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सियासत

बच गये अदानी, आई हरियाली, चढ़ाई शुरू… पर्दे के पीछे के खेल पर पढ़ें भड़ास एडिटर यशवंत की बेबाक़ टिप्पणी

यशवंत सिंह-

खेला हो गया। अड़ानी को जितना गिरना था गिर चुके। अब चढ़ाई फिर शुरू। कइयों में अपर सर्किट है। अमीरों की लिस्ट में आज बाईस से अठारह पर आ गए। शाम होते होते टॉप टेन के आसपास दिख जाएँ तो कोई आश्चर्य नहीं। एक दो कंपनियों को छोड़कर बाक़ी सबमें भरपूर हरियाली है। शाम तक अड़ानी पॉवर और अड़ानी गैस में भी प्राण प्रवेश कर सकता है।

अड़ानी कोई एक उद्योगपति नहीं हैं। वो मोदी जी की परछाईं हैं, वो मोदी जी की आत्मा हैं। जिस कंपनी के साथ देश की ताक़तवर सरकार खड़ी हो उस पर ग्लोबल अटैक बस कुछ दिन की बेहोशी ला सकता है, प्राण हरण नहीं कर सकता।

वैसे, इस ग्लोबल दुनिया में मिसाइल और परमाणु से युद्ध न के बराबर होंगे। किसी देश को तबाह करना हो तो उस देश की अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर दो, घुटनों के बल बैठ जाएगा।

कुछ कुछ भारत के साथ ऐसा ही करने की साज़िश हुई है। अड़ानी को यहाँ इतना बड़ा किया जा चुका है, इतना कुछ दिया जा चुका है कि उनके ग्रुप की मौत का मतलब मार्केट में मातम, देश में अस्थिरता।

अड़ानी को हिडनबर्ग के हाथों नहीं मरना चाहिए, ये सदिच्छा मेरी पहले दिन से है। अड़ानी के न मरने में अभी तो भारत का हित है।

हिंडनबर्ग प्रकरण सबक बहुत कुछ देता है। सोचने को बहुत मसाला देता है। कुछ पॉइंट्स-

  • मीडिया अब सिर्फ़ चौथा स्तंभ नहीं रहा। ये परमाणु बम सरीखा है।
  • मीडिया के आवरण में अब अंतरराष्ट्रीय साज़िशें हुआ करेंगी।

-हर शासक अपने देश की मीडिया को अपने लिए नियंत्रित रखेगा, चुनिंदा दूसरे देशों को अस्थिर करने के लिए अपने मीडिया उन पर छोड़ देगा।

  • दुनिया में जो कथित लोकतांत्रिक देश हैं, वहाँ कोई नेता या व्यक्ति या पार्टी की सरकार नहीं होती, वहाँ के कॉर्पोरेट्स की मर्ज़ी से सरकारें आती जाती रुकती बदलती हैं।
  • दक्षिणपंथी मोदी के बढ़ते वैश्विक प्रभाव से परेशान लिबरल पश्चिमी राष्ट्र की मिलीजुली सर्जिकल स्ट्राइक थी हिडनबर्ग रिपोर्ट। भारतीय बाज़ार को ध्वस्त कर घुटनों के बल लाने की साज़िश थी।
  • किसी भी देश का कॉर्पोरेट पवित्र गाय नहीं। ख़ासकर फ्रॉड और मेनिपूलेशन की बात की जाए तो पश्चिम के दैत्याकार मल्टीनेश्नल कॉर्पोरेट्स के आगे अड़ानी कहीं नहीं ठहरते।
  • पश्चिम की बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ग़रीब और विकासशील देशों का खून पीकर फलीफूली हैं। इनके नाम दूसरे देशों के खनिज लूटने, प्रधानमंत्रियों-राष्ट्रपतियों की हत्याऐं कराने, सरकारें गिराने बनाने, जबरन रोग और इलाज बेचने, मानवाधिकार की ऐसी तैसी करने, रिश्वत देने, मीडिया और विचार मैनेज करने समेत सैकड़ों प्रमाणित आरोप हैं। पर कोई देश इनसे सवाल नहीं पूछ सकता, जुर्माना नहीं वसूल सकता।

-ज्यादा दूर नहीं! ख़ुद पर नज़र डालिए। सौ दो सौ साल पीछे जाकर। ईस्ट इंडिया कंपनी अड़ानी की कम्पनी नहीं थी। ये उन हरामज़ादों की कंपनी थी जो आज लोकतंत्र और नैतिकता की बातें करते हुए दूसरे देशों को खड़े खड़े निगल जाने की प्लानिंग करते रहते हैं।

-क्या हमने ईस्ट इंडिया कम्पनी के लूट और जुल्म का हर्जाना माँगा, पाया?

मोदी से हम लड़ लेंगे। बीजेपी से वैचारिक विरोध रहेगा। पर अंतरराष्ट्रीय साज़िशों के झाँसे में न आएँगे। कम से कम मैं तो अड़ानी का नाश नहीं चाहता।

  • मैं ये भी नहीं चाहता कि अड़ानी इतने बड़े बना दिये जाएँ कि उनके डूबने से देश डूबने लगे। मोदी के पाप छोटे नहीं हैं। लेकिन लोकतंत्र वाली राजनीति / रणनीति में ऐसे पाप किसने नहीं किए। किस नेता को अपना वाला ‘चेला अम्बानी’ ‘शिष्य अड़ानी’ नहीं चाहिए!

-अगर मुझे नैतिकता / नियम-क़ानून और देश में से कोई एक चुनना हो तो अनैतिक होकर अपन देश को चुनेंगे, देश को नंबर एक पर रखेंगे।

जारी…

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