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हेमंत शर्मा और अजीत अंजुम की जुगलबंदी के चर्चे हर जुबान पे…. पार्ट वन

हेमंत शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं. जनसत्ता अखबार और इंडिया टीवी न्यूज चैनल में लंबे समय तक काम करने और कई किताबें लिखने के बाद अब वे खुद का न्यूज चैनल लेकर आ रहे हैं. इस नए हिंदी न्यूज चैनल में अजीत अंजुम जी वरिष्ठतम पद पर कार्यरत लोगों में से एक हैं. सो, हेमंत और अजीत आजकल काफी वक्त साथ-साथ बिता रहे हैं, आफिस में चैनल की प्लानिंग हो या घुमक्कड़ी, सिनेमा, आयोजनों में शिरकत, दोनों साथ-साथ देखे पाए जाते हैं.

बात बस यहीं तक नहीं है बल्कि बात यहां से शुरू होती है. लौटकर हेमंत शर्मा फेसबुक पर एक लंबा चिट्ठा प्रकाशित कर देते हैं जिसके केंद्र में नायक अजीत अंजुम होते हैं. एक तो हेमंत शर्मा का बनारसी अंदाज़ में लाइव किस्सागोई और उपर से अजीत अंजुम का उसका केंद्रीय पात्र बनाया जाना, सो जनता खूब रस ले लेकर पढ़ रही है.

हालांकि अजीत अंजुम इन किस्सों में बस बहाना भर होते हैं, खुद अजीत अंजुम के शब्दों में ‘किस्सागोई के लिए मुल्ला नसीरुद्दीन जैसे पात्र के इजाद की तरह’, पर ढेर सारे लोग इन किस्सों को सच समझ बैठते हैं. किस्सागोई में सत्य और झूठ के बीच एक अर्द्धसत्य भी होता है, कल्पनाशीलता भी होती है, जिसके जरिए हेमंत शर्मा अपने कुछ पुरानी रपटों / कहानियों / किस्सों को जादुई तरीके से ताजातरीन / नया / मौलिक बनाते हुए पेश कर जनता को फंसा-पढ़ा ले जाते हैं.

भड़ास पर भी इस जुगलबंदी को पेश किया जाना जरूरी है ताकि नई पीढ़ी के पत्रकार जान समझ सकें कि पत्रकारिता दरअसल किसी सेलरी पैकेज का नाम नहीं बल्कि एक जीवनचर्या, एक जीवंतता, एक दार्शनिकता, एक समझ का नाम है जिसे जिया जाता है, सिर्फ नौकरी करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता है. पेश है पहली किश्त.

यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Hemant Sharma

मेरे मित्र Ajit Anjum भी ग़ज़ब आदमी है। ऊपर से नीचे तक एनर्जी से भरे हुए। उनके साथ कही जाना एक अजूबा अनुभव होता है। उनके फ़ोन का कैमरा उनका घातक हथियार है। जिससे लोग डरने लगे है। डोनाल्ड ट्रंप के गुस्से का ईरान की अर्थव्यवस्था पर उतना आतंक नही होगा जितना अजीत के मोबाइल कैमरे का इसकी ज़द में आने वालों पर है। कही पर किसी का वीडियो बनाने और उसे फ़ेसबुक पर लाईव करने की वे रिपोर्टरी उत्तेजना में हमेशा रहते है। अभी वे कश्मीर गए थे। गुलमर्ग से इतने वीडियो बना डाले कि होटल के वेटर हो या गाइड, घोड़े वाले हो या शिकारे वाले सबके भीतर यह डर फैल गया कि एक आदमी कैमरा लेकर घूम रहा है जो किसी का भी वीडियो बना रहा है। उनके भीतर यह भय सेना के भय से भी ज़्यादा था।

अजीत के कैमरे ने कश्मीर के टूरिज्म पर भी भयानक असर डाला। दर्जनों शिकारे वाले, सैकड़ों गाइड और हज़ारों सैलानी अनिश्चितकालीन अवकाश पर चले गए। तीन दिन में कश्मीर घाटी में अजीत जी का भय कनपटीमार और मुंहनोचवा से भी ज़्यादा हो गया था। कश्मीर के राज्यपाल के दफ्तर में इस प्रस्ताव पर गम्भीरता से विचार चल रहा है कि घाटी में पत्थरबाजी की घटनाओं पर अंतिम रोक की खातिर अजीत को सरकारी खर्चे पर खरीदे गए उन्नत मॉडल मोबाइल कैमरे के साथ मैदान में उतार दिया जाए।

उनके विडियो बनाने और लाईव करने के इस चुल्ल को देख ऐसा लगता है कि अजीत अब तो जीवन के उत्तराध्द में है वरना अगर उस ज़माने में मोबाईल फ़ोन होते तो वे अपने निजी और आत्मीय क्षणों को भी लाईव कर देते। कल हम लोगों को दो समारोह में साथ साथ जाना था। एक तो हिन्दी के सबसे ताक़तवर उपन्यास राग दरबारी के छपने के पचास साल पूरे होने पर आयोजित समारोह था जिसमें राग दरबारी पर दास्तानगोई थी। दास्तानगोई मिटती परम्परा है इसलिए हममें उसे देखने की लालसा थी। कार्यक्रम इण्डिया इण्टरनैशनल सेन्टर में था। जब अजीत जी के साथ हम वहां पहुँचे तो कुछ अता पता नहीं।

मल्टीपरपज हॉल में कुछ और चल रहा था। मुझे लगा कोई ग़लतफ़हमी हुई है। गाड़ी से निमंत्रण पत्र मँगा कर देखा तो पता चला की छपा तो यही का पता है। तभी राजकमल प्रकाशन के अशोक जी के बेटे मिले और बताया कि आख़िरी वक़्त पर वैन्यू बदल गया है। अब कार्यक्रम चिन्मय मिशन के ऑडिटोरियम में है। पूछते ताछते वहॉं पहुँचे तो बहुत भीड़ हॉल ठसाठस भरा बाहर लोग थे। चाय के साथ समोसे पकौडे सैंडविच का तगड़ा इन्तज़ाम था। मैंने सोचा राजकमल को क्या हो गया है। उनकी गाड़ी तो चाय के साथ बिस्कुट से आगे बढ़ती नहीं थी। कुछ परिचत भी मिले पर अपरिचितो की संख्या ज़्यादा थी। वह भी सूट बूट वाले अभिजात्य जिनका साहित्य से कोई नाता नहीं लग रहा था।

हमने भी प्लेट उठाई और समोसे पकौड़े भर लिए राग दरबारी के नाम पर। अजीत जी की जैसी आदत है। शुरू में कुछ खाने को मना करते है बाद में चॉंप देते है। हम समोसा खा ही रहे थे तभी पता चला कि यह आयोजन तो किसी मिसेज़ कुकरेजा की स्मृति में प्रार्थना सभा का है। कुछ ही दिन पहले वे दिवंगत हुई है। जब यह सभा समाप्त हो जाएगी, इनका स्टेज उखड़ेगा। यहीं पर राजकमल का स्टेज लगेगा तब रागदरबारी का कार्यक्रम होगा। अब अजीत असहज होने लगे आपने कहॉं फँसा दिया? मैं कह रहा था कुछ गड़बड़ है। मैंने कहा कोई बात नहीं समोसा तो खा ही चुके है। अब मिसेज़ कुकरेजा की आत्मा की शांति का प्रार्थना कर लेते है। हम दोनों ने उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना की उनके तस्वीर पर फूल चढ़ाए। और लाईन में खड़े उनके परिजनों को नमस्कार कर वापस हॉल के बाहर आए। कुकरेजा जी को शान्ति मिली या नहीं पर अपनी क्षुधा समोसे पकोड़े से तृप्त थी।

थोड़ी देर में राजकमल का समारोह शुरू हुआ। हॉल में अजीत जी ने मेरा परिचय किन्हीं सर्वानन्द जी से कराया। फिर उन्होंने इन्तज़ाम में लगी एक भद्र महिला से परिचय कराया और बताया यह सर्वानन्द की पत्नी है। उन्होंने कहा नहीं नहीं, अजीत जी आपको कोई ग़लतफ़हमी हुई है। मैं वह नहीं हूँ। बहरहाल हम दोनों ने उनसे क्षमा मॉगी। अजीत जी ने बताया गड़बड़ हो गयी पर वो भी ऐसी ही लगती है।

कार्यक्रम शुरू ही हुआ था। पहले वक़्ता थे ज्यॉं द्रेज। अजीत जी ने अपने चुल्ल के चलते मोबाईल निकाल लिया और रिकार्डिंग शुरू। थोड़ी ही देर में एक हादसा हुआ। ज़्याँ द्रेज का रिकार्डेड भाषण अजीत जी के मोबाईल से न जाने कैसे चला गया? अब हाल में दो भाषण चल रहे थे। मंच पर भी ज़्याँ द्रेज। अजीत के मोबाईल से भी ज्या द्रेज की क्लिप डेफर्ड लाइव के अंदाज में। आस पास बैठे लोग देखने लगे पर अजीत जी का मोबाईल तमाम कोशिशों के बाद भी बन्द नहीं हो पा रहा था। कई बटन एक साथ दबाने बाद वह बन्द हो पाया।

थोड़ी देर में हम वहॉं से दूसरे कार्यक्रम कमानी ऑडिटोरियम में अवध की रोशनचौकी कार्यक्रम में गए। वहॉं खुसरो से लेकर वाजिद अली शाह तक अवध की परम्परा के गीत मालिनी जी गा रही थी। यहॉं भी वे माने नहीं। उन्होंने फ़ेसबुक लाईव किया। अजीत जी को अवध की तवायफो के गाए जाने वाले गीत बहुत पंसद आए। उन्होंने बेगुसराय अन्दाज़ में दाद दी। उनका कहना था कि असली संगीत की परम्परा इन्हीं कोठों ने बचाई। अजीत के साथ यह शाम यादगार रही।

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से सिर्फ अजीत अंजुम का जवाबी कमेंट यहां प्रस्तुत किया जा रहा है….

Ajit Anjum : हेमंत जी की इसी शैली और किस्सोगाई के हम तीस सालों से मुरीद रहे हैं. इस बार उनकी किस्सागोई के किरदार हम बन गए. वो जब साक्षात भी होते हैं तो हंसते -हंसाते ही रहते हैं. जो भी उनकी जद में रहता है, वो खुद पर भी हंसना सीख जाता है. उन्होंने बाकी जो लिखा सो लिखा लेकिन मिसेज कुकरेजा की प्रार्थना सभा वाली बात पर कुछ मैं भी बता दूं. व्यंग्य विधा का लाभ लेकर उन्होंने थोड़ी छूट ले ली है. ये सब सही है कि हम आईआईसी से वापस होते हुए साईं ऑडिटोरियम पहुंचे. परिसर के बाहर ही कई जगह मिसेज कुकरेजा की स्मृति सभा की सूचना के पर्चे चिपके हुए थे. परिसर में दाखिल होते ही वापस आती भीड़ के बीच अनुराधा प्रसाद दिखीं . उन्होंने मुझे देखते ही कहा – अजीत, आप कुकरेजा के यहां आए हैं? शायद वो चौंकी होंगी कि मैं यहां कहां? मैंने उन्हें कहा कि मैं तो राजकमल प्रकाशन के कार्यक्रम में आया हूं. दुआ-सलाम के बाद आगे बढ़े तो हॉल के प्रवेश द्वार के पास समोसे, पकौड़े और तमाम तरह के खाने के सामनों के टेबल के पास सौ से ज्यादा लोगों की अपरिचित भीड़ दिखी. समझ गया कि ये दिवंगत मिसेज कुकरेजा की स्मृति सभा में आए लोग हैं. हेमंत शर्मा और मैं थोड़ी दूर पहले रुक कर खाने वालों की भीड़ की तरफ लपकते राजकमल प्रकाशन के बुलावे पर आए लोगों को देखकर मजे लेते रहे. विभूति नारायण राय भी साथ खड़े थे. रागदरबारी के कार्यक्रम में आ रहे बहुत से लोग गेट से दाखिल होते ही सीधे समोसे-पकौड़े के स्टॉल की तरफ जाते और प्लेट सजाते दिख रहे थे और हम तीनों मिसेज कुकरेजा की सभा में आ रहे अनचाहे मेहमानों पर चर्चा कर रहे थे. तभी हेमंत जी शरारती अंदाज में सक्रिय हुए. उम्र से भले ही वो पचपन पार के हों, खिलंदड़ापन में उनका जवाब नहीं. हेमंत जी मुझे करीब करीब खींचते हुए कुकरेजा परिवार की सभा में शामिल भीड़ की तरफ ले गए और कुर्सी पर जम गए. मैं संकोच में वहां बैठने से मना करता रहा लेकिन उनके सामने किसकी चलती है कि मेरी चलती. तभी उनके एक इंतजाम बहादुरी प्लेट भर समोसी -पकौड़े और कुछ सामान ले गए . खुद खाते हुए हेमंत जी की तरफ बढ़ाया तो हेमंत जी ने खुद एक समोसी चांपा और एक मुझे थमाने लगे. मैं फिर उठकर भगाने लगा कि ये गलत बात है. फिर वही हुआ. दबाव में समोसा थामने पड़ा. मुंह में डालने से पहले इधर-उधर देखा कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा. विभूती नारायण राय की नजरें तो नहीं देख रही कि हम थोड़ी देर पहले दूसरों की बात कर रहे थे, अब वही काम खुद कर रहे हैं. तब तक हेमंत जी मेरा फोटो खींच लिया , जो आज पता चला. प्लेट लाने वाले और खाने में ताक में पास आ चुके शिवेन्द्र सिंह को भी मैं कहा कि यार ये किसी मिसेज कुकरेजी की प्रार्थना सभा का इंतजाम है. शिवेन्द्र हंसाता हुआ बिना समोसा लिए दूर चला गया. प्लेट लाने वाले भाई साहब भी इधर उधर देखने लगे. लाए वो यही समझकर थे कि ये इंतजाम राजकमल वालों का होगा और हम तो गेस्ट हैं. हेमंत जी फुल मजे के मूड में थे. अरे खाओ यार. खाओ यार करके पकौड़े थमाने की कोशिश करते रहे, मैं उठकर भागा वहां से. यही हेमंत जी की अदा है.


इसके आगे के पार्ट पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

पार्ट 2 : हेमंत शर्मा और अजीत अंजुम की जुगलबंदी के चर्चे हर जुबान पे!

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पार्ट 3 : हेमंत शर्मा और अजीत अंजुम की जुगलबंदी के चर्चे हर जुबान पे!

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