‘आईएएनएस’ के नए एडिटर इन चीफ के बचाव में उनके एक करीबी ने यह लिख भेजा, पढ़ें

जनाब, आईएएनएस को उसके हाल पर क्यों नहीं छोड़ देते…. बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। बात अब निकल चुकी है। तो इसे दूर तक जाने दिया जाए। पहले न्यूजवायर में आईएएनएस के पूर्व प्रबंध सम्पादक का लेख और फिर उसकी काट में एक हिंदी पोर्टल पर लेख और अब सबसे ताजातरीन न्यूजलाउंड्री पर आईएएनएस या फिर यूं कहें उसके मौजूदा एडिटर इन चीफ और सीईओ के खिलाफ विस्तृत चीरफाड़। मैंने भी कई साल आईएएनएस को दिए हैं और इसी कारण भावनात्मक रूप से इस संस्थान से जुड़ा रहा हूं। औरों की तरह मुझे भी कौतूहल रहती है कि आईएएनएस में क्या चल रहा है और कहां इसके बारे में क्या लिखा जा रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आईएएनएस इन दिनों काफी चर्चा में है। प्रधानमंत्री को अपशब्द कहने से लेकर प्रबंधन में बदलाव (कुछ लोग कह रहे हैं कि यह मोदी के खिलाफ अपशब्द लिखने के कारण हुआ है) तक बीते सात महीनों से आईएएनएस चर्चा के केंद्र में है। आखिरकार एसा क्या हो गया है आईएएनएस में कि इसके सारे विरोधी एक साथ नींद से जाग गए हैं और एक साथ हो लिए हैं।

काफी पड़ताल के बाद पता चला कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। सभी जानते हैं कि आईएएनएस बदलाव के दौर से गुजर रहा है और कहा जा रहा है कि यह बदलाव सकारात्मक है। कुशल नेतृत्व में सही दिशा में अग्रसर इस संस्थान की तरक्की एक बार फिर दिखने लगी है। लोगों का कहना है कि कई प्रयोग हुए हैं। हो रहे हैं। आगे भी होंगे। अब तक किए गए सभी प्रयोग सफल रहे हैं और आने वाले दिनों में होने वाले प्रयोगों की सफलता की गारंटी दिखाई दे रही है।

यही कारण है कि कई ऐसी लाबियां एक साथ सक्रिय हो गई हैं, जो अब तक चुप थीं या फिर 30 साल से सक्रिय आईएएनएस की गिरती साख से खुश थीं। मैंने एक अरसा आईएएनएस में बिताया है और इसे काफी करीब से जाना है। अपने उसी आकलन के अधार पर यह कह सकता हूं कि जो दिख रहा है उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अभी आईएएनएस सबसे अच्छे दौर से गुजर रहा है। लोगों में काम को लेकर उत्साह है। नाराज वही लोग हैं, जो काम नहीं करना चाहते थे। नए एडिटर इन चीफ और सीईओ ने आते ही साफ कर दिया था कि जो काम नहीं कर सकते, वे अपने लिए रास्ता खोज लें।

एसे में जिनको रास्ता मिला, निकल लिया और जिनको नहीं मिला, रुका रहा और तेल तथा उसकी धार को देखता रहा। अपने अनुभव के आधार पर दावे के साथ कह सकता हूं कि इसमें कोई दो राय नहीं कि बीते कई सालों से आईएएनएस में बहुतेरे लोगों ने खुद के लिए एक कम्फर्ट जोन तैयार कर लिया था और वे उससे कतई निकलने को तैयार नहीं थे। इस कम्फर्ट जोन में वे बड़े खुश थे लेकिन नए सीईओ के आने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि अब एसा नहीं चलने वाला है।

लिहाजा नए एडिटर इन चीफ के आने के बाद उन्हें नहीं चाहते हुए भी इस जोन से बाहर निकलना पड़ा। इसमें उन्हें काफी तकलीफ हुई। और तकलीफ होती भी क्यों नहीं। इससे निकलने का साफ मतलब यह था कि काम करना होगा। और सच्चाई यह है कि काम करने के लिए वे राजी नहीं थे। तो फिर जाना तो होगा क्योंकि नई व्यवस्था में सिर्फ उनका ही स्वागत था, जो काम करना चाहते थे। हुआ भी यही, जो काबिल थे, कामगार थे रुके रहे और काबिल होते हुए भी कामचोर थे, वे जाने को मजबूर हुए।

आईएएनएस को करीब से जानने वालों का मानना है कि इस कम्फर्ट जोन के लिए पुरानी व्यवस्था जिम्मेदार थी। जिस संस्थान का मैनेजिंग एडिटर एक साल में तकरीबन 10 बार विदेश (ज्यादातर अमेरिका) यात्रा पर जाता हो, उसकी नैया भगवान भी नहीं पार लगता सकता। जिस संस्थान में सीनियर पदों पर बैठे लोग एक साल में 15 से अधिक बार अमेरिका और यूरोप की यात्रा कर रहे हों, उसे भगवान भी माफ नहीं कर सकता। ऐसे में जो लोग इनके नीचे काम कर रहे होंगे, उनकी मानसिक स्थित्ति का अंदाजा लगाया जा सकता है। लोग अपने हिसाब से आते थे, अपने हिसाब से काम करते थे औऱ अपने हिसाब से चले जाते थे। कल तो कल अगले घंटे क्या होना है, किसी को नहीं पता होता था।

नए एडिटर इन चीफ के आने के बाद यह स्थिति तुरंत बदल दी गई। मंथली अवार्ड की परंपरा खत्म कर दी गई, जिसे पूर्व प्रबंध सम्पादक ने आते ही शुरू किया था। इस तरह पुरस्कार देने की आड़ में चाय और समोसे बांटकर लोगों का तुष्टिकरण करने की नीति खत्म हो गई। यह भी कई लोगो को बुरा लगा। पुरस्कार के नाम पर अपने लोगों को खुश किया जाता रहा। एक विभाग का आलम यह था कि उसके कर्मचारियों को पहले से पता होता था कि इस महीने अवार्ड किसे मिलेगा।

पूर्व प्रबंध सम्पादक ने आते ही अपने आपको सुरक्षित करने और काबिल साबित करने लिए एक जबरदस्त मायाजाल बुना था। उस मायाजाल में हिंदी फिल्मों की तरह सबकुछ था, सिवाय स्टोरी (काम) के। इस मायाजाल में सब फंस गए और फिर हुआ यह कि काम करने को कोई राजी नहीं था। पूरे कुएं में ही भांग मिल चुकी थी। हर कोई जंकेट और इवेंट के नाम पर घूमने-फिरने में मस्त हो गया। अगर इसका डिस्ट्रीब्यूशन भी सही तरीके से होता तो ठीक था। आईएएनएस में काम कर रहे एक पत्रकार का कहना है कि आलम क्या था 2016 में प्रबंध सम्पादक महोदय ओलम्पिक कवर करने रियो चले गए जबकि कई अनुभवी खेल पत्रकार बेचारे मुंह ताकते रह गए। यहां तक तो ठीक था। इसके बाद तो और भी बुरा हुआ। होता यह था कि पूरी स्टोरी डेस्ट पर तैयार रहती थी और जनाब व्हाट्सअप पर कोट्स भेजकर खुद बाईलाइन ले लिया करते थे। इससे खेल डेस्क पर काम करने वालों में काफी नाराजगी थी।

बात विचारों और विचारधारा की है। आज आईएएनएस छोड़ने वाला हर इंसान एडिटर इन चीफ से नाराज है। उन्हें भला-बुरा कह रहा है। इस व्यक्ति का दोष सिर्फ इतना है कि वह एक डूबती नैया को पार लगाने की कोशिश में जुटा है। नए एडिटर इन चीफ इसे साबित करने के लिए कई नए आइडियाज के साथ आए हैं और उन पर तेजी से काम हो रहा है। प्रयोग हो रहे हैं, वे नाकाम हो सकते हैं लेकिन पहले तो प्रयोग होते ही नहीं थे। जो जैसा चल रहा है, वैसा चलने को-की रणनीति पर यह संस्थान चल रहा था, जिसने एक समय पीटीआई को हिलाकर रख दिया था।

नए एडिटर इन चीफ से उलट पुराने प्रबंध सम्पादक ने खुद को एक अच्छा मेनेजिंग एडिटर साबित करने के प्रयासों के तहत कई चीजें आजमाईं लेकिन वे सभी नाकाम रहीं। यूं कहें तो उनका हर एक कदम अपनी कुर्सी को जस्टीफाई करने के लिए था। और वह इसमें सफल भी रहे। पुराने सीईओ उनसे काफी प्रभावित दिखे लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। न तो सैलरी बढ़ी और ना ही आईएएनएस से सब्सक्राइबर बढे। और को और प्रधानमंत्री को अपशब्द लिखे जाने की घटना के बाद तो सब्सक्राइबरों की संख्या कम ही गई। आईएएनएस की क्रेडिबिलिटी पर सवालिया निशान लग गया। मंत्रालय में आईएएनएस के नाम की फाइल खुल गई और उस पर ताला तक लगने की नौबत आ गई।

एक संस्थान के लिए वे बड़े खराब दिन थे। उन दिनों आईएएनएस का तथाकथित कश्मीर प्रेम उफान पर था। भारत और मोदी से नफरत करने वाले कई कश्मीरी यहां शान के साथ पल रहे थे । इनमें से एक था- इंजमाम। उसका और आईएएनएस में लम्बे समय तक काम करने वाली अलगाववादी नेता गिलानी की नातिन रुवा शाह का एक वीडिया बीबीसी पर आया, जिसमें इंजमाम सरेआम भारत के खिलाफ आग उगलता और पाकिस्तान के समर्थन में बोलता दिखा लेकिन उसके खिलाफ कोई एक्शन नहीं हुआ। उलटे उसे कभी यहां, कभी वहां शिफ्ट किया गया ताकि वह सुरक्षित रहे।

इसी में से एक था मोदी को अपशब्द लिखने वाला कश्मीरी पत्रकार, जिसे पहले तो ब्रेकिंग न्यूज विभाग (जबरदस्ती क्रिएट किया गया विभाग) में रखा गया और जब यह आइडिया फ्लाप हो गया तो उसे प्रमोट करके ब्यूरो चीफ बना दिया गया जबकि ब्यूरो चीफ बनना किसी और को चाहिए था। अब वह शख्स (अभी विदेशी समाचार एजेंसी में काम कर रहा है और वह भी आईएएनएस के एक बेहद प्रतिष्ठित पत्रकार की पैरवी पर) गुटबाजी में जुट गया। ब्यूरो में काम करने वालों का कहना है कि उसके पास न्यूज सेंस नहीं था औऱ इसी कारण अपने काम को जस्टीफाई करने के लिए उसने अपने इर्द-गिर्द घूमने वालों की एक फौज तैयार की, जो उसके जाने और नए एडिटर इन चीफ के आने के बाद भी उसके भक्त बने रहे। इन लोगों ने मोदी के लिए अपशब्द लिखे जाने वाले मामले में इसका बचाव किया था और बाद में मौजूदा ब्यूरो चीफ को जी-भरकर परेशान करते रहे।

इनमें से कई कांटो का ताज पहने मौजूदा ब्यूरो चीफ प्रशांत सूद के साथ काम करने को राजी नहीं थे और वही करते थे, जो अपशब्द लिखने वाला शख्स उनसे कहता था। इसका एजेंडा था, आईएएनएस को पटरी से उतारना औऱ उसके काबिल साथी इस काम में शिद्दत से जुटे थे। नए एडिटर इन चीफ के आने के बाद यही वो लोग थे, जिन्हें जाने को कहा गया। अब इनकी संख्या 10 है या 12 इससे नए एडिटर इन चीफ या फिर आईएएनएस को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि नई व्यवस्था में काम करने वाले लोगों की जरूरत थी। टाइमपास करने वाले या फिर देशद्रोहियों की नहीं। पुरानी व्यवस्था में एसे तमाम तत्व खूब फले-फूले और एक दिन आया कि इन्होंने उसी थाली में छेद कर दिया, जिसमें वे सालों से खा रहे थे।

एक संगठन के तौर पर आईएएनएस हमेशा से लिबरल रहा है। मैं जानता हूं कि जो लोग आज पत्रकारों के अधिकारों के हनन की बात कर रहे हैं, उन्हें यह भी समझना चाहिए कि अपने संस्थान के प्रति पत्रकारों के कुछ कर्तव्य भी होते हैं और कर्तव्यों काहर हाल में निवर्हन किया जाना चाहिए। बीते कुछ सालों से एसा नहीं हो रहा था। पत्रकार लगातार अपने अधिकारों की बात करते रहे लेकिन नए एडिटर इन चीफ ने जब उन्हें उनके कर्तव्यों की याद दिलाई तो उनकी सांस अटक गई और उनका मानवाधिकार हावी हो गया। ये वही पत्रकार थे, जो काम नहीं करना चाहते थे लेकिन नई व्यवस्था के तहत उन्हे हर दिन स्टेरी के लिए मेहनत करनी पड़ रही थी। एसे में विरोध तो होना ही था। नए एडिटर इन चीफ को बुरा तो बनना ही था।

यह सच है कि कोई भी संस्थान आपको मुफ्त में पैसे नहीं दे सकता। एसे में जो जानते थे कि नई व्यवस्था के तहत उनकी दाल नहीं गलने वाली है, वे चुपचाप चलते बने। जिनके पास रास्ते थे, वे नए रास्ते पर चल दिए और जिनके पास रास्ते नहीं थे, उनके पास काम करने के सिवाय और कोई चारा नहीं था। काम हो रहा है और जारी भी रहेगा। नित नए प्रयोग हो रहे हैं औऱ उन पर काम चल रहा है। तमाम नाराजगी के बावजूद जो साथ रह गए हैं उन्हें नई व्यवस्था बदलाव का भागीदार बनाना चाह रही थी लेकिन वे इसके लिए राजी नहीं थे।

क्या मानवाधिकार की बात करने वाले ये पत्रकार यह नहीं जानते कि पुरानी व्यवस्था ने अपने साथ काम करने वालों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। लोगों को अंधेरे में रखा गया। इतना बड़ा बदलाव आने वाला है, इसकी भनक तक नहीं लगने दी गई। बदलाव के समय महोदय प्रबंध सम्पादक जी कैरेबियंस की यात्रा पर थे। उससे पहले सात दिनों की छुट्टी पर थे। बदलाव हालांकि 14 दिनों में नही् हुए थे और जो लोग इस बदलाव के लिए जिम्मेदार थे, वे अच्छी तरह जानते थे कि उन्हें नई व्यवस्था स्वीकार नहीं कर सकती। जनाब प्रबंध सम्पादक उनमें से एक थे। आते ही उनकी छुट्टी हो गई। यह होना था।

इससे आहत जनाब ने एक लेख के माध्यम से अपनी भड़ास निकाली। लिखा कि उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ और कई कर्मचारियों के साथ लगातार हो रहा है। जनाब ने यह नहीं लिखा कि इतने बड़े फैसले से इस संगठन के साथ सालों से काम कर रहे लोगों को अवगत क्यों नहीं कराया गया। क्या यह उन लोगों के साथ दुर्व्यवहार नहीं, जो एक मैनेजिंग एडिटर होने के नाते आपसे पारदर्शिता और अप्रेजल की चाल रख रहे थे। आईएएनएस कर्मचारियों की हालत जेट एअरवेज का टिकट खरीदने वाले उन यात्रियों की तरह हो गई, जिन्हे रेस्क्यू के लिए एअर इंडिया को सामने आना पड़ा।

नए एडिटर इन चीफ को आए अभी चार महीने भी नहीं हुए हैं। आते ही उन्होंने टाउनहाल मीटिंग में साफ कर दिया कि किसी की नौकरी नहीं जाएगी लेकिन इसका यह मतलब नहीं था कि आप कुर्सी तोड़ते रहो। उनके खिलाफ बोलते रहो। पीआर कम्पनियों को धमकाते रहो, जंकेट पर जाते रहो, दोस्तों को भेजते रहो और आपकी नौकरी सुरक्षित रहेगी। नौकरी नहीं जाएगी यह तो सबने सुना लेकिन नौकरी कैसे बची रहेगी यह कोई सुनने को तैयार नहीं था और किसी भी निजी संस्थान नें नौकरी बनाए या बचाए रखने के लिए परफार्म करना जरूरी होता है।

नई व्यवस्था में काम कर रहे लोगों का कहना है कि नए एडिटर इन चीफ के पास आइडियाज हैं और वह उन्हें इम्प्लीमेंट करना चाहते हैं और सारा विवाद इसी पर है। जनाब पूर्व प्रबंध सम्पादक के वफादार लोग आज भी आईएएनएस में बैठे हैं और वे हरगिज नहीं चाहते कि एेसा हो। न्यूजलाउंड्री में प्रकाशित लेख में इन लोगों का भी बड़ा योगदान रहा है क्योंकि इस पूरे लेख में एेसी कई बातें लिखी हैं, जिनका जिक्र सिर्फ शामल की एडिट मीटिंग में होता था। दूसरी ओर, जनाब पूर्व प्रबंध सम्पादक के पास कोई भी आइडिया नहीं था। उनके कार्यकाल में आईएएनएस ने कोई सकारात्मक बदलाव नहीं देखा। हां, देखा तो सिर्फ हर चीज का केंद्रीकरण हुआ, जो खास मकसद के तहत किया गया।

जनाब पूर्व प्रबंध सम्पादक के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वह हर काम करना चाहते थे, वह भी जो उन्हें नहीं करना चाहिए था। यहां तक कि पीआर कम्पनियों को कहा गया था कि वे किसी जंकेट के लिए जेनेरिक इन्वाइट मेल भेजें और वह भी सीधे जनाब के पास जानी चाहिए। किसी खास पत्रकार के पास नहीं, जिसे वे सालों से जानते हैं। इस सिलसिले में हरदेव ने आईएमजी रिलायंस के एक पीआर को खूब परेशान क्योंकि वह नीता अम्बानी के एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था। वह आईएएनएस से जो चाहता, आईएएनएस ठीक उसका उलट करता। यह सिलसिला तीन साल तक चलता रहा।

यह सब होता रहा और फिर शुरू हुआ एक नया खेल। यहां जनाब ने अपने खास लोगों को खुश करने की रणनीति अपनाई। किसी खास इवेंट के लिए हिंदी और अग्रेजी के दो लोग एक साथ नहीं जा सकते थे (जबकि पीआर उन्हें ले जाने के लिए तैयार होता था) लेकिन विदेश में होने वाले किसी जंकेट के लिए दो लोग (एक बीट कवर करने वाला पत्रकार और एक जनाब का खास आदमी) खुलेआम जाते थे। यह आलोचना की बात नहीं। नीति की बात है। इससे संस्थान में असंतोष बढ़ा। यह भी सुनने में आया कि लड़कियों के साथ अच्छा बर्ताव होता था (खासकर इंटरटेंमेंट की क्योंकि पुराने प्रबंधन के मुताबिक पूरे आईएएनएस में सिर्फ वही काम करती हैं) और लड़कों के साथ बुरा। यह सभी कहा करते थे। जनाब का लड़कियों के प्रति साफ्ट कार्नर था, यह किसी से छुपा नहीं था।

नए एडिटर इन चीफ पर आरोप लग रहे हैं कि वे सरकार के साथ हैं। आईएएनएस का भगवाकरण करने आए हैं लेकिन असल में ऐसा नहीं है। सुना है कि नए एडिटर इन चीफ के आने के बाद सरकार के खिलाफ भी काफी कुछ लिखा गया। रोज सरकार की नीतियों की आलोचना हो रही है। कांग्रेस के बड़े नेताओं की खबरों को प्रमुखता दी जा रही है। आम आदमी पार्टी और यहां तक की ममता बनर्जी की खबरें प्रमुखता से की जा रही हैं।

नए एडिटर इन चीफ से नाराजगी किसी और बात को लेकर है। नए एडिटर इन चीफ को करीब से जानने वाले एक पत्रकार ने कहा कि वह कहते हैं कि प्रधानमंत्री को गाली मत दो क्योंकि वह हमारा प्रधानमंत्री है। हां, उसकी नीतियों की खूब आलचोना करो। मुझे तो इसमें कुछ गलत नहीं लगता लेकिन दूसरे ओर पूर्व प्रबंध सम्पादक के कार्यकाल में भाजपा विरोधी और साथ ही साथ राष्ट्र विरोधी नीतियों पर जोर दिया गया। अलगावादियों के करीब रहे कश्मीरी युवाओं को पनाह मिली और वे जमकर उत्पात मचाते रहे। सरकार के खिलाफ, मोदी के खिलाफ अनाप-शनाप लिखते रहे। आईएएनएस में उन चीजों पर कभी लगाम नहीं लगी लेकिन अमित शाह द्वारा खबर रुकवाने का प्रयास किए जाने की घटना ने खूब सुर्खियां बटोरीं। एक प्रबंध संम्पादक होने के नाते जनाब ने इस मामले में अपना स्टैंड ले लिया था, जो उनके हिसाब से उचित था। इसके बाद उन्होंने यू-ट्यूब चैनलों और पोर्टल्स पर जाकर इसे जस्टीफाई करने की भी कोशिश की। यह दरअसल, पापुलेरिटी बटोरने की एक चाल थी।

इसमें कोई शक नहीं कि द वायर में छपा लेख जनाब की कुंठा का प्रतीक है। एसा कोई लेख मैंने नए एडिटर इन चीफ को लिखते नहीं देखा गया। किसी संगठन में तीन साल काम करने का बाद आप किसी न किसी हद तक भावनात्मक तौर पर जुड़ते हैं और उसके बारे में कभी भी, कहीं भी बुरा नहीं बोलते लेकिन जनाब ने एक बार भी नहीं सोचा कि उन्हें नौकरी पर रखने वाले डाइरेक्टर दोस्त ने जिस मेहनत से इस संस्था को खड़ा किया और संवारा है, उसका नाम खराब करते वह कितना अनैतिक काम कर रहे हैं।

अनैतिक तो उन लोगों की आवाज को दबाना भी था, जो लगातार यह शिकायत करते रहे कि पाकिस्तान के प्यार में अंधा एक कश्मीरी डेस्क पर बैठकर भारत-पाकिस्तान मैच के दौरान सरेआम भारत विरोधी बातें करता था और नारे लगाता था। जब इस सम्बंध में शिकायत की गई तो कोई एक्शन नहीं हुआ। इससे इस तरह के तत्वों का मनोबल बढ़ता गया और फिर वह हुआ जो नहीं होना चाहिए था। आईएएनएस भारत सरकार के बैड बुक में आ गया और यह सब एक व्यक्ति की जिद के कारण हुआ। प्रबंध सम्पादक होने के नाते जनाब को यह देखना चाहिए था कि देश के विरोध में नारे लगना उनकी संस्था के हित में नहीं है। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उन्हें तो बस दिन काटने थे और दिन मजे में कट रहे थे।

सबसे हैरानी की बात यह है कि यह सब पुराने सीईओ के भी समझ में नहीं आया। जैसे ही मामला बिगड़ा जनाब सीईओ पानी में लाठी पीटते दिखे। वे अनजान थे और आईएएनएस में सरकार के विरोध की आड़ में देश विरोधी ताकतें मजबूत हो रही थीं। कश्मीर से आने वाली खबरों को ब्यूरो में एडिट करके उसे सरकार विरोधी रूप दे दिया जाता और डेस्क पर बैठे पाकिस्तानी नुमाइंदे वहां की अच्छी खबरें लगातार सामने लाते रहे ओर वे खबरें प्रकाशित भी होती रहीं। डेस्क सम्भाल रहे लोगों ने भी इन कश्मीरियो को खूब पुचकारा और इसी का नतीजा था कि वे किसी से डरते नहीं थे।

अभी काफी मसाला है लिखने को लेकिन सवाल उठता है कि इससे क्या फायदा होगा। जिसको जाना है, जा चुका है। जिसको आना था, आ चुका है। वह अपनी नीतियों पर काम करेगा। जनाब ने तीन साल अपनी नीतियों पर काम किया। जनाब का आईएएनएस से अब कुछ लेना-देना नहीं। ऐसे में जनाब को चाहिए कि खुद जिएं और दूसरो को भी जीने दें। ऐसे लोगों का पैरोकार बनने से कुछ नहीं मिलेगा, जो काम करने को राजी नहीं। अब तो जनाब के पास भी काम नहीं। हां, उन सभी लोगों के पास काम है, जो आईएएनएस से निकाले जा चुके हैं या खुद छोड़ गए हैं। तो फिर जनाब को अपने काम पर फोकस करना चाहिए और आईएएनएस को उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए।

आईएएनएस में कार्यरत एक कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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Bhadas4media ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಬುಧವಾರ, ಏಪ್ರಿಲ್ 17, 2019
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