मीना कोई अकेली नहीं, भारतीय मीडिया को पूरा दलित वर्ग कुबूल नहीं!

Tahir Mansuri : बीबीसी से मीना कोतवाल को हटाए जाने की घटना को सामान्य मत समझिये. मीना अकेली नहीं हैं जिन पर यह गाज़ गिरी है बल्कि पूरा दलित वर्ग भारतीय मीडिया में अस्वीकार्य है. बीबीसी की मानसिकता पर मुझे पहले भी कोई शक नहीं था कि वह दोगले हैं, मनुवादी एजेंडे पर हैं.

बहुत से दलित और मुस्लिमों को लगता है कि बीबीसी सरीखे चैनल दलित-मुस्लिमों की आवाज़ हक़ से उठाते हैं, इसलिए यह अबतक स्पष्ट होते हुए भी अस्पष्ट था कि बीबीसी मनुवादी है. असल मे इनके दलित और मुस्लिमों के मुद्दे सामने लाने की वजह है मीडिया का कॉरपोरेट सिस्टम जहां bbc सरीखे चैनल्स पोर्टल्स को पता है कि कौन सा कन्टेंट बिक रहा है.

अब यह विडम्बना ही कहिये हमारी की कॉरपोरेट का यह मजबूत कन्टेंट सिर्फ दलित और मुस्लिम हैं. लिहाज़ा ये चैनल्स-पोर्टल्स इन वर्गों की खबरें ज़्यादा चलाते हैं जबकि इन वर्गों की पीड़ा से इन चैनल्स का कोई भी भावनात्मक रिश्ता नहीं है. मैं नहीं कहूंगा कि I stand with Meena kotwal क्योंकि बीबीसी पर इसका कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा बल्कि मैं कहूंगा बहुजन मीडिया स्थापित कीजिये, यही आखरी विकल्प इसका हल है.

Tarique Anwar Champarni : पॉलिसी के नाम पर बीबीसी में दलितों और अति पिछडों को प्रताड़ित करने वाले ब्राह्मणवादी संपादक अपने चहेतों पर पालिसी को लागू नहीं करते हैं। संपादकों की चहेती और एनडीटीवी के रविश कुमार की पैरवी से बीबीसी पहुंची सर्वप्रिया सांगवान मैग्सेसे अवार्ड जीतने पर रविश का ही इंटरव्यू लेने शुक्रवार को उनके पास पहुंची।

इंटरव्यू में सर्वप्रिया खुद कहती हैं उनकी रविश से काफी नजदीकी है। यहां तक कि एनडीटीवी के प्राइम टाइम शो में भी रविश ने अपनी सफलता का हकदार सर्वप्रिया को बताया। पूरे इंटरव्यू के दौरान सर्वप्रिया ने रविश कुमार से अपने नज़दीकी को साबित करती नज़र आई।

बीबीसी की पॉलिसी के अनुसार ये सरासर गलत है। कोई भी पत्रकार अपने परिवार या अपने जानने वालों के बारे में रिपोर्ट नहीं कर सकता है, क्योंकि बीबीसी मानती है कि ऐसा करने से रिपोर्ट की निष्पक्षता प्रभावित होती है। सर्वप्रिया के लैंग्वेज और बॉडी लैंग्वेज से भी पक्षपात नज़र आ रहा था। वह रविश कुमार से कहती हैं, “आप मेरे क़रीबी और सीनियर रहे हैं।” रविश कुमार उसी रात के अपने प्राइम टाइम शो में कहते हैं, ‘मेरी सफलता के पीछे कई लोगों का हाथ है,’ सर्वप्रिया का भी नाम लेते हुए वो उसे धन्यवाद कहते हैं।

बीबीसी में इसे अपराध माना जाता है और ऐसा करने वाले पत्रकार को निकाल दिया जाता है, साथ ही संपादक पर भी कार्रवाई होती है। पर क्या सर्वप्रिया के मामले में इस पॉलिसी का पालन हुआ? नहीं। क्यों नहीं हुआ? आप इसे बेहतर समझ सकते हैं। सर्वप्रिया के इस इंटरव्यू को बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक मुकेश शर्मा ने उसे अपने फेसबुक पर भी शेयर किया है।

एक बड़ी गलती को संपादकों के समर्थन से कैसे सही साबित किया जा सकता, यह उसका बेहतरीन उदाहरण है। कुल मिलाकर जब सवर्ण पत्रकारों की गलती और उन पर कार्रवाई की बात आती है तो बीबीसी की पॉलिसी तेल लेने चली जाती है। वाह रे ब्राह्मणवादी सम्पादकों, अपना रौब सिर्फ दलित पिछड़ों पर निकालते हो। (नोट:- अपनी संस्थान के संविधान को लतियाने वाले लोग ही उसी संस्थान के माध्यम से जब संविधान-संविधान चिल्लाते है तब बड़े क्यूट लगते है।)

सौजन्य : फेसबुक

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