारा निधार्रित 27 फीसदी आरक्षण के अतिरिक्त 5 प्वाईंट भी मिलेंगे, जो कि शहरी ओबीसी विद्यार्थी को नहीं मिलेंगे।)

हिन्दी के चर्चित पत्रकार और आलोचक प्रमोद रंजन दिल्ली से प्रकाशित ‘फॉरवर्ड प्रेस’, पत्रिका के सलाहकार संपादक हैं. 

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महिषासुर प्रसंग में ‘फारवर्ड प्रेस’ मैग्जीन की ओर से प्रेस बयान

नई दिल्‍ली। नई दिल्‍ली से प्रकाशित ‘फारवर्ड प्रेस’ भारत की प्रथम द्विभाषी (अंग्रेजी-हिंदी) मासिक ​है, जो अप्रैल, 2009 से निरंतर प्रकाशित हो रही है। फूले-आम्‍बेडकरवाद की वैचारिकी पर आधारित यह पत्रिका समाज के बहुजन तबकों में  लो‍कप्रिय है। अभी इसके लगभग 80 हजार पाठक हैं तथा यह मुख्‍य रूप से उत्‍त्‍र भारत में पढी जाती है। दक्षिण भारत के द्रविड आंदोलनों तथा देश अन्‍य हिस्‍सों में सामाजिक न्‍याय से जुडे आंदोलनों, लेखकों से बुद्धिजीवियों से भी पत्रिका का गहरा जुडाव है। इस पत्रिका का एक महत्‍वपूर्ण अवदान यह भी माना जाता कि इसने  भारत की विभिन्‍न भाषाओं के सामाजिक न्‍याय के पक्षधर बुद्धिजीवियों को एक सांझा मंच प्रदान किया है, जिससे विचारों का आदान-प्रदान तेज हुआ है। 

पत्रिका में समसामयिक विष्‍यों पर विश्‍लेषणों के अतिरिक्‍त्‍ शोध आलेख भी प्रकाशित होते हैं तथा अकादमिक क्षेत्रों में जारी विमर्शों में भी इसका दखल रहा है। सामजविज्ञान व राजनीतिक विज्ञान की दृष्टि से ‘ओबीसी विमर्श की सैद्धांतिकी’ तथा हिंदी साहितय में ‘बहुजन साहित्‍य की अवधारणा’  विकसित करने में फारवर्ड प्रेस का विपुल योगदान माना जाता है। पत्रिका ने संस्‍कृति के क्षेत्र में ‘बहुजन परंपराओं’ को चिन्हित करने के लिए अनेक विशेषांक प्रकाशित किये हैं, जिनमें ‘महिषासुर’ के संबंध में भी अनेक लेख प्रकाशित हुए हैं। पत्रिका के सीईओ तथा प्रधान संपादक आयवन कोस्‍का हैं, और  संपादक प्रमोद रंजन हैं। 

संसद के दोनो सदनों में पिछले तीन दिनों  में ‘महिषासुर’ के प्रसंग में बहसें चलीं हैं तथा विपक्ष के सदस्‍यों के वॉकआऊट व सदन के सथगित होने की घटनाएं हुई हैं। इस संदर्भ में विभिन्‍न समचार माध्‍यमों में फारवर्ड प्रेस को लेकर चर्चा हुई तथा कुछ टीवी चैनलों/ अखबारों ने लिखा है कि सदन में मानव संसाधन विकास मंत्री द्वारा हिंदू देवी दुर्गा के संबंध में जो आपत्तिजनक पर्चा पढा गया, वह फारवर्ड प्रेस से लिया गया है। पत्रिका के संबंध में  इस तरह की अन्‍य दूसरी बातें भी समाचार माध्‍यमों में आयी हैं, जो या पूर्ण्‍ सत्‍य नहीं हैं, या भ्रामक हैं। इस सबंध में तथ्‍य निम्‍नांकित हैं :

-लोकसभा और राजयसभा में मानव संसाधन मंत्री स्‍मृति इरानी ने जेएनयू में कथित तौर पर 2014  में  लगाया गया जो  पर्चा/ पोस्‍टर पढा, वह फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित किसी लेख का अंश नहीं है। वस्‍तुत: यह समझ कि महिषासुर दिवस सिर्फ जेएनयू में मनाया जा रहा है भ्रामक है। देश के 300 से अधिक स्‍थानों पर यह आयोजन होते हैं। पश्चिम बंगाल के कुछ आयोजकों का दावा है कि वे जेएनयू से पहले से ही महिषासुर दिवस मनाते रहे हैं। जाहिर है, जेएनयू समेत किसी भी आयोजन में ‘फारवर्ड प्रेस’ की कोई सीधी भूमिका नहीं होती। हां, हमारे लिए यह प्रसन्‍नता की बात है कि हमारे पाठकों-लेखकों ने मुख्‍यधारा द्वारा विस्‍मृत कर दिये गये एक सांस्‍कृतिक‍ विमर्श को गति दी है। पत्रिका की मंशा है कि भारत की विभिन्‍न परंपराएं और संस्‍कृतियां एक दूसरे का सम्‍मान करें तथा एक दूसरे से सीखें। 

-ब्राह्मणवादी संगठनों की  शिकायत पर दिल्‍ली पुलिस ने पत्रिका के ”बहुजन-श्रमण विशेषांक, अक्‍टूबर, 2014” की प्रतियां जब्‍त कर ली थीं तथा संपादकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था, जो अभी न्‍यायलयाधीन है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित हो रहे महिषासुर संबंधी विमर्श से ‘ओबीसी और ब्राह्मणों’ के बीच वैमन्‍य बढ रहा है। हमारा यह विश्‍वास है कि न्‍यायालय में यह आरोप मिथ्‍या साबित होगा।

-फारवर्ड प्रेस के प्रिंट संस्‍करण का प्रकाशन जून, 2016 से अपरिहार्य कारणों से बंद‍ किया जा रहा है। इससे संबंधित सूचना पत्रिका के मार्च अंक में प्रकाशित की गयी  है। वह सूचना अटैच है। कृपया देखें। ध्‍यातव्‍य है कि पत्रिका का प्रिंट संस्‍करण भले ही बंद हो रहा हो कि लेकिन इसके साथ ही हम अपनी बेव मौजूदगी को अत्‍यअधिक सशक्‍त भी बनाने जा रहे हैं। इसके अतिरिक्‍त्‍ हम विभिन्‍न सामयिक विष्‍यों पर साल में 24 किताबें प्रकाशित करने की योजना पर भी काम कर रहे हैं। यह सब कदम इसलिए उठाए गये हैं ताकि हम बहुजन विमर्श का और सशक्‍त हस्‍तक्षेप दर्ज करवा सकें।

-पत्रिका की इस बार की आवरण कथा है ‘बहुजन विमर्श के कारण निशाने पर है जेएनयू’। पत्रिका के संपादक प्रमोद रंजन द्वारा लिखित इस आवरण कथा में इस पूरे प्रकरण पर विस्‍तार से प्रकाश डाला गया है तथा बताया गया कि किस प्रकार आरएसएस के मुखपत्र ‘पांचजन्‍य’ के 8 नवंबर, 2015 अंक में लगाये गये आरोप फरवरी, 2016 में पुलिस के गुप्‍चर विभाग की रिपोर्ट में बदल गये और फिर उसी आधार पर देश के इस  प्रतिष्ठित उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान को बदनाम करने की साजिश की गयी।

-प्रमोद रंजन
संपादक, फारवर्ड प्रेस
9811884495

आगे पढ़ें : Bahujan discourse puts JNU in the crosshairs

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एक सांस्कृतिक आंदोलन के चार साल

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मुट्ठी भर अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित छात्रों ने जब 25 अक्टूबर, 2011 को पहली बार ‘महिषासुर शहादत दिवस’ मनाया था, तब शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह दावानल की आग सिद्ध होगा। महज चार सालों में ही ये इन आयोजनों न सिर्फ देशव्यापी सामाजिक आलोड़न पैदा कर दिया है, बल्कि ये आदिवासियों, अन्य पिछडा वर्ग व दलितों के बीच सांस्कृतिक एकता का एक साझा आधार भी प्रदान कर रहे हैं।

इस साल (2015) देश भर में 300 से ज्यादा स्थानों पर महिषासुर शहादत अथवा महिषासुर स्मरण दिवस मनाया गया। यह आयोजन देश की सीमा पार कर नेपाल भी पहुंच गया।  मुख्‍यधारा के मी‍डिया की नजरों से दूर, कहीं इसे 10-15 उत्साही युवक सांकेतिक रूप से हाथ में तख्तियां लेकर कर रहे हैं, तो कहीं एक से 20 हजार लोगों की भीड़ वाली सभाएं हो रही हैं। इन आयोजनों को देखते हुए यह आसानी से महसूस किया जा सकता है कि भारत की दमित अस्मिताएं इस बहाने अपना अभिनव सांस्कृतिक इतिहास लिख रही हैं।

भारत में जिस दुर्गा पूजा को देवताओं और राक्षसों की लड़ाई बताकर उसे निर्विवाद माना जाता था, वह आज इन आयोजनों के कारण संकट में है। महिषासुर दिवस मनाने वालों का कहना कि वह तो आर्यों-अनार्यों की लड़ाई थी और महिषासुर हम अनार्यों के पुरखा और नायक हैं। आदिवासियों के मिथकीय नायक और देवता रहे महिषासुर को शहीद बताने वाले लोगों में आज ज्यादा संख्या यादव, कुशवाहा, कुम्हार, कुर्मी, निषाद, मांझी, रजक, रविदास आदि वंचित बहुजनों की है।

इन आयोजनों के एक अध्येता के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में महिषासुर दिवस के आयोजकों से बात करना हमारे लिए एक अनूठा अनुभव रहा। इनके पास कहने के लिए ढेर सारी बातें हैं। लेकिन कुछ साझा बातें अनायास ध्यान खींचती हैं। ये सभी आयोजक बताते हैं कि हम ”बचपन से इस विषय में सोचते थे कि दुर्गा की मूर्तियों में जो असुर है, उसका रंग-रूप क्यों हम लोगों जैसा है और क्यों उसे मारने वालों की कद-काठी पहनावा आदि सब उनके जैसा है, जो आज के द्विज हैं’’!  बाद में जब उन्होंने अपने स्तर पर विचार किया और खोजबीन की तो आश्चर्यचकित रह गये। उनके आसपास, यहां तक कि कई मामलों में तो अपने घरों में ही मनुज देवा, दैत्येरा, मैकासुर, कारसदेव आदि से संबंधित असुर परंपराएं पहले से ही मौजूद थीं। कुछ आयोजक मानते हैं कि महिषासुर व उनके गण कोई मिथकीय पात्र नहीं, बल्कि एतिहासिक पात्र हैं, जो उनके कुनबे के रक्षक, प्रतापी राजा अथवा जननायक थे।

सभी आयोजक महिषासुर की ‘पूजा’ का विरोध करते हैं तथा ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का निषेध करते हैं। शायद यही इन आयोजनों की असली ताकत भी है।

इन चार सालों में यह एक प्रकार की सांस्कृतिक राजनीति का आयोजन भी बन चुका है। यह न सिर्फ नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों में हो रहा है बल्कि दूर-दराज के गांव-कस्बों में भी इसकी जबरदस्त चर्चा है। बात सरकारी अमले तक पहुंची है और कई जगहों पर इस उत्सव के दिन सुरक्षा के दृष्टिकोण से अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की जाने लगी है।

महिषासुर का एक संबंध भारत की आदिम जनजाति ‘असुर’ की प्राचीन संस्कृति से जुड़ता है, जिनकी कुल संख्या अब देश भर में बमुश्किल 9 हजार बची है। असुरों में कम ही लोग पढ़े-लिखे हैं। गुमला के विशुनपुर प्रखंड के सामाजिक कार्यकर्ता अनिल असुर कहते हैं कि ”मैंने स्कूल की किताबों में पढ़ा है कि देवताओं ने असुरों का संहार किया था। वह हमारे प्रतापी पूर्वजों की सामूहिक हत्याएं थीं।’’ रांची से प्रकाशित ‘जोहार दिशुम खबर’ के संपादक अश्विनी कुमार पंकज कहते हैं कि, ”महिषासुर को खलनायक बताने वाले लोगों को आदिवासी, पिछडा वर्ग व अन्य वंचित तबकों के बीच उनके नायकत्व को समझना चाहिए।’’ पंकज बताते हैं कि ”इस साल (वर्ष 2015 में) देश भर में लगभग 350 जगहों पर महिषासुर दिवस मनाया गया।’’

महिषासुर दिवस मनाने वाले लोग बताते हैं कि दुर्गा व उनके सहयोगी देवताओं द्वारा महिषासुर की हत्या कर दिये जाने के बाद आश्विन पूर्णिमा को उनके अनुयायियों ने विशाल जनसभा का आयेाजन किया था, जिसमें उन्होंने अपनी समतामूलक संस्कृति को जीवित रखने तथा अपनी खोई संपदा को वापस हासिल करने का संकल्प लिया था। यही कारण है कि विभिन्न स्थानों पर जो आयोजन हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश आश्विन पूर्णिमा वाले दिन ही होते हैं। यह पूर्णिमा दशहरा की दसवीं के ठीक पांच दिन बाद आती है। हालांकि कई जगहों पर यह आयोजन ठीक दुर्गा पूजा के दिन भी होता है तथा कहीं-कहीं आयोजक अपनी सुविधानुसार अन्य तारीखें भी तय कर लेते हैं। कहीं इसे ‘महिषासुर शहादत दिवस’ कहा जाता है तो कहीं ‘महिषासुर स्मरण दिवस’।

आइए, बानगी के तौर पर कुछ चुनिंदा जगहों पर नजर डालते हुए हम इन आयोजनों की तासीर समझने की कोशिश करें। हलांकि रिपोर्ट पूरी करने की समय सीमा के कारण हम इस सूची में क्षेत्रीय विविधता की जरूरत को पूरा नहीं कर पाए हैं। लेकिन यह एक बानगी तो है ही।

• पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जिला के काशीपुर प्रखंड के झालागौडा में महिषासुर शहादत दिवस पर विशाल आयोजन होता है। इस वर्ष यहां इस आयोजन के लिए लगभग 20 हजार लोग जुटे, जिनमें मुख्य रूप से संताल, बावरी, राजहड, महाली आदि आदिवासी जातियों व पिछड़े-दलित तबकों के लोग थे। यहां यह आयोजन चरियन महतो के नेतृत्व में होता है। कुर्मी जाति से आने वाले महतो यह आयोजन न सिर्फ यहां करते हैं, बल्कि उन्होंने कई अन्य स्थानों पर भी इस आयोजन के लिए आदिवासियों को प्रेरित किया है। वे कहते हैं कि कुर्मी व इस तरह की अन्य अन्न व पशुपालक जातियों की जडें आदिवासी समाज में ही रही हैं, यह कारण है कि हम महिषासुर से गहरा अपनापा महसूस करते हैं। चरियन बताते हैं कि ”हम लोगों ने पहली बार यह आयोजन वर्ष 2011 में दिल्ली के जेएनयू में महिषासुर दिवस मानये जाने की खबर सुनने के बाद किया, लेकिन मेरे मन में यह बात बहुत पहले से थी। वर्ष 1997 में ही मैंने अपने बांग्ला साप्ताहिक नया सूरज में इस संबंध में एक संपादकीय लेख लिखा था।’’ वे बताते हैं कि उसका शीर्षक था, ‘मानवता और राष्ट्रीयता विरोधी है दुर्गोत्सव।’ इसमें उन्होंने लिखा था कि महिषासुर इस देश के मूल निवासी थे। दुर्गापूजा विदेशी आर्यों द्वारा उनकी हत्या के उपलक्ष्य में मनायी जाती है। इस प्रकार यह विदेशी आक्रांताओं का गुणगाणन करने का उत्सव है, जो अपने मूल रूप में हमारी राष्ट्रीयता के विरूद्ध है। वर्ष 2010 में उन्होंने अपने इसी विचार को और विस्तार से लिखा, जो पुरूलिया से प्रकाशित जाति संगठन ‘कुर्मी मिलन संगम’ के बांग्ला  मुखपत्र ‘अखड़ा’ में प्रकाशित हुआ, जिसकी काफी चर्चा हुई। इसे पढ़कर उनके पास स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता अजित प्रसाद हेम्ब्रम और शत्रुध्न मुर्मू आए। उन्होंने यह प्रस्ताव रखा कि दुर्गापूजा का विरोध किया जाए। लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों में यह संभव नहीं था। इन लोगों ने तय किया कि वे अपने पूर्वज महिषासुर की याद में कार्यक्रम आयोजित करेंगे। इस प्रकार उन्होंने अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए दुर्गापूजा के दिन ही महिषासुर शहादत दिवस मनाना शुरू कर दिया। आयोजन के पहले साल भारत सरकार के ज्वाईंट रजिस्ट्रार जनरल स्वप्न विश्वास कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बने थे, उसके बाद से बहुजन समाज से आने वाले अनेक बड़े अधिकारी, टेक्नोक्रेट व अन्य प्रभावशाली लोग इस आयोजन में मौजूद रहते हैं।

राज्य में विभिन्न जगहों पर हो रहे इन आयोजनों की सारी जानकारियां चरियन की जुबान पर रहती हैं। वे बताते हैं ”वर्ष 2011 में हमारे आयोजन के बाद 2012 में मालदह में भी यह आयोजन शुरू हुआ। 2013 में पश्चिम बंगाल के 24 जगहों पर महिषासुर दिवस मनाया गया। 2014 में इन आयोजनों की संख्या 74 हो गयी। यह बहुत तेजी से फैल रहा है। इस साल राज्य के 182 स्थानों पर महिषासुर दिवस मनाया गया है।’’

• पश्चिम बंगाल के 24 परगना (नार्थ) जिला के अशोक नगर थाना क्षेत्र के बीराबांदोपल्ली में इस साल पहली बार महिषासुर दिवस का आयोजन किया गया। यहां आयोजन 20 अक्टूबर को हुआ। आयोजन में लगभग 400 लोग शामिल हुए। इसके आयोजकों में से एक सुरसेनजीत वैरागी बताते हैं कि इस क्षेत्र में दलित अबादी बहुसंख्यक है, जिन्होंने इस आयोजन से काफी उत्साह दिखाया। आयोजन में क्षेत्र के अन्य पिछड़ा वर्ग लोग और मुसलमान भी शामिल हुए। उन्होंने बताया कि स्थानीय पुलिस ने उन्हें आयोजन नहीं करने के लिए एक नोटिस थमा दिया था, लेकिन वे झुके नहीं। उन्होंने पुलिस अधिकारियों के समक्ष सवाल उठाया कि ”किसी को जन्मदिन की पार्टी करने या प्रियजन की मृत्यु पर शोक सभा आयोजित करने के लिए आपसे अनुमति लेने पड़ती है क्या?’’  हार कर पुलिस ने कार्यक्रम में विध्न उत्पन्न नहीं किया। वैरागी कहते हैं कि यह न सिर्फ  हमारे पूर्वजों की हत्या का उत्सव है बल्कि दुर्गापूजा के दौरान जो मूर्तियां बनायी जाती हैं, उनमें मनुष्य की हत्या को दर्शाया जाता है, जिसका बहुत बुरा प्रभाव समाज पर पड़ता है। कोलकाता के सरदिंद बिस्वास के नेतृत्व में भी इस साल महिषासुर दिवस का आयोजन किया गया। वे बताते हैं कि इस साल चैबीस परगना नार्थ तथा साउथ, मिदनापुर ईस्ट तथा वेस्ट, बर्धमान, बाकुरा, बीरभूम, मुर्शिदाबाद, जलपाईगुडी, कोच्छ विहार, मालदह समेत राज्य के 15 जिलों में दर्जनों जगहों पर शहदत दिवस का आयोजन किया गया है।

• कोलकाता के शहरी क्षेत्र व कई उपनगरों में भी कई जगहों पर महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन पिछले दो सालों से हो रहा है। इन क्षेत्रों में इसका वाहक बना है समुद्र बिस्वास के संपादन में निकलने वाला बांग्ला पाक्षिक ‘निर्भीक संवाद’। समुद्र बताते हैं कि वे अपने अखबार में इन आयोजनों की तैयारी, इस दौरान होने वाले संभाषण आदि की रिपोर्ट को निरंतर प्रकाशित करते हैं। आयोजन की अवधारणा के पक्ष में कई लेख भी इसमें छपे हैं, जिससे वंचित तबकों में इसके प्रति तेजी से जागरूकता आयी है। समुद्र बिस्वास एक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘जनमन’ भी निकालते हैं तथा उन्होंने ‘दुर्गा पूजा आंतरू’ (दुर्गा पूजा की अंदरूनी कथा) शीर्षक से बांग्ला में एक किताब भी लिखी है, जिसमें दुर्गा और महिषासुर की कथा की बहुजन व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। इस किताब का विमोचन वर्ष 2014 में कोलकता पुस्तक मेला में किया गया था। बिस्वास बताते हैं कि बंगाल के जलपाईगुड़ी जिला के कालचीनी में 1985 से ही असुर दिवस मनाया जाता रहा है। वर्ष 2011 में दिल्ली में हुए आंदोलन के बाद से इसने ऐसा बंगालव्यापी स्वरूप ग्रहण कर लिया है कि इस बार आनंद बाजार जैसे दुर्गा पूजा के घनघोर समर्थक अखबार को भी इसके सामने झुकना पड़ा। उसने इस साल इस आयोजन के संबंध में सकरात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की।

•  उत्तर प्रदेश के देवरिया के निकट डुमरी में ‘यादव शक्ति’ पत्रिका के प्रधान संपादक चंद्रभूषण सिंह यादव व लखनऊ में इसी पत्रिका के संपादक राजवीर सिंह के निर्देशन में महिषासुर शहादत दिवस का अयोजन किया जाता है। ‘यादव शक्ति’ ने इस साल 26 अक्टूबर को यह दिवस मनाया, जिसमें वंचित समुदायों के बुद्धिजीवियों ने सांस्कृतिक आजादी की जरूरत पर बल देते हुए अपनी बातें रखीं। इन आयोजनों में शामिल होने वाले लोग बताते हैं कि प्रदेश में कई अन्य जगहों पर भी पिछले दो सालों से यह आयोजन निरंतर हो रहा है।

• झारखंड के धनबाद जिले के निरसा प्रखंड के मुगमा में भी 2012 के बाद से हर साल महिषासुर को स्मरण किया जा रहा है। इस साल यहां एक नवंबर को महिषासुर दिवस मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से आए बहुजन समाज पार्टी के नेता डा रामाशीष राम ने कहा कि ”महिषासुर बहुजनों के महानायक थे। बहुजनों की एकजुटता जरूरी है ताकि हम अपने इतिहास का पुनर्पाठ कर सकें । मनुवादियों द्वारा लिखे गए इतिहास पर हमारा भरोसा नहीं है।’’ संगोष्ठी में करीब 100 लोग शामिल हुए। इनमें ज्यादातर संख्या अन्य पिछड़ी जातियों के लोगों की थी।

• झारखंड के गिरिडीह जिला में भी अनेक जगहों पर महिषासुर दिवस मनाया जाने लगा है। जिला में इन आयोजनों को वरिष्ठ अधिवक्ता दामोदर गोप का नेतृत्व प्राप्त है। गोप बताते हैं कि वे वर्षों तक सीपीआई (एमएल) के सदस्य रहे, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि ”उच्च जातियों के दवाब में कम्युनिस्ट पार्टियां बहुजनों को सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से गुलाम बनाए रखना चाहती हैं।’’  वे सवाल उठाते हैं कि ”क्या एक मनुष्य के रूप में सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान हमारे लिए काफी है? सांस्कृतिक गौरव के सारे सुख क्यों सिर्फ उच्च जातियों के लिए हैं?’’  गोप का मानना है कि ”सांस्कृतिक और सामाजिक आजादी के बिना सिर्फ आर्थिक लड़ाईयों की बात करना एक छलावा मात्र है। आर्थिक रूप से भी वही समाज समृद्ध हो पाता है, तथा अपनी समृद्धि को लंबे समय तक बरकार रख सकता है, जिसकी गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक जडें हों।’’ इसी जिला के धनवार प्रखंड में महिषासुर दिवस का आयोजन अरविंद पासवान करते हैं। धनवार में इस साल 24 अक्टूबर को इसका आयोजन किया गया। वे बताते हैं कि अगले साल से आश्विन पूर्णिमा को गिरीडीह और आसपास के जिलों में और बडे पैमाने पर महिषासुर स्मरण दिवस मनाया जाएगा। झारखंड प्रदेश असुर संघ बनाकर राज्य स्तरीय असुर सम्मेलन करने की भी तैयारी चल रही है।

• बिहार के मुजफ्फरपुर के सिंकंदरपुर कुंडल में इस साल 26 अक्टूबर (आश्विन पूर्णिमा) को महिषासुर दिवस मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में विभिन्न कॉलेजों के लगभग 100 छात्र मौजूद थे। यहां एकलव्य सेना के कार्यकर्ताओं ने इस आयोजन का संचालन किया, जिसके कर्ताधर्ता नरेश कुमार सहनी हैं। इस आयोजन से पहले एकलव्य सेना के कुछ कार्यकर्ताओं ने दशहरा के दिन जिलाधिकारी के आवास के सामने खुदीराम स्मारक पर ‘काला दिवस’ मनाकर दलित-पिछड़े लोगों से अपील की कि वे अपने पूर्वज की हत्या के जश्न में शामिल न हों।

नरेश कुमार सहनी बताते हैं कि ”मैं बचपन से ही सोचता था कि अगर कथित देवताओं की वंशावलियां हैं तो जरूर असुरों की भी तो वंशावली होगी। आखिर उनके वंशज आज कौन हैं? बाद में दिल्‍ली से प्रकाशित फारवर्ड प्रेस में छपे लेख की जानकारी मुझे हुई तो लगा कि और भी लोग मेरी तरह ही सोच रहे हैं। उस लेख ने मुझे अपनी बात कहने की ताकत दी।’’ वे  बताते हैं कि ”हम निषादों (मल्लाहों) की एक उपजाति है – महिषी। यह निषादों की वह उपजाति है जो पशुपालन करती है। महिषासुर हम मल्लाहों के पूर्वज थे।”  साथ ही, वे स्वयं ही जोड़ते हैं कि ”महिषासुर जिस काल में रहे होंगे, उस समय जाति व्यवस्था इस रूप में नहीं रही होगी, इसलिए उनकी जाति नहीं निर्धारित की जा सकती। यादव व अन्य जातियां भी उन्हें अपना पूर्वज मानती हैं। सभी अपने जगह सही हैं।’’

• मुजफ्फपुर के भगवानपुर में भी महिषासुर महोत्सव मनाया। इसके संचालन का जिम्मा उठाया हीरा यादव ने। यह पूछने पर कि क्या विरोध का सामना नहीं करना पड़ता, वे बताते हैं कि ”पहले विरोध होता था। 2011 में जब यह आयोजन शुरू हुआ तो घर के लोगों ने ही विरोध किया। उनका मानना था कि दुर्गा हिंदुओं की देवी हैं। उनके खिलाफ  आयोजन क्यों? लेकिन अब लोग समझ चुके हैं कि वह कोई धर्मयुद्ध नहीं था। वह आर्यों-अनार्यों की लड़ाई थी। इसलिए, यह एक ऐतिहासिक घटना है। इसका हिन्दू धर्म से कोई वास्ता या सरोकार नहीं। ब्राह्मण जाति सभी हिंदुओं का पर्याय नहीं है।’’ 

• मुजफ्फपुर जिला के ही मीनापुर प्रखंड के छितरा गांव में वर्ष 2014 में महिषासुर की मूर्ति बनायी गयी थी। लेकिन इस वर्ष बिना मूर्ति के ही महिषासुर स्मरण दिवस मनाया गया। दरअसल, जैसे-जैसे इस संबंध में मूर्ति पूजा की विरोधी रही आदिवासी मूल की परंपराओं की जानकारी सामने आ रही है, लोग महिषासुर की मूर्ति बनाने को गलत मानने लगे हैं। इसकी जगह इन कार्यक्रमों में प्राय: अपने पूर्वज के रूप में महिषासुर का सिर्फ चित्र लगाया जाता है तथा संभाषण व सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। छितरा गांव में हुए आयोजन में आसपास के गांवों के लगभग 1500 लोगों ने भाग लिया। आयोजन में बहुजन जातियों द्वारा पारंपरिक तौर पर गाये जाने वाले गीतों का गायन किया गया तथा जनपक्षधर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये गये।

• बिहार के मधेपुरा निवासी, पेशे से शिक्षक हरेराम मूलत: एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनकी टीम के निर्देशन में एक स्कूल के मैदान में 26 अक्टूबर, 2015 को महिषासुर महोत्सव मनाया। इस आयोजन में करीब 150 लोग शामिल हुए। विचार गोष्ठी हुई लेकिन किसी अखबार ने इस खबर को छापना मुनासिब नहीं समझा। हरेराम बताते हैं कि उन्होंने आयोजन की प्रेस विज्ञप्ति और तस्वीरें सभी अखबारों को दी थीं। लेकिन, न तो कोइ पत्रकार इसे कवर करने आया और न कहीं यह खबर छप सकी। बकौल हरेराम भगत, बिहार विधानसभा के चुनाव की गहमागहमी कारण उनके यहां ज्यादा भीड़ नहीं हो सकी। उन्हें करीब 1000 लोगों के आने की उम्मीद थी। वे कहते हैं कि ”इस क्षेत्र में पहले बामसेफ  के संस्थापक कांशीराम जी का आंदोलन चलता था। इस कारण महिषासुर महोत्सव के लिए लोगों को कनविंश करने में हमें कोई दिक्कत नहीं हुई।’’  

• बिहार के नवादा में भी 2012 से महिषासुर शहादत दिवस मनाया जा रहा है। वर्ष 2014 यहां भी महिषासुर की मूर्ति बनायी गयी थी, तथा भारी जन जुटान हुआ था। कार्यक्रम के आयोजक रामफल पंडित, एडवोकेट जयराम प्रसाद, उमेश सिंह, सुमन सौरभ और रामस्वरूप मांझी बताते हैं कि इस क्षेत्र में इस आयोजन ने व्यापक समाजिक आलोडऩ पैदा किया है। लोग महसूस करने लगे हैं कि हमें आर्थिक और सामाजिक आजादी तभी मिल सकती है, जब हम अपने ऊपर लादी गयी ब्राह्मणवादी संस्कृति के जुए को उतार फेंके। उनका मानना है कि ”इन आयोजनों के कारण राजनीतिक जागृति भी आयी है।’’

• बिहार के गंगा पार शहर हाजीपुर से लगभग 16 किलोमीटर दूर भगवानपुर अट्टा में एक नवंबर को महिषासुर के स्मरण के लिए एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया, जिसमें लगभग 1000 लोगों ने शिरकत की, जिसमें बडी संख्या महिलाओं की थी। आयोजक थे – राष्ट्रीय मूल निवासी संघ तथा सत्यशोधक विचार मंच। दो सत्रों में विभाजित यह आयोजन दिन के 12 बजे से रात के 2 बजे तक चला।

पहले सत्र का विषय था, ‘महिषासुर कौन, हत्या क्यों, हत्या की जानकारी वंशजों को है या नहीं, और हत्या की जानकारी नहीं होने का परिणाम’, दूसरे सत्र का विषय था, ‘हमारे देश के शास्त्ऱों में में आर्य-अनार्य, देव-दानव, सुर-असुर, सवर्ण-अवर्ण, आदि संघर्षों का विवरण है, तत्कालीन अनार्य, दानव, असुर, अवर्ण कौन थे, तथा उनका संघर्ष तथा छल-कपट से उनकी पराजय के बाद उनके वंशजों की किस रूप में पहचान।’ इन लंबे-चौड़े विषयों पर देश भर से आये सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने अपनी राय खूब विस्तार से रखी, जिसका स्वागत वहां मौजूद लोग तालियों की गडग़ड़ाहट से करते रहे।

इस अवसर पर प्रमुख वक्ताओं के रूप में, यादव जाति से आने वाले राष्ट्रीय सत्यशोधक मंच के संयोजक शिवाजी राय, भील आदिवासी समुदाय से आने वाले राष्ट्रीय मूल निवासी संघ के अध्यक्ष ताराराम मेहना तथा दलित समुदाय से आने वाले बामसेफ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष डॉ. देशराज ने विस्तार से अपनी बातें रखीं। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुशवाहा जाति से आने वाली सामाजिक कार्यकर्ता नीलम कुशवाहा ने कहा कि ”मनुवादी व्यवस्था ने देवियों के रूप महिलाओं का दुरूपयोग किया है, इसलिए इन देवियों को अपना आदर्श बनाया जाना गलत है। महिलाओं के सशक्तिकरण का अर्थ यह नहीं है कि उसे पुरूषों के तेज से उत्पन्न बताया जाए। उन्होंने कहा कि आज की महिलाओं को सच्चे सशक्तिकरण और अपमानजनक प्रलोभनों के बीच फर्क करना चाहिए तथा उन सामाजिक शक्तियों के साथ खड़ा होना चाहिए, जो न्याय की लड़ाई लड़ रही हैं।” उदयन राय ने इस अवसर पर कहा कि ”संसद और अदालत के माध्यम से हमें अपने पूर्वजों हत्याओं के विभिन्न जश्नों पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने चाहिए।” आयोजन को दिलीप पाल, महावीर दास सिसोदिया, राजनारायण गुप्ता, विनोद कुमार, कुमारी बेबी, कुमारी प्रार्थना, तनीषा, महेंद्र राय, हास्य कवि गया प्रसाद, सत्येंद्र पासवान, पारसनाथ रजक आदि ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता स्थानीय नेता सुबोध राय ने की तथा संचालन जिवलेश्वर प्रसाद ने किया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिहार के पटना में अधिवक्ता मनीष रंजन, पत्रकार नवल किशोर कुमार, राकेश यादव, सुपौल में अभिनंदन कुमार, सीवान में रामनरेश राम, प्रदीप यादव, पूर्वी चंपारण में बिरेंद्र गुप्ता, पश्चिमी चंपारण में रघुनाथ महतो, शिवहर में चंद्रिका साहू, सीतमाढ़ी में रामश्रेष्ठ राय और गोपाल गंज के थावे मंदिर के महंथ राधाकृष्ण दास महिषासुर की गाथा को शहादत/स्मरण दिवस के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के कोशांबी के जुगवा में एनबी सिंह पटेल और अशोक वर्धन हर साल एक बडा आयोजन करते हैं। पिछले वर्ष इन लोगों ने अपने गांव का नाम बदलकर ‘जुगवा महिषासुर’ करने व वहां इस आशय का बोर्ड लगाने की घोषणा की थी। मिर्जापुर में कमल पटेल और सुरेंद्र यादव, इलाहाबाद में लड्डू सिंह व राममनोहर प्रजापति, बांदा में मोहित वर्मा, बनारस में कृष्ण पाल, अरविंद गौड और रिपुसूदन साहू इस आयोजन के कर्ताधर्ता हैं। कर्नाटक के मैसूर, तेलांगना के हैदराबाद, मध्यप्रदेश के बालाघाट के मोरारी मोहल्ला और उड़ीसा के कई शहरों में भी महिषासुर दिवस मनाया जाने लगा है। बंगाल के पुरूलिया में स्वप्न कुमार घोष तथा उड़ीसा के कालाहांडी में नारायण बागार्थी के नेतृत्व में इस आयोजन पिछले साल मीडिया में खासी सुर्खियां बटोरीं थीं। भारत के अतिरिक्त नेपाल में भी कुछ जगहों पर महिषासुर शहादत दिवस मनाये जाने की सूचनाएं हैं, लेकिन वहां के आयोजकों से हम समयाभाव के कारण संपर्क नहीं कर सके।

प्रमोद रंजन फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक हैं। रविप्रकाश मल्टीमीडिया पत्रकार हैं। फिलहाल बीबीसी हिंदी और दूरदर्शन के लिए नियमित असाइनमेंट । वे प्रभात खबर, देवघर के स्थानीय संपादक, दैनिक जागरण, कोलकाता के संपादकीय प्रभारी, दैनिक भास्कर, रांची के डिप्टी एडिटर और आई नेक्सट के रांची, पटना, आगरा और जमशेदपुर संस्करणों के संपादक रह चुके हैं.

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फारवर्ड प्रेस के क्रिश्चियन मालिक आयवन कोस्का को मिल गई जमानत

फारवर्ड प्रेस के मालिक और मुख्‍य संपादक आयवन कोस्‍का को नई दिल्‍ली के पटियाला हाऊस कोर्ट ने गुरुवार को अग्रिम जमानत दे दी। इस मैग्जीन के सलाहकार संपादक प्रमोद रंजन को भी जमानत मिली। आदालत में मैग्जीन के मालिक और संपादक का पक्ष रखते हुए ख्‍यात नारीवादी लेखक व अधिवक्‍ता अरविंद जैन, साइमन बैंजामिन तथा अमरेश आनंद ने कहा कि फारवर्ड प्रेस पर  पुलिस की कार्रवाई अभिव्‍यक्ति की आजादी पर हमला है। यहां तक कि संपादकों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 153 (अ) , 295 (अ) आज की तारीख में निरर्थक हो गये हैं तथा इसका उपयोग राजनीतिक कारणों से किया जा रहा है।

जमानत के बाद सलाहकार संपादक प्रमोद रंजन ने उत्‍तर प्रदेश के महोबा जिले में मौजूद महिषासुर (जिन्‍हें भैसासुर के नाम से भी जाना जाता है ) की तस्‍वीरें जारी करते  हुए कहा कि फारवर्ड प्रेस में कोई भी सामग्री सामग्री आधारहीन नहीं है। यह मंदिर भारतीय पुरातत्‍व विभाग द्वारा संरक्षित भी है। ऐसे सैकडों भौतिक साक्ष्‍य उपलब्‍ध हैं, जो यह साबित करते हैं कि ‘दुर्गा-महिषासुर’ का बहुजन पाठ अलग रहा है। उन्‍होंने कहा कि पत्रिका का इन पाठों को प्रकाशित करने का मकसद अकादमिक रहा है। इसके अलावा इस पाठों के माध्‍यम से हम चाहते हैं कि विभिन्‍न समुदाय एक दूसरे की भावनाओं, परंपराओं को समझें तथा एक-दूसरे करीब आएं। फारवर्ड प्रेस का कोई इरादा किसी समुदाय की भावना को आहत करने का नहीं रहा है।

गौरतलब है कि इसके पूर्व उदय प्रकाश, अरुन्धति राय, शमशुल इस्लाम,शरण कुमार लिंबाले, गिरिराज किशोर, आनंद तेल्तुम्बडे, कँवल भारती, मंगलेश डबराल, अनिल चमडिया, अपूर्वानंद, वीरभारत तलवार, राम पुनियानी, एस.आनंद समेत 300 से हिंदी, मराठी व अंग्रेजी लेखकों ने फारवर्ड प्रेस पर कार्रवाई की निंदा की थी।

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फारवर्ड प्रेस का मुख्‍य संपादक आयवन कोस्‍का वाकई क्रिश्चियन है भाइयों…

Yashwant Singh : फारवर्ड प्रेस का मुख्‍य संपादक आयवन कोस्‍का वाकई क्रिश्चियन है भाइयों… तभी तो ये हिंदू धर्म के पीछे पड़ा है… मेरा हिंदू या किसी धर्म से रत्ती भर लगाव नहीं है लेकिन इतना जानता हूं कि जो घर फूंके आपने चले हमारे साथ… यानि पहले अपने घर को सुधारो… पहले अपने घर से शुरुआत करो… तो हरे आयवनवा कोस्कवा.. पहले तो क्रिश्चियन धर्म यानि इसाई धर्म के खिलाफ एक विशेषांक निकाल कर दिखा फारवर्ड प्रेस में … उसके बाद हिंदू और इस्लाम धर्म के भीतर की बुराइयों को बताना…

इसाइ मिशनरीज को यूरोपियन कंट्रीज से जिस कधर पैसा डालर मिलता है ये सबको पता है… इनका काम ही है दूसरे धर्मों के लोगों को अपने धर्म के नजदीक खींचना.. चाहें ये काम सेवा भाव से हो या फिर दूसरे धर्म की बुराई दिखाने के भाव से… पहले मुझे फारवर्ड प्रेस से सिंपैथी थी…. लेकिन इसके मुख्य संपादक और मालिक के क्रिश्चियन होने की बात पता चलने के बाद मेरा भी कान खड़ा हो गया है….

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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पुलिस विरोध के बावजूद कोर्ट ने फारवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन को जमानत दी

Pramod Ranjan : अंतत: आज कोर्ट से मुझे भी अग्रिम जमानत मिल गयी। ख्‍याल नारीवादी लेखक अरविंद जैन इस मामले में मेरे वकील हैं। उन्‍होंने बताया कि पुलिस के पक्ष ने जमानत का घनघोर विरोध किया। अरविंद जैन जी कोर्ट में ‘फारवर्ड प्रेस’ का पक्ष तो रखा ही, साथ ही भारतीय दंड संहिता की धारा 153 A (जिसके तहत मुकदमा दर्ज किया गया है) की वैधता पर भी सवाल उठाए। यही वह धारा है, जो अभिव्‍यक्ति की आजादी पर पुलिस का पहरा बिठाती है।

हालांकि यह अंत नहीं है। लडाई तो अब शुरू हुई है। यह लडाई न सिर्फ मेरी है, न सिर्फ श्री आयवन कोस्‍का की, न ही सिर्फ फारवर्ड प्रेस की। यह अभिव्‍यक्ति, विमर्श और तर्क करने की आजादी की लडाई है। हम सभी को इसे इसी रूप में लडाना चाहिए। एक संघर्ष वस्‍तुत: आधुनिक समाज के निर्माण के लिए है। उन सभी का हार्दिक शुक्रिया जो विभिन्‍न मतांतरों के बावजूद विमर्श और अभिव्‍यक्ति की आजादी की लडाई में बराबर के भागीदार हैं।

फारवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन के फेसबुक वॉल से.

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कुछ ईसाइयों ने कुछ कुत्सित हिंदुओं के साथ मिल कर दुर्गा को ‘वेश्या’ साबित करने की कोशिश की है

( File Photo Samarendra Singh )

Samarendra Singh : इन दिनों मेरे पास कुछ ई-मेल आ रहे हैं महिसासुर के बलिदान को लेकर। यह किसी दंगाई की सोच रही होगी जिसे लगता होगा कि वह इतिहास दुरुस्त कर देगा। ठीक वैसे ही जैसे कुछ लोग अयोध्या में इतिहास दुरुस्त करना चाहते हैं। अरे भई अब तक कोई ऐसा क्रांतिकारी पैदा ही नहीं हुआ जो अतीत को करेक्ट कर सके। फिर यह तो अतीत भी नहीं … अतीत का एक धार्मिक मिथक है। मैं इस दंगाई सोच का विरोध करता हूं और उन तमाम क्रांतिकारियों से अपील करता हूं कि मुझे ई-मेल नहीं भेजा करें। मुझे शांति से जीने दें। इस ई-मेल में संविधान का हवाला दिया गया है। तो क्या संविधान यह इजाजत देता है कि कोई मूर्ख किसी के भगवान या खुदा का अपमान करे? क्या यह अधिकार मुझे है कि किसी दिन मैं किसी भी धर्म के नायक को अपराधी करार देते हुए उसके विरोधियों को खुदा घोषित कर दूं?

Samarendra Singh : इस देश में छिछोरों की कोई कमी नहीं है. दंगाई की भी कोई कमी नहीं है. लेकिन यहां एक तबका ऐसा है जो दंगाइयों से भी ज्यादा घिनौना है. यह तबका बौद्धिक खोल में छिपा रहता है. इसका काम है वह आधार तैयार करना जिससे दंगा हो. यह तबका बडे़ ही महीन तरीके से धर्मनिरपेक्षता का खून करता है और अपनी अय्याशियों का सामान इकट्ठा करता है. ऐसा ही एक तबका इन दिनों फॉरवर्ड प्रेस नाम की किसी कुत्सित संस्था से जुड़ा हुआ है. यह फॉरवर्ड प्रेस किसका है? यह फॉरवर्ड प्रेस एक ईसाई का है. एक ईसाई व्यक्ति और संस्था का हिंदू देवी देवताओं से क्या लगाव हो सकता है? यह सवाल करने पर सारी तस्वीर साफ हो जाती है.

इस संस्था के पास कुछ खास किस्म के बुद्धिजीवियों ने (जो दरअसल बेहद क्रूर और शातिर किस्म के व्यक्ति हैं) अपना जमीर गिरवी रख दिया है. लेकिन जमीर गिरवी रखना और निजी लाभ के लिए दंगा भड़काने की साजिश रचना दोनों दो बाते हैं. इन बुद्धिजीवियों ने जमीर गिरवी रखने के साथ दंगा भड़काना भी शुरू कर दिया है. मतलब यह सारे बुद्धिजीवी जिन्होंने उस ई-मेल पर अपने हस्ताक्षर किया है या फिर अपना समर्थन दिया है वह सब मेरी नजर में गुजरात के दंगाइयों की तरह ही घृणित, क्रूर और वहशी हैं. और जिस तरह का वह लेख है, जिसमें हिंदू धर्म की “शक्ति” को अपमानित किया है और महिषासुर के जांघों पर बैठा दिखाया गया है और “वेश्या” बताया गया है … उससे यह जाहिर होता कि यह सब बीमार मानसिकता वाले व्यक्ति हैं… जिन्हें संविधान का जरा भी इल्म नहीं है. इन्हें तो यह भी इल्म नहीं कि यह इतिहास और धार्मिक मिथकों को बदलने की जिस परंपरा की नींव डाल रहे हैं उसके कितने खतरनाक नतीजे निकलेंगे.

जिस तरह कुछ ईसाइयों ने कुछ कुत्सित हिंदुओं के साथ मिल कर दुर्गा को “वेश्या” साबित करने की कोशिश की है और उस प्रकरण के समर्थन वाले पत्र पर कुछ मुसलमानों ने भी दस्तखत किए हैं… उसी तरह भविष्य में कोई हिंदू या मुसलमान ईसा मसीह या फिर कोई हिंदू और ईसाई पैगंबर मोहम्मद के बारे में इसी तरह ओछी और घृणित बातें लिख सकता है!! तब भी क्या वह संविधान के दायरे में लिखी गई बात होगी?? इसलिए आज जो कोई भी इस प्रकरण में फॉरवर्ड प्रेस का समर्थन कर रहा है, वह मेरी नजर में दंगाइयों से ज्यादा घृणित है. मैं उन सब पर लानत भेजता हूं. और उनमें से कुछ जो मेरी फ्रेंड लिस्ट में थे आज उन्हें इस हक से बेदखल करता हूं.

एनडीटीवी में काम कर चुके पत्रकार समरेंद्र सिंह के फेसबुक वॉल से.

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फॉरवर्ड प्रेस एक व्यावसायिक पत्रिका है और अभी तक इसी दक्षिणपंथी सरकार में राजनीतिक स्पेस खोज रही थी

आज से कोई साढ़े आठ साल पहले यानी 2006 के फरवरी में ”सीनियर इंडिया” नाम की व्‍यावसायिक पाक्षिक पत्रिका पर छापा पड़ा था। विवादास्‍पद अंक ज़ब्‍त कर लिया गया था। संपादक आलोक तोमर समेत प्रकाशक को जेल हुई थी। आरोप था कि पत्रिका ने डेनमार्क के कार्टूनिस्‍ट का बनाया मोहम्‍मद साहब का कथित विवादित कार्टून छापा है जिससे कुछ लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। सच्‍चाई यह थी कि उस वक्‍त दुनिया भर में चर्चित इस कार्टून पर पत्रिका ने एक कोने में करीब दो सौ शब्‍द की अनिवार्य टिप्‍पणी की थी जिसके साथ कार्टून का एक थम्‍बनेल प्रकाशित था, जिसे आधार बनाकर दिल्‍ली पुलिस कमिश्‍नर ने अपने ही सिपाही से पत्रिका के खिलाफ एक एफआइआर इसलिए करवा दी क्‍योंकि दो अंकों से पत्रिका की आवरण कथा कमिश्‍नर के खिलाफ़ छप रही थी जिसे मैंने और अवतंस चित्रांश ने संयुक्‍त रूप से अपने नाम से लिखा था। स्‍पष्‍टत: यह दिल्‍ली पुलिस द्वारा बदले की कार्रवाई थी, लिहाज़ा प्रभाष जोशी से लेकर राहुल देव तक पूरी पत्रकार बिरादरी का आलोकजी के समर्थन में उतर आना बिल्‍कुल न्‍यायसंगत था।

अब इसके साथ व्‍यावसायिक पत्रिका ”फॉरवर्ड प्रेस” का मामला रखकर देखिए। बताया जा रहा है कि एक शिकायत के आधार पर आरोप यहां भी वही है कि कुछ लोगों की भावनाएं दुर्गा-महिषासुर पौराणिक कथा के पुनर्पाठ के कारण आहत हुई हैं। लिहाज़ा अंक ज़ब्‍त हुआ और चतुर्थ श्रेणी के कुछ कर्मचारी जेल चले गए। सच्‍चाई क्‍या है? सच्‍चाई उतनी ही है जितनी दिखती है- मतलब एक शिकायत हुई है कंटेंट के खिलाफ़ और कार्रवाई हुई है। इसके पीछे की कहानी यह है कि महिषासुर विरोध के लिए जिस ‘दक्षिणपंथी’ सरकार को आज दोषी ठहराया जा रहा है, पिछले कई अंकों से यह पत्रिका उसी के गुणगान कर रही थी। जिस सरकार ने ”फारवर्ड प्रेस” की अभिव्‍यक्ति की आज़ादी पर हमला किया है, अब तक पत्रिका उसी सरकार और उसके ओबीसी प्रधान सेवक के एजेंडे में अपनी राजनीतिक स्‍पेस खोज रही थी, हालांकि ‘संतुलन’ बैठाने के लिए कुछ और लेख बेशक छाप दिए जाते थे। तो हुआ यह, कि अचानक एक शिकायत के कारण मामला बस बैकफायर कर गया। पहले महिषासुर हिंदुत्‍व में डायवर्सिटी खोजने का औज़ार था, दमन की कार्रवाई के बाद वह अचानक वामपंथ से समर्थन जुटाने का औज़ार बन गया है।

इसके बावजूद पत्रिका पर छापे की ‘कार्रवाई’ का विरोध होना चाहिए, तो इस बात को समझते हुए कि अभिव्‍यक्ति की आज़ादी का मामला यहां पत्रिका के राजनीतिक एजेंडे से स्‍वायत्‍त नहीं है। पहले तो आप यह मानें कि ”फॉरवर्ड प्रेस” एक व्‍यावसायिक पत्रिका है, कोई आंदोलन नहीं। दूसरे यह समझें कि सामान्‍यत: प्रकाशनों पर दमन सत्‍ता-विरोध के चलते किया जाता है (जैसा ”सीनियर इंडिया” के साथ हुआ), लेकिन ताज़ा मामले में पिछले एक साल से मोदी सत्‍ता के पक्ष में तर्क जुटा रही पत्रिका का दमन हुआ है। इसलिए इसे आप पत्रिका के राजनीतिक एजेंडे से काटकर नहीं देख सकते। इस लिहाज से मैं सीनियर इंडिया के मामले को फॉरवर्ड प्रेस के मुकाबले ज्‍यादा जेनुइन मानता हूं।

अगर वाकई ”फॉरवर्ड प्रेस” दक्षिणपंथ विरोध या वामपंथी रुझान की पत्रिका है (जैसा कि अब कहा जा रहा है) तो एचएल दुसाध से लेकर प्रेमकुमार मणि तक हर कोई नरेंद्र मोदी के प्रोजेक्‍ट में हिस्‍सेदारी क्‍यों तलाश रहा था? यदि पिछले अंकों में ज़ाहिर राजनीतिक लाइन ही पत्रिका की आधिकारिक लाइन है, तो अब दक्षिणपंथी सरकार के दमन का स्‍यापा क्‍यों? कहने का मतलब ये कि अभिव्‍यक्ति की आज़ादी के साथ हम खड़े तो हैं ही, हमेशा रहेंगे, लेकिन उस भ्रामक राजनीति का क्‍या करें जो अपनी सुविधा के मुताबिक कभी दक्षिणपंथी हो जाती है तो कभी वामपंथियों को साथ आने को कहती है।

 

अभिषेक श्रीवास्‍तव

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सांस्‍कृतिक बहुलता के पक्ष में उतरे चार सौ से ज्यादा लेखक और प्रकाशक

नई दिल्ली । 400 से अधिक लेखकों, पत्रकारों,  प्रकाशकों  व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने फॉरवर्ड प्रेस पर पुलिस द्वारा की गयी दमनात्माक कार्रवाई की कडी निंदा की है। निंदा करने वालों में उदय प्रकाश, अरुन्धति राय, शमशुल इस्लाम, शरण कुमार लिंबाले,  गिरिराज किशोर, आनंद तेल्तुम्बडे, कँवल भारती, मंगलेश डबराल, अनिल चमडिया, अपूर्वानंद, वीरभारत तलवार, राम पुनियानी, एस.आनंद, आदि अनेक अंग्रेजी, हिंदी और मराठी के प्रतिष्ठित लेखक शामिल हैं। उन्‍होंने यहां मंगलवार को गृह मंत्री ने नाम जारी अपील में कहा कि –  ‘यह देश विचार, मत और आस्थाओं के साथ अनेक बहुलताओं का देश है और यही इसकी मूल ताकत है. लोकतंत्र ने भारत की बहुलताओं को और भी मजबूत किया है।  आजादी के बाद स्वतंत्र राज्य के रूप में भारत ने अपने संविधान के माध्यम से इस बहुलता का आदर किया और उसे मजबूत करने की दिशा में प्रावधान सुनिश्चित किये.

इस देश के अलग–अलग भागों में शास्त्रीय मिथों के अपने अपने पाठ लोकमिथों के रूप में मौजूद हैं. देश के कई हिस्सों में ‘रावण’ की पूजा होती है, पूजा करने वालों में सारस्वत ब्राह्मण भी शामिल हैं. महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर राजा बलि की पूजा की जाती है, जो वैष्णवों के मत के अनुकूल नहीं है. आज भी इस देश में असुर जनजाति के लोग रहते हैं, जो महिषासुर व अन्य असुरों को अपना पूर्वज मानते हैं। हर साल मनाये जाने वाले अनेक पर्वों में धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप निर्मित छवि वाले असुरों के खिलाफ जश्न मनाया जाता है, जो एक समूह के अस्तित्व पर प्रहार करने के जाने –अनजाने आयोजन हैं.

दिल्ली से प्रकाशित फॉरवर्ड प्रेस पत्रिका अक्टूबर के अपने ‘बहुजन –श्रमण परंपरा विशेषांक’ में में इस तरह की अनेक परंपराओं, सांस्कृतिक आयोजनों, विचारों को सामने लायी है, जिसमें ‘दुर्गा –मिथ’ या दुर्गा की मान्यता के पुनर्पाठ भी शामिल हैं.

२०११ में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक छात्र समूह ने ‘महिषासुर शहादत’ दिवस मनाने की परम्परा की शुरुआत की, जिसके बाद पिछले चार सालों में देश के सैकड़ो शहरों में यह आयोजन आयोजित होने लगा है. इस व्यापक स्वीकृति का आधार इस देश के बहुजन –श्रमण परम्परा और चेतना में मौजूद है.

पिछले ९ अक्टूबर को इस कारण फॉरवर्ड प्रेस के खिलाफ दिल्ली पुलिस द्वारा अतिवादी लोगों के एक समूह के द्वारा किये गए एफ आई आर और उसके बाद पुलिस की कार्यवाई की हम निंदा करते हैं पत्रिका के ताजा अंक की प्रतियां जब्त कर ली गयी हैं तथा संपादकों के घरों पर पुलिस का छापा,  उनके दफ्तर और घरों पर निगरानी पत्रिका के कामकाज पर असर डालने के इरादे से की जा रही है. यह अभिव्यक्ति की आजादी और देश में बौद्धिक विचार परम्परा के खिलाफ हमला है. वैचारिक विरोधों को पुलिसिया दमन या कोर्ट-कचहरी में नहीं निपटाया जा सकता। अगर पत्रिका में प्रकाशित विचारों से किसी को असहमति है तो उसे उसका उत्तर शब्दों के माध्यम से ही देना चाहिए।

हम भारतीय जनता पार्टी सरकार से आग्रह करते हैं कि इस एफ आई आर को तत्काल रद्द करने का निर्देश जारी करे और पुलिस को निर्देशित करे कि इसके संपादकों के खिलाफ अपनी कार्यवाई को अविलम्ब रोका जाए.’

Writers, Publishers, Journalists and Social Activists Came forward for Cultural diversity

New Delhi : Writers, Publishers, Journalists and Social Activists condemened police action against Forward Press, which include Uday Prakash, Arundhati Rai, Shamshul Islam, Sharan Kumar Limbale, Kanwal Bharti, Giriraj Kishor, Anand Teltumbade, Manglesh Dabral, Anil Chamadia, Apoorvanand, Veerbharat Talwar, Ram Puniyani , S.Anand and more than 350 others from Hindi, English and Marathi Literature. They in the appeal addressed to the Home Minister said that…

‘India is a country of many faiths, thoughts and beliefs. It is a land of diversities and therein lies its strength. Democracy has strengthened our diversity. After Independence, the Indian Constitution duly recognized this diversity and provided for protection and preservation of the same.

In different parts of the country, various religious and folk myths are prevalent. In some places, Ravana is worshiped and among the worshipers are Saraswat Brahmins. In Maharashtra, Raja Bali is worshiped, which is something Vaishnavites may not agree with. India is also home to the Asur tribe, which believes that Mahishasur and other Asurs were its forefathers. Several religious functions celebrated with great gusto rely on the image of Asurs, as created by some religious texts. This may be hurtful to those who do not view Asurs as demons.

The Delhi-based FORWARD Press magazine, in its October 2014 issue centered on Bahujan-Shraman tradition has brought to fore several such traditions, cultural functions, beliefs and thoughts. And these included a re-rendition of the ‘myth’ of Durga.

In 2011, a group of students of JNU started celebrating ‘Mahishasur Martyrdom Day’ and over the last four years, the celebration of this Day has started in many places in the country.

On October 9, a group of extremist students lodged an FIR against FORWARD Press in Vasant Kunj police station of New Delhi.. We strongly condemn the police action. The police has confiscated the copies of Forward Press . Now the writers  and contributors of the magazine are also on target. This, coupled with the police raids on the homes of the editors of the magazine and the surveillance mounted at the office and the residences of the editors seems to be aimed at disrupting the publication of the magazine.This is also a wanton assault on the fundamental right to freedom of expression and the tradition of free discourse in our country. Intellectual debates are not finalized in the  police stations or court room. If anyone has any issue with the published materials, he should express his own opinion in words.

We demand that the BJP government should order immediate withdrawal of the case and order the police to stop its illegal action against the magazine and its editorial staff.’

Endorsed By :

1.       अरूंधति राय

2.       उदय प्रकाश

3.       शमशुल इस्लाम

4.       वीर भारत तलवार

5.       शरण कुमार लिंबाले

6.       गिरिराज किशोर

7.       आनंद तेलतुम्‍बडे

8.       अनिल चमडिया

9.       मंगलेश डबराल

10.     कँवल भारती

11.     नूतन मालवीय

12.     प्रसन्‍न कुमार चौधरी

13.     राम पुनियानी

14.     उर्मिलेश

15.     एस. आनंद

16.     वीरेंद्र यादव

17.     विद्याभूषण रावत

18.     फेरोज. एल. विसेंट

19.     राजकुमार राकेश

20.     मदन कश्यप 

21.     अपूर्वानंद

22.     नीलिमा शर्मा

23.     मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

24.     संजीव कुमार

25.     शंभुनाथ शुक्ला

26.     रोज केरकेटटा

27.     जवरीमल पारिख

28.     जुगनू शारदेय

29.     अविनाश दास

30.     फैसल अनुराग

31.     कुमार मुकुल

32.     विनीत कुमार

33.     अनिरूद्ध देशपांडे

34.     सुधीर सुमन

35.     दिलीप मंडल

36.     सुषमा असुर

37.     वंदना टेटे

38.     रोज केरकेटटा

39.     ग्‍लैडसन डुंगडुंग

40.     आशुतोष कुमार

41.     अशोक कुमार पाण्डेय

42.     श्रीधरम

43.     संदीप मील

44.     सत्येंद्र मुरली

45.     सुधा अरोडा

46.     विमल कुमार

47.     रजनी तिलक

48.     राजेन्द्र प्रसाद सिंह

49.     हरिनारायण ठाकुर

50.     पल्लव

51.     गुलजार हुसैन

52.     चन्द्र भूषण सिंह यादव

53.     पवन के श्रीवास्तव

54.     सुनील कुमार सुमन

55.     रेयाज-उल-हक

56.     स्वतंत्र मिश्र

57.     अरूण देव

58.     एल एस हरदेनिया

59.     समर अनार्य

 

60.     अशोक दुसाध

61.     जितेंद्र कुमार बिसारिया

62.     रजनीश कुमार झा

63.     संजीव चन्दन

64.     टेकचंद

65.     मोहम्मद इमरान

66.     सुभाष चंद्र कुशवाहा

67.     अनिता भारती

68.     मुसाफिर बैठा

69.     अजय प्रकाश

70.     कृपाशंकर

71.     अफलातून अफलू

72.     कौशल पंवार

73.     अमरेंद्र कुमार शर्मा

74.     रतन लाल

75.     एचएल दुसाध

76.     शिवानंद तिवारी

77.     हरनाम सिंह वर्मा

78.     उमराव सिंह जाटव

79.     मनीष रंजन

80.     कमल भारती

81.     निवेदिता झा

82.     कृष्णकांत

83.     रेक्टर कथूरिया

84.     रमेश ठाकुर

85.     कुमार प्रशांत

86.     बीरेंद् यादव

87.     चंद्रेश मडावी

88.     शिल्‍पा भगत

89.     अतुल आनंद

90.     विष्‍णु शर्मा

91.     प्रकाश शत्रुद्र

92.     कबीर वर्मा

93.     अशोक दास

94.     ओम सुधा

95.     गुलज़ार हुसैन

96.     वीरेंद्र मीणा

97.     आलोक मिश्रा

98.     आशीष कुमार अंशु

99.     लाल बाबू ललित

100.    अमलेंदू उपाध्‍याय

101.    सुशील कुमार शीलू

102.    राजीव मणि

103.    तपन

104.    अशोक चौधरी

105.    अखिलेश प्रसाद

106.    रजनी तिलक

107.    लाल जी निर्मल

108.    राकेश सिंह

109.    हरेराम सिंह

110.    सुभाष चंद्र

111.    हिमांशु पांड्या

112.    अशोक यादव

113.    अजीत राठौर

114.    सचि कुमारी

115.    अनिमेश बहादुर

116.    राहुल राज पॉल

117.    ब्रजेश कुमार पाण्‍डेय

118.    सूर्यनारायण

119.    प्रमोद श्रीवास्‍तव

120.    संतोष सतनामी

121.    आशुतोष सिंह

122.    राकेश श्रीवास्‍तव

123.    अविनाश गौतम

124.    नवजीत कुमार

125.    मुकेश

126.    प्रमोद गौतम

127.    तेजभान तेज

128.    रामकेश मीणा

129.    ओमप्रकाश

130.    अक्षय पाठक

131.    मुकेश कुमार

132.    ताहीरा हसन

133.    रामअवध राम

134.    अरविंद मुरली

135.    परमानंद आर्य

136.    नंदलाल चौहान

137.    श्‍याम हलदार

138.    नेहा सिंह

139.    विपिन बिहारी दूबे

140.    अशोक मेश्राम

141.    प्रवीण वाणखेडे

142.    वी. उदयभान सिंह

143.    रमेश गौतम

144.    निर्दोष कुशवाहा

145.    रमेश विद्रोही

146.    मेहुल चावडा

147.    अभिनंदन कुमार

148.    संदीप मेघवाल

149.    अजीत कुमार ददौरिया

150.    राकेश गौतम

151.    अनिल कुमार

152.    प्रभांश यादव

153.    वीएस यादव

154.    अरविंद कुमार मोदी

155.    रविंद्र सिंह कुशवाहा

156.    भारत अमन

157.    जितेंद्र नारायण

158.    सूर्य नारायण

159.    सुधीर कुमार जाटव

160.    आलोक मिश्रा

161.    उदय यादव

162.    गिरीश अंजान

163.    सुभाष सिंह सुमन

164.    देवराज रावत

165.    अनिल कुमार यादव

166.    आदित्य जाटव

167.    चंद्रशेखर बाबू आम्‍बेडर

168.    प्‍यारे लाल

169.    राजेश कुमार

170.    चंदन राय

171.    फिरोज खान

172.    राकेश कुमार

173.    सुनील यादव

174.    अभिनव मल्लिक

175.    निर्भय प्रकाश

176.    देवेश कुमार

177.    संजय कुमार

178.    मोहम्मुद आलम

179.    ओमप्रकाश यादव

180.    अमित रंजन चित्रांशी

181.    आशीष अनचिन्हा्र

182.    धर्मेंद्र सिंह

183.    अंकित अग्रवाल

184.    आलोक कुमार

185.    गौतम परमार

186.    समीर शेखर

187.    बीरेंद्र सिंह

188.    राजेंद्र चतुर्वेदी

189.    अलका वर्मा

190.    सुधीर आम्‍बेडकर

191.    भूपेश कुमार सुहेरा

192.    पवन श्रीवास्‍तव

193.    बुद्ध विक्रम सेन

194.    शोभित जायसवाल

195.    जयराम राकेश

196.    अवज्ञा अमरजीत गुप्ता

197.    अलका वर्मा

198.    विशेष राय

199.    राजीव मणि

200.    चंद्रेश मेरावी

201.    हिमांशु ककोडिया

202.    उदय पाल

203.    आनंद सिंह गोदरा जाट

204.    अमृत सागर

205.    धीरेश सैनी

206.    बीरेंद्र मीणा

207.    अश्‍वघोष

208.    लखन सिंह

209.    पूंज प्रकाश

210.    अमित के. मिश्रा

211.    राजेश मंचल

212.    राजवीर

213.    अनुज शुक्‍ल्‍

214.    प्रतीक राव

215.    अमरदीप सिंह

216.    संघ शरण

217.    अमित चौधरी

218.    शाहिद अख्‍तर

219.    रामलगन

220.    अनिल वर्मा

221.    शिवंत कुमार

222.    महेश अमन

223.    अरूण कुमार

224.    प्रमोद गौतम

225.    संजय यादव

226.    हीरलाल बवानिया

227.    जिया हसन

228.    राजकुमार मीणा

229.    पवन भास्‍कर

230.    प्रकाश भारत

231.    कैलाश नौरियाल

232.    सुनील सरदार

233.    अनिल सिंह गोंड

234.    अशर्फी लाल

235.    संजय बौद्ध

236.    जगदीश लाल

237.    इरफान हुडा

238.    मनोज अभिज्ञान

239.    रेखा मौर्या

240.    प्रीतम सिंह

241.    मदन कुमार

242.    धीरज कुमार

243.    राजेंद्र कुमार

244.    संतोष कुमार

245.    रौशन कुमार पासवान

246.    उदय भानू

247.    राजेश कुमार

248.    अरविंद भारती

249.    रामअवतार यादव

250.    आलोक मौर्या

251.    अवधेश कुमार

252.    जंगबहादुर यादव

253.    आशिफ खुर्शीद

254.    अजय गीनवाल

255.    रवि नागवंशी

256.    शुजातुल्ला खान

257.    अभय कुमार

258.    जितेंद्र वाल्मिकी

259.    सतवीर तंवर

260.    अश्वाघोष

261.    निशांत सिंह

262.    राजू बौद्धी

263.    संदीप नाईक

264.    अर्पणा

265.    संदीप प्रसाद

266.    प्रमोद ताम्बट

267.    मोहन श्रोत्रिय

268.    राजू कुमार सिंह

269.    गोविंद माथुर

270.    मुकम्म द ताईद

271.    महमूद आलम

272.    अलका प्रकाश

273.    गिरीश जाटव

274.    मुन्नूज लाल

275.    रविंद्र कुमार सिन्हा

276.    अनिल गुप्ता

277.    साजिना राहत

278.    विवेक निराला

279.    मदन गोपाल सिंह भदौरिया

280.    मनोज कुमार झा

281.    अंजु शर्मा

282.    हेमेंद्र कुमार भगत

283.    संघ शरण

284.    मुकेश अहिरवार

285.    रमेश रावत

286.    विनोद आजाद

287.    आशुतोष चौधरी

288.    राजकुमार राजन

289.    शत्रुध्न

290.    दिवाकर घोष

291.    राजेश कोतेड

292.    राजेंद्र सिंह

293.    देवेंद्र देव

294.    परमेवर दास

295.    मनोज कुमार

296.    प्रकाश्वीरर नवल

297.    हंसराज धनका

298.    संजय कुमार

299.    अरविंद वर्मा

300.    पवन कुमार निराला

301.    राकेश यादव

302.    मोतीलाल द्रविड

303.    प्रमोद गौतम

304.    नसरउद्दीन

305.    संजय शान

306.    नाथूराम मेघवाल

307.    महेश पीपल

308.    अविनाश कुमार

309.    गुरेंद्र सिंह

310.    सुधीर कुमार

311.    एस प्रसाद यादव

312.    अमित कुमार

313.    घनश्याम कुशवाहा

314.    अमर मेघवंशी

315.    विनोद

316.    कौशिका पाटिल

317.    अतुल कांत गौतम

318.    राकेश कुमार

319.    सुमित शाक्य

320.    राम सिंह

321.    आलोक तिवारी

322.    सुरेंद्र कुमार कोरी

323.    अभिवनव आलोक

324.    चैतन्‍य मित्रा

325.    जयसिंह नरनौलिया

326.    नरेंद्र चौहान

327.    सुधीर कुमार

328.    जयपाल नेहरा

329.    कैलाश प्रसाद

330.    मनोज गौतम

331.    कपिलेश प्रसाद

332.    राकेश कुमार सिंह

333.    पवन गहलोत

334.    सुनील वर्मा

335.    कबीर वर्मा

336.    सुधीर यादव

337.    राम रविन्द्र

338.    सुधीर यादव

339.    मो‍हसिन हबीब

340.    राजीव सुमन

341.    प्रदीप शिंदे

342.    शाक्य मुनि चांडाल

343.    अनंत सिन्हा

344.    शीलरतन गौतम

345.    विजय सैन

346.    ललित कुमार

347.    रीतेश कुमार दास

348.    हेमराज हरनोट

349.    अखिलेश प्रभाकर

350.    अजय नेताम

351.    निर्दोष कुशवाहा

352.    सचिन कुमार

353.    जयप्रकाश सिंह कुशवाहा

354.    बाघाराम शार्दुल

355.    विक्रम सिंह यादव

356.    अखिलेश प्रभाकर

357.    शैलेश वर्मा

358.    अजित राज

359.    अरिविंद गोहिल

360.    मनीष कुमार बोध

361.    संजय कुमार

362.    नीलांबुज

363.    दीपक भारती

364.            एसके चौटाला

365.            श्रवण देवरे

366.            राजेश कश्‍यप

367.            अतिफ रब्‍बानी

368.            घनश्‍याम शाह

369.            आशीष अलैक्‍सजेंडर

370.            अंजली देशपांडे

371.            श्री प्रकाश

372.            कुमार सुंदरम

373.            राजदेव यादव

374.            प्रदीप गौतम

375.            गिरिजेश्‍वर प्रसाद

376.            रमेश अवस्‍थी

377.            जॉन दयाल

378.            विशाल मंगलवादी

379.    फिजा इमरान

380.    जयपाल मेहरा

381.    राजीव कुमार

382.    मानिकचंद्र झा

383.    धर्मेद्र कुमार यादव

384.    प्रदीप कुमार गौतम

385.    मुकेश अहिरवार

386.    प्रीतम सिंह

387.    आलोक कुमार

388.    राम सिंह

389.    नूर मोहम्‍मद नूर 

390.    केसी सिहरा

391.    संदीप कन्‍नौजिया

392.    जियाउल हसन

393.    विनोद बहाडे

394.    रंजीत सिंह

395.    सुनील कुमार सिंह

396.    अजय आनंद

397.    शिवसागर यादव

398.    सलमान अरशद

399.    श्रीकांत चौधरी

400.    सिमोन पिटरसन

401.    अशोक कुमार मिश्र

402.    परशुराम कांबले

403.    कुमार सत्‍येंद्र

404.    अवज्ञा अमरजीत गुप्ता, आदि अनेक।

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फॉरवर्ड प्रेस पर दिल्ली पुलिस का छापा मोदी सरकार का फासीवादी कदम: जेयूसीएस

लखनऊ। जर्नलिस्टस् यूनियन फॉर सिविल सोसाईटी (जेयूसीएस) ने फॅारवर्ड प्रेस के दिल्ली कार्यालय पर दिल्ली की बसंतनगर थाना पुलिस द्वारा 8 अक्टूबर को छापा मारने तथा उसके चार कर्मचारियों को अवैध रूप से हिरासत में लिए जाने की घटना की कठोर निंदा की है। जेयूसीएस ने दिल्ली पुलिस की इस कारवाई को फॉसीवादी हिन्दुत्व के दबाव में आकर उठाया गया कदम बताते हुए इसके लिए नरेन्द्र मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। इसके साथ ही फॉरवर्ड प्रेस की मासिक पत्रिका के अक्टूबर-2014 के अंक ’बहुजन श्रमण परंपरा विशेषांक’ को भी पुलिस द्वारा जब्त करने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए इसे मुल्क में फासीवाद के आगमन की आहट कहा है।

फारवर्ड प्रेस के दिल्ली कार्यालय पर छापे का विरोध करते हुए जेयूसीएस के नेता लक्ष्मण प्रसाद और अनिल कुमार यादव ने कहा कि देश का संविधान किसी भी नागरिक को उसके न्यूनतम मूल अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। संघ के साहित्यों में बेहद शातिराना तरीके से मुसलमानों के खिलाफ जहर उगला जाता है और वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर छपते हैं। ठीक उसी तरह, दलित समाज को भी अपनी बात कहने का लोकतांत्रिक और संविधान प्रदत्त हक है। उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस की यह कार्यवाही मोदी सरकार के दबाव में तथा हिन्दुत्ववादी ताकतों के हाथों खेलते हुए संविधान और देश के धर्म निरपेक्ष ताने बाने के खिलाफ जाकर की गई है।
 
इस अवसर पर जेयूसीएस के नेता तथा वरिष्ठ पत्रकार राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में ’ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम’ के तत्वाधान में 9 अक्टूबर, को महिषासुर शहादत दिवस के आयोजन स्थल पर जिस तरह से एबीवीपी के गुंडों द्वारा मापीट और तोड़फोड़ की गई, उससे यह साबित होता है कि अब संघ अपने बौद्धिक विरोधियों से तर्कों से निपटने में एकदम असहाय हो चुका है। अब वह झुंझलाहट में सीधे मारपीट पर उतर आया है। उन्होंने कहा कि भारत एक मिली जुली संस्कृतियों वाला देश रहा है। हर संस्कृति की अपनी एक प्रतीकात्मक पहचान रही है तथा उसका समाज उस संस्कृति की अस्मिता को अगर अपने स्तर पर लोकतांत्रिक तरीके से पूजना चाहता है तो किसी को क्या दिक्कत हो सकती है? उन्होंने कहा कि यह घटना नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा देश को फासीवाद के रास्ते पर धकेलने की खुली कोशिश है और लोकतंत्र के हित में पूरी ताकत के साथ इसका प्रतिकार किया जाएगा।
 
द्वारा जारी
 
राघवेंद्र प्रताप सिंह
प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य
जर्नलिस्ट्स यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी,
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
संपर्क- 09696545861

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उनकी सालों की मनुस्मृति पर ‘फॉरवर्ड प्रेस’ का मात्र एक अंक भारी पड़ गया….

Vineet Kumar : उनकी सालों की मनुस्मृति पर फॉरवर्ड प्रेस का मात्र एक अंक भारी पड़ गया…. और आप कहते हैं- हिंदी में कुछ भी लिख दो, फर्क और असर तो सिर्फ अंग्रेजी से ही पड़ना है… नहीं तो जिसे लेखक, संपादक की हैसियत से छापा गया, उसे पाठक की हैसियत से लेने के बजाय गुंडई पर उतर आने की ज़रूरत क्यों पड़ जाती..

फारवर्ड प्रेस के जिस अंक को लेकर बवाल हुआ है, उसे पढ़ने के लिए उपर दिए गए मैग्जीन के आवरण चित्र पर क्लिक करें या फिर यहां क्लिक करें: Forward Press

Samar Anarya : महिषासुर के मिथक को लेकर अपनी अपनी राय हो सकती है पर उसके आधार पर किसी पत्रिका के दफ्तर में छापामारी और तोड़फोड़? सोचिये कि पेरियार आज होते तो सरकार उनके साथ क्या करती। फॉरवर्ड प्रेस पर हुआ पुलिसिया हमला आगे आने वाले दिनों की पूर्वसूचना है। हाशिम हुसैन, मार्केटिंग एक्‍सक्‍यूटिव धनंजय उपाध्‍याय, सकुर्लेशन एक्‍सक्‍यूटिव, राजन, ग्राफिक डिजायनर प्रकाश, ड्राइवर की गिरफ्तारी का विरोध करें। Pramod Ranjan की संभावित गिरफ्तारी का भी।

Ashok Das : प्रेस की आजादी को सिर्फ ब्राह्मणवादी मीडिया तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता। यह बहुजन आंदोलन को बढ़ाने वाली पत्रिकाओं पर भी लागू होता है। “दलित दस्तक” समूह फारवर्ड प्रेस पर हुई कार्रवाई की निंदा करता है। हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक में खड़े हैं। फारवर्ड प्रेस कार्यालय में आज सुबह पुलिस ने छापा मारा तथा ‘बहुजन-श्रमण परंपरा विशेषांक’ (अक्‍टूबर, 2014) के अंक जब्‍त करके ले गयी। ऑफिस के ड्राइवर प्रकाश व मार्केटिंग एक्‍सक्‍यूटिव हाशिम हुसैन को भी अवैध रूप से उठा लिया गया है। सलाहकार संपादक प्रमोद रंजन को भी भूमिगत होना पडा है। प्रेस से जुड़़े किसी व्यक्ति को एफआइअार की कॉपी भी नहीं मिल पायी है।

Sanjeev Chandan : कल जे एन यू में काला दिन था . महिषासुर शहादत दिवस क़ॆ आयोजन में मुझे बोलना था , जब मैं वहां पहुंचा तो जे एन यू के मुख्य गेट पर पुलिस थी , वह जाने नहीं दे रही थी लोगों को , मैं भी रोक लिया गया . मैं Pramod Ranjan के साथ जे एन यू के पीछे के गेट से पहुंचा लेकिन तब तक ए बी पी के छात्र कार्यक्रम स्थल पर तोड फोड करने लगे थे . पुलिस के सामने शुरु से ही वे धमकियां दे रहे थे कि यहां ‘ खून’ होगा . जे एन यू एस यू और आइसा के छात्रों ने समझदारी से उनका परिरोध किया. वे वहां उपस्थित लोगों को काबेरी हास्टल में कार्यक्रम की जगह पर लेकर अन्दर से दरवाजा बन्द कर चुके थे . बाहार से ए बी पी के छात्रों ने कमरे के कांच तोड दिये और वहां दरवाजे भी तोड डाले गये . ए बी पी का यह शर्मनाक तरीका रहा अपनी बात कहने का , बाहर पुलिस उनका साथ दे रही थी . ए आई बी एस एफ के साथी Jitendra Yadav ने तमाम मुश्किलों और चुनौतिय़ों के बीच यह आयोजन कर डाला , शोर शारबे और हंगामे के बीच जितेन्द्र सहित तीन छात्र नेताओं ने अपनी बात कही . अफसोस मैं अन्दर नहीं जा सका .

Rahul Pandey : आज 9 अक्‍टूबर को महि‍षासुर जयंती के दि‍न दि‍ल्‍ली पुलि‍स का Forward Press पर हमला और प्रेस के दो कर्मचारि‍यों की गि‍रफ्तारी लोकतंत्र ही नहीं, देश की अस्‍मि‍ता पर कि‍या गया वह हमला है, जो निंदनीय तो है ही, पर इसपर चुप रहना और भी ज्‍यादा खराब है। दि‍ल्‍ली की पुलि‍स ब्राह्म्‍णों के साथ मि‍लकर देश को जि‍स रसातल में ले जाने का सपना देख रही है, इंसाफ और अमनपसंद मेरे देश के लोग ऐसा नहीं होने देंगे, इसका मुझे यकीन है। दि‍ल्‍ली पुलि‍स के आतंक के चलते फॉरवर्ड प्रेस के भाई Pramod Ranjan को जि‍स तरह से भूमि‍गत होना पड़ा है, वह साफ बताता है कि अब वाकई लोकतंत्र खतरे में है। मैं दि‍ल्‍ली पुलि‍स के इस कुकर्म की पुरजोर निंदा करता हूं। यह हमला हमें बताता है कि राजा महि‍षासुर को लेकर हम एकदम सही राह पर हैं। ब्राह्म्‍णों के मि‍थकों का नाश हो। देवताओं का खात्‍मा हो। राजा महि‍षासुर की जय हो।

Rahul Pandey : जेएनयू में अभी अभी एबीवीपी वालों ने तोड़फोड़ करनी शुरू कर दी है। पगलाए हिंसक जानवरों ने यह तोड़फोड़ छात्रसंघ चुनावों का बदला उतारने और अपने ब्राह्म्‍णवाद को सर्वोपरि रखने के लि‍ए की है। मौके पर मौजूद पि‍यूष मौर्या बता रहे हैं कि कावेरी हॉस्‍टल में महि‍षासुर शहादत दि‍वस पर एक कार्यक्रम रखा गया था। दुर्गापूजा के दि‍नों में जब एबीवीपी वालों ने मूर्ति स्‍थापना की तो कि‍सी ने वि‍रोध नहीं कि‍या, पर जब दलि‍त वर्ग ने अपने राजा महि‍षासुर की जयंती मनानी चाही, तो एबीवीपी वालों ने स्‍थानीय गुंडों के साथ मि‍लकर तोड़फोड़ करनी शुरू कर दी है।

Krishna Kant : फारवर्ड प्रेस पर छापे के विरोध में पोस्ट लिखने पर कई मित्रों की आपत्ति थी कि आपको हल्ला मचाने से पहले पत्रिका पढ़नी चाहिए, न कि प्रशासन पर सवाल उठाने चाहिए. पत्रिका का यह अंक मैंने पढ़ लिया है. पत्रिका की पहली स्टोरी है—’जब असुर थे देवता और देव थे राक्षस’. यह स्टोरी वेदों, अवेस्ता और अन्य समकालीन ग्रंथों के सहारे इतिहास के सवर्ण अथवा दबंग पाठ को खारिज करती है और यह बताती है कि कैसे ‘अहुर यानी असुर कालांतर में सुर यानी देवता हुआ.’ जो असुर थे वे सुर हो गए. हमारे संस्कृत विषय में भी वेद के कुछ सूक्त पढ़ाये जाते हैं. और अवेस्ता का हवाला देकर अध्यापक यह बताते हैं कि उस दौरान असुर अधिपति के अर्थ में प्रयुक्त होता था. मुझे भी बताया गया. अगर दलित विमर्शकार इसकी व्याख्या अपने तरीके से करें तो इसमें कौन सा आसमान टूट पड़ा? पत्रिका में प्रेमकुमार मणि जी का बहुजन श्रमण परंपरा पर एक लेख है. समाज में मौजूद अनेक परंपराओं में से किसी एक पर चर्चा करना कबसे गैरकानूनी हो गया? इस कार्रवाई का मूल वेंडी डोनिगर की किताब पर प्रतिबंध में निहित है. अगर संघ प्रमुख भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को हिंदू कहने का अधिकार रखते हैं, तो कोई समुदाय अपनी धर्म—संस्कृति और अपनी परंपरा के नये पाठ क्यों नहीं लिख सकता? वे सवर्ण परंपराओं को मानने से इनकार कर रहे हैं तो कौन सा राष्ट्र पर संकट आ गया, कि प्रेस और पत्रिका पर जब्ती की कार्रवाई करने की जरूरत पड़ गई? यदि प्रचलित मान्यताओं से हटकर कोई कुछ करना चाहे तो क्या उसपर ऐसी कार्रवाई होना उचित है? क्या सवर्ण मान्यताओं को खारिज करने वाली पत्रिका को जब्त किया जाना लोकतांत्रिक कदम है? फारवर्ड प्रेस के दफ्तर में छापा और पत्रिका जब्त किए जाने की मैं घोर निंदा करता हूं और आप सबसे ऐसा करने की उम्मीद करता हूं. यह अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने की कार्रवाई है.

Ashish Awasthi : दलित आवाज को उठाने वाली पत्रिका “फॉरवर्ड प्रेस” का दफ्तर आज सील किया गया..प्रतियां उठा ली गई. हर वैकल्पिक आवाज़ को दबा दिया जायेगा , कुचल दिया जायेगा। तर्कों और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं से दरकिनार कर फैसला किया जायेगा तानाशाह के तरह।

“जो धर्म की ध्वजा नहीं उठाएंगे ,
मारे जायेंगे !!!!
लोकतंत्र की आढ़ लेके जम्हूरी निज़ाम का गला घोंटा जायेगा।
एक दम उस शख्श के मानिंद जिसने अपने अंतिम दौर में ख़ुदकुशी की थी.
पर हम लड़ेंगे
क्योंकि लड़ने की ज़रूरते है बाकी।
उन गुलाम इक्षाओं के लिए
उस सुबह के लिए
जिसका लाल ” मार्तण्ड ” हर बराबरी और गरिमामयी जिंदिगी की गारेंटी का पुरनोट होगा
इतनी जल्दी हम नहीं हारने वाले क्योंकि
हम घांस है
तुम्हारे हर किये पे उग आएंगे
जलकुंभी की तरह
We express our complete solidarity with Forward Press and all the members. I have always taken pride in association with Forward Press. It is rendering a great service to Dalit Bahujan people all over the country. It has stood with human rights of the people of all kind. It has also supported all ideas of freedom of ideas and expression. We may not agree with every article and every view point but we must stand in solidarity with people’s right to question mythologies and history.

Kanwal Bharti : प्रमोद रंजन के समर्थन में….

अब यह नहीं चलेगा

तुमने किस साजिश से हमें पढ़ने नहीं दिया, अब समझ में आ रहा है.
तुमने क्या-क्या नहीं किया हमें बर्बाद करने के लिए
सिर्फ इसलिए कि हम तुम्हारे सांस्कृतिक गुलाम बने रहें–
तुमने निर्गुण राम को, जो हमें कबीर ने दिया था,
राक्षसों और असुरों के बधिक राजा राम का रूप दे दिया
एक आदिवासी को बनाकर गुलाम बैठा दिया उनके चरणों में
और हमने कुछ नहीं कहा, खामोश ही रहे,
तुम्ही ने लिखा, तुम्ही ने थोपा,
हमने अनुकरण किया, हम अशिक्षित कैसे समझ सकते थे तुम्हारा जाल?
जिन्दा भी कहाँ रहने दिया था तुमने उसे
जिसने भी चाहा था तुम्हारी बराबरी करना.
शस्त्र-विद्या में पारंगत एकलव्य का अंगूठा इसीलिए न काटा था तुमने
कि वो अर्जुन से आगे जा रहा था,
और तुमने अपना काला इतिहास लिख दिया
कि एकलव्य ने खुद अपना अंगूठा दान किया था गुरु को,
जो वह था ही नहीं.
तुम्ही ने लिखा, तुम्ही ने थोपा
हमने अनुकरण किया, हम अशिक्षित कैसे समझ सकते थे तुम्हारा जाल?
क्यों मरवाया था तुमने राम से शम्बूक को?
इसीलिए न कि वो तुम्हारी वर्णव्यवस्था को उलट रहा था?
तुमने कितना बड़ा झूठ गढ़ा था कि वो राम के हाथों मृत्यु का याचक बन
सदेह स्वर्ग जाने की कामना से उल्टा तप कर रहा था.
तुम्ही ने लिखा, तुम्ही ने थोपा
हमने माना, हम अशिक्षित कैसे समझ सकते थे तुम्हारा जाल?
कितनी क्रूर हिंसा की थी तुमने हिरण्यकश्यप के साथ
तुमने क्यों फड़वाया था भूखे शेर से उसका जिस्म?
इसीलिए न कि वो विष्णु-विरोधी, देव-विरोधी था,
मानता था स्वधर्म को.
तुमने लिखा कि वह नरसिंह अवतार था जिसने मारा उसे.
कितना बड़ा खतरा रहा होगा वो तुम्हारे ब्राह्मण-धर्म के लिए
कि अवतार लेना पड़ा था उसे मारने के लिए भगवान को.
तुम्ही ने लिखा, तुम्ही ने थोपा
हमने माना, हम अशिक्षित कैसे समझ सकते थे तुम्हारा जाल?
कितना छल किया था तुमने ब्राह्मण-विरोधी देव-विरोधी महिषासुर के साथ
जब दमन नहीं कर सके उसका तो एक रूपसी को भेजा तुमने उसे मारने के लिए
जिसने उसे आठ दिन तक अपने रूप-जाल में फांसा,
और नौवें दिन उसकी हत्या कर दी.
हमारे सांस्कृतिक पुरौधा की हत्यारी दुर्गा को तुमने महाशक्ति बना दिया
अब मनाते हो हर वर्ष उसकी स्मृति में पूजा का देश व्यापी उत्सव
हमारे जख्मों पर नमक छिड़कने के लिए.
तुम्ही ने लिखा, तुम्ही ने थोपा
हमने माना, हम अशिक्षित कैसे समझ सकते थे तुम्हारा जाल?
अब तक जो भी तुमने चाहा, वही हुआ,
पर भारत में अंग्रेजों के आगमन और लोकतंत्र को आने से तुम नहीं रोक सके,
हम शिक्षित हो गये,
जोतिबा फुले और डा. आंबेडकर जैसे विद्वान का नेतृत्व हमें मिल गया.
हम अब जाग गये हैं, समझ गये हैं तुम्हारा जाल.
कि कैसे तुमने मारा हमारे नायकों को
कैसे हमें बनाया गुलाम?
अब तुम कहते हो कि हम मिथकों की राजनीति कर रहे हैं,
जातिवाद और साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं,
और इस आरोप में तुम गिरफ्तार करा रहे हो हमारे लेखकों को,
जब्त करा रहे हो हमारी पत्रिकाओं को.
हम समझ गये हैं कि तुम लोकतंत्र में भी मौजूद हो
हमें फांसी देने के लिए.
नासमझी में हमारे लोगों ने बड़ी गलती की तुम्हें देश का नेतृत्व सौंप कर,
तुम इस योग्य बिल्कुल नहीं हो.
पूरा देश जानता है कि
तुमने मिथक की राजनीति करके पूरे देश में आग लगा दी है
कोई प्रमाण नहीं मिला अयोध्या में राम के होने का
फिर भी तुमने ध्वस्त कर दी बाबरी मस्जिद,
सड़कों पर लोगों का खून बहा दिया एक मिथक के लिए,
तुम मिथक के लिए राजनीति करो तो लोकतंत्र
हम करें तो जातिवाद
अब यह नहीं चलेगा, बिल्कुल नहीं चलेगा.
–कँवल भारती
(9-10-2014)

फेसबुक से.

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‘फारवर्ड प्रेस’ के आफिस पर छापा और चार मीडियाकर्मियों की गिरफ्तारी भाजपा में शामिल ब्राह्मणवादी ताकतों के इशारे पर हुई!

फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक प्रमोद रंजन ने गुरुवार को जारी प्रेस बयान में कहा कि ”हम फारवर्ड प्रेस के दिल्‍ली कार्यालय में वसंत कुंज थाना, दिल्‍ली पुलिस के स्‍पेशल ब्रांच के अधिकारियों द्वारा की गयी तोड़-फोड़ व हमारे चार कर्मचारियों की अवैध गिरफ्तारी की निंदा करते हैं। फारवर्ड प्रेस का अक्‍टूबर, 2014 अंक ‘बहुजन-श्रमण परंपरा’ विशेषांक के रूप में प्रकाशित है तथा इसमें विभिन्‍न प्रतिष्ठित विश्‍वविद्यलयों के प्राध्‍यापकों व नामचीन लेखकों के शोधपूर्ण लेख प्रकाशित हैं। विशेषांक में ‘महिषासुर और दुर्गा’ की कथा का बहुजन पाठ चित्रों व लेखों के माध्‍यम से प्रस्‍तुत  किया गया है। लेकिन अंक में कोई भी ऐसी सामग्री नहीं है, जिसे भारतीय संविधान के अनुसार आपत्तिजनक ठहराया जा सके।”

प्रमोद रंजन ने प्रेस बयान में आगे कहा कि- ”बहुजन पाठों के पीछे जोतिबा फूले, पेरियार, डॉ आंबेडकर की एक लंबी परंपरा रही है।  हम अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता  पर हुए इस हमले की भर्त्‍सना करते हुए यह भी कहना चाहते हैं कि यह कार्रवाई स्‍पष्‍ट रूप से भाजपा में शामिल  ब्राह्मणवादी ताकतों के इशारे पर हुई है। देश के दलित-पिछड़ों ओर आदिवासियों की पत्रिका के रूप में फारवर्ड प्रेस का अस्तित्व इन ताकतों की आंखों में लंबे समय से गड़ता रहा है। फारवर्ड प्रेस  ने हाल के वर्षों में इन ताकतों की ओर से हुए अनेक हमले झेले हैं। इन हमलों ने हमारे नैतिक बल को और मजबूत किया है। हमें उम्‍मीद है कि इस संकट से मुकाबला करने में हम सक्षम साबित होंगे।”

मूल खबर….

‘फारवर्ड प्रेस’ कार्यालय पर पुलिस का छापा, ‘बहुजन-श्रमण परंपरा विशेषांक’ के अंक जब्‍त

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‘फारवर्ड प्रेस’ कार्यालय पर पुलिस का छापा, ‘बहुजन-श्रमण परंपरा विशेषांक’ के अंक जब्‍त

फारवर्ड प्रेस कार्यालय में आज सुबह पुलिस ने छापा मारा तथा हमारा ‘बहुजन-श्रमण परंपरा विशेषांक’ (अक्‍टूबर, 2014) के अंक जब्‍त करके ले गयी। हमारे ऑफिस के ड्राइवर प्रकाश व मार्केटिंग एक्‍सक्‍यूटिव हाशिम हुसैन को भी अवैध रूप से उठा लिया गया है। मुझे भूमिगत होना पड़ा है। मैं जहा हूं, वहां मेरे होने की आशंका पुलिस को है। इस जगह के सभी गेटों पर गिरफ्तारी के लिए पुलिस तैनात कर दी गयी है। शायाद वे जितेंद्र यादव को भी गिरफ्तार करना चाहते हैं ताकि आज (9 अक्‍टूबर) रात जेएनयू में आयोजित महिषासुर दिवस को रोका जा सके। हमें अभी तक किसी भी प्रकार के एफआइअार की कॉपी भी नहीं मिल पायी है। लेकिन जाहिर है कि यह कार्रवाई ‘महिषासुर’ के संबंध में फारवर्ड प्रेस द्वारा लिये गये स्‍टैंड के कारण कार्रवाई की गयी है।

मैं इस संबंध में अपना पक्ष मैं प्रेमकुमार मणि के शब्‍दों में रखना चाहूंगा। प्रेमकुमार मणि की यह निम्‍नांकित टिप्‍पणी ‘महिषासुर’ नामक पुस्‍तक में संकलित है। इस पुस्‍तक का भी विमोचन आज रात जेएनयू में आयो‍जित ‘महिषासुर दिवस’ पर किया जाना था/ है। इस आपधापी के सिर्फ इतना कहूंगा कि आप इसे पढें और अपना पक्ष चुनें। हमें आपसे नैतिक बल की उम्‍मीद है।

हत्‍याओं का जश्‍न क्‍यो?

प्रेमकुमार मणि

जब असुर एक प्रजाति है तो उसके हार या उसके नायक की हत्या का उत्सव किस सांस्कृतिक मनोवृति का परिचायक है? अगर कोई गुजरात नरसंहार का उत्सव मनाए या सेनारी में दलितों की हत्या का उत्सव, भूमिहारों की हत्या का उत्सव तो कैसा लगेगा? माना कि असुरों के नायक महिषासुर की हत्या दुर्गा ने की और असुर परास्त हो गए तो इसे प्रत्येक वर्ष उत्सव मनाने की क्या जरूरत है। आप इसके माध्यम से अपमानित ही तो कर रहे हैं।

महिषासुर की शहादत दिवस के पीछे किसी के अपमान की मानसिकता नहीं है। इसके बहाने हम चिंतन कर रहे हैं आखिर हम क्यों हारे? इतिहास में तो हमारे नायक की छलपूर्वक हत्या हुई, परंतु हम आज भी छले जा रहे हैं। दरअसल, हम इतिहास से सबक लेकर वर्तमान अपने को उठाना चाहते हैं। महिषासुर शहादत दिवस के पीछे किसी के अपमानित करने का लक्ष्य नहीं हैं।
हमारे सारे प्रतीकों को लुप्त किया जा रहा है। यह तो इन्हीं कि स्रोतों से पता चला है कि एकलव्य अर्जुन से ज्यदा धनुर्धर था। तो अर्जुन के नाम पर ही पुरस्कार क्यों दिए जा रहे हैं एकलव्‍य के नाम पर क्यों नहीं? इतिहास में हमारे नायकों को पीछे कर दिया गया। हमारे प्रतीकों को अपमानित किया जा रहा है। हमारे नायकों के छलपूर्वक अंगूठा और सर काट लेने की प्रथा से हम सवाल करना चाहते हैं। इन नायकों का अपमान हमारा अपमान है। किसी समाज, विचारधारा, राष्‍ट्र का। वह मात्र कपड़े का टुकड़ा नहीं होता।

गंगा को बचाने की बात हो रही है। तो इसका तात्पर्य यह थोड़े ही है कि नर्मदा, गंडक या अन्य नदियों को तबाह किया जाय। अगर गंगा के किनारे जीवन बसता है तो नर्मदा, गंडक आदि नदियों के किनारे भी तो उसी तरह जीवन है। गंगा को स्वच्छ करना है तो इसका तात्पर्य थोडे हुआ कि नर्मदा को गंदा कर देना है। हम तो एक पोखर को भी उतना ही जरूरी मानते हैं जितना कि गंगा। गाय की पूजनीय है तो इसका अर्थ यह थोडे निकला कि भैस को मारो। जितना महत्वपूर्ण गाय है उतनी ही महत्वपूर्ण भैंस भी है। हालांकि भैंस का भारतीय समाज में कुछ ज्यादा ही योगदान है। भौगोलिक कारणों से भैस से ज्यादा परिवारों का जीवन चलता है। अगर गाय की पूजा हो सकती है तो उससे ज्यादा महत्वपूर्ण भैंस की पूजा क्यों नहीं? भैंस को शेर मार रहा है और उसे देखकर उत्सव मना रहे हैं। क्या कोई शेर का दूध पीता है। शेर को तो बाडे में ही रखना होगा। नहीं तो आबादी तबाह होगी। आपका यह कैसा प्रतीक है? प्रतीकों के रूप में क्या कर रहे हैं आप?

यह किस संस्कृतिक की निशानी है। पारिस्थितिकी संतुलन के लिए प्रकृति में उसकी भी जरूरत है परंतु खुले आबादी में उसे खुला छोड दिया तो तबाही मचा देगा।

हम अपने मिथकीय नायकों में माध्यम से अपने पौराणिक इतिहास से जुड़ रहे हैं। हमारे नायकों के अवशेषों को नष्‍ट किया गया है। बुद्ध ने क्या किया था कि उन्हें भारत से भगा दिया। अगर राहुल सांकृत्यायन और डॉ अम्बेडकर उन्हें जीवित करते हैं तो यह अनायास तो नहीं ही है।महिषासुर के बहाने हम और इसके भीतर जा रहे हैं। अगर महिषासुर लोगों के दिलों को छू रहा है तो इसमें जरूर कोई बात तो होगी। यह पिछडे तबकों का नवजागरण है। हम अपने आप को जगा रहे हैं। हम अपने प्रतीकों के साथ उठ खड़ा होना चाहते हैं। दूसरे को तबाह करना हमारा लक्ष्य नहीं हैं। हमारा कोई संकीर्ण दृष्टिकोण नहीं है। यह एक राष्‍ट्रभक्ति और देश भक्ति का काम है। एक महत्वपूर्ण मानवीय काम।

महिषासुर दिवस मनाने से अगर आपकी धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं तो हों। आपकी इस धार्मिक तुष्टि के लिए हम शुद्रों का अछूत, स्त्रियों को सती प्रथा में नहीं झोंकना चाहते। हम आपकी इस तुच्छ धार्मिकता विरोध करेंगे। ब्राम्हण को मारने से दंड और दलित को मारने से मुक्ति यह कहां का धर्म है? यह आपका धर्म हो सकता है हमारा नहीं। हमें तो जिस प्रकार गाय में जीवन दिखाई देता है उसी प्रकार सुअर में भी। हम धर्म को बड़ा रूप देना चाहते हैं। इसे गाय से भैंस तक ले जाना चाहते हैं। हम तो चाहते हैं कि एक मुसहर के सूअर भी न मरे। हम आपसे ज्यादा धार्मिक हैं।

आपका धर्म तो पिछड़ों को अछूत मानने में हैं तो क्या हम आपकी धार्मिक तुष्टि लिए अपने आप को अछूत मानते रहे। संविधान सभा में ज्यादातर जमींदार कह रहे थे कि जमींदारी प्रथा समाप्त हो जाने से हमारी जमींने चली जाएगीं तो हम मारे जाएंगे। तो क्या इसका तात्पर्य कि जमींदारी प्रथा जारी रखाना चाहिए। दरअसल, आपका निहित स्वार्थ हमारे स्वार्थों से टकरा रहा है। वह हमारे नैसर्गिक स्वार्थों को भी लील रहा है। आपका स्वार्थ और हमारा स्वार्थ अलग रहा है, हम इसमें संगति बैठाना चाहते हैं।

दुर्गा का अभिनंदन और हमारे हार का उत्सव आपके सांस्कृतिक सुख के लिए है। लेकिन आपका सांस्कृतिक सुख तो सती प्रथा, वर्ण व्यवस्था, छूआछूत, कर्मकाण्ड आदि में है तो क्या हम आपकी संतुष्टि के लिए अपना शोषण होंने दें। आपकी धार्मिकता में खोट है।

महिष का तात्पर्य भैंस। असुर एक प्रजाति है। असुर से अहुर और फिर अहिर बना होगा। जब सिंधु से हिन्दु बन सकता है तो असुर से अहुर क्यों नहीं। आपका भाषा विज्ञान क्यों यहां चूक जा रहा है। हम तो जानना चाहते है कि हमारा इतिहास हो क्या गया? हम इतने दरिद्र क्यों पड़े हुए हैं।

मौजूदा प्रधानमंत्री गीता को भेट में देते हैं। गीता वर्णव्यवस्था को मान्यता देती है। हमारे पास तो बुद्धचरित और त्रिपिटक भी है। हम सम्यक समाज की बात कर रहे हैं। आप धर्म के नाम पर वर्चस्व और असमानता की राजनीति कर रहे हैं जबकि हमारा यह संघर्ष बराबरी के लिए है।

अगर आप फारवर्ड प्रेस का पुलिस द्वारा उठाया गया अंक पढना चाहते हैं तो इस लिंक पर जाएं-

Bhadas4Media.com/pdf/forwardpress.pdf

प्रमोद रंजन
सलाहकार संपादक
फारवर्ड प्रेस
janvikalp@gmail.com

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