राकेश सिन्हा ने कहा है कि वे जनसत्ता में कभी नहीं रहे… फिर सच्चाई क्या है…

Sanjaya Kumar Singh : भूल सुधार… एक पोस्ट में मैंने लिखा कि भाजपा के विचारक राकेश सिन्हा जनसत्ता में थे। परिचित हैं। उसे भड़ास4मीडिया ने प्रकाशित किया और अपने ट्वीटर पर भी। राकेश जी ने कहा है कि वे जनसत्ता में कभी नहीं रहे। मैंने चेक कर लिया। मुझे ही गलत याद था और मैं उन्हें जनसत्ता का स्ट्रिंगर समझता था। पर चूंकि स्ट्रिंगर और स्टाफर के तकनीकी अंतर को मैं नहीं मानता इसलिए मैंने लिख दिया था कि वे जनसत्ता में थे।

मैंने चेक कर लिया वे वाकई जनसत्ता में नहीं रहे। उनकी एकाध खबरें (उनके नाम के साथ) जरूर छपीं हैं पर वे स्टाफ में तो नहीं ही थे और इनकार कर रहे हैं तो स्ट्रिंगर भी नहीं थे। असल में वे ऑफिस आते-जाते थे और रिपोर्टिंग कक्ष में पाए भी जाते थे तभी की हाय हलो है। मुमकिन है अब उन्हें याद नहीं होगा तो परिचित भी नहीं हैं। हालांकि मुझे इसी से भ्रम हुआ। असल में हम जैसों के कांफिडेंस (जिसे मैंने भ्रम लिखा है) का कारण यह है कि उन दिनों जनसत्ता में खबर के साथ किसी का एक बार नाम छप जाता था तो वह उसी को लेकर घूमता और दिखाता था, सीना ठोंककर कहता भी था कि वह जनसत्ता में है।

लोग बाग पूछते कि वो तो वहां है, ऐसा है, वैसा है, जनसत्ता में कैसे है तो हमीं लोग बताते रहते थे कि नहीं स्ट्रिंगर है, फ्रीलांसर है (अंशकालिक कर्मचारी) आदि। आम लोग तो तब ना इसका अंतर जानते थे ना समझते थे। आपस में भी बुरा लगता था कि एक ही काम के लिए किसी को ज्यादा वेतन आई कार्ड (कनवेयंस अलाउंस भी, जो मुझे नहीं मिलता था और बहुत तकलीफ रही) सब कुछ और किसी को कुछ नहीं। राकेश जी मना कर रहे हैं कि जनसत्ता में नहीं थे तो मैं इसकी पुष्टि करता हूं और इसके लिए खुले दिल से उनकी प्रशंसा भी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Ajay Setia राकेश सिंहा कभी जनसत्ता में नहीं थे. वह इंडियन एक्सप्रैस में लिखा करते थे.

Sanjaya Kumar Singh ये तो और नई जानकारी है। मुझे लगता है उम्र का असर मेरी याद्दाश्त पर पड़ रहा है।

Ajay Setia मैने आप की पोस्ट में उन का नाम पढा तो आश्चर्य हुआ.लेकिन जानबूझकर टिप्पणी नहीं की थी. आईएएस की भागदौड के बाद राकेश सिन्हा करीब करीब उन्हीं दिनों में दिल्ली विवि में अध्यापक हो गए थे.

Sanjaya Kumar Singh दिल्ली विश्विद्यालय के एक कालेज में पढ़ाते हुए सुधीश पचौरी जनसत्ता में नियमित कॉलम लिखते थे और दफ्तर कम आते थे। आप बता रहे हैं कि राकेश जी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे और मुझे याद है कि वे जनसत्ता दफ्तर (अब मैं एक्सप्रेस बिल्डिंग कहूंगा) सुधीश जी के मुकाबले तो बहुत ज्यादा आते थे (एक समय)। फिर भी यह विवाद का मुद्दा नहीं है। एक्सप्रेस बिल्डिंग आने वालों का हिसाब नहीं रखा जा सकता है। अरुण शौरी लिख चुके हैं कि लोग भ्रष्टाचार की पूरी फाइल रीसेप्शन पर छोड़ जाते थे फिर फोन करके बताते थे कि फाइल छोड़ आया हूं।

Ambrish Kumar वे दूसरे राकेश सिन्हा है अक्सर शाम को सुशील सिंह के साथ प्रेस क्लब में मिलेंगे वे एक्सप्रेस थे और एक तीसरे भी हैं जो अब एक्सप्रेस में हैं तीसरे वाले ब्यूरो में हम लोगो के समय से है अब प्रमोशन हो गया है.

Ramendra Jenwar जनसत्ता मेँ नहीँ थे तब तो उनका जीवन ही बेकार है उन्हेँ पत्रकार नहीँ माना जा सकता…जैसे देशभक्ति का प्रमाणपत्र सँघ कार्यालय से मिलने पर ही मान्य होता है ऎसे ही पत्रकारिता का जनसत्ता से.

Sanjaya Kumar Singh नहीं उनके साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है। वो पत्रकार होने का दावा भी नहीं करते और इस खंडन के बाद तो लगता है, पहले भी ऐसा कोई शौक नहीं रखते होंगे। आप किसी और का गुस्सा किसी और पर निकाल रहे हैं।

Mohd Zahid जहाँ भी थे या हैं, एक नंबर के छूठे और मक्कार हैं।

Kumar Bhawesh Chandra वह अपने रवि प्रकाश के अच्छे मित्र हैं। 20 आशीर्वाद (अस्तबल) में आना जाना था। इस नाते हम सभी उन्हें तभी से जानते हैं।

Ambrish Kumar तब उन्हें कोई नहीं जानता था, अब वे किसी को नहीं पहचानते हैं हिसाब बराबर. वे जनसत्ता में भी आते / मंडराते थे पर उसका अब कोई अर्थ नहीं.


मूल पोस्ट….

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