मृणाल पाण्डे की कथाकृति ‘हिमुली हीरामणि कथा’ का लोकार्पण

नई दिल्ली। हिमुली हीरामणि कथा की रचना युवाओं के लिए हुई है यदि इसे हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की परंपरा को आगे ले जाने वाली कृति समझा जाता है तो यह मेरे लेखन का सम्मान है। सुप्रसिद्ध कथाकार और पत्रकार मृणाल पाण्डे ने मिरांडा हाऊस में अपनी सद्य प्रकाशित कथा कृति ‘हिमुली हीरामणि कथा’ के लोकार्पण एवं परिचर्चा के अवसर पर कहा कि यह नानी के घर और छठी के दूध के बीच की कथा है। पाण्डे ने परिहास भाव के लगातार विरल होते जाने को चिन्ताजनक बताते हुए कहा कि ऐसे दौर में मैंने बोलियों के बाल्यावस्था के साहित्य को पढ़ा और उस विरल होते परिहास भाव को इस कृति में समेटा है। उन्होंने कहा यह कहानी यथार्थ की कहानी है जिसकी भाषा दादी- नी की कहानियों वाली है।

इससे पहले पुस्तक के लोकार्पण के बाद परिचर्चा प्रारम्भ करते हुए आलोचक वैभव सिंह ने कहा कि इस उपन्यास की संरचना में लोक कथा को पुनः गढ़ा गया है जिसमें लोककथा का मनोविज्ञान है तो वर्तमान राजनीति और विडम्बनाओं की गूँज भी। उन्होंने कहा आज के समय के सत्य को लोककथाओं के माध्यम से सुनाया गया है जिससे आस्थाओं का पुनर्स्थापना भी होती है। सुखांत की अनिवार्यता इस आस्था को जीवित बनाए रखती है। डॉ वैभव ने कहा कि इस देश में आधुनिकता की ब्लैक मार्केटिंग की गयी है और ग्रामीण अनपढ़ लोगों से उनकी परंपरा को छीना गया है। उन्होंने कहा कि हिमुली की कहानी को जेंडर डिस्कोर्स की कहानी के रूप में भी देखा जा सकता है वहीं कथा में राजसत्ता से मिले हुए नगर सेठों की खबर लेने को रोचक प्रसंग बताया।

परिचर्चा में चर्चित कवि कथाकार प्रियदर्शन ने कहा कि शब्द की सत्ता पिछले दशकों में टूटी है और तकनीक के दौर में साहित्यिक चुनौती से संघर्ष का लेखन हुआ है। उन्होंने कहा आधुनिकता के पार जाने के क्रम में हम पीछे जाते हैं तो ‌इस किताब को पढ़ते हुए यथार्थ की परिधि को तोड़ने वाले मनोहर श्याम जोशी, विजयदान देथा, की याद आ जाती है। प्रियदर्शन ने कहा यह लोककथा नहीं है, बल्कि उसके विन्यास में वर्तमान दीखता है। यहां नीरा राडिया, अम्बानी, रतन टाटा सब दिख जायेंगे। कृति की प्रशंसा में उन्होंने कहा कि हिंदी का रस ठेठ भाव में यहां मौजूद है। उन्होंने कहा कि कृति में सत्ता के गलियारों के प्रपंच फूटता है और यह स्त्री के दुखों और प्रतिरोध की कथा भी बन जाती है।

बाद में छात्राओं से हुए संवाद में यथार्थवाद पर सार्थक और लंबी बहस भी चली। बहस में मृणाल जी ने एक उत्तर में कहा बहुधा लेखन खेल की तरह लगता है, जिसमें उत्सुकता और भावुकता भरी होती है। उन्होंने इस कृति के लिए कहा कि ‌मैंने व्यंजनों की थाली पड़ोसी है, जो मन आये आप आस्वादन कर सकते हैं। आयोजन में राजपाल एंड संज़ की मीरा जौहरी ने इस कृति के प्रकाशन को अपने लिए गौरव की बात कहा। अंत में मिरांडा हाउस के हिंदी विभाग की रजनी सिसोदिया ने आभार व्यक्त किया।

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‘शीतलवाणी’ के नये अंक के लोकार्पण पर बोले कुंअर बेचैन- ‘छोटे शहरों से साहित्यिक पत्रिकाएं निकालना मुश्किल काम’

सहारनपुर। देश के जाने माने गीतकार डॉ.कुंअर बेचैन का कहना है कि आज के दौर में साहित्यिक पत्रिकाएं निकालना बहुत मुश्किल काम हैं, और सहारनपुर जैसे छोटे शहर से और भी कठिन है, लेकिन जो लोग यह काम कर रहे हैं वह हिन्दी को समृद्ध करने में बड़ा योगदान कर रहे हैं। डॉ.बेचैन ने यह बात यहां प्रद्युमन नगर स्थित कलानिधि सभागार में डॉ.वीरेन्द्र आज़म के संपादन में सहारनपुर से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘शीतलवाणी’ के नये अंक का लोकार्पण करते हुए कही।

इस अवसर पर देहरादून से आये प्रख्यात ग़ज़लकार डॉ. अश्वघोष ने कहा कि शीतलवाणी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछले करीब एक दशक से हिन्दी की अलख जगा रही है,आज जब नेट और मोबाइल ने साहित्य पठन पाठन को काफी सीमित कर दिया है ऐसे समय में शीतलवाणी का अभियान सराहनीय है। प्रख्यात साहित्यकार कृष्ण शलभ ने कहा कि शीतलवाणी द्वारा देश के अनेक साहित्यकारों को केंद्र में रखकर कई ऐसे विशेषांक प्रकाशित हुए हैं जो साहित्यिक दृष्टि ही नहीं शोधार्थियों के लिए शोध की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहे हैं। देश के चर्चित गीतकार राजेंद्र राजन ने कहा कि सहारनपुर से प्रकाशित शीतलवाणी आज देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में अपना विशेष स्थान बना चुकी है, शीतलवाणी के अनेक अंक बहुत शानदार रहे हैं। इससे पूर्व उक्त सभी साहित्यकारों ने शीतलवाणी के जुलाई अंक का लोकार्पण किया।

पत्रिका के संपादक डॉ. वीरेंद्र आजम ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि शीतलवाणी का प्रकाशन धनोपार्जन के लिए नहीं अपितु हिन्दी के नये और युवा रचनाकारों को मंच देने का प्रयास है।  उन्होंने बताया कि कवि शमशेर बहादुर व नरेश सक्सेना, नाट्य लेखक व कथाकार डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल, भाषाविद् डॉ. द्वारिका प्रसाद सक्सेना, आलोचक कमला प्रसाद, कथाकार से रा यात्री व उदय प्रकाश तथा प्रशासक व कवि, संस्मरण  लेखक आर पी शुक्ल आदि साहित्य मनीषियों को केंद्र में रखकर उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर आधारित विशेषांक पत्रिका द्वारा निकाले गए है जिनसे उक्त साहित्यकारों के साहित्य पर शोध करने वाले शोधार्थियों को काफी मदद मिली है, और यही शीतलवाणी के प्रकाशन का उद्देश्य भी है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. आर पी सारस्वत ने किया। इस अवसर पर अनेक साहित्यकार व गणमान्य लोग मौजूद रहे।

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‘बनास जन’ लोकार्पण : पत्रकारिता मनोरंजन हो गई, वर्तमान को इतिहास से परिचित कराएं

लखनऊ : वरिष्ठ हिन्दी उपन्यासकार रवींद्र वर्मा ने इप्टा लखनऊ द्वारा आयोजित साहित्य-संस्कृति की पत्रिका बनास जन के विशेषांक ‘आख्यान में अखिलेश’ के लोकार्पण समारोह में कहा कि इस अंक ने एक बड़ी जिम्मेदारी का निर्वहन किया है। लोकार्पण समारोह में ‘लमही’; के संपादक विजय राय ने कहा कि आज़ादी पूर्व की तत्कालीन पत्रकारिता पर कहा गया था, कुछ समय बाद यहां मशीन होगी। व्यक्ति भी वैसा ही होगा। खिंची हुई लकीर पर चलना रह जाएगा। आज की पत्रकारिता भिन्न नहीं है। साहित्य हड़बड़ी में लिखा जा रहा है। ई-बुक्स का दौर है। नई तकनीक है। पुराने सामाजिक मूल्य ध्वस्त हो रहे हैं। नए परिवेश स्थापित हो रहे हैं। पत्रकारिता मनोरंजन हो गयी है। 

उन्होंने कहा कि मीडिया के नए संसाधन, नयी तकनीक, चैनल और यांत्रिक विकास है। दो राय नहीं कि पुरानी रूढ़ियां को इसने तोड़ा है। मगर भाषा पर बुरा असर डाला है। पत्रकारिता का उद्देश्य यह भी है कि अपने वर्तमान को इतिहास से परिचित करायें। मगर उपेक्षा की जा रही है। आज पुस्तक मेले साहित्य को प्रचारित करने की महती भूमिका निभा रहे हैं। सोशल मीडिया की विश्वसनीयता सीमित है। वो लुग्दी साहित्य को फोकस करते हैं। और जनसामान्य तक नहीं पहुंच पाया है। मीडिया चैनल महज 500 शब्दों के शब्दकोष पर चल रहे हैं। लघु पत्रिकाओं के संपादक मिल-जुल कर प्रतिरोध करें।

विख्यात कवि एवं समाज विज्ञानी बद्रीनारायण ने अखिलेश को भूमंडलीकरण के संकटपूर्ण दौर का लेखक बताते हुए कहा कि अपनी पीढ़ी के साथ उन्होंने आगे की कई पीढ़ियों को कथा के स्रोतों की जानकारी दी। बनास जन का यह विशेषांक उस समय की री विजिट है। प्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि अखिुलेश अपनी पत्रिका के द्वारा सबको प्रकाश में लाते रहे हैं अब उन पर समग्रता के साथ काम हुआ है। विशेषांक के लेख साफतौर पर बताते हैं कि अंक की सामग्री कितनी गंभीर और महत्त्वपूर्ण है। प्रो रूपरेखा वर्मा ने कहा कि अखिलेश के लेखों में सामाजिक परिदृश्यपर बेहतरीन टिप्पणियाँ होती हैं जो हमारे समय और समाज को सही सही देखने में बड़ी मददगार हैं। इस विशेषांक के संपादक और युवा कथाकार राजीव कुमार ने अखिलेश को चुनने का कारण बताया – आज के भूमंडलीकरण के दौर में अखिलेश की कहानियां जनमानस को छूती हैं। संप्रेषण की जटिलता की चुनौतियों को स्वीकार करती हैं। उन्हें सहज बनाती हैं। इस सत्र में कथाकार अखिलेश ने अंक में प्रकाशित एक आत्म कथ्य ‘;भूगोल की कला‘; के कुछ अंशों का पाठ किया। उन्होंने कहा कि लम्बे समय तक लिखते रहने के बाद अगर मूल्यांकन होता है तो खुशी मिलती है कि उनके लेखन को समझा जा रहा है। संयोजन इप्टा के महासचिव राकेश ने किया।

आयोजन के दूसरे सत्र में ‘वर्तमान चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में साहित्यिक पत्रकारिता‘ विषय पर चर्चा हुई। बीज वक्तव्य वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव ने दिया। उन्होंने अपने विस्तृत चिन्तापरक व्याख्यान में कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता की चुनौतियां उन्नीसवीं शताब्दी में भी थी और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भी। आज इक्कीसवीं सदी में यह घोषित चुनौती है। राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र में स्थापित किया जा रहा है। सौ साल पीछे जाने पर पाते हैं कि इस धारणा के विरुद्ध आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘;सरस्वती’; में ‘;देश की बात’; पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए लिखा था लगान बंद हो जाए तो सारा तंत्र फेल हो जाये। उस समय रूस में क्रांति नहीं हुए थी। आज से सौ साल पहले जून 1915 में गणेश शंकर विद्यार्थी ने हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना से मुठभेड़ की थी। उन्होंने कहा था ऐसी कल्पना करने वाले राष्ट्र का अर्थ ही नहीं समझते। 1922 में माधवी पत्रिका में ‘;ईश्वर का बहिष्कार‘; विषय पर लेख छपे। बहुत विरोध हुआ। लेकिन पत्रिका चलती रही। 1938 में यशपाल जी की ‘;विप्लव’; पत्रिका में प्रकाशित रचनाओं को पढ़ने से ज्ञात होता है कि आज़ादी के आंदोलन में कांग्रेस और मुस्लिम लीग की क्या भूमिकाएं थीं। प्रेमचंद ने ‘;हंस’; में भीमराव अंबेडकर की तस्वीर मुखपृष्ठ पर छाप कर उनकी भूमिका को स्वीकार किया था। 

उन्होंने कहा कि उस दौर में समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा से प्रेरणा लेकर सोच निर्धारित की जाती थी। आज विचारहीनता है। बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने से सामाजिक समरसता के ढांचे को धक्का लगा और भूमंडलीकरण ने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को पीछे धकेल दिया। धनिक तंत्र की स्थापना हो गई। सामाजिक समरसता और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर लेखक बंटा हुआ है। लूट मची है। अपराधी एक एक करके छूटे जा रहे हैं। बुद्धिजीवी बंद किये जा रहे हैं या हाशिये पर धकेले जा रहे हैं। सोच बनाने वाली सभी स्वायत्तशासी संस्थाओं के शीर्ष पर संकीर्ण सोच के लोग बैठाये जा रहे हैं। लेखक कहने के लिए मजबूर हो गया है कि उसके अंदर का लेखक मर गया है। इमरजेंसी के दौरान पहल जैसी लघु पत्रिका ने आवाज़ उठाई थी। आज प्रगतिशील लेखकों का अधिग्रहण किया जा रहा है। उनका मुखपत्र सामाजिक समरसता की बात करने वाले डॉ अंबेडकर को हिंदू विचारधारा के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करता और पेरियार को हिंदू विरोधी। ऐसे में लघु पत्रिकाओं से साहित्यिक पत्रकारिता की ज़रूरत है। अपना इतिहास को खंगालें। जनतंत्र को बचाने के लिए एकजुट होकर आंदोलनकारी स्वरुप अपनाना पड़ेगा। कॉरपोरेट से स्वयं को बचाते हुए अभिव्यक्ति का भरपूर इस्तेमाल करने और आक्रामकता की ज़रूरत है।

कथाक्रम के संपादक और कथाकार शैलेंद्र सागर इतिहास में झांकने पर पाते हैं कि साहित्यिक पत्रिकायें पढ़ी जाती थीं। कुछ साल पहले तक ‘;धर्मयुग’; और ‘;साप्ताहिक हिंदुस्तान’; भले ही पूर्णतया साहित्यिक पत्रिकाएं नहीं थीं परंतु साहित्य को पढ़ने के लिए प्रेरित करती थीं। सिर्फ़ साहित्यकार ही नहीं, समाज का हर बुद्धिजीवी चिंतक था। हर दौर का शासक अपने काडर के लोगों को प्रमोट करता है। मगर आज दिक्कत यह है कि काडर के निकृष्ट लोगों को आगे बढ़ाया जा रहा है और अच्छे लोगों को पीछे धकेला जा रहा है। आज की, कल की और उससे भी आने कल की पीढ़ी किस प्रकार का साहित्य और हिंदी पढ़ रही है यह चिंता का विषय है। चिंतन करना है कि साहित्य के प्रति कैसे लोगों को आकर्षित करना है। साहित्य पत्रिकाएं आजकल जिस प्रकार के मुद्दों और विमर्श को उठा रही हैं उसमें किसान आंदोलन नहीं है, आदिवासी जीवन नहीं है। आत्महत्या के कारण नहीं बताये जा रहे हैं। नई पत्रिकाये आ रही हैं, यह शुभ संकेत है। मगर निगेटिव रचनायें छप रहीं हैं। इसका असर यह है कि गुणवत्ता प्रभावित हुई है। लेखक एक्टिविस्ट की भूमिका में नहीं है।

दिल्ली से आये अंग्रेज़ी शिक्षक डॉ आशुतोष मोहन का विचार था कि पत्रिका चाहे छोटी हो या बड़ी, अगर उसका उसका लक्ष्य साफ़ हो, फ़ोकस हो तो वार खाली नहीं जा सकता। अंग्रेजी में तो इसका सर्वथा अभाव है। उसका ज्ञान चेतन भगत तक सीमित है। इस पर उसे गर्व भी है। इसका मतलब है कि कहीं कुछ कमी है। अच्छा और जागरूक साहित्य क्या होता है, यह बताने का माध्यम आज नहीं है। ज़रूरत अच्छी और इंफार्मेटिव पत्रिकाओं की है।

‘बनास जन’ के संपादक पल्लव ने कहा कि पत्रकारिता में वह शक्ति है जो पाठक का दिमाग ही बदलने की क्षमता रखती है। उन्होंने बताया कि लखनऊ में एक चौराहे पर महाराणा प्रताप की मूर्ति देख चित्तौड़गढ़ निवासी होने पर उन्हें गर्व हुआ। लेकिन यह देखकर दुःख होता है कि उन्हें संकीर्ण धार्मिक प्रतीक के रूप में दर्शाया जाता है जबकि वे महान स्वतंत्रता प्रेमी थे। शायद लोगों को यह नहीं मालूम कि हल्दी घाटी की लड़ाई में महाराणा प्रताप का सेनापति एक मुस्लिम था और अकबर का सेनापति हिंदू था। यह न पढ़ने का परिणाम है। उन्होंने याद दिलाया कि एक बार अपने एक भाषण में नेहरू ने महाराणा प्रताप को बहुत ऊंचा स्थान देते हुए कहा था कि बाबर आक्रमणकारी था, लेकिन अकबर यही पैदा हुआ और यहीं रह गया। बाज़ारवादी शक्तियों ने हमारी रुचियों को विकृत कर दिया है। वही तय कर रही हैं कि हमें क्या खाना और पहनना है, और क्या पढ़ना है। साहित्य आदमी को अकलमंद बनाता है। वस्तुत: यह उदारीकरण का नहीं अनुदारीकरण का दौर है। उन्होंने कहा कि नए लोगों को ज्यादा से ज्यादा पढ़ना चाहिए। साहित्य में कैरियरवाद से बचें। लघु पत्रिकाओं को खरीदें और पढ़ें।

 वरिष्ठ कथाकार और ‘निष्कर्ष’ के संपादक गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव की नज़र में आर्थिक सुधारीकरण ने पूरे समाज के हर अंग को बुरी तरह से जकड़ लिया है। राजनीतिक भ्रष्टाचार बढ़ा है। कोई बचा सकता है तो साहित्य। साहित्य चेतना पैदा करता है। साहित्य के माध्यम से चेतना में स्थायी परिवर्तन संभव है। प्रेमचंद ने रचनाओं के माध्यम से लंबी लड़ाई लड़ी। उन्होंने कहा कि राजनीति नहीं, साहित्य मशाल है। साहित्य मुक्ति का माध्यम है। आज मूल्यों का अवमूल्यन हो रहा है। साहित्य इस यथार्थ को पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत करे। आज साहित्य पाठक को प्रभावित नहीं कर पा रहा है। पाठक की कल्पनाशीलता को पहचानना ज़रूरी है, तभी उसकी चेतना को प्रभावित किया जा सकता है। भूमंडलीकरण स्थानिकता, संवेदना, सहानुभूति को ख़त्म करना चाहती है। परिवार को ख़त्म करना चाहती है। हर लेखक समाज को बदलने के लिए कमिटेड होता है। अंतर्विरोधों की तलाश करें। प्रतीकों के माध्यम से चेतना को प्रभावित करें। इस संबंध में मोहन राकेश की कहानियां पढ़ी जानी चाहियें। मनुष्य और समाज को अलग करना संभव नहीं है। अपने दृष्टिकोण को ईमानदारी से प्रस्तुत करें अन्यथा अप्रासंगिक हो जायेंगे। प्रेमचंद की कहानियां समाज को दिशा देती हैं। इस सत्र का संचालन युवा कथाकार सूर्य बहादुर थापा ने किया।

हस्तक्षेप से वीर विनोद छाबड़ा की रिपोर्ट

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साठ कवियों के संकलन ‘तुहिन’ और ‘गूंज’ का लोकार्पण

नई दिल्ली : हिंदी भवन में 29 कवियों की प्रतिनिधि कविताओं के संकलन ‘तुहिन’ और 33 संभावनाशील कवियों की प्रतिनिधि कविताओं के संग्रह ‘गूंज’ का लोकार्पण किया गया। लोकार्पण प्रतिभा रक्षा सम्मान समिति करनाल के अध्यक्ष नरेंद्र अरोडा, कथाकार और पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज, काटूर्निस्ट इरफान व वरिष्ठ कवयित्री सुमन केशरी ने किया। 

 ‘गूंज’ में जिन 33 संभावनाशील कवियों की कविताओं का संकलन है उनमें शुभ्रा कुमारी की कविताओं को लोगों ने खूब सराहा। शुभ्रा कृषि से स्नातकोत्तर में प्रथम श्रेणी गोल्ड मेडलिस्ट हैं। शुभ्रा ने अपने संकलन सोचती हूं हो आउं घर, लड़कियों का सच, नहीं लगाती मैं मेंहदी, बेटियां, पहला प्यार, नेह निमंत्रण और गढ़ लेते हो शब्द में आदि का पाठ भी किया। किताब का संपादन अंजु अनु चैधरी और मुकेश कुमार सिंहा ने और प्रकाशन हिंद युग्म के शैलेश भारतवासी ने किया है। कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन कवयित्री रमा भारती और संचालन अंजु शर्मा ने किया। 

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महुआ माजी, वीरेन्द्र सारंग, मलय जैन, राम कुमार सिंह के उपन्यासों का लोकार्पण

विश्व पुस्तक मेले का छठा दिन पुस्तक लोकार्पणों के नाम रहा। राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल (237-56) में तीन किताबों महुआ माजी की ‘मरंग गोड़ा निलकंठ हुआ’, मलय जैन की ‘ढाक के तीन पात’  व वीरेन्द्र सारंग का उपन्यास ‘हाता रहीम’ का लोकार्पण किया गया। महुआ माजी की किताब ‘मरंग गोड़ा निलकंठ हुआ’ के लोकार्पण के अवसर पर बोलते हुए  वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि, महुआ माजी के इस उपन्यास का पेपरबैक में आना खुशी की बात है। पेपर बैक से ही साहित्य का भविष्य है। इस उपन्यास के महत्व पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस उपन्यास का समाजशास्त्रीय महत्व है। वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने मंगलेश जी की बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा कि, आमतौर पर आदिवासी विमर्श को सतही ढंग से देखा जा रहा था, लेकिन अब बदलाव आया है। आदिवासी समस्या लेखक समझने लगे हैं।

कवि संपादक लीलाधर मंडलोई ने कहा कि हमलोगों को भी एक खास तरीके की लिटरेसी की जरूरत है। इस किताब से मैं भी लिटरेट हुआ हूं।  आलोचक वीरेन्द्र यादव  ने इस मौके पर कहा कि, हिन्दी में इस विषय पर पहले उपन्यास नहीं लिखा गया था। इसका समाजशास्त्रीय महत्व तो है ही साथ में एक उपन्यास के रूप में भी महत्व है। विकास बनाम विनाश का प्रश्न एक साथ उठाया गया है। यह पारंपरिक कसौटी से इतर आस्वादपरक मनःस्थिति से मुक्त होकर नई दिशाओं का अन्वेषक है। कथाकार असगर वजाहत ने कहा कि, यह किताब हिन्दी साहित्य पर लगे उस आरोप का खंडन करती है जिसमें कहा गया है कि हिन्दी साहित्य मध्यमवर्ग तक ही सीमित रहा है। लेखक संपादक प्रियदर्शन ने कहा कि यह उपन्यास बहुत ही शोध कर के लिखी गयी है। इस किताब के बारे में बताते हुए उपन्यासकार महुआ माजी ने कहा कि, इस उपन्यास में मैंने विकिरण, प्रदूषण व विस्थापन से जूझते आदिवासियों की गाथा को पेश किया है। यह उपन्यास तथाकथित सभ्य देशों द्वारा किए जाने वाले सामूहिक नरसंहार के विरूद्ध निर्मित एक नई मुक्तिवाहिनी की कथा है। वास्तविक अर्थों में यह उपन्यास इक्कीसवीं सदी का और ‘आज का’ उपन्यास है।

राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित मलय जैन की किताब ‘ढाक के तीन पात’ का लोकार्पण के अवसर पर बोलते हुए आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि यह उपन्यास गांव, पुलिस, अध्यापक की पृष्भूमि लिए हुए 21 सदी में तेजी से भागते भारत और पिछड़ते भारत के अंतर्द्वंद्व की कथा है। रोचक मुहावरे में सामाजिक यथार्थ पर लिखा हुआ उपन्यास है। वहीं वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने कहा कि मलय जी का यह उपन्यास व्यंग प्रधान उपन्यास है। जब श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास ‘रागदरबारी’ 1968 में आया था तब उसने ग्रामीण भारत के यथार्थ को झकझोरा था। उसी कड़ी में यह भी उपन्यास है। मलय जी ने नई जटिलताओं को इस उपन्यास में उठाया है। लेखक मलय जैन ने कहा कि यह उपन्यास नए संदर्भों में गांव व सरकारी समस्याओं को समझने का मौका देगा।

वीरेन्द्र सारंग का उपन्यास ‘हाता रहीम’ का लोकार्पण केदारनाथ सिंह, मदन कश्यप, रंजीत वर्मा, हृषिकेश सुलभ, लीलाधर मंडलोई, कृष्ण कल्पित, पंकज चतुर्वेदी, महुआ माजी व अजंतादेव की उपस्थिति में हुआ। इस मौके पर केदारनाथ सिंह ने उपन्यास की सफलता की कामना की। स्टॉल पर निरंतर बढ़ रही पाठकों के भीड़ के बीच स्टॉल पर दिन भर स्थापित व नवोदित लेखकों का आना-जाना बना रहा। राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने सदाबहार पुस्तकों के साथ-साथ नई पुस्तकों के लिए भी पाठकों का रूझान देखकर खुशी व्यक्त की।

युवाओं के बीच ‘लप्रेक’ के चढ़े सुरूर के बीच ‘सार्थक’ ने आज विश्व पुस्तक मेले में अपनी अगली किताब ज़ेड प्लस फिल्म की औपन्यासिक कथा का लोकार्पण कराया। ‘ज़ेड प्लस’ के बारे में बोलते हुए प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि, ‘यह सिनेमा और साहित्य की दूरियों को पाटने का काम करेगी। इसकी भाषा पठनीय है। यह एक पोलिटिकल पार्स है।’ वहीं जाने माने पत्रकार रामशरण जोशी ने कहा कि, ऐसे समय में जब साहित्य और सिनेमा को लेकर परिस्थितियां जटिल होती जा रही है, वैसे में इस किताब का आना सार्थक पहल है। बतौर एक प्रयोग इस पुस्तक का बहुत महत्व है।

पाठक प्रिय कथाकार असगर वज़ाहत ने कहा कि, मुझे खुशी है कि हिन्दी सिनेमा में कुछ बढ़ रहा है। किसी निर्देशक निर्माता को यह कहानी प्रभावित की और उसने इस पर फिल्म बनाई। हिन्दी सिनेमा और साहित्य के बीच में जो दूरी है, उस पर सोचने की आवश्यकता है। कथाकार व जानकीपुल व्लॉग के संपादक प्रभात रंजन ने कहा कि, यह हिन्दी में पहला मौका है, जब किसी उपन्यास पर फिल्म पहले बनी है और उसका प्रकाशन बाद में हुआ है। अपनी किताब के बारे में बताते हुए लेखक रामकुमार सिंह ने कहा कि, ‘यह उपन्यास साहित्य व सिनेमा की जर्नी है। यह एक आम आदमी की कहानी है, जो राजनीतिक खेल से परेशान है। मुझे पूरा विश्वास है कि इस उपन्यास को पढ़ कर आप वाह! कहे बिना नहीं रह सकते। यह थ्रिलर की तरह चलती है। यह बहुत ही मज़ेदार है’।

ध्यान रहे कि ज़ेड प्लस से पहले राजकमल प्रकाशन समूह के नए इम्प्रिंट ‘सार्थक’ से तीन किताबें दर्दा-दर्रा हिमालय (अजय सोडानी), सफ़र एक डोंगी में डगमग (राकेश तिवारी) और ‘इश्क़ में शहर होना’ जिसे टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने लिखा पाठकों के बीच जबर्दस्त मांग में है। इस बावत राजकमल प्रकाशन समूह के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम ने आशा व्यक्त करते हुए कहा कि जिस तरह से सार्थक की बाकी किताबों को पाठकों से प्यार मिला है, उसी तरह इस किताब को भी स्नेह मिलेगा। ‘ज़ेड प्लस’ के लेखक रामकुमार सिंह हैं।

प्रेस रिलीज

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सरोज सिंह के पहले कविता संग्रह ‘तुम तो आकाश हो’ का लोकार्पण

8 फरवरी 2015 को इंदिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद में Saroj Singh की काव्यकृति ‘तुम तो आकाश हो’ का विमोचन हुआ। इस किताब का लोकार्पण हिंदी की मूर्धन्य कथाकार मैत्रेयी पुष्पा, दुनिया इन दिनों के प्रधान संपादक सुधीर सक्सेना, कवि सिद्धेश्वर सिंह, संस्कृत की प्राध्यापिका हीरावती सिंह तथा लेखक और साइक्लिस्ट राकेश कुमार सिंह ने किया।

‘तुम तो आकाश हो’ की कविताओं के आलोक में समकालीन स्त्री लेखन पर टिप्पणी करते हुए मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि इस समय का स्त्री लेखन काफी बेबाक हुआ है। लिखने के ख़तरे कम हुए हैं। फेसबुक जैसे नवमंचों ने इस ख़तरे को और कम तो किया ही है, साथ ही लिखने, छपने औैर पाठक तक पहुँचने की प्रक्रिया आसान भी किया है।

सरोज सिंह ने अपनी कुछ कविताओं के पाठ के साथ-साथ अपने रचनाकर्म की शुरुआत और रचना को गंभीरता से लेने की कहानी को संक्षेप में उपस्थित श्रोताओं के समक्ष रखा। संदीप सिंह ‘साहिल’ ने संग्रह की कुछ रचनाओं का प्रभावी पाठ किया। किताब पर राकेश कुमार सिंह, हीरावती सिंह, सिद्धेश्वर सिंह और सुधीर सक्सेना के अपने विचार रखे। धन्यवाद ज्ञापन सीआईएसएफ के सीनियर कमांडेंट पी.पी. सिंह ने और संचालन कवयित्री इंदु सिंह ने किया।

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रवीश की किताब ‘इश्क़ में शहर होना’ का हुआ लोकार्पण

जयपुर साहित्य महोत्सव में लप्रेक-फ़ेसबुक श्रृंखला की पहली पुस्तक इश्क में शहर होना का लोकार्पण अनूठे अंदाज में संपन्न हुआ। चारबाग मंडप में आयोजित ‘कहानी की नई करवट’ सत्र में इस पुस्तक का लोकार्पण जयपुर के युवा विद्यार्थियों ने किया। इस सत्र में लप्रेककार रवीश कुमार से कथाकार अनु सिंह चौधरी ने बातचीत की। रवीश कुमार ने अपनी किताब ‘इश्क़ में शहर होना’ से कई लघु कथाओं का पाठ किया।

जयपुर के युवाओं ने बहुत ही उत्साह के साथ इश्क़ की कथाओं का लुत्फ उठाया। इस मौके पर ‘इस मौके पर मंच पर राजकमल प्रकाशन समूह के मार्केटिंग निदेशक अलिंद महेश्वरी, संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरूपम उपस्थित थे। यह पुस्तक अमैजन डॉट कॉम पर प्री बुकिंग के लिए 13 फरवरी तक विशेष छूट के साथ उपलब्ध है।

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इला कुमार के पांचवें काव्य-संग्रह के लोकार्पण में संचालक महोदय खुद पच्चीस मिनट तक बोले

दिल्ली : वरिष्ठ कवयित्री इला कुमार के पाँचवें काव्य-संग्रह  “आज पूरे शहर पर” का लोकार्पण पिछले दिनों हिन्दी भवन / दिल्ली में किया गया.  कला सम्पदा एवं वैचारिकी की ओर से हिंदी भवन / दिल्ली में आयोजित लोकार्पण कार्यक्रम में एक विचारगोष्ठी की शुरुआत करते हुए विजयशंकर ने इला कुमार की काव्य –पुस्तकों (ठहरा हुआ एहसास, जिद मछली की, किन्हीं रात्रियों में, कार्तिक का पहला गुलाब) एवं उपन्यास तथा अनुवाद (रिल्के और लाओ त्ज़ु) के साथ-साथ उपनिषद कथाओं और हिन्दुत्व से सम्बंधित पुस्तकों का रचनाकार बताते हुए उनके महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदान की चर्चा की.

विजय शंकर ने जनमानस के मन से कविता की बढती दूरी पर चिंता व्यक्त की. कवयित्री सविता सिंह ने कविता, स्त्री विमर्श के संतुलन और सौंदर्य से अपनी बात शुरू करके कहा कि कविता के साथ  स्त्री का सम्बंध अपने सेल्फ के साथ सम्बन्ध होने जैसा है, जबकि पुरुष का कविता के साथ सम्बन्ध वैसे ही है जैसे किसी अन्य के साथ. उन्होंने इला कुमार की कविताओं में बचपन के आह्लाद और अकेलेपन की उदासी को चिह्नित किया. आलोचक ज्योतिष जोशी ने कहा, ‘मैंने पूरे संग्रह को दो-दो बार पढ़ा. इस संग्रह की कविताओं को स्त्री या पुरुष द्वारा लिखी गई न कहकर मात्र कवि द्वारा लिखित कहा जाना चाहिए. ये प्रचलित फ्रेम से हटकर लिखी गईं कविताएं हैं और यह आज की मंचीय कविता–पाठ से अलग किस्म का पाठ है.” उन्होने कई कविताओं का जिक्र किया –  समवाद, कहा मैंने शहर से, आज का कवि, मध्य रात्रि के बीच आदि. 

संचालक ओम निश्चल कार्यक्रम के संचालन के नियमों को ध्वस्त करते हुए लगातार पच्चीस मिनटों तक बोले लेकिन लोकार्पित संग्रह पर उन्होंने नहीं के बराबर बोला. साहित्यकार धनंजय कुमार ने मंच की तरफ से इस विसंगति के बारे में असंतोष व्यक्त किया.

अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री कृष्णदत्त पालीवाल ने कवि की अंतर्दृष्टि और द्रष्टा भाव के साथ-साथ कविताओं की पठनीयता की तरफ संकेत किया. उन्होंने संग्रह की कविताओं के बीच सूर्य और सूर्यबिम्बों  के दुहराव को भी इंगित किया. कविता को समर्पित इस कार्यक्रम में उमेश वर्मा, सुरेन्द्र ओझा, डा. वेदप्रकाश, मृत्युन्जय कुमार, अनुराग सचान, बिपिन चौधरी, डा. हर्षबाला, डा. प्रिया शर्मा, अनिल जोशी, सरोज जोशी, नरेश शांडिल्य, गीताश्री, अमृता ठाकुर आदि उपस्थित थे.

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त्रैमासिक पत्रिका ‘लीलटांस’ का लोकार्पण

चूरू । प्रयास संस्थान, चूरू की ओर से शुरू की गई त्रौमासिक राजस्थानी साहित्यिक पत्रिका ‘लीलटांस‘ के प्रवेशांक का लोकार्पण रविवार शाम जिला मुख्यालय स्थित सूचना केन्द्र में किया गया।  मुख्य अतिथि साहित्य अकादेमी नई दिल्ली में राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के संयोजक प्रो. अर्जुन देव चारण ने पत्रिका के लोकार्पण के बाद संबोधित करते हुए कहा कि ‘लीलटांस’ पत्रिका से उनकी यह अपेक्षा है कि वह पक्षी की तरह समग्र व विहंगम दृष्टि की वाहक और समाज व साहित्य में नए मूल्यों की स्थापना का माध्यम बने।

उन्होंने मातृभाषा की उपेक्षा का दर्द व्यक्त करते हुए कहा कि पुरखों ने पीढ़ियों की साधना से जिन शब्दों को अर्जित किया, उन्हें हम क्षण-क्षण खोते जा रहे हैं। भाषा व साहित्य को समृद्ध करने में पत्रिकाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है लेकिन पत्रिका के जरिए दृष्टि का विस्तार सामने आना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज जबकि शब्द अपना अर्थ खोते जा रहे हैं, रंजन अत्यंत मुश्किल किंतु महत्वपूर्ण काम है और पत्रिका के संपादन में यह क्षमता दिखनी चाहिए कि वह लीलटांस की तरह राग-द्वेष, माया-मोह, ईर्ष्या-प्रेम से दूर रहकर पाठकों के लिए बेहतरीन सामग्री पेश करे। उन्होंने कहा कि इक्कीसवीं सदी में चरित्रा निर्माण अत्यंत मुश्किल काम है और साहित्य यही काम करता है। पत्रिका के नामकरण पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि पक्षी का साहित्य से अत्यंत निकट का संबंध रहा है क्योंकि पक्षी करूणा जगाता है। उनकी यह कामना है कि राजस्थानी साहित्य में ‘लीलटांस’ पत्रिका गरूड़ उड़ान भरे। चारण ने कहा कि पत्रिका की सफलता में पाठकों की भी जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है कि वह संपादक को राह दिखाए तो उसका हौसला भी बढाए।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए अतिरिक्त जिला कलक्टर राजेंद्र सिंह कविया ने पत्रा-पत्रिकाओं को भाषा के विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए कहा कि ‘लीलटांस’ के जरिए नए लेखकों को सृजन का बेहतर मंच मिलेेगा। उन्होंने कहा कि चूरू जिला सांस्कृतिक व साहित्यिक गतिविधियों के जरिए पूरे देश में अपनी पहचान बनाए हुए है।  विशिष्ट अतिथि जोधपुर के वरिष्ठ साहित्यकार मीठेश निर्मोही ने कहा कि ‘लीलटांस’ के लोकार्पण को ऐतिहासिक क्षण बताते हुए कहा कि आज के समय में साहित्यिक पत्रिका निकालना खांडे की धार पर चलना है। आजादी के समय प्रांत के नेताओं में इच्छाशक्ति होती तो राजस्थानी को उपेक्षा के दिन देखने नहीं पड़ते। राजस्थानी को मान्यता नहीं होने का खामियाजा प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ रहा है।

विशिष्ट अतिथि ‘कथेसर’ के संपादक व साहित्यकार सत्यनारायण सोनी ने उम्मीद जताई कि लीलटांस संजीदा रचनाकार व पाठक तैयार करेगी। उन्होंने मेघराज मुकुल, रावत सारस्वत व किशोर कल्पनाकांत के योगदान का स्मरण करते हुए कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएं सामाजिक परिवर्तन का वाहक बनती है। जो भूमिका देश के निर्माण में एक मजदूर की होती है, वही भूमिका समाज के निर्माण में पत्रिका की होती है। उन्होंने महात्मा गांधी का कथन दोहराते हुए कहा कि मातृभाषा में शिक्षा नहीं होना किसी भी व्यक्ति के लिए आत्महत्या के समान है।

विशिष्ट अतिथि बीकानेर के लेखक-पत्राकार हरीश बी शर्मा ने कहा कि लीलटांस के जरिए राजस्थानी का नवलेखन सामने आएगा और नए रचनाकारों को प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने पत्रिका के कलेवर की सराहना करते हुए कहा कि राजस्थानी भाषा की समृद्धि की दिशा में पत्रिका मील का पत्थर साबित होगी, ऐसी अपेक्षा है। उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य का विचार महत्वपूर्ण है, लीलटांस के विचार को प्रयास के साथियों ने अपनी इच्छाशक्ति से अमली जामा पहनाया है, यह प्रेरणास्पद कार्य है।

पत्रिका के संपादक कुमार अजय ने कहा कि ‘लीलटांस’ सबकी अपेक्षा पर खरी उतरे, ऐसा उनका प्रयास रहेगा। प्रयास के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि लीलटांस से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। वरिष्ठ साहित्यकार भंवर सिंह सामौर ने आभार जताया। संचालन कमल शर्मा ने किया।  इससे पूर्व अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। हाकम अली, रामनाथ कस्वां, रामेश्वर प्रजापति, रामकुमार घोटड़, सत्यनारायण शांडिल्य, महावीर नेहरा, अनिल शास्त्राी, गुमाना राम मांझू, विकास बेनीवाल, सोहन सिंह दुलार, विकास मील, सुधींद्र शर्मा, परमेश्वर लाल दर्जी, बीरबल नोखवाल, चंद्रशेखर पारीक, राजीव स्वामी, राजेंद्र मुसाफिर, मोहन सोनी, श्याम सुंदर शर्मा, केसी सोनी, युवा जागृति संस्थान के जयसिंह पूनिया, अजीत चारण, उम्मेद धानियां ने अतिथियों का स्वागत किया। इस मौके पर बड़ी संख्या में साहित्यकार, साहित्यप्रेमी एवं नागरिकण मौजूद थे।

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महेंद्र दवेसर ‘दीपक’ के कहानी संग्रह ‘पुष्प-दहन’ का लोकार्पण

श्रीमती संगीता बहादुर के कर-कमलों द्वारा लंदन के नेहरू सेंटर में महेंद्र दवेसर ‘दीपक’ के चौथे कहानी-संग्रह ‘पुष्प- दहन’ का लोकार्पण संपन्न हुआ. कार्यक्रम के संचालक थे बीबीसी के हिंदी यूनिट के पूर्व अध्यक्ष एवं घोषक और कथा (यू.के.) के वर्तमान अध्यक्ष सर्वप्रसिद्ध साहित्यकार, श्री कैलाश बुधवार. कार्यक्रम में शामिल थीं दो विश्वविख्यात साहित्यकार, डॉक्टर कविता वाचक्नवी (कहानीकार, कवियत्री, शोधक, समीक्षक और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की परीक्षक) और श्रीमती दिव्या माथुर (कहानीकार, कवियत्री, वातायन की संस्थापक-अध्यक्ष और नेहरू सेंटर की पूर्व सीनियर प्रोग्रामर). इस अवसर पर उपस्थित थे अन्य प्रसिद्ध साहित्यकार – डॉक्टर श्याम मनोहर पाण्डे, श्रीमती उषाराजे सक्सेना, श्रीमती तोषी अमृता तथा श्रीमती शन्नो अग्रवाल.

कार्यक्रम के आरंभ में नेहरू सेंटर की निदेशक श्रीमती संगीता बहादुर ने दर्शकों की प्रचुर उपस्थिति पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की और उनका हार्दिक स्वागत किया. तत्पश्चात उन्होंने महेंद्र दवेसर का परिचय कराया और उनके साहित्यिक जीवन की चर्चा करते हुए कहा कि अपलब्धि के लिए आयु की दीवार नहीं हुआ करती. उन्होंने बताया कि उन्होंने लेखक की कई कहानियां पढ़ी हैं जो कि अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी हैं क्योंकि उनके विषय जन-साधारण के जीवन से जुड़े हुए होते हैं. उन्होंने सभा के संचालक श्री कैलाश बुधवार, डॉक्टर कविता वाचक्नवी, श्रीमती दिव्या माथुर और श्री महेंद्र दवेसर को मंच पर निमंत्रित किया.

पुस्तक के लोकार्पण से पूर्व श्री कैलाश बुधवार ने यह चिरंतन सत्य दोहराया कि कलम तलवार से ताक़तवर होती है और कहा कि हर कुशल लेखक की तरह महेंद्र द्वेसर ने इस विपुल शक्ति के प्रयोग में संसार की खूबियों, खराबियों और परेशानियों को निशाने पर रखा है. उनकी कहानियाँ जीवन से साक्षात कराती हैं और सचमुच जीवन-दर्पण हैं.

कार्यक्रम की प्रमुख वक्ता डॉक्टर कविता वाचक्नवी ने कहा कि कई बार बड़े बड़े लेखक भी अनावश्यक वर्णन के कारण अपनी रचनाओं को कमज़ोर कर देते हैं और पाठक अपने कौतुहूल में आगे jump कर जाता है. महेंद्र द्वेसर की रचनाओं में यह कमजोरी नहीं मिलती और कहानियों का बहाव बना रहता है. पुस्तक में शामिल देश-विभाजन संबंधी कहानियों ‘दो पाटन बिच आए के’ और ‘बंदिशें‘ कि चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि ये कहानियाँ आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि लेखक ने इन्हें वर्तमान में ढाल दिया है. कविता जी को पुस्तक की कोई भी कहानी कमजोर नहीं लगी. शीर्ष कथा ‘पुष्प दहन’ उन्होंने ‘रौंगटे खड़े’ कर देने वाली बताया. कविता जी ने कहा कि कहानी  ‘एक नोट सौ का’ ने उन्हें भी हिलाकर रख दिया.

श्रीमती दिव्या माथुर ने बताया कि उस शाम वे पुस्तक कि किसी कहानी का पाठ करना चाहती थीं किन्तु समय के अभाव के कारण वे ऐसा न कर सकीं. उन्होंने पुस्तक के अंत में छपीं देश-विदेश से मिली संपादकों, साहित्यकारों और पाठकों की प्रतिक्रियाएं पढकर सुनाईं. श्री महेंद्र दवेसर ने पाठकों को अपनी कहानियों के प्रेरक सूत्रों की जानकारी दी, अपनी याद से अपनी कहानियों के कुछ अंशों को सुनाया और फिर से याद दिलाया कि पुस्तक-विक्रय से उपलब्ध राशि Sutton के Royal Marsden Hospital को दी जाने वाली है. कार्यक्रम के अंत में श्री कैलाश बुधवार ने नेहरु सेंटर, कार्यक्रम की भागीदार डॉक्टर कविता वाचक्नवी, श्रीमती दिव्या माथुर और सर्वोपरी उपस्थित दर्शोकों का पुन: धन्यवाद किया.

प्रेस रिलीज.

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आईआईएमसी से निकलते ही होनहार पत्रकार हिमांशु ने ‘सही’ समय पर ‘सही’ कदम उठा लिया!

Abhishek Srivastava : स्‍वागत कीजिए Indian Institute Of Mass Communication(IIMC) से निकले इस होनहार पत्रकार Himanshu Shekhar का, जिसने ‘सही’ समय पर ‘सही’ कदम उठाते हुए पूरे साहस के साथ ऐसा काम कर दिखाया है जो अपनी शर्म-लिहाज के कारण ही सही, बड़े-बड़े पुरोधा नहीं कर पा रहे। मैं हमेशा से कहता था कि संस्‍थान में पत्रकारिता के अलावा बाकी सब पढ़ाया जाता है। बस देखते रहिए, और कौन-कौन हिंदू राष्‍ट्र की चौखट पर गिरता है।

 

युवा मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से. इस पोस्ट पर खुद हिमांशु शेखर ने जो प्रतिक्रिया दी है, वह इस प्रकार है…

Himanshu Shekhar : अभिषेक श्रीवास्तव जी से एकाध बार मुलाकात हुई है। इनके बोलचाल और लेखन से मैं इन्हें गंभीर पत्रकार ही नहीं इंसान भी समझता था। लेकिन ये सज्जन तो एक ऐसे जज की तरह बर्ताव कर रहे हैं जिसे साक्ष्यों से कोई लेेना—देना ही नहीं। उसे तो साक्ष्यों को देखने तक में अपने श्रम के जाया होने का भय है। प्रथम दृष्टया कोई मामला आया और सुना दिया फैसला। काश! अभिषेक जी आप ये फैसला किताब कम से कम एक बार देख कर सुनाते। अगर थोड़ी फुर्सत होती तो भूमिका मात्र ही पढ़ लेते। लेकिन फेसबुक पर कमेंट करने की जल्दबाजी रही होगी शायद आपको, इसलिए आपने ऐसा जहमत नहीं उठाया। खैर, इतनी जल्दबाजी में सुनाए गए निर्णय के बारे में क्या ही कहना! जब आप एक व्यक्ति का सही आकलन नहीं कर सकते तो फिर आईआईएमसी जैसे संस्थान के आकलन में गलती होना स्वाभाविक ही है।

मूल पोस्ट…

हिमांशु शेखर की किताब ‘मैनेजमेंट गुरू नरेंद्र मोदी’ का विमोचन अमित शाह ने किया

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