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दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करके कराया गया प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का चुनाव!

यशवंत सिंह-

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, कंपनी अधिनियम: 1956 के अंतर्गत आता है। इस प्रकार से प्रेस क्लब ऑफ इंडिया एक पंजीकृत कंपनी है। ‘साधारण वोटिंग सदस्यों को कंपनी का शेयरधारक माना जाता है’। यानी कि कंपनी अधिनियम के अनुसार, कोई भी नया सदस्य/शेयरधारक अपनी सदस्यता की तारीख से एक वर्ष तक वार्षिक आम निकाय की बैठकों और चुनावों में वोट नहीं डाल सकता है। यही कानून प्रेस क्लब ऑफ इंडिया पर भी लागू होता है; जो माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के 2010 के आदेशों का उल्लंघन कर रहा है।

इसे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के पूर्व महासचिव संदीप दीक्षित और निर्निमेश कुमार, जो उस समय ‘दी हिंदू’ के कानूनी संवाददाता थे, द्वारा प्राप्त किया गया था। विनय कुमार, संदीप दीक्षित और निर्निमेश ने ‘दी हिंदू’ में काम किया हुआ है। 2010 में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक ‘निर्देश और आदेश’ दिया कि 2008 से कोई भी नया सदस्य 2010 के चुनावों में मतदान में भाग नहीं ले सकता है।

ऐसा कहा जा सकता है कि ‘परिवर्तन’ की बात करने वाल, वामपंथी समूह द्वारा दिया गया ये नारा, कभी वास्तव में लागू नहीं किया गया। 2010 से इस कथित वामपंथी समूह ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के प्रबंधन पर एकाधिकार जमा लिया है। वहीं ‘दिल्ली उच्च न्यायालय का आदेश’ जो इस वामपंथी समूह ने लिया था, आज तक उस पर अमल नहीं कर पाया है। यह न्यायालय की अवमानना है! 2010 के चुनाव दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त ‘पर्यवेक्षक’ के अधीन हुए थे।

हालाँकि, संदीप दीक्षित को दी हिंदू और दी ट्रिब्यून से बर्खास्त कर दिया था, लेकिन वो ही माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेशों के इन उल्लंघनों का मास्टरमाइंड है।

निर्निमेश कुमार को पिछले कुछ वर्षों से क्लब की सदस्यता से ही बर्खास्त कर दिया गया है क्योंकि वे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के भीतर गलत कामों पर सवाल उठाते रहे हैं। जब प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के वरिष्ठ सदस्य प्रबंधन समिति के निर्णयों पर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें बिना ‘कारण बताओ नोटिस’ के मनमाने ढंग से निष्कासित कर दिया जाता है।

यह एक स्पष्ट साज़िश है कि नए सदस्यों को ‘साधारण श्रेणी सदस्यता’ में नामांकित किया जाता है ताकि वे इस प्रबंधन के पक्ष में अपना वोट दे सकें। इस प्रकार ये 500 से 600 नए सदस्य प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के इस वामपंथी माफिया के ‘ब्रिटिश पॉकेट बोरो’ (जो ब्रिटेन में लेंडलॉर्ड के नुमाइंदे थे) की तरह बन जाते हैं।

एक समूह जो ‘परिवर्तन’ की मांग कर रहा था, वह अपनी अवैधानिक मनमानी से ‘परिवर्तन’ की अनुमति नहीं दे रहा है। अब दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनाव याचिकाएँ दायर करके प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के इन चुनावों को चुनौती देने का समय आ गया है, जहाँ वे ‘ताश के घर’ की तरह ढह जायेंगें!

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में तथाकथित चुनाव महज़ एक दिखावा और संसाधनों तथा समय की बर्बादी है। ऐसा संभव नहीं है कि एक ही पैनल, लगातार 12 साल से जीते! यह मनमानी और तानाशाही है। जितेंद्र सिंह क्लब का कर्मचारी है और क्लब में सदस्य के वित्तीय योगदान से अपना वेतन प्राप्त करता है, तो वह निर्णय कैसे ले सकता है? उसकी पीसीआई के सभी सदस्यों के प्रति जवाबदेही है। विनय कुमार के संरक्षण के कारण वह एक निर्णयात्मक अफसर की तरह व्यवहार करता है?

एक समय था जब प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, बौद्धिक सामूहिक केंद्र था। अब नाज़ी, हिटलर के कानसंट्रेशन शिविर का केंद्र बन गया है, जहां बोलने, व्याचारों को व्यक्त करने की आज़दी, लोकतांत्रिक मूल्यों व क्लब संस्कृति की गरिमा पूरी तरह से खत्म हो गई है व धूल-धूसरित हो गई है।

(श्रृंखला जारी रहेगी)

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1 Comment

1 Comment

  1. Ravindra nath kaushik

    October 12, 2023 at 5:59 am

    आप तो अंदर तक घुसे हैं ‌ हमें तो देहरादून में ही पता है कि ये वामपंथी गिरोह के चंगुल में है ‌ । पत्रकारिता करते 50 साल हो गए, दिल्ली भी आते जाते हैं, पत्रकार संगठनों में भी 25-30 साल दिये हैं लेकिन कभी इस क्लब को देखने की भी इच्छा नहीं होती।
    आपकी श्रृंखला रूचिपूर्ण और रोचक है।

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