आज के ज्यादातर अखबारों ने साबित किया, नाम बड़े दर्शन छोटे

कोलकाता की घटना को दिल्ली के अखबारों में ज्यादा महत्व दिए जाने पर मैंने कल लिखा था। आज भी उसका असर दिल्ली के अखबारों में है। आज ये नहीं कहा जा सकता कि मामला सिर्फ कोलकाता का रह गया है। चुनाव आयोग का फैसला है, अंतिम चरण के चुनाव की खबर है, पहली बार हुई कार्रवाई है – तो पहले पन्ने पर रहेगी ही। आज देखते हैं कि यह सब कैसे हुआ। इन्हीं अखबारों और इन्हीं खबरों से। कल मैंने लिखा था कि हिंसा में कितने घायल हुए यह नहीं मालूम होने के बावजूद खबर को खूब प्रमुखता मिली थी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में लोग हनुमान और राम के रूप में शामिल थे पर खबर के साथ फोटो छपी – आगजनी की, अमित शाह की जिसे हम रोज देखते हैं। भाजपा के गुंडों पर आरोप था कि उन्होंने एक कॉलेज में घुसकर तोड़फोड़ की और बंगाल पुनर्जागरण के स्तंभ तथा बंगाल की मशहूर हस्तियों में एक, ईश्वर चंद विद्यासागर की प्रतिमा तोड़ दी क्योंकि कॉलेज के पास रोड शो (या अमित शाह) को काले झंडे दिखाए गए थे और डंडे फेंके गए थे। खबर इसकी भी कम थी और फोटो तो नहीं के बराबर।

द टेलीग्राफ के पहले पन्ने की खबरें और शीर्षक देखिए। बाकी से कहिए नाम बड़े दर्शन छोटे।

दिल्ली में खबर छपने के बाद माहौल बन गया था। चुनाव आयोग में दोनों प्रमुख पक्षों – भाजपा और तृणमूल कांग्रेस ने शिकायत कर दी थी। पर अमित शाह ने दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस भी की। इसमें कहा कि हिंसा की खबर सुबह से थी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। साथ ही उन्होंने कहा कि टीएमसी के लोगों ने ही झूठ फैलाने के लिए मूर्ति तोड़ी। (इसीलिए अखबारों में नहीं छपी?)। शाह ने यह भी कहा, “हमारे पोस्टर बैनर फाड़े गए। हमारे कार्यकर्ताओं को उकसाया गया। इस बारे में मैं कल लिख चुका हूं। पर जब अमित शाह कह रहे हैं कि कार्यकर्ताओं को उकसाया गया – तो क्या उनसे पूछा जा सकता है कि उकसाने पर वे हिन्सा करेंगे। विद्यासागर के दिन पूरे हुए के नारे लगाएंगे? और लगाएंगे तो आम अखबारों की खबर से ये तथ्य क्यों गायब रहेंगे? अमित शाह ने कहा कि सुबह से खबर थी कि कॉलेज से लड़के हिंसा कर सकते हैं। लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया। यहां मुद्दा यह है कि खबर आपको थी। कार्रवाई पुलिस कैसे करती? क्या आपने पुलिस को सूचना दी। मुझे ऐसी कोई खबर नहीं दिखी।

दैनिक भास्कर ने पहले पन्ने पर चुनाव आयोग की कार्रवाई को मुख्य खबर बनाया है और मुख्य शीर्षक के साथ ही कुछ छोटे फौन्ट में बताया है, आयोग ने सीआईडी के एडीजी और गृह विभाग के प्रधान सचिव को भी हटाया। आयोग के पास अपने कारण होंगे, सूचना भी होगी पर मैं अखबारों में आम आदमी के लिए छपी सूचना के आधार पर समझ रहा हूं कि अमित शाह ने आरोप लगाया कि सुबह से सूचना थी कि कॉलेज के लड़के हिंसा कर सकते हैं और चुनाव आयोग ने सीआईडी के एडीजी और गृह विभाग के प्रधान सचिव को हटा दिया। क्या यह सिर्फ संयोग है? मुझे लगता है कि नहीं, क्योंकि मैंने अमर उजाला में खबर पढ़ी है, “मोदी शाह के दबाव में आयोग : ममता”। इसे ऐसे समझिए, रोड शो का एक साधारण, लोकतांत्रिक विरोध हुआ, डंडा फेंकने जैसी हिंसा भी हुई। जवाब में भाजपाइयों ने भारी तोड़ फोड़ की। उन्हें रोकने की कोई कोशिश नहीं की गई। अगर सुबह से सूचना थी कि कॉलेज से लड़के हिंसा कर सकते हैं तो क्या भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा गया कि वे जवाबी हिन्सा नहीं करें? अगर ऐसा कहा ही नहीं गया तो क्या (जवाबी) हिन्सा के लिए शीर्ष नेतृत्व जिम्मेदार नहीं है?

यह तो स्पष्ट है कि ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ना और उनके नाम के कॉलेज में तोड़फोड़ करने से तृणमूल कांग्रेस को भी मुद्दा मिल गया है। हिंसा की कथित शुरुआत (डंडा फेंकने और काले झंडे दिखाने) इस कॉलेज से हुई। मुमकिन है यह सुनियोजित हो या नहीं भी हो – फिलहाल यह मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है भाजपाइयों ने तोड़फोड़ की और दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस करके तृणमूल पर हिंसा फैलाने का आरोप लगा रही है और दबाव बना रही है। जो कार्रवाई हुई उससे लगता है कि वह अपनी चाल में कामयाब भी है। इसी क्रम में नरेन्द्र मोदी ने आरोप लगाया है और अमर उजाला ने पहले पन्ने पर लीड के साथ छापा है, “दीदी ने घोंटा लोकतंत्र का गला : मोदी”। अमित शाह के रोड शो के बारे में कल और आज की खबरों से मुझे दीदी यानी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भूमिका नहीं दिखी। पर मोदी आरोप लगा रहे हैं।

अमर उजाला की यह खबर मुख्य शीर्षक के साथ उपशीर्षक है। मुख्य शीर्षक है, “चुनाव आयोग का सख्त फैसला प्रचार एक दिन पहले ही रोका, गृहसचिव और एडीजी को हटाया”। इस फैसले के बाद बंगाल में जो हुआ उसके लिए दीदी को दोषी ठहराने का कोई कारण नहीं है। वह भी तब जब इसपर ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया बहुत सख्त और स्पष्ट है। कायदे से उपशीर्षक वही होना चाहिए था। इसे टेलीग्राफ और इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक बनाया है। इंडियन एक्सप्रेस में मुख्य खबर का शीर्षक है, “बंगाल हीट, ईसी फ्रीज” (बंगाल गर्म चुनाव आयोग अकड़ा)। एक्सप्रेस ने चुनाव आयोग की कार्रवाई की इस खबर के साथ ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया छापी है जिसका शीर्षक है, “चुनाव आयोग भाजपा का प्रवक्ता है, मोदी और शाह से आदेश लेता है : ममता”।

द टेलीग्राफ का मुख्य शीर्षक है, बंगाल मज्जल्ड (बंगाल के मुंह पर जाब – जानवरों के मुंह पर लगाया जाता है)। उपशीर्षक है, चुनाव आयोग ने प्रचार की अवधि कम की पर मोदी की अंतिम सभाएं सुरक्षित हैं (यह इस आदेश से संबंधित अहम तथ्य है पर शीर्षक में कहां है?)। ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया का शीर्षक है, निर्णय मोदी-शाह के हैं, चुनाव आयोग के नहीं। द टेलीग्राफ ने यह भी छापा है कि अमित शाह ने प्रेस कांफ्रेंस में ईश्वर चंद विद्यासागर की प्रतिमा तोड़े जाने पर क्या दावा किया और उपलब्ध वीडियो से क्या पता चलता है। पूरे मामले को ठीक से समझाने-बताने के लिए सबसे अच्छी प्रस्तुति दैनिक भास्कर की है। पूरे मामले को आप भी कायदे से समझ सकें इसलिए मैं बता रहा हूं कि भास्कर ने क्या कैसे लिखा है और फिर कुछ बाकी रह गए अखबारों के शीर्षक बताऊंगा और आप समझ सकेंगे नाम बड़ा दर्शन छोटे अखबारों पर सही अर्थों में लागू है। सबसे ऊपर है, बंगाल में चुनाव हिंसा से कार्रवाई तक के 25 घंटे। इसमें अखबार ने चार कार्रवाइयों की चर्चा की है। ये हैं : 1 अमित शाह बोले-मुझ पर हमले हुए, सीआरपीएफ न होती तो नहीं बच पाता 2 ममता ने कहा- विद्यासागर की मूर्ति भाजपा ने तोड़ी, सबूत हैं 3 भाजपा कोलकाता से दिल्ली तक मूक धरने पर बैठी रही और 4 आखिरकार चुनाव आयोग ने प्रचार बंद करने का फैसला किया। इसके नीचे, मुख्य खबर का शीर्षक है – बंगाल में तय समय से 19 घंटे पहले आज रात 10 बजे से प्रचार बंद, देश में ऐसा पहली बार।

कांग्रेस नेता अहमद पटेल और माकपा नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि अगर हिंसा को देखते हुए प्रचार रोकने की नौबत आ गई तो आयोग गुरुवार तक इंतजार क्यों कर रहा है? कोलकाता की हिंसक घटनाओं के आरोप में पुलिस ने अमित शाह और भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज कीं। दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा समेत 58 लोगों को कोलकाता में गिरफ्तार किया। हालांकि बाद में बग्गा को छोड़ दिया गया। इन सबके बावजूद टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड का शीर्षक है, “चुनाव आयोग ने पहली बार सातवें चरण के प्रचार अभियान की मियाद एक दिन कम की”। हिन्दुस्तान टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, “बंगाल में जबरदस्त भिड़ंत के बाद प्रचार अवधि कम की गई”। (हिन्दी) हिन्दुस्तान में शीर्षक है, “बंगाल में एक दिन पहले प्रचार बंद होगा”। नवभारत टाइम्स का शीर्षक है, “हिंसा के बाद चुनाव आयोग का ऐतिहासिक फैसला, दो टॉप अफसरों के तबादले”। मुख्य शीर्षक जबरदस्ती की तुकबंदी है। और ऐसी नहीं कि उल्लेख किया जाए। नवोदय टाइम्स में शीर्षक है, “अब बंगाल में एक दिन पहले खत्म होगा प्रचार”। जागरण का शीर्षक भाजपा के लिए सबसे अनुकूल है, “बंगाल के दो शीर्ष अफसर हटाए गए”। उपशीर्षक है, “निर्वाचन आयोग ने राज्य में चुनाव प्रचार के 19 घंटे घटाए, पहली बार उठाया ऐसा कदम”। और तीसरी लाइन है, “सीआरपीएफ नहीं होती तो मेरा बचना मुश्किल था : शाह”। इसके साथ एक कॉलम की एक छोटी सी खबर है जिसका विस्तार अंदर के पन्ने पर है। यह पूरे मामले पर ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया है, “चुनाव आयोग की कार्रवाई पर ममता का पक्षपात का आरोप”।

आज की इन खबरों के साथ कल की खबरों पर गौर करके आप पूरे मामले को समझ सकते हैं। भाजपा ने एक साधारण विरोध के जवाब में तोड़फोड़ कर अखबारों की मदद से उसे बड़ा मामला बना दिया और दिल्ली में (दैनिक भास्कर के अनुसार कलकत्ता से दिल्ली तक) विरोध प्रदर्शन आयोजित कर दबाव बनाया। कार्रवाई से लगता है कि उसमें कामयाब रही। ममता बनर्जी के आरोप को न भी मानें तो आज की कार्रवाई से ममता प्रशासन पक्षपातपूर्ण तो लगता ही है। यहां गौरतलब है कि चुनाव होते रहे हैं। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस चुनाव मैदान में रही है। नई तो अमित शाह और भाजपा की जोड़ी ही है। फिर भी हिंसा और चुनाव प्रचार में भाषा खराब होने का आरोप उसपर नहीं है – यह है उसका चुनावी प्रबंध। दूसरी बात यह है कि पिछली बार विदेशी बैंकों से कालाधन लाकर सबको 15 लाख देने का जुमला था और उसका अच्छा असर था तो भाजपा को चुनाव जीतने के लिए दूसरे उपाय नहीं करने पड़े। वो सब इस बार दिख रहे हैं। उसमें अखबारों का भरपूर उपयोग शामिल है।

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Comments on “आज के ज्यादातर अखबारों ने साबित किया, नाम बड़े दर्शन छोटे

  • ओम प्रकाश सिंह says:

    इस खबर के लेखक का नाम उल्लेख नहीं है। उन्हें मैं सुझाव देना चाहता हूं कि किसी भी मुद्दे पर लिखने से पहले उसके बारे में जानना और गहन अध्ययन बहुत जरूरी होता है। बंगाल की मरु पत्रकारिता पर आप ऐसे ही कलम उठा कर चला नहीं सकते, बहुत कुछ जानना पड़ता है। लेखक ने इस मामले में जो लिखा है उस बारे में उनकी जानकारी शुन्य हैं और लेख भी पूरी तरह से दिशाहीन है।

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    • Arun Pandey says:

      ओम प्रकाश जी, आपका कहना सही है। लेखक महोदय के बारे में आपने सही आकलन किया है।

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