जब मैं शशिशेखर के लॉलीपॉप में फंस गया!

Yograj Singh

शशिशेखर ने हिन्दुस्तान को बर्बाद कर दिया, इसे फिर से खड़ा करने में 10 साल और लगेंगे

भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं है, यह कहावत चरितार्थ जरूर होती है। सन् 2000 की बात है, दैनिक जागरण से हिन्दुस्तान में छलांग लगाई। वहां पहुंचने का रास्ता भी बेढंगा ही है, अजय जी ने संदेश भिजवाया कि हमसे आकर मिलो। उनसे एक-दो बार मिला भी, पर इसी बीच केवल तिवारी ने कहा कि वहां तो लंबा समय लगेगा, आपको मैं संतोष तिवारी से मिलवाता हूं। संतोष तिवारी से मिला और एक हफ्ते में ऑफर दे दिया गया। उस समय हिन्दुस्तान अखबार लॉटरी वाला माना जाता था। 24 साल की उम्र थी, समझ सकते हैं कि काम करने का कितना उत्साह रहा होगा। दिल्ली में चार सेंटर खोले गए थे।

हमें पूर्वी दिल्ली में काम करने के लिए बोला गया। पूर्वी दिल्ली में हालात यह थे कि कुछ रिपोर्टरों की खबर खुद ही लिखनी पड़ती थी और खबर कम पड़ने पर अपना खोजी दिमाग इस्तेमाल करके पेज को पूरा करते थे। कभी-कभार चारों सेंटर का काम भी हमारे पास ही आ जाता। मैं अधिक दिन सेंटर पर नहीं टिक सका, मेरा बुलावा हिन्दुस्तान टाइम्स हाउस के लिए आ गया। उन दिनों वहां की यूनियन बहुत मजबूत थी, किसी को बैठने नहीं देते थे। मेरे जाने पर हालांकि किसी ने कोई विरोध नहीं किया। पुराने सभी दिग्गज लोग थे, मुझे बहुत प्यार करते थे। 12-14 पेज का अखबार उन दिनों निकलता था, उसमें से 10-11 पेज पर मेरा ही काम होता था। हेडिंग लगाना, खबर को काटना, पेज को तैयार करना होता था। हिन्दुस्तान टाइम्स कमाता था, हिन्दुस्तान खाता था, इस तरह की कानाफूसी हुआ करती थी, इससे काम करने की ललक और बलवती हो जाती थी, मकसद सिर्फ एक था कि हिन्दुस्तान क्यों नहीं कमा सकता।

प्रमोद जोशी जी उन दिनों संपादक रात्रि थे, हालांकि उस समय उनके अनुभव का उपयोग बहुत कम ही होता था। उनकी उतनी चलती नहीं थी। लेकिन हम सबकी सुनते थे, कांट्रेक्ट और वेज बोर्ड के बीच एक माध्यम थे। धीरे-धीरे वेज बोर्ड के बहुत सारे लोग सेवानिवृत्त हुए, अधिकांश लोगों ने स्वैच्छिक रिटायरमेंट भी ले लिया। नए लोग आने शुरू हुए, अखबार का रंग-रूप बदला, जिसमें एक अहम कड़ी के रूप में मैं शामिल रहा, लेकिन दिखाने के लिए नहीं, काम को जमीन पर उतारने के लिए। अखबार भी कमाऊ बन गया। मृणाल जी संपादक थीं, प्रमोद जोशी अब अखबार की रीढ़ बन चुके थे। लेकिन इस बीच कुछ गडबड़ियां भी हुईं। जिन लोगों की बदौलत अखबार निरंतर बढ़ रहा था, उन्हें मजबूत नहीं किया गया, बाहर के लोगों को लाकर अनाप-शनाप पैसे दिए जाने लगे। आगरा, मेरठ, देहरादून संस्करण की शुरुआत हुई। दिल्ली-एनसीआर संस्करण के अलावा इन संस्करणों के लिए भी बहुत कार्य किया। कुछ समय पश्चात मृणाल जी के जाने की खबरें सुनाई देने लगी और एक दिन उन्हें प्रथम तल से नीचे छोड़ने के बाद मन बहुत खिन्न हुआ। सैलरी तो हमें बहुत नहीं मिलती थी, लेकिन मृणाल जी जो सम्मान करती थी, उसी सम्मान के लिए हम जी-जान से काम करते थे।

शशिशेखर आ गया, लोग कहते थे कि यह काम करने वाले लोगों को पसंद करता है। पर मेरा शशिशेखर के साथ का जो अनुभव है, उसके मुताबिक वह जो बात करता है, उसके ठीक उलटा काम करता है। हिन्दुस्तान टाइम्स ही नहीं, पूरी प्रिंट मीडिया में अभी भी कोई बराबरी करने को तैयार हो तो मैं उससे प्रतियोगिता करने को तैयार हूं। शशिशेखर ने जब देखा कि संस्करण टाइम पर नहीं जा रहा है तो उसने मुझे बुलाकर कुछ लॉलीपॉप दिया और मैं उसके लॉलीपॉप में फंस गया। जी तोड़ मेहनत करके सभी संस्करणों को टाइम पर छुड़वा देता था। तमाम साथियों के साथ प्रदीप तिवारी और पवनेश कौशिक इसके साक्षी हैं। लेकिन जब इनकिरीमेंट की बारी आई तो मेरा पैसा सबसे कम बढ़ा। स्वभाव के मुताबिक मैं गुस्से में आ गया और पत्र लेकर शशिशेखर के चेम्बर में चला गया। वहां गुस्से में कुछ बातें भी कहीं, लेकिन उसने और कुछ न कहने की बजाय सिर्फ यह बोला कि योगराज जी हमसे चूक हुई है, हम इसमें सुधार करेंगे। मैं चला आया, उसके बाद काफी दिन तक इंतजार किया, लेकिन सुधार तो नहीं हुआ। इसके बाद शशिशेखर ने ड्रामे की शुरुआत की, जब वह हटा पाने में नाकामयाब रहा तो उसने मेरा ट्रांसफर भागलपुर कर दिया। मैं भागलपुर चला भी जाता, लेकिन मैं ठहरा स्वाभिमानी आदमी। मैंने कुछ समय पश्चात सीधे एच.आर. को अपना त्याग पत्र दे आया।

आप सोच रहे होंगे इतनी लंबी कहानी बताने का क्या अर्थ है? दरअसल इतनी मेहनत जिस अखबार के लिए की हो, जिस अखबार को अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय दिया हो, ऐसे में हिन्दुस्तान अखबार को गिरता देखकर पुरानी बातें याद आ गईं। हिन्दुस्तान अखबार तो काफी पहले से बर्बाद हो चुका था, ऐसे में कोरोना महामारी का बहाना और मिल गया। बहुत लोगों की वहां से छंटनी भी हुई। बनी हुई चीज को बिगड़ने में समय लगता है। शशिशेखर ने हिन्दुस्तान को बर्बाद कर दिया, अब इसको फिर से खड़ा करने में दस साल और लगेंगे।

बात तकरीबन 2006-2007 की है, लेकिन थोड़ा आगे-पीछे भी हो सकता है। हिन्दुस्तान में कार्य करते हुए मन में कुछ उदासी थी। इसी दौरान दैनिक भास्कर का बिजनेस भास्कर लांच होने आया। सुदेश गौड़ जी दिल्ली के लिए भर्तियां कर रहे थे, उन्होंने मुझे बुलाया, बिठाकर चाय पिलाई और बिजनेस भास्कर में नौकरी करने का पत्र दे दिया। पैसा भी हिन्दुस्तान की अपेक्षा पांच हजार अधिक था। मैंने हिन्दुस्तान से छुट्टी लेकर एक सप्ताह में उनकी टीम भी बनवा दी। पर इस एक सप्ताह के दौरान ऑफिस आने-जाने में समय अधिक लगता था और कठिनाई भी होती थी। मेरे पास कोई वाहन तो था नहीं, कार्यालय से वापसी के समय जो परेशानी हुई, उससे मैं निराश हुआ और वहां काम न करने का मन बना लिया। सुदेश गौड़ जी को मना किया या नहीं, यह तो याद नहीं, लेकिन बिजनेस भास्कर जाना बंद कर दिया।

हिन्दुस्तान अखबार में बने रहने की मुख्य वजह गाजियाबाद से नई दिल्ली के लिए चलने वाली लोकल ट्रेन थी। जून-2013 में आखिरकार हिन्दुस्तान छोड़ना ही पड़ा। इस दौरान मेरे गुरुजी और पुराने साथी राकेश घंसोलिया ने मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया बुलवाया और अमन नैयर जी से मिलवाया। अमन नैयर जी ने एक ही बार में मेरे बॉयोडाटा पर पद और पैसा दोनों मार्क करके भेज दिया। इसके बावजूद नवभारत के लिए मेरा क्यों नहीं हो पाया, इसका क्षोभ जरूर रहेगा और वजह क्या रही या किसकी वजह से मेरा पत्र अटका, यह संदेह बरकरार है। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया यानी नवभारत में काम न कर पाना मेरे मन में एक बोझ सा है।

इसके बाद दिल्ली विधानसभा के चुनाव में चार-पांच विधानसभाओं के लिए खूब खबरें लिखी। इसमें भी सारा कार्य मेरा लेकिन धन ज्यादा मेरा साथी कमाता था। पर इसका कोई मलाल नहीं है क्योंकि धन कहां से आएगा, इसकी कला मैं नहीं जानता हूं, साथ वाले व्यक्ति को ही पता था। नौकरी गई तो वसुंधरा का मकान भी बेच दिया। इस समय मैं वसुंधरा सेक्टर-2 में किराए के मकान में रहता था। इसी दौरान वार्ता लोक में रह रहे सुनील पांडेय जी से भेंट हुई। कुछ समय पश्चात उन्होंने मुझे आरएसएएस समर्थित संगठन भारतीय किसान संघ की पत्रिका किसान कुल को निकालने हेतु किसान संघ लेकर चले गए। दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर किसान संघ का कार्यालय था। यहां पैसा तो कामचलाऊ ही था, लेकिन मन को बड़ी संतुष्टि रहती थी।

…जारी….

पत्रकार योगराज सिंह की एफबी वॉल से.

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