त्रैमासिक पत्रिका ‘लीलटांस’ का लोकार्पण

चूरू । प्रयास संस्थान, चूरू की ओर से शुरू की गई त्रौमासिक राजस्थानी साहित्यिक पत्रिका ‘लीलटांस‘ के प्रवेशांक का लोकार्पण रविवार शाम जिला मुख्यालय स्थित सूचना केन्द्र में किया गया।  मुख्य अतिथि साहित्य अकादेमी नई दिल्ली में राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के संयोजक प्रो. अर्जुन देव चारण ने पत्रिका के लोकार्पण के बाद संबोधित करते हुए कहा कि ‘लीलटांस’ पत्रिका से उनकी यह अपेक्षा है कि वह पक्षी की तरह समग्र व विहंगम दृष्टि की वाहक और समाज व साहित्य में नए मूल्यों की स्थापना का माध्यम बने।

उन्होंने मातृभाषा की उपेक्षा का दर्द व्यक्त करते हुए कहा कि पुरखों ने पीढ़ियों की साधना से जिन शब्दों को अर्जित किया, उन्हें हम क्षण-क्षण खोते जा रहे हैं। भाषा व साहित्य को समृद्ध करने में पत्रिकाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है लेकिन पत्रिका के जरिए दृष्टि का विस्तार सामने आना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज जबकि शब्द अपना अर्थ खोते जा रहे हैं, रंजन अत्यंत मुश्किल किंतु महत्वपूर्ण काम है और पत्रिका के संपादन में यह क्षमता दिखनी चाहिए कि वह लीलटांस की तरह राग-द्वेष, माया-मोह, ईर्ष्या-प्रेम से दूर रहकर पाठकों के लिए बेहतरीन सामग्री पेश करे। उन्होंने कहा कि इक्कीसवीं सदी में चरित्रा निर्माण अत्यंत मुश्किल काम है और साहित्य यही काम करता है। पत्रिका के नामकरण पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि पक्षी का साहित्य से अत्यंत निकट का संबंध रहा है क्योंकि पक्षी करूणा जगाता है। उनकी यह कामना है कि राजस्थानी साहित्य में ‘लीलटांस’ पत्रिका गरूड़ उड़ान भरे। चारण ने कहा कि पत्रिका की सफलता में पाठकों की भी जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है कि वह संपादक को राह दिखाए तो उसका हौसला भी बढाए।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए अतिरिक्त जिला कलक्टर राजेंद्र सिंह कविया ने पत्रा-पत्रिकाओं को भाषा के विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए कहा कि ‘लीलटांस’ के जरिए नए लेखकों को सृजन का बेहतर मंच मिलेेगा। उन्होंने कहा कि चूरू जिला सांस्कृतिक व साहित्यिक गतिविधियों के जरिए पूरे देश में अपनी पहचान बनाए हुए है।  विशिष्ट अतिथि जोधपुर के वरिष्ठ साहित्यकार मीठेश निर्मोही ने कहा कि ‘लीलटांस’ के लोकार्पण को ऐतिहासिक क्षण बताते हुए कहा कि आज के समय में साहित्यिक पत्रिका निकालना खांडे की धार पर चलना है। आजादी के समय प्रांत के नेताओं में इच्छाशक्ति होती तो राजस्थानी को उपेक्षा के दिन देखने नहीं पड़ते। राजस्थानी को मान्यता नहीं होने का खामियाजा प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ रहा है।

विशिष्ट अतिथि ‘कथेसर’ के संपादक व साहित्यकार सत्यनारायण सोनी ने उम्मीद जताई कि लीलटांस संजीदा रचनाकार व पाठक तैयार करेगी। उन्होंने मेघराज मुकुल, रावत सारस्वत व किशोर कल्पनाकांत के योगदान का स्मरण करते हुए कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएं सामाजिक परिवर्तन का वाहक बनती है। जो भूमिका देश के निर्माण में एक मजदूर की होती है, वही भूमिका समाज के निर्माण में पत्रिका की होती है। उन्होंने महात्मा गांधी का कथन दोहराते हुए कहा कि मातृभाषा में शिक्षा नहीं होना किसी भी व्यक्ति के लिए आत्महत्या के समान है।

विशिष्ट अतिथि बीकानेर के लेखक-पत्राकार हरीश बी शर्मा ने कहा कि लीलटांस के जरिए राजस्थानी का नवलेखन सामने आएगा और नए रचनाकारों को प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने पत्रिका के कलेवर की सराहना करते हुए कहा कि राजस्थानी भाषा की समृद्धि की दिशा में पत्रिका मील का पत्थर साबित होगी, ऐसी अपेक्षा है। उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य का विचार महत्वपूर्ण है, लीलटांस के विचार को प्रयास के साथियों ने अपनी इच्छाशक्ति से अमली जामा पहनाया है, यह प्रेरणास्पद कार्य है।

पत्रिका के संपादक कुमार अजय ने कहा कि ‘लीलटांस’ सबकी अपेक्षा पर खरी उतरे, ऐसा उनका प्रयास रहेगा। प्रयास के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि लीलटांस से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। वरिष्ठ साहित्यकार भंवर सिंह सामौर ने आभार जताया। संचालन कमल शर्मा ने किया।  इससे पूर्व अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। हाकम अली, रामनाथ कस्वां, रामेश्वर प्रजापति, रामकुमार घोटड़, सत्यनारायण शांडिल्य, महावीर नेहरा, अनिल शास्त्राी, गुमाना राम मांझू, विकास बेनीवाल, सोहन सिंह दुलार, विकास मील, सुधींद्र शर्मा, परमेश्वर लाल दर्जी, बीरबल नोखवाल, चंद्रशेखर पारीक, राजीव स्वामी, राजेंद्र मुसाफिर, मोहन सोनी, श्याम सुंदर शर्मा, केसी सोनी, युवा जागृति संस्थान के जयसिंह पूनिया, अजीत चारण, उम्मेद धानियां ने अतिथियों का स्वागत किया। इस मौके पर बड़ी संख्या में साहित्यकार, साहित्यप्रेमी एवं नागरिकण मौजूद थे।

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