जाने-माने कवि और पत्रकार वीरेन डंगवाल का बरेली में निधन

नीलाभ की दो कविताएं जो वीरेन के लिए लिखी गई थीं

एक दिन इसी तरह
(वीरेन के लिए)

एक दिन इसी तरह किसी फ़ाइल के भीतर
या कविता की किताब के पन्नों में दबा
तुम्हारा ख़त बरामद होगा

मैं उसे देखूंगा, आश्चर्य से, ख़ुशी से
खोलूंगा उसे, पढ़ूँगा एक बार फिर
कई-कई बार पढ़े पुरानी बातों के कि¤स्से

तुम्हारी लिखावट और तुम्हारे शब्दों के सहारे
मैं उतर जाऊँगा उस नदी में
जो मुझे तुमसे जोड़ती है
जिसके साफ़-शफ़्फ़ाफ़ नीले जल में
घुल गयी हैं घटनाएँ, प्रसंग और अनुभव
घुल गयी हैं बहसें और झगड़े

एक दिन इसी तरह किसी फ़ाइल में
किसी किताब के पन्नों में
बरामद होगा तुम्हारा ख़त

मैं उसे खोलूंगा
झुर्रीदार हाथों की कँपकँपाहट के बावजूद
आँखों की ज्योति मन्द हो जाने पर भी
मैं पढ़ सकूंगा तुम्हारा ख़त
पढ़ सकूंगा वे सारे ख़त
जो तुमने मुझे लिखे
और वे भी
जो तुमने नहीं लिखे

एक दिन इसी तरह
तुम्हारा ख़त होगा: और मैं

1986

मित्रताएँ

मनुष्यों की तरह
मित्रताओं का भी आयुष्य होता है

यही एक रिश्ता है
बनाते हैं जिसे हम जीवन में
शेष तो जन्म से हमें प्राप्त होते हैं
भूल जाते हैं लोग सगे-सम्बन्धियों के नाम
मित्रों के नाम याद रहे आये हैं

मित्रताओं का भी आयुष्य होता है
मनुष्यों की तरह
कुछ मित्रताएँ जीवित रहीं मृत्यु के बाद भी
आक्षितिज फैले कछार की तरह थीं वे
मिट्टी और पानी का सनातन संवाद
कुछ मित्रताएँ नश्वर थीं वनस्पतियों की तरह
दिवंगत हुईं वे
जीवित बचे रहे मित्र
2004


आगे की स्लाइड में… वीरेन डंगवाल अपनी एक कविता का पाठ करते हुए…

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Comments on “जाने-माने कवि और पत्रकार वीरेन डंगवाल का बरेली में निधन

  • अरुण श्रीवास्तव says:

    वीरेन दा के निधन की खबर ने स्तब्ध कर दिया। पूरा विश्वास था कि वे इसबार भी अपनी बीमारी (कैंसर) पर विजय पाकर अस्पताल से वापस आएंगे अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ ।
    वीरेन दा को तो एक कवि के रूप नहीं जानता । एक पत्रकार के रूप में पहली बार अमर उजाला बरेली में नौकरी के लिए मिला । उनके मित्र और मेरे अग्रज चितरंजन सिंह का पत्र लेकर मैं उनके पास गया था। पहली मुलाकात में भी उन्होंने एहसास नहीं होने दिया अजनबी होने का । उन्होंने अतुल महेश्वरी को पत्र लिखा और नौकरी मिल गई हालांकि मैं टिक नहीं पाया दूसरी बार वे अपनी सीट से उठकर राजुल जी के चैंबर तक गए। दूसरी बार बरेली में नौकरी मिल गई। यही पर पलास जी से परिचित हुआ। सहारा में नौकरी करने के दौरान भी हर महीने उनसे मिलने भटनागर कालोनी जाया करता था। यह सिलसिला तब टूटा जब उन्होंने अमर उजाला कानपुर में संपादक की जिम्मेदारी संभाली।
    वीरेन दा के सानिध्य में काम करने की पूरी नहीं हो सकी। अफसोस इस बात का भी रहेगा कि उनके अंतिम दर्शन नहीं कर पर पाया ।
    उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

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