इकलौती बेटी को पत्रकारिता के दलदल में झोंक कर मैं काफी दुखी हूं

हर पिता से विनती करता हूं कि अपनी बेटी को पत्रकार न बनने दें…

मान्यवर महोदय,

ज्ञात हुआ कि आपके मंच पर पत्रकारिता से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा होती है, इसीके चलते यह पत्र लिख रहा हूं. मेरी आत्मजा मुंबई में करीब साढ़े छह साल काम करने के बाद हाल ही में दिल्ली शिफ्ट हुई. वह टाइम्स ऑफ इंडिया के अखबार नवभारत टाइम्स में काम कर रही है. सोमवार को जब वह अपने दफ्तर में अपने काम में तल्लीनता से लगी हुई थी. तभी, सोनी सर नामक एक व्यक्ति ने उसके सर पर मुक्का मारा.

मुक्का इतना जोर का था कि मेरी लड़की वहीं बिलबिला उठी. जब उसने विरोध किया तो उसे कहा गया कि यह उक्त व्यक्ति का स्नेह जताने का तरीका है. एक 26 साल की लड़की से प्यार जताने की किसी 46 साल के व्यक्ति को क्या आवश्यकता.

बात यहीं खत्म नहीं हुई. जब प्रार्थी की पुत्री ने अपनी बॉस नम्रता मेडम को इस बारे में बताया तो वह कहने लगी कि कौनसा तुम्हारा मोलेस्टेशन हो गया है जो रो रही हो. महोदय क्या पत्रकारिता में लड़कियों को पलख पांवड़े बिछा कर मोलेस्ट होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए?

पुत्री इस वक्त 100.8 बुखार से जूझ रही है. मैं, मेरी धर्मपत्नी, मेरी तीनों बहने, उनके पति, मेरी पत्नी की बहनें और उनके पति सभी काम काजी हैं, क्या हम यह नहीं जानते कि कार्यस्थलों पर इस तरह का व्यवहार नहीं होना चाहिए?

ज्ञातव्य हो कि वह पहला मौक़ा नहीं है जब प्रार्थी की पुत्री के साथ दुर्व्यवहार किया गया हो. करीब तीन महीने पहले जब उसे पीठ का दर्द हुआ तो डॉक्टर के कहने के बावजूद वरिष्ठों के अहम के चलते उसे ‘कुशन’ का प्रयोग तक नहीं करने दिया गया अपितु ‘कुशन’ ले जाने के लिए उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया.

इसके अलावा भी कई किस्से हैं. कुछ महीनों पहले रविवार को अवकाश होने के उपरांत भी मेरी लड़की को रात साढ़े आठ बजे दो खबरे बनाने के लिए उसके इमिजिएट बॉस ने फोन किया, पुत्री ने बताया कि उसे 101 बुखार है, तब भी यह कह कर कि बुधवार को आने वाले मंगलवार एडिशन के लिए चाहिए उससे काम करवाया गया. काम करने में संकोच नहीं है महोदय पर यह खबरे उस बुधवार नहीं बल्कि उसके भी अगले बुधवार को छप कर आई.

अनेकों बार यह कह कर कि तुम तो अकेले रहती हो. पति बच्चें तो है नहीं, उसे बहुत ज्यादा काम दिया गया. जब उसने प्रतिकार किया तो उसे कामचोर या काम न करने की अभ्यस्त कहा गया जिसके चलते उसने चुपचाप सुनना शुरू किया. क्या अपनी पर्सनल लाइफ कुछ नहीं.

उसे बालीवुड का पूरा एक पेज बनाना होता है जिसके लिए मुंबई से छपने वाले एक अखबार से ही सब न्यूज का अनुवाद करके लिया जाता है, यह पूरा अनुवाद उसके जिम्मे रहा. इसके बाद भी यह कह कर कि तुम्हारा अनुवाद सटीक नहीं है, अभ्यास करो और अभ्यास के नाम पर उसे इसी अखबार की बालीवुड से इतर न्यूज का भी अनुवाद करने को दिया जाता जो फेमिना आदि में छप सके. परिस्थिति यह रही कि यदि उन न्यूज का अनुवाद करके दे दिया जाता तो और न्यूज दे दी जाती.

महोदय एक व्यक्ति से रोजाना 5000 शब्द करवाएंगे तो उसकी गुणवत्ता तो प्रभावित होगी ही. गुणवत्ता प्रभावित होने पर फिर प्रताड़ना. साथ ही ऑफिस में थक जाने और घर लाकर वह काम करके देने के बाद यह सूचित करने की मुझे घर पर भी काम करना पड़ रहा है यह कहा जाता, ‘मत करो घर, यहीं बैठे रहो.’

यह तर्क देकर कि वह घर पर क्या करेगी, उसे सुबह आठ बजे ओफिस बुलाया जाता जबकि बाकी सारे लोग साढ़े नौ से दस के बीच आते. इसके उपरांत भी यह लोग तीन बजे चले जाते और प्रार्थी की पुत्री को साढ़े चार -पांच से पहले निकलने का अवसर नहीं मिला. जब उसने इस बात का विरोध जताना चाहा तो यह कहकर कि एक बार डोक्टर के जाने के लिए, एक बार घर पर प्लम्बर आने के चलते तुम दो -ढाई बजे भी तो निकल गई हो, उसे चुप करवा दिया गया.

आज इस बात को लेकर कि मैंने अपनी एक ही बेटी को पत्रकारिता के दलदल में झोंक दिया मैं काफी दुखी हूं और हर पिता से विनती करता हूं कि अपनी बेटी को पत्रकार न बनने दे, क्योंकि रोज दफ्तर से आकर फोन पर फूट फूट कर रोती बेटी को सुनना बेहद तकलीफदेह है.

भवदीय
विद्यारतन व्यास
vidhyaratnavyas@gmail.com

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‘भड़ास ने मुझे बदनाम कर दिया, माफी मांगो वरना मुकदमा करा दूंगी’

टीम भड़ास, आपकी वेबसाइट www.Bhadas4Media.com पर ‘नभाटा में नया फरमान- डेस्क नहीं करेगा किसी रिपोर्टर की कॉपी एडिट‘ नामक शीर्षक से 27 जून 2015 को एक आर्टिकल प्रकाशित किया गया है, जिसका लिंक है- https://bhadas4media.com/print/6225-nbt-farman इस आर्टिकल में मेरे नाम का इस्तेमाल कर मुझे बदनाम करने की कोशिश की गई है। बगैर मेरी इजाजत के, बगैर मेरा कथन/पक्ष जाने मेरे नाम का इस्तेमाल यहां क्यों किया गया? आपने यहां बिना सच जाने मुझे ‘आरोपी’ करार दे दिया। किसी आपराधिक मामले से जुड़ी खबर को बनाते हुए भी प्राथमिकी में दर्ज तथ्यों के आधार पर खबर लिखी जाती है।

मेरे खिलाफ जब कोई आपराधिक मामला अथवा प्राथमिकी तक दर्ज नहीं, तो आपको मेरे नाम का इस्तेमाल करने का अधिकार किसने दिया? आप ये कैसे लिख सकते हैं- ‘मुंबई नवभारत टाइम्स ने हाल ही में रिपोर्टर्स और स्ट्रिंगर्स के खिलाफ एक नया फरमान जारी किया हैं. फरमान के मुताबिक नवभारत टाइम्स के रिपोर्टर्स और स्ट्रिंगर्स को अपनी न्यूज़ कॉपी २०० परसेंट अच्छी बनाकर देनी पड़ेगी, ताकि डेस्क को कोई भी काम न करना पड़े.’?

जबकि हमारे ऑफिस में ऐसा कोई फरमान जारी नहीं किया गया है। आप किस आधार पर न सिर्फ मुझ पर, बल्कि हमारे एडिटर और एसोसिएट एडिटर पर भी लांछन लगा रहे हैं? एनबीटी में डेस्क पर काम करने वाले अनेक लोग हैं, पर यहां जिस तरह मेरे नाम का इस्तेमाल किया गया है, वह साफ जाहिर करता है कि यहां सीधे-सीधे मुझे टारगेट किया जा रहा है। आपके इसी आर्टिकल में छपे एक वाक्य के मुताबिक- ‘एनबीटी से जुड़े लोगों के मुताबिक एनबीटी में कॉपी एडिटर के पोस्ट पर काम कर रहीं आकांशा प्रभु नामक महिला पत्रकार ने कह दिया है कि मेरे पास कोई भी न्यूज़ कॉपी फाइनल आनी चाहिए, हैडिंग से लेकर कंटेंट में एक भी गलती नहीं होनी चाहिए.’

आपने ऐसा करके मेरी छवि को अपमानित और बदनाम किया है। यदि आपने इसके लिए मुझसे सार्वजनिक तौर पर अपनी इसी वेबसाइट पर 24 घंटे के भीतर माफी नहीं मांगी, तो मैं आपके खिलाफ मानहानि और महिला उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कराऊंगी। आपकी इस करनी से मुझे मानसिक आघात पहुंचा है।

आकांक्षा प्रभु

journalist.aprabhu@gmail.com

नवभारत टाइम्स

मुंबई


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नभाटा में नया फरमान- डेस्क नहीं करेगा किसी रिपोर्टर की कॉपी एडिट

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