मकान खाली कराने का डंडा इमानदारी से भरा है, इसे रोकने में हम क्यों साथ दें?

-नवेद शिकोह-

मुसीबत में लखनऊ के पत्रकार, फिर भी आपस में तकरार… केंद्र सरकार ने अखबारों पर तलवार चलायी तो हजारों पत्रकारों की नौकरी पर बन आयी। पत्रकारों ने मदद की गुहार लगाई तो स्वतंत्र पत्रकार की प्रेस मान्यता वाले दिग्गज / रिटायर्ड / प्रभावशाली पत्रकारों ने कहा कि हम इमानदारी की तलवार को रोकने की कोशिश क्यों करें? अच्छा है, फर्जी अखबार और उनसे जुड़े फर्जी पत्रकार खत्म हों। इसी बीच यूपी की प्रदेश सरकार ने बड़े पत्रकारों से बड़े-बड़े सरकारी मकान खाली कराने का डंडा चलाया। बड़ों ने एकजुट होकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए छोटों का समर्थन जुटाने का प्रयास किया। छोटों को बदला लेने का मौका मिल गया।  बोले- मकान खाली करने का डंडा इमानदारी का डंडा है। इसे रोकने में हम क्यों साथ दें। अच्छा है- करोड़ों के निजी मकानों के मालिकों को सरकारी मकानों से बाहर करना ईमानदारी का फैसला है।

किसी न किसी तरीके से सरकारों से परेशान लखनवी पत्रकार मुसीबतों के इस दौर में भी आपस मे ही उलझे हैं। और पत्रकारों की एकता की कोशिश तेल लेने चली गयी है। लखनऊ के तुर्रमखां पत्रकारों से न सिर्फ सरकारी मकान छिनेंगे बल्कि ये जेल की हवा भी खा सकते हैं। बरसों से वीवीआईपी कालोनियों में रह रहे ये दिग्गज पत्रकार अब उस नियमावली की गिरफ्तार में आ गये हैं जिसके तहत जिनके निजि मकान या भूखंड है उन्हें सरकारी मकान में रहने का हक नही है। निजी मकान होने के कारण ये राज्य सम्पत्ति विभाग द्वारा मांगे गये निजी मकान न होने का हलफनामा नहीं दे रहे हैँ। इसलिए इनके सरकारी मकानों को दूसरों (गैर पत्रकारों) के नाम आवंटित करने का सिलसिला शुरू होने वाला है। जिन्होंने निजी मकान होने के बाद भी मकान न होने का झूठा हलफनामा दे दिया है उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरु होगी। इन सबसे कई वर्षों का कामर्शियल किराया भी लिया जा सकता है।

इन खतरों के बावजूद भी करोड़ों की सम्पत्ति वाले कुछ पत्रकार सरकारी मकान छोड़ने को तैयार नहीं हैं। ये लोग सरकार के इस रुख से लड़ने के लिए एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन वो 95%पत्रकार जिन्हें कभी सरकारी मकान का लाभ नहीं मिला वो इनके साथ आना तो दूर सरकार के इस फैसले का मूक समर्थन कर रहे हैं।  इस माहौल में पत्रकारों के दो गुटों में तकरार बढ़ती जा रही है। आम पत्रकारों के बड़े गुट का कहना है कि अखबारों को खत्म करने की नीतियों के खिलाफ ये दिग्गज पत्रकार कभी हमारे दुख-दर्द में साथ नहीं आये।

बीस-तीस लीडिंग ब्रान्डेड मीडिया घरानों से जुड़े पत्रकारों को छोड़कर देश के 95/ पत्रकारों की रोजी-रोटी दांव पर है। लेकिन लखनऊ के पत्रकारों की हालत कुछ ज्यादा ही पतली हो गई है। यहाँ फाइल कापी अखबारों के पत्रकारों की सबसे अधिक तकरीबन तीन सौ राज्य मुख्यालय की मान्यतायें हैं। लखनऊ सहित यूपी के सौ-सवा सौ मंझौले अखबारों से लगभग दो सौ पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता है। इसके अतिरिक्त बड़े अखबारों और छोटे-बड़े न्यूज चैनलों/एजेंसियों से तीन सौ से अधिक पत्रकार/कैमरा पर्सन मान्यता प्राप्त हैं। बाकी रिटायर्ड पत्रकार बतौर स्वतंत्र पत्रकार /वरिष्ठ पत्रकार मान्यता का लाभ ले रहे हैं।

डीएवीपी की सख्त नीतियों ने अभी हाल ही में देश के 90%अखबारों(फाइल कापी और मंझोले) को कहीं का नहीं छोड़ा। प्रसार की जांच में ज्यादातर नप गये।  अखबारों को मजबूरी में एनुअल रिटर्न में 70%तक प्रसार कम दिखाना पड़ा। इस दौरान इन मुसीबत के मारों पर मुसीबत का सबसे बड़ा पहाड़ ये टूटा कि न्यूज प्रिंट पर भी GST लागू हो गया। इन सबका सीधा असर देश भर के 80% पत्रकारों के रोजगार पर पड़ा। लखनऊ के छोटे/कम संसाधन वाले संघर्षशील/फाइल कापी वाले/मझोले यानी सैकेंड लाइन के अखबारों के पत्रकार बिलबिला रहे थे। वो चाहते थे कि बड़े/वरिष्ठ /प्रभावशाली पत्रकार/पत्रकार नेता/पत्रकार संगठन डीएवीपी की नीतियों और न्यूज प्रिंट पर GST का विरोध करें। लेकिन कोई बड़ा विरोध के लिए सामने नहीं आया। क्योंकि इनकी प्रेस मान्यता स्वतंत्र पत्रकार की है इसलिए ये अपने को महफूज मान रहे थे।

लखनऊ में ऐसे रिटायर्ड और प्रभावशाली पत्रकारों की बड़ी जमात है जो सरकारों के बेहद करीब रहते है। इनमें से ज्यादातर पत्रकार संगठन चलाकर सरकारों से अपना उल्लू सीधा करते है। इन पत्रकारों को इस बात की भी कुंठा थी कि पिछली सरकार ने थोक के हिसाब से नये लोगों को राज्य मुख्यालय की मान्यता क्यों दे दी। इन कथित मठाधीशों का ये भी आरोप है कि जिनका पत्रकारिता की दुनिया से दूर-दूर तक कोई भी लेना देना नहीं था ऐसे सैकड़ों लोगों ने फाइल कापी के अखबारों का रैकेट शुरु किया। फर्जी कागजों के झूठे दावों और घूस के दम पर फाइल कापी के अखबारों का प्रसार 25 से 65 हजार तक Davp से एप्रूव करा लिया। इन अखबारों से सीधे फर्जी तौर पर राज्य मुख्यालय की मान्यता करायी और लाखों-करोड़ों रुपये के सरकारी विज्ञापन का अनैतिक लाभ लिया।

अपनी इस थिंकिंग के होते ही ये डीएवीपी की सख्त पालिसी और न्यूज प्रिंट पर GST की मुखालफत में आगे आना तो दूर बल्कि मूक समर्थन करते दिखे। अब सरकारी मकानों को खाली करने और जांच के घेरे में आ गये तो अलग-थलग पड़ गये हैं। पत्रकारों की मैजौरिटी इनका साथ देने को तैयार नहीं है। चौतरफा मुसीबतों की इस घड़ी में जिसको साथ होना चाहिए था वो बेचारी पत्रकारों के अधिकारों के जनाजों पर चराग जलाने के लिए तेल लेने गयी है। हालांकि इस बेचारी एकता (पत्रकारों की एकता) को बुलाने की कोशिश भी जारी है। 

लेखक नवेद शिकोह लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9918223245 या Navedshikoh@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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जो खाने पर टूटें, उन्हें पत्रकार ना माना जाये!

तुम्हें पत्रकारिता की कसम! पत्रकार संगठनो!!! ऐलान करो..आह्वान करो.. अपील करो.. अहद करो :- कवरेज के दौरान पत्रकार फ्री के पत्तल नही चाटें… जो खाने पर टूटें, उन्हे पत्रकार ना माना जाये। पठनीय सामग्री जरूर लें। गिफ्ट, बैग, फाइल, फोल्डर या कोई भी डग्गा ना लें। डग्गा बटोरने और खाने-पीने वाले कथित पत्रकारो को चिन्हित करो। इनका बहिष्कार करो। इन्हे फर्जी साबित करो। इससे लालची/फर्जी/डग्गामार कथित पत्रकारो की भीड़ भी छट जायेगी। कार्यक्रमों, प्रेस मीट, प्रेस वार्ताओ के सरकारो गैर सरकारी आयोजको को पत्र लिखें। जो खाने-पीने या गिफ्ट का इन्तजाम करेगा, सम्पूर्ण मीडिया कर्मी उसका बहिष्कार करेंगे।

पत्रकार संगठनों, वरिष्ठ पत्रकारों, जिम्मेदार और सक्रिय पत्रकारों, विधानसभा सत्र के दौरान तुम्हारी बिरादरी के लोगो के हाथो से खाने की प्लेट छीन ली गयीं। इससे ज्यादा अपमान क्या होगा! गलती सरकारी तंत्र की ही नहीं आपकी बिरादरी के बेगैरत लोगों की भी है। प्रायश्चित करने का एक ही तरीका है। विभिन्न पत्रकार संगठनो ऐलान करो- विधानसभा मे प्लेट छीनने की घटना के बाद कोई भी पत्रकार कवरेज के दौरान कुछ-खायेगा नही। किसी प्रेस कांफ्रेंस या कही भी कवरेज के लिये आये पत्रकार ना सूक्ष्म जलपान ना विशाल जलपान, ना रात्रिभोज ना दोपहर भोज, कुछ भी नहीं करेंगे।

कोई गिफ्ट, फाइल, बैग, किसी किस्म के डग्गे या खाने-पीने की परम्परा खत्म हो। इसे असंवैधानिक माना जाये। इसे पत्रकारिता के उसूल के खिलाफ माना जाये। इसे रिश्वत माना जाये। पत्रकार संगठोनो यदि तुम ये अहद नही करोगे। ये अपील और आह्वान नही करोगे, तो तुम्हे पत्रकारिता और पत्रकारों के इस अशोभनीय अपराध का जिम्मेदार माना जायेगा। गिफ्ट और खाने-पीने को लेकर पत्रकारिता की धूमिल होती छवि का गुनाहगार माना जायेगा। ये तुम्हाया फर्ज भी है और जिम्मेदारी भी।

नवेद शिकोह
लखनऊ
Navedshikoh84@rediffmail.com
9918223245

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हाथों से प्लेट छीने जाने के बाद संगठित हो गए लखनऊ के पत्रकार

अखबार, चैनल, पत्रकार, पत्रकार संगठन, रोजी-रोटी, सुरक्षा और सम्मान जब कुछ भी सुरक्षित नहीं दिखा तो खामोशी टूटी। पत्रकार संगठनो की गुटबाजी पर विराम लगा। पत्रकार संगठित दिखे और भक्तगीरी की भावना भी हवा होती दिखाई दी। क्या छोटे क्या बड़े। क्या ब्रान्ड और क्या लोकल अखबार और पत्रकार। सरकारों के दमनकारी रवैये के लपेटे में हर कोई आ चुका है। देश के आधे से ज्यादा अखबारों की मान्यता खत्म कर दी गयी। हजारों श्रमजीवी पत्रकारों को दरकिनार कर पचास पत्रकारों की सूची अन्य पत्रकारों को अपमानित कर रही है। सरकारी मकान छिनने का अंदेशा साफ नजर आ रहा है।

आपातकाल जैसे इस माहौल ने आज पत्रकारों को एकजुट होने पर मजबूर कर दिया। पत्रकारों के संगठनों की गुटबाजी पर विराम लगा। अपनी शिकायतें दर्ज कराने के लिये आज जब सौ-ढेड़ सौ पत्रकार एकत्र हुए तो सरकार के सख्त तेवर पिघलते हुए दिखाई दिये। आला अधिकारियो ने पत्रकारों की मुश्किलों का एहसास किया और समस्याओं के समाधान का आश्वासन दिया। बीते दिनों 4पीएम अखबार पर हमला हुआ। उधर विधानसभा के बजट सत्र में पत्रकारों को अपमानित किया गया। फिर तो पत्रकारों का सब्र का बाँध टूटा। भक्त पत्रकार भी विरोध पर उतर आये। विभिन्न गुटों और संगठनो के पत्रकारो ने मिल कर पत्रकार एकता का नारा बुलंद कर दिया।

विधानसभा सत्र में पटल पर मिलने वाले बजट साहित्य का वितरण भी सुचारू रूप से नहीं किया गया। कवरेज पर आये पत्रकारो में से दस प्रतिशत पत्रकारो को ही बजट साहित्य दिया गया। लंच के समय पत्रकारों को कैन्टीन में नहीं घुसने दिया गया। विधानसभा में तैनात मार्शल पत्रकारों से बद्तमीजी पर उतर आये। कई पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की की गयी। प्यास से तड़प रहे पत्रकारों के हाथों से पानी की बोतल छीन ली गयी।

सत्र की कवरेज के लिये पत्रकारो को सदन में चार-पांच घंटे मौजूद रहना पड़ता है। इस दौरान ही लंच का समय भी होता है। ये पुरानी परम्परा है कि आम तौर से बजट सत्र मे सदन के सदस्यों के अतिरिक्त कवरेज करने आये पत्रकारो के खाने का भी इन्तजाम होता रहा है। फिर भी कई पत्रकार सरकार का मौजूदा रुख देखकर अपने साथ लंच बाक्स लाये थे, किन्तु संदिग्ध पाउडर की घटना के बाद सख्त सुरक्षा के कारण पत्रकार अपना लंच बाक्स साथ नहीं ले जा सके। इसलिये लंच के समय कई पत्रकार कैन्टीन में भोजन करने गये। जहां गेट पर ही उन्हें रोक लिया गया। पत्रकारों ने कहा कि वे कैन्टीन से खरीद कर भोजन करेंगे, ना कि वो सरकारी धन से विधायको और पत्रकारों के लिये किये गये भोजन मे हाथ लगायेगे। इसके बावजूद भी पत्रकारों को रोकने के लिये कैन्टीन पर पहरे बैठा दिये गये। कुछ पत्रकार किसी तरह कैन्टीन में दाखिल हो गये। इन पत्रकारों के हाथ से प्लेट छीन ली गयी। बस यहीं पर सब्र का बाँध टूट गया। कवरेज का बहिष्कार कर दिया गया। क्योंकि भूखे पेट भजन ना होये गोपाला…

नवेद शिकोह
लखनऊ
9918223245
Navedshikoh84@rediffmail.com

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मायावती से तीखा सवाल पूछने वाली उस लड़की का पत्रकारीय करियर शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया!

Zaigham Murtaza : अप्रैल 2002 की बात है। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था। मायावती की सत्ता में वापसी की आहट के बीच माल एवेन्यु में एक प्रेस वार्ता हुई। जोश से लबरेज़ मैदान में नई-नई पत्रकार बनी एक लड़की ने टिकट के बदले पैसे पर सवाल दाग़ दिया। ठीक से याद नहीं लेकिन वो शायद लार क़स्बे की थी और ख़ुद को किसी विजय ज्वाला साप्ताहिक का प्रतिनिधि बता रही थी। सवाल से रंग में भंग पड़ गया। वहां मौजूद क़रीब ढाई सौ कथित पत्रकार सन्न। Continue reading

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यूपी के मुख्यमंत्री निवास पर संवाददाता सम्मेलन की यह तस्वीर हो रही वायरल

Dilip Mandal : यह बीजेपी कार्यकर्ताओं का सम्मेलन नहीं है. यूपी के मुख्यमंत्री निवास पर हुए संवाददाता सम्मेलन की ताजा तस्वीर है. ये सब निष्पक्ष पत्रकार हैं. इनका बताया हुआ जानकर हम अपने विचार बनाते हैं. आपके प्रिय चैनल का रिपोर्टर भी यहीं है. भारतीय मीडिया एक पोंगापंथी सवर्ण पुरुष है. यूपी के मुख्यमंत्री निवास पर संवाददाता सम्मेलन की वायरल हो रही तस्वीर. पहचानिए अपने प्रिय चैनल और अखबार के पत्रकार को. वह यहीं कहीं है. गौर से देखिए. यूपी के सीएम निवास पर संवाददाता सम्मेलन की तस्वीर.

Ambrish Kumar : यह फोटो दो दिन पहले मानसरोवर यात्रा और सिंधु दर्शन के यात्रियों को सरकार की तरफ से चेक बांटने के कार्यक्रम की है. इसमें भगवा गमछा बांटा गया था. बांटना तो मानसरोवर वाली समिति की तरफ से था पर सूचना विभाग के लोग भी बांट रहे थे. अपने परिचित पत्रकार भी गमछा ले आए हैं और इसकी पुष्टि भी की. हालांकि इस कार्यक्रम में बहुत से वरिष्ठ पत्रकार पहुंच नहीं पाए. विभाग की तरफ से समय पर सूचना न मिलने की वजह से वर्ना ज्यादातर को इस गर्मी में एक अदद गमछा तो मिलता ही. खैर अगली बार.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल और अंबरीश कुमार की एफबी वॉल से.

मूल खबर…

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लखनऊ में थोक के भाव पत्रकार किए गए सम्मानित, देखें लिस्ट

लखनऊ में नेशनल मीडिया क्लब द्वारा आयोजित स्वच्छता अवार्ड व पत्रकार सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुख्य अथिति के रूप में शिरकत की. इस मौके पर मुख्यमंत्री ने स्वच्छता के लिए उत्तर प्रदेश का पहला टोल फ्री नंबर जारी किया. आयोजन में नेशनल मीडिया क्लब ने पत्रकारिता दिवस के अवसर पर 60 वर्ष पूरे कर चुके वरिष्ठ पत्रकारों को सम्मानित किया।

थोक के भाव में सम्मानित किए गए ढेरों पत्रकारों के नाम इस प्रकार हैं- 

1. राजनाथ सिंह सूर्य (लखनऊ)

2. विभांशु दिव्याल (लखनऊ)

3. कमलेश त्रिपाठी (दिल्ली)

4. डॉ. दिलीप चौबे (दिल्ली)

5. डॉ. रामनरेश त्रिपाठी (इलाहाबाद)

6. रमाशंकर श्रीवास्तव (इलाहाबाद)

7. एस पी सिंह (इलाहाबाद)

8. रामदत्त त्रिपाठी (लखनऊ)

9. हुसैन अफसर (लखनऊ)

10. प्रमोद तिवारी (कानपुर)

11. शिवशंकर गोस्वामी (लखनऊ)

12. भोलानाथ कुशवाहा (मिर्जापुर)

13. उमाशंकर त्रिपाठी (लखनऊ)

14. राजेंद्र द्विवेदी (आज वाले)

15. बदरी विशाल (वाराणसी)

16. नवनीत मिश्र (लखनऊ)

17. दिनेश श्रीवास्तव (लखनऊ)

18. रामकृपाल (दिल्ली)

19. मार्तंड पुरी (दिल्ली)

20. सत्यमोहन पांडेय (फर्रूखाबाद)

21. दिलीप शुक्ला (लखनऊ)

22. अनिल शुक्ला (आगरा)

23. वीरेंद्र सेंगर (दिल्ली)

24. अशर्फीलाल (बरेली)

25. सीपी गोयल (मैनपुरी)

26. श्याम कुमार

27. विजय पंकज

28. रवींद्र सिंह

29. खान साहेब

30. अशोक शुक्ला

31. के बक्स

32. सदगुरुशरण

33. सुनील दुबे

34. प्रमोद गोस्वामी पीटीआई

35. सुरेंद्र द्विवेदी एएनआई

37. यदुनंदन लाल गोस्वामी

38. दिनेश श्रीवास्तव, नोएडा

इस मौके पर विधानसभा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित, उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा, लालजी टंडन,  सुनील भराला, सुरेश राणा, कृष्णा राज, महेंद्र सिंह, हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव, क्रिकेटर आर. पी. सिंह, संगठन मंत्री सुनील बंसल प्रमुख सचिव सूचना अवनीश अवस्थी समेत 2 दर्जन से ज्यादा विधायक और कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे. मुख्यमंत्री ने स्वच्छता अभियान के ब्रांड एंबेसडर हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव को सम्मानित भी किया.

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लखनऊ की दलाल, शरणागत और चरणपादुका संस्कृति की पत्रकारिता का एक ताजा अनुभव

विष्णु गुप्त

क्या लखनऊ की पत्रकारिता अखिलेश सरकार की रखैल है? लखनऊ की पत्रकारिता पर अखिलेश सरकार का डर क्यों बना हुआ रहता है? अखिलेश सरकार के खिलाफ लखानउ की पत्रकारिता कुछ विशेष लिखने से क्यों डरती है, सहमती है? अखिलेश सरकार की कडी आलोचना वाली प्रेस विज्ञप्ति तक छापने से लखनऊ के अखबार इनकार  क्यों कर देते हैं? अब यहां प्रष्न उठता है कि लखनऊ के अखबार अखिलेश सरकार के खिलाफ लिखने से डरते क्यों हैं? क्या सिर्फ रिश्वतखोरी का ही प्रश्न है, या फिर खिलाफ लिखने पर अखिलेश सरकार द्वारा प्रताडित होने का भी डर है?

सही तो यह है कि अखिलेश सरकार के खिलाफ लिखने पर लखनऊ की पत्रकारिता को प्रताड़ित होने का भी डर है और रिश्वतखोरी से हाथ धोने का भी डर है। अखिलेश सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में पत्रकारों को अपने पक्ष में करने के लिए दोनों तरह के हथकंडे अपना रखे है। एक हथकंडा पत्रकारों और अखबार मालिकों को रिश्वतखोरी कराने और दूसरे हथकंडे में खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों का उत्पीड़न करना।

अखिलेश सरकार के इस दोनों हथकंडों की परिधि में लखनऊ की पत्रकारिता पूरी तरह चपेट में हैं। ईमानदार और स्वतंत्र पत्रकारों की हत्या हुई, उत्पीड़न हुआ पर लखनऊ में अखिलेश सत्ता के खिलाफ पत्रकारों की कोई सशक्त आवाज नहीं उठी। यूपी के पत्रकारों की हत्या और उत्पीडन की आवाज दिल्ली तक तो पहुंची और दिल्ली में अखिलेश सरकार के खिलाफ पत्रकारों की आवाज भी उठी थी पर लखनऊ में सषक्त आवाज नहीं उठी। पत्रकारिता हमेशा सत्ता को आईना दिखाने के लिए जानी जाती है और यह धारणा विकसित है कि स्वच्छ और निडर पत्रकारिता ही अराजक, भ्रष्ट और निकम्मी सत्ता की कुंभकर्णी नींद से जगाती है और जन चेतना का संचार कर ऐसी सत्ता को जनाक्रोश का सामना कराती है। पर पत्रकारिता के इस धर्म का कहीं कोई वीरता है नहीं। पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए यह चितांजनक स्थिति है, जिस पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।

अभी-अभी हमने लखनऊ की पत्रकारिता पर अखिलेश सरकार का डर देखा है, अखिलेश सरकार की शरणागत पत्रकारिता को देखा है। कैसे एक मामूली प्रेस विज्ञप्ति और कार्यक्रम का अखबार या चैनल संज्ञान लेने से इनकार कर देते हैं कि वह प्रेस विज्ञप्ति और कार्यक्रम अखिलेश सरकार के खिलाफ था। प्रसंग मेरी पुस्तक से जुड़ा हुआ है। सर्वविदित है कि अखिलेश के गुंडा राज पर एक मेरी पुस्तक आयी है, पुस्तक का नाम है, ‘अखिलेश की गुंडा समाजवादी सरकार’। लोकशक्ति अभियान द्वारा लखनऊ में मेरी पुस्तक पर एक परिचर्चा कार्यक्रम रखा गया था। परिचर्चा कार्यक्रम में कई हस्तियां शामिल थीं, कई पत्रकार भी शामिल थे। परिचर्चा कार्यक्रम में लोगों ने पुस्तक पर खट्टी-मिटठी चर्चा की। हमने यह सोचा था कि परिचर्चा कार्यक्रम को एक समाचार दृष्टि से जरूर जगह मिलेगी। जिन अखबारों के प्रतिनिधि नहीं पहुंचे थे उन अखबारों को परिचर्चा कार्यक्रम की प्रेस विज्ञप्ति कार्यक्रम के आयोजक लोकशक्ति अभियान द्वारा भेज दी गयी थी। पर परिचर्चा कार्यक्रम की खबर कहीं भी नहीं छपी।   

मैं एक कॉलमनिष्ट हूं। लखनऊ के कई अखबारों में मेरा कॉलम भी छपता है। इसलिए मैने कई संपादकों को कॉल कर पूछ लिया कि भाई परिचर्चा कार्यक्रम की खबर क्यों नहीं छापी? यह तो साधारण और सूचनात्मक खबर थी। पहले तो आनाकानी हुई फिर संपादकों का कहना था कि अखिलेश सरकार से कौन बैर लेगा, अखिलेश के गुंडों से कौन लडाई मोल लेगा, आप तो दिल्ली वाले हैं, लखनऊ से सीधे दिल्ली पहुंच जायेंगे, आपको डर नहीं है पर हमे तो लखनऊ में रहना है, अगर अखिलेश सरकार की वापसी हो गयी तो फिर अगले पांच साल तक हमारा अखबार निशाने पर रहेगा। संपादकों की यह चिंता और डर के पीछे एक नहीं कई अन्य रहस्य भी है जिन्हें बेपर्दा करना जरूरी है।

अब यहां प्रश्न उठता है कि अखबारों और संपादकों के डर के पीछे अन्य रहस्य क्या है? संपादकों ने पूरा सच नहीं बताया। यह सही है कि राज्य सत्ता के खिलाफ लिखने और अभियानरत रहने से उत्पीड़न का खतरा रहता है। पर पत्रकारिता तो खतरों से खेलने का नाम है, पत्रकारिता तो जान पर खेलकर खबरें निकालने और सभी को सच का आईना दिखाने का नाम है? राज्य सत्ता से डरने वाले, गुंडों से डरने वाले, समाजविरोधी से डरने वाले, भ्रष्ट अधिकारियों से डरने वाले और ऐेसे लोगों के सामने शरणागत होने वाले लोग पत्रकार हो ही नहीं सकते हैं, ऐसे लोग चरणपादुका संस्कृति के होते हैं, दलाल किस्म के होते हैं, इनके लिए पत्रकारिता सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ की पूर्ति के लिए एक सशक्त माध्यम भर होती है, पत्रकारिता को सरकार, गुंडों, असामाजिक तत्वों और भ्रष्ट अधिकारियों का चरणपादुका बना कर अपनी झोली भरते हैं। दुर्भाग्य यह है कि आज पत्रकारिता में लोग एक मिशन के तहत नहीं आते हैं, वीरता दिखाने के लिए नहीं आते हैं, परिवर्तन के लिए नहीं आते हैं, क्रांति के लिए नहीं आते हैं। सिर्फ और सिर्फ पेट पालने और नौकरी करने आते हैं। फिर अन्य लोगों और पत्रकारों में अंतर क्या रह जायेगा? पत्रकार फिर अपने को विशेष क्यों और कैसे कह पायेंगे।

जब हमने जानने की यह कोशिश की आखिर असली रहस्य क्या है तो पता चला कि यह रहस्य रिश्वतखोरी का है। लखनऊ में पत्रकारों को रिश्वतखोरी कराने की एक बडी विषैली संस्कृति बन चुकी है। रिश्वतखोरी कराने के लिए प्रतिस्पर्द्धा होता रहा है। प्राय: सभी सरकारो में यह संस्कृति रही है। पर अखिलेश की सरकार मे यह संस्कृति और भी विषैली बन गयी है। लखनऊ ही नहीं बल्कि नोएडा, गाजियाबाद और कानपुर और वाराणसी जैसे शहरों में सैकडों पत्रकारों को अखिलेश सरकार ने आवास की सुविधा दी है। सरकारी नियम के अनुसार जिसका जिस शहर में अपना आवास होता है उस शहर मेें ऐसे पत्रकार को सरकारी आवास नहीं मिल सकता है। पर दर्जनों-दर्जनों ऐसे पत्रकार हैं जिनका खुद का मकान है पर सरकारी मकान भी आंवटित करा रखे हैं। कई ऐसे पत्रकार भी हैं जिन्होने वर्षों पहले पत्रकारिता छोड रखी है, जिनका अब पत्रकारिता से दूर-दूर तक रिश्ता नहीं है फिर पत्रकार कोटे से सरकारी आवास की सुविधा भोग रहे हैं। कई ऐसे लोग भी है जिनकी जिंदगी कब्र में लटकी हुई है फिर भी पत्रकार के नाम पर सरकारी मकान की सुविधा से अपनी दो पीढियों को लाभार्थी करा रहे हैं। ऐसे लोग अखिलेश सरकार से डर कर पत्रकारिता का गला तो घोटेंगे ही, यह तय है।

सरकारी विज्ञापन एक बड़ा कारण है। छोटा-बड़ा सभी अखबार और चैनल आज सरकारी विज्ञापन पर निर्भर हैं। सरकारी विज्ञापन के लिए अखबार और चैनल फर्जी सर्कुलेशन दिखाते हैं। लखनऊ में कई ऐसे अखबार हैं जिनका सर्कुलेशन लाख-लाख तक है पर ऐसे अखबारों का कार्यालय भी ढंग का नहीं है, नियमित कर्मचारी तक नहीं है, पत्रकार के नाम पर ऑपरेटर रख कर अखबार निकाल लिया जाता है। बडे़ अखबार भी कोई दूध के धोये हुए नहीं है। बडे़ अखबारों के कई धंधे होते हैं, बडे अखबारों के मालिक पैरवी और दलाली का कार्य करते हैं। बडे़ अखबारों के वैध और अवैध धंघे तभी तक चलते रहेंगे और इनकी पैरबी और दलाली तभी तक चलती रहेगी जबतक इनकी सत्ता के साथ मधुर संबंध रहेंगे। विज्ञापन भी तभी तक मिलते रहेंगे जबतक इनकी सत्ता के साथ मधुर संबंध रहेंगे। अगर अखबार और चैनल सत्ता के साथ मधुर संबंध नहीं रखेगे तो फिर सत्ता इनकी फर्जी सर्कुलेशन की पोल देगी और सरकारी विज्ञापन बंद कर दिया जायेगा। सरकारी विज्ञापन बंद होने से छोटे अखबार बंद हो जायेगे और बडे अखबारों का भी बुरा हाल हो जायेगा।

जिन लोगों ने अखिलेश सरकार के खिलाफ जाकर लिखने का साहस दिखाया है उन सभी पत्रकारों को अखिलेश सरकार का कोपभाजन बनना पडा है। एक पत्रकार है जिनका नाम अपूप गुप्ता है, वे एक पत्रिका निकालते है, जिनका नाम दृष्टांत है। दृष्टांत नामक पत्रिका पिछले 15 सालों से सत्ता के खिलाफ बुलंदी के साथ लड रही है। अनूप गुप्ता और उनकी पत्रिका दृष्टांत की खासियत यह है कि अखिलेश सरकार के खिलाफ आग उगलती रही है, अखिलेश सरकार के कुनबेवाद, गुंडावाद, भ्रष्टचारवाद के खिलाफ लिखते रहे हैं, एक पर एक भ्रष्टाचार, गुडागर्दी की कहानियां खोलते रहे हैं। पर इसकी कीमत अनूप गुप्ता को चुकानी पडी है।

पहले तो अखिलेश सरकार और उनकी भ्रष्ट नौकरषाही का बदबूदार चेहरों ने अनूप गुप्ता पर लालच का हथकंडा अपनाया। जब लालच के हथकंडे में अनूप गुप्ता नहीं फंसे तो फिर उन पर तरह तरह के जुल्म ढाये गये, उत्पीडन की कोई कसर नहीं छोडी गयी। अनूप गुप्ता की पत्रिका का निबंधन रद करा दिया गया, अनूप गुप्ता की हत्या तक कराने की कोषिष हुई। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि रातोरात अनूप गुप्ता का आंवटित आवास का आंवटन रद कर दिया गया। अनूप गुप्ता का आवास से सारा सामान सडक पर फेक दिया गया। अगर अनूप गुप्ता भी अखिलेश सरकार की चाटुकारिता पंसद कर ली होती तो फिर न तो उनसे आवास छीना जाता और न ही उनका उत्पीडन होता। अखिलेश की सत्ता में एक पत्रकार को कैसे जला कर मार डाला गया था, यह भी उल्लेखनीय है।

लखनऊ की दलाल, शरणागत और चरणपादुका संस्कृति की पत्रकारिता की जगह ईमानदार, निष्पक्ष और निडर पत्रकारिता की स्थापना की उम्मीद भी तो नहीं बनती है।

लेखक विष्णु गुप्त वरिष्ठ पत्रकार हैं और इनकी कई पुस्तकें आ चुकी हैं। लेखक से मोबाइल नंबर 09968997060 या मेल आईडी guptvishnu@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है।

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