सम-विषम के नाम पर आम जनता को परेशान करने के लिए अड़ गई आम आदमी पार्टी की सरकार

Sanjaya Kumar Singh : पत्नी और सरकार के आगे तर्क!! दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए जांच के तौर पर शुरू की जा रही सम विषम नंबर की कारों को सम विषम तारीखों को ही चलने देने के फैसले की घोषणा में इतनी छूट है कि – यह प्रयोग सफल हो या असफल कोई खास मतलब नहीं है। सम-विषम नंबर के नाम पर असल में दिल्ली की आबादी को दो हिस्सों में बांट दिया गया है। एक आबादी जो इससे बेसर है। चाहे वह वीआईपी हो या मोटरसाइकिल चलाने वाली या महिलाएं। दूसरी आबादी इससे प्रभावित होने वालों की है और यह दिल्ली में रोज दफ्तर आने जाने वालों का है जो सबसे ज्यादा परेशानी झेलेगी। चूंकि मामला स्थायी नहीं है इसलिए परेशानी और ज्यादा है। वरना परेशान होने वाला अपने लिए कोई इंतजाम करता।

प्रयोग अवधि के दौरान छूट पाने वाली गाडियों में सीएनजी गाड़ियां तो हैं पर महंगी और तथाकथित शून्य उत्सर्जन वाली गाड़ियां नहीं हैं। इसी तरह जिस प्रदूषण जांच के नाम पर दिल्ली वालों को वर्षों से परेशान किया जा रहा है उसका भी कोई मतलब इस परीक्षण अवधि के दौरान नहीं है। सरकारें अपने फैसले कर लेती हैं, जनता से ना पूछा जाता है और ना उनकी राय का कोई मतलब होता है। इसीलिए मेक इन इंडिया और मेक फॉर इंडिया तो है लेकिन मेक फॉर कंज्यूमर की चिन्ता किसी को नहीं है। इसी तरह, प्रदूषण के बहाने नियम तो बना दिए गए, प्रयोग के तौर पर ही सही 15 दिन स्कूल भी बंद कर दिए जाएंगे तो गैर वास्तविक स्थितियों में यह पता कैसे चलेगा कि प्रयोग सफल रहा या असफल। 15 दिन स्कूल बंद करके यह प्रयोग करने से बेहतर नहीं होता कि ऐसे समय किया जाता जब स्कूल बंद रहते हैं। हालांकि, इस दौरान भी ज्यादातर अवधि में स्कूल बंद रहेंगे और ऐसे में जो आबादी दिल्ली के बाहर चली जाएगी उसका अंदाजा कैसे होगा। क्या कोई आंकड़ा है जो यह बताता हो कि छुट्टियों में कितने लोग दिल्ली से बाहर चले जाते हैं।

अगर यह निर्णय़ पक्का होता तो मनुष्य वैकल्पिक स्थायी इंतजाम करता। पर यहां वह स्थिति भी नहीं है। इसलिए प्रयोग ठीक से हो ही नहीं सकता है। उदाहरण के लिए किसी के पास दो गाड़ियां हैं और दोनों सम या विसम नंबर वाली – तो प्रयोग अवधि में वह कुछ नहीं कर सकता है। छह महीने (या ऐसी ही) पूर्व घोषणा होती तो वह कोई उपाय करता। कोई दंपति साथ जाते हैं – एक ही गाड़ी है। इसलिए पति चलाता है। पहले पता होता तो पत्नी सीख लेती, चलाने लगती। दफ्तर जाने वाली महिला 12 साल तक के बच्चे को लेकर जाएगी नहीं और पति के साथ (खुद चलाकर दूसरे नंबर वाली गाड़ी से) नहीं जा सकती है। मुझे यह भी नहीं जम रहा है। ये कुछ उदाहरण हैं मुझे नजर आ रहे हैं। जाहिर है, और भी कई होंगे। पर हर चीज जनता से पूछकर करने वाली आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस बार जनता को मौका ही नहीं दिया और प्रयोग के नाम पर 15 दिन (इसके सात-आठ दिन) एक कार वाले या सम-अथवा विषम नंबर की ज्यादा गाड़ियों वाले आम मतदाताओं को परेशान करने की ठान ली है।

हालांकि, मुझे इसमें एक रास्ता नजर आ रहा है। अगर ऐसा कर दिया जाए तो लोगों को सहूलियत हो जाएगी और सरकार को कुछ सही आंकड़े भी मिल सकते हैं। सम नंबर वाले दिन विषम और विषम नंबर वाले दिन सम नंबर की गाड़ी चलाने का जुर्माना दो हजार रुपए है। प्रयोग अवधि में इसे 10 हजार रुपए एक मुश्त कर दिया जाए और यह भी देख लिया जाए कि कितने लोग प्रदूषण कम करने के नाम पर ये पैसे देने के लिए तैयार होते हैं – और प्रयोग अवधि की यह छूट बाद में उपयुक्त समझी जाए तो स्थायी भी हो सकती है। वरना दिल्ली में ज्यादातर लोगों के पास जितना पैसा है उससे दूसरी गाड़ी के नाम पर और फिर सम या विषम नंबर वाली गाड़ी के नाम पर गाड़ियों की संख्या बढ़ेगी ही घटेगी नहीं और उसका दबाव किसी ना किसी रूप में रहेगा ही।

टैक्सियों को महीने में 15 दिन ही चलाने की इजाजात देने का मतलब होगा टैक्सी वाला 15 दिन गाड़ी खड़ी रखने के पैसे यात्रियों-ग्राहकों से ही वसूलेगा। बाकी दिन वही गाड़ियां यूपी और हरियाणा में चलाएगा। प्रदूषण उधर होगा, उसका लाभ भी बढ़ जाएगा। मरेगा आम आदमी। जहां तक टैक्सी को सीएनजी से चलाने का सवाल है, मेरे टैक्सी वाले ने बड़ी व्यावहारिक समस्या बताई। उसका कहना है कि डीजल चुराकर बेचा जा सकता है, सीएनजी नहीं। इसलिए ड्राइवर सीएनजी गाड़ी चलाना नहीं चाहते हैं और यात्रियों को परेशान करते हैं ताकि मालिक उन्हें सीएनजी गाड़ी ना दें (यह बात उसने हर बार सीएनजी भराने की शिकायत करने पर ही बताई थी कि ड्राइवर जानबूझकर यात्री को परेशान करते हैं)। दिल्ली की पूर्व मुख्य शीला दीक्षित ने भी कहा है कि यह शुरुआत आधी-अधूरी तैयारी पर की जा रही है। मजे की बात यह है कि इस पर दिल्ली के अजीब राज्यपाल नजीब जंग को कोई एतराज नहीं है। शायद वे और उनकी केंद्र सरकार इस प्रयोग से मुक्त है इसलिए।

सरकार का यह व्यवहार कैसा है इसे बताने के लिए Sanjay Sinha ने यह चुटकुला लिखा था मैं भी अपनी बात इसी चुटकुले से खत्म करूंगा बाकी पत्नी और सरकार का कुछ किया नहीं जा सकता है। झेलना ही पड़ता है। चुटुकुला इस तरह है – “एक बार एक महिला अपने पति की गैरमौजूदगी में अपने प्रेमी के साथ बेडरूम सो रही में थी। पति शहर से दूर कहीं दौरे पर गया था। पत्नी को मालूम था कि पति दो दिनों के बाद ही आएगा। पर उस रात पति अचानक घर जल्दी पहुंच गया। उसने अपनी चाबी से कमरे का दरवाजा खोला और भीतर चला आया। पत्नी अचानक कमरे में अपने पति को देख कर जरा भी नहीं घबराई। उसने बहुत संयत होकर पूछा, “अरे, तुम जल्दी कैसे चले आए? तुम तो दो दिनों के लिए दौरे पर गए थे न?”

पति ने पत्नी के सवालों का जवाब देने की जगह पत्नी से पूछा कि ये कौन है?

अब पत्नी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। वो लगभग चिल्लाने वाली स्थिति में थी। उसने कहा, “तुम बात मत बदलो। मैंने जो पूछा है, पहले उसका जवाब दो, तुम जल्दी कैसे आ गए?”

Arvind Kejriwal भी ऐसे ही हैं?

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. वह जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक वरिष्ठ पद पर कार्य कर चुके हैं और इन दिनों कंटेंट फील्ड में बतौर उद्यमी सक्रिय हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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