मोदी के ‘जय श्री राम’ कहने का रवीश वैसे ही मज़ाक उड़ाएंगे जैसे वरुण गांधी का मज़ाक बनाया था?

Abhishek Srivastava : हां जी, तो दशहरा बीत गया। एक झंझट खत्‍म हुआ। आइए अब मुहर्रम मनाते हैं, कि दुनिया के सबसे बड़े संसदीय लोकतंत्र के सबसे ऊंचे संवैधानिक पद पर बैठे शख्‍स ने त्‍योहार के बहाने पांच बार ”जय श्रीराम” का नारा लगाया और यह कह कर कि आवाज़ दूर तक पहुंचनी चाहिए, जनता को भी ललकार दिया। ‘अपने’ रवीश कुमार कहां हैं भाई? जब प्रधानजी नारा लगा रहे थे, तब मैं सोच रहा था कि क्‍या रवीश कुमार अपने प्राइम टाइम में वैसे ही उनका मज़ाक उड़ाएंगे जैसे 2009 में पीलीभीत में वरुण गांधी द्वारा चुनावी रैली में यह नारा लगाने पर उन्‍होंने उनका मज़ाक बनाया था?

रवीश ने उस वक्‍त बुलेटिन खोलते ही व्‍यंग्‍य मिश्रित आधी हंसी में ज़ोर से कहा था ”जय श्रीराम” और उपहास किया था कि आज के ज़माने में कोई ऐसा नारा लगाए तो उस पर क्‍यों न हंसा जाए! आज वे चुप रहे। वे आदमी-आदमी का फ़र्क जो समझते हैं। लो भाई, ज़माना बदल गया। अब हंसो! ज़ोर से हंसो! रावण की तरह हंसो! इतना हंसो कि तर जाओ, हंसो और मर जाओ! या हुसैन…!!!

Anita Choudaary : रावण दहन के बहाने ही सही, जय श्री राम के हुंकार के साथ “साहेब” आखिर राम की शरण में आ ही गए… जे हुयी न बात, लेकिन आते-आते 12 साल 4 महीने और 15 दिन लग गए.. चलो कोई नहीं भले देर आये हो साहेब मगर दुरस्त जरूर आना .. अब तो बस इंतज़ार है, रामराज्य आएगा या रावण और सुपर्णनखा का जंगल राज्य कायम रहेगा.. वैसे एक बात गाँठ बाँध ली साहेब “बहुत कठिन है डगर ….., “सर्जिकल स्ट्राइक” भी काम न आया तो लग जाएगी ….

Om Thanvi : पांच रोज़ पहले प्रधानमंत्री ने अपने ही लोगों से कहा था कि सर्जिकल स्ट्राइक पर बयानबाज़ी न करें। आज लखनऊ में अपने स्वागत में “प्रतिशोधक” के रूप में लगे पोस्टरों के बीच उन्होंने जिस तरह आतंकवाद के हवाले से राम और रावण के संघर्ष का ज़िक्र किया, जिस अन्दाज़ में “युद्ध” शब्द का एकाधिक बार प्रयोग किया, गदा उठाई, तीर चलाया, सुदर्शन चक्र थामा – उसे देख क्या अब भी किसी को शक़ होगा कि सेना की बहादुरी को भाजपा नेता अपने नेता की बहादुरी का नमूना बनाकर उत्तर प्रदेश चुनाव में इस्तेमाल करने वाले हैं। विजयादशमी के दिन प्रधानमंत्री का लखनऊ जाना अपने आप में इस योजना का हिस्सा ज़ाहिर होता है। अजीबोग़रीब ही है कि “प्रतिशोधकों” वाले पोस्टरों पर भाजपा नेताओं के ढेर चेहरे मंडित थे, पर एक भी सैनिक उनमें कहीं नहीं था।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव, अनीता चौधरी और ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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