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दिव्य दंतमंजन विवाद : कटल फिश बोन शाकाहारी श्रेणी में आयेगा या मांसाहारी?

डॉ अरविंद मिश्रा-

बाबा रामदेव एक नये विवाद के घेरे में आ गये हैं। एक वैधानिक नोटिस में उनके दिव्य दंतमंजन में एक समुद्री जीव के अंश पाये जाने का आरोप है जिससे इस प्रोडक्ट का ‘वेज’ स्टेटस ‘नानवेज’ में बदलने की स्थिति है।

आईये एक जीवविज्ञानी की दृष्टि से इस विवाद को समझते हैं। दरअसल जिस समुद्री जीव के अंश को दंतकांति में मिलाने की बात की गयी है वह घोंघा परिवार (मोलस्का) का सेपिया (Sepia officinalis) है जिसे कटल फिश के नाम से भी जानते हैं।

नाम में फिश होने के बावजूद भी यह मछली नहीं है। सीधे इसका मांस नहीं बल्कि इसके आंतरिक अस्थि के अति अल्प अंश को दंतकांति में मिलाये जाने का उल्लेख इस टूथपेस्ट के रैपर पर है। जबकि रैपर पर हरा निशान वेज प्रोडक्ट दर्शाता है।

बहुत लोगों को यह जानकारी नहीं है कि कटल फिश बोन को ही आम व्यापारिक बोली – भाषा में समुद्र फेन कहा जाता है। कटलफिश समुद्रों में बहुतायत में हैं। जब इनकी मृत्यु होती है तो इनकी अस्थि बिना सड़े गले खराब हुये समुद्रों में तैरते रहते हैं। तटों पर भी बड़ी मात्रा में बिखरते हैं। समुद्र फेन नामकरण संभवतः इसलिये ही पड़ा है।

समुद्र फेन आम परचून या पंसारी की दुकान पर भी उपलब्ध होता है। आयुर्वेदिक दवाओं में इस्तेमाल होने के साथ ही कई भोज्य पदार्थों में भी इसका इस्तेमाल होता है। आयुर्वेदिक औषधि के रुप में इसके इस्तेमाल पर एक विस्तृत आलेख आप यहां देख सकते हैं -https://www.easyayurveda.com/2017/10/22/cuttlefish-bone-samudraphena-remedies/amp/
कुछ लोग गोलगप्पे को अधिक कुरमुरा बनाने में भी इसका अल्प मात्रा में उपयोग करते हैं।

समुद्र फेन जीवित अवस्था का कटल फिश का भाग नहीं है बल्कि उसके मृत्यु के उपरान्त का प्रोडक्ट है। इसमें 85 फीसदी कैल्शियम कार्बोनेट और सिलिका आदि मिनेरल होते हैं। कुछ पक्षियों खासकर लव बर्ड्स, बुजेरिगर और तोतों के पिंजरों में भी इसे रखा जाता है ताकि वे अपनी चोंच रगड़ते रहें और कैल्शियम का पूरक आहार भी प्राप्त कर सकें।

मेरी दृष्टि में दंतकांति में समुद्र फेन का अल्पांश अनुचित नहीं है बल्कि यह कई आयुर्वेदिक उत्पादों और दंतमंजनो के फार्मूले का एक संघटक है। हां दंतकांति के रैपर पर सेपिया (Sepia officinalis) उद्धृत है यानि जीव का नाम लिखा है जबकि उस पर कटल फिश बोन होना चाहिए था। यह भूल अवश्य है जो कानूनी दांवपेंच में इस पातंजलि प्रोडक्ट के विरुद्ध जा सकता है।

कटल फिश बोन शाकाहारी श्रेणी में आयेगा या फिर मांसाहारी यह भी विवाद का बिन्दु है। आपकी क्या राय है?


इस Cuttle fish bone के चूरे के कारण ही दंत कांति दंत मंजन कुछ खुरदुरा होता है और इसलिए दातों के डॉक्टरों की राय में यह दांतों के लिए हानिकारक होता है। यदि हम मांसाहार की परिभाषा यह रखें कि आहार की वह चीज, जो हमें जंतुओं से प्राप्त होती है, मांसाहार है, तो कटल फिश बोन का चूरा मांसाहार में आएगा, और तब जंतुओं से प्राप्त दूध और शहद भी मांसाहार में आएंगे। यद्यपि दंत कांति मंजन को हम खाते नहीं हैं, केवल मुंह में लेते हैं। -राजीव अग्रवाल

आएगा तो एनिमल ओरिजिन के अंतर्गत, आयुर्वेद में बहुत से ऐसे घटक हैं जो एनिमल ओरिजिन के हैं। इसे veg origin vs animal origin की दृष्टि से देखने पर वितण्डा ही फैलेगी। पाश्चात्य कम्पनियां E केमिकल के नाम देकर धड़ल्ले से एनिमल ओरिजिन उत्पाद मिलाते रहे हैं। -चंद्रमणि चौहान

यदि किसी जीव के किसी भी अंश का उपयोग किसी चीज में किया जाता है तो वह एनिमल प्रोडक्ट ही मानी जायेगी।वह कटल फिश की अस्थियां ही तो हैं। -रामधनी द्विवेदी

समुद्र फेन नामक यह प्रोडक्ट पूरी तरह से हमारे लोकजीवन में वेजिटेरियन के रूप में सदियों से स्वीकृत है । आयुर्वेद में भी इसका प्रयोग कर्णपीड़ा सहित विभिन्न बीमारियों के निदान में उल्लिखित है । यह विवाद रहित वेजिटेरियन है। परन्तु चूंकि बाबा को विवाद में घसीटने और पटक लगाने की वामपन्थी कसक बाकी है यूपीए किल में वृन्दावन करात के आक्रमण और बाबा के प्रत्याक्रमण से उसकी भारी बेइज्जती और हार के बाद से, इसलिये यह विवाद सुलझाया जा रहा है। -दिनेश कुमार गर्ग

It is a byproduct of dead animal formed by several metabolic reactions. People must not be confuse. -Lalit kumar chauhan

ज़ी, यह समुद्र फेन के नाम से कई भस्मो मे प्रयुक्त होता है. प्रायः सभी भस्मो मे cacium salts होते ही है. इनको थोड़ा जस्टिफाई करना पड़ेगा. -बैद्यनाथ झा

आखिरी पैरा में जो सवाल आपने उठाया है उस का उत्तर आप खुद ही दे चुके हैं. इसे शाकाहारी नहीं मान सकते. -अशोक गोयल


मूल खबर-

दिव्य दंत मंजन में जानवरों के अवशेष होने का आरोप लगाकर महिला वकील ने पतंजलि को लीगल नोटिस भेजा! https://www.bhadas4media.com/divy-dant-manjan-legal-notice/

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1 Comment

1 Comment

  1. संजय शर्मा

    May 19, 2023 at 11:11 pm

    मांस खाया जाता है तो पशु को मारकर ही खाया जाता है तो इसका ये मतलब नहीं है कि मृत घोंघा की अस्थियां हैं इसलिए ये वेज है. आयुर्वेद में नॉनवेज मान्य है और पैकिंग पर रेड मार्क्स अलाउड है सवाल तो उसका है कि नॉनवेज है तो ग्रीन मार्क क्यों किया? सवाल ये नहीं है कि क्यों मिलाया बल्कि सवाल ये है कि मिलाया तो रेड मार्क करना था।

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