संपादक पर ठगी के विज्ञापन का दायित्व क्यों न हो?

Vishnu Rajgadia : संपादक पर ठगी के विज्ञापन का दायित्व क्यों न हो? किसी राज्य में भूख से किसी एक इंसान की मौत होने पर राज्य के मुख्य सचिव को जवाबदेह माना गया है। जबकि मुख्य सचिव का इसमें कोई प्रत्यक्ष दोष नहीं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने सीधे मुख्य सचिव पर दायित्व सौंपा है ताकि राज्य की मशीनरी दुरुस्त रहे।

इसी तरह, अख़बार में विज्ञापन छपवाकर कोई ठगी की जा रही हो, तो इसकी जाँच करके इसे रोकने का पहला दायित्व उस अख़बार के संपादक पर है। ध्यान रहे कि उसी ठगी के पैसे से विज्ञापन की राशि का भुगतान होता है। यानी ठगी से अर्जित लाभ का शेयर अख़बार को भी मिलता है। ठगी के शिकार बेरोजगार अगर अख़बार से विज्ञापन की राशि की वसूली की मांग करें, तो क्या इज्जत रह जायेगी अख़बार की?

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार विष्णु राजगढ़िया की एफबी वॉल से. कुछ प्रमुख कमेंट्स यूं हैं :

Krishna Mohan आज का संपादक बेबस और लाचार होता है। वह किसी भी विज्ञापन पर रोक नहीं लगा सकता। यदि विज्ञापन पर रोक लगाने की कोशिश करेगा तो उसी समय उसकी छुट्टी हो जायगी। पहले संपादक ने नाम पर अखबार बिकता था। संपादक अखबार का स्टैंडर्ड बनाए रखता था ।विज्ञापन के लिए वह अपने हिसाब से जगह दिया करता था। अब वैसी बात नहीं है। अब यदि संपादक की वजह से विज्ञापन छूट जाएगा तो उस पर कार्रवाई हो जायगी। संपादक हमेशा अपनी नौकरी बचाने के ही चक्कर में लगा रहता है। यही कारण है कि जैकेट टाइप का विज्ञापन प्रचलन में आया है। ऐसी स्थिति में विज्ञापन के लिए सीधे तौर पर प्रबंधक को दोषी माना जाए किसी संपादक को नहीं।

Vishnu Rajgadia : Krishna Mohan jee, संपादक अगर किसी विज्ञापन को रोक नहीं सकता, तब भी वह उस ठगी के विज्ञापन की असलियत बताने वाली खबर तो छाप सकता है न! आखिर उसकी भी कोई सामाजिक जिम्मेवारी है।

शैलेंद्र शांत : प्रबंधक या प्रकाशक पर

Vishnu Rajgadia शैलेन्द्र शांत जी, प्रबंधक और प्रकाशक तो धंधे के लिये ही बैठे हैं। लेकिन संपादक तो नैतिकता और देश हित की बात करता है न!

शैलेंद्र शांत : अब आप तो ऐसा न कहें, सम्पादक खबरों-सम्पादकीय सामग्री के लिये जिम्मेदार होता है। अगर सम्पादक मालिक भी हो तो वह तय कर सकता है।

Vishnu Rajgadia अख़बार में छपे हर शब्द की जिम्मेवारी संपादक पर है। विज्ञापन की भी। यह तो कानूनी बात है। कोई केस कर दे समझ जाएंगे संपादक जी।

शैलेंद्र शांत : इसी से बचने के लिये डिस्कलेमर छापा जाने लगा है !

Vishnu Rajgadia जैसे होटल में खाना में जहर डालकर दे दे और बिल में लिखा हो कि पानी की जाँच आप खुद कर लें?

Anami Sharan Babal एड में क्या छप रहा है इससे मेरे ख्याल से संपादक का कोई लेना देना नहीं होना जरूरी है क्या छप रहा हैयह सरकार का अधिकार है। यहीं पर से तो पत्रकारिता चालू होती है यदि सरकार कोई भी झूठ छपवाने के लिए आजाद है तो संपादक भी अपने रिपोर्टरों को एक निर्देश दे कि हमें इस एड की असलीयत पर खबर चाहिए । यह काम कोई रिपोर्टर स्वत विवेत से या संपादक क्यों नहीं करते । संपादक अपना धर्म अदा करे सब काम सरकार और कोर्ट पर नहीं एक पत्रकार का काम यही तो है कि झूठ को बेपर्दा करे तो करे कौन रोक रहा है। पर यहां पर तो सरकार के खिलाफ लिखते पेशाब आने लगती है कि कहीं एड ना बंद हो जाए तो क्या खाक खाकर लिखएंगे

Bips Ranchi अखबार सिर्फ विज्ञापन पेज पर यह लिखना छोड़ दे कि ”छापे गये विज्ञापन की जाँच कर लें, अखबार की किसी प्रकार की जिम्मेदारी नहीं” तब देखिये

Vishnu Rajgadia इस लिखने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अगर किसी विज्ञापन के कारण ठगी का शिकार व्यक्ति चाहे तो ठग गिरोह के खिलाफ केस करते हुए विज्ञापन की राशि में से अपनी राशि की वसूली की मांग कर सकता है।

Bips Ranchi गुरु जी मेरा कहना है की “जाँच” रीडर क्यू करे? वो तो अखबार के भरोसे उस विज्ञापन पर भरोसा कर बैठता है. अगर जिमेदार सम्पादक / अखबार नही तो सर्वेयर से सर्ये क्यू करवाते है की कौन अखबार पढ़ते या बूकिँग करवाना चाहते है. स्तर गिर रहा है गुरु जी सभी अखबार है. जैसे की वो बोला जाता है ना… दारोगा का मतलब क्या होता है ? दा रो गा : रो के दा या गा के दा. देना तो होगा. वोही हाल सभी अखबार का है. विज्ञापन चाहे कोई भी हो सिर्फ पैसा आना चाहिये.

Suraj Khanna आपने बिलकुल सही पकड़ा है मेरे ख्याल से अख़बार हम खरीद कर पढ़ते है यानि अखबार एक वस्तु है जिसे मूल्य देकर ख़रीदा गया यानी खरीददार एक उपभोक्ता है अतः उसके द्वारा ख़रीदे गए अखबार के भ्रामक विज्ञापन से कोई ठगा जाता है तो उसे अखबार के विरुद्ध उपभोक्ता फोरम में शिकायत करनी चाहिए साथ ही अख़बार के विरुद्ध मुकद्दमा दर्ज करानी चाहिए।

Vishnu Rajgadia यह भी सही है।

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डीएवीपी की विज्ञापन नीति में ये कैसा संशोधन!

विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) की विज्ञापन नीति में पहले भारत सरकार की ओर से देश की तीन बड़ी संवाद समितियों को वरीयता दी गई थी, साथ में सभी समाचार पत्र-पत्रिकाओं से कहा गया था कि इन तीन में से किसी एक की सेवाएं लेना अनिवार्य है। जैसे ही यह निर्देश डीएवीपी की वेबसाइट पर आए, देशभर में जैसे तमाम अखबारों ने विरोध करना शुरू कर दिया। यह विरोध बहुत हद तक इस बात के लिए भी था कि क्‍यों समाचार पत्रों के लिए सरकार की इस विज्ञापन एजेंसी ने अंक आधारित नियम निर्धारित किए हैं। इन नियमों के अनुसार प्रसार संख्‍या के लिए एबीसी या आरएनआई प्रमाण पत्र होने पर 25 अंक, समाचार एजेंसी की सेवा पर 15 अंक, भविष्‍य निधि कार्यालय में सभी कर्मचारियों का पंजीयन होने पर 20 अंक, प्रेस कॉन्‍सिल की वार्ष‍िक सदस्‍यता लेने के बाद 10 अंक, स्‍वयं की प्रेस होने पर 10 अंक और समाचार पत्रों के पृष्‍ठों की संख्‍या के आधार पर अधिकतम 20 से लेकर निम्‍नतम 12 अंक तक दिए जाएंगे।

इस नई विज्ञापन नीति के आने के बाद से जैसे ज्‍यादातर अखबारों को जो अब तक स्‍वयं नियमों की अनदेखी करते आ रहे थे, लगा कि सरकार ने उन पर सेंसरशिप लागू कर दी है। कई छोटे-मध्यम श्रेणी के अधिकतम अखबारों के साथ कुछ एजेंसियों को भी पेट में दर्द हुआ, जिन्‍हें अपने लिए इस नीति में लाभ नहीं दिख रहा था। बाकायदा विरोध-प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया । एक क्षेत्रीय समाचार एजेंसी ने तो इसमें सभी हदें पार कर दीं । वह अपने खर्चे पर छोटे-मंझोले अखबार मालिकों को दिल्‍ली ले गई और अपनी ओर से कई दिनों तक विरोध प्रदर्शन करवाया।

यहां प्रश्‍न यह है कि सरकार को इस नीति को लाने की जरूरत क्‍यों आन पड़ी ? क्‍या सरकार को यह नहीं पता था कि अखबारों से उसकी सीधेतौर पर ठन जाएगी । यह तय था कि जिस मोदी सरकार के बारे में कल तक ये अखबार गुणगान करने में पीछे नहीं थे, देश में इस नई विज्ञापन नीति के लागू होते ही समाचार पत्र सीधे सरकार के विरोध में खड़े हो सकते हैं। वास्‍तव में यदि इन सभी का उत्‍तर कुछ  होगा तो वह हां में ही होगा। क्‍योंकि सरकार, सरकार होती है, उसके संसाधन अपार हैं और उसे ज्ञान देने वालों की भी कोई कमी नहीं होती, इसके बाद यह जानकर कि आने वाले दिनों में नई विज्ञापन नीति के लागू होते ही सबसे पहले सरकार का विरोध होगा, यह नीति डीएवीपी ने लागू की।

देखा जाए तो जिन लोगों को ये नहीं समझ आ रहा है कि क्‍यों सरकार ने आ बैल मुझे मार वाली कहावत को अपनी इस नीति के कारण चरितार्थ किया, तो उन्‍हें ये समझ लेना चाहिए कि सरकार इस रास्‍ते पर चलकर देश के उन तमाम कर्मचारियों का भला करना चाहती थी, जो किसी न किसी अखबार के दफ्तर में वर्षों से काम तो कर रहे हैं लेकिन उनका पीएफ नहीं कटता। जीवन के उत्‍तरार्ध में जीवन यापन के लिए कहीं कोई भविष्‍य नि‍धि सुरक्षित नहीं है। वस्‍तुत: सरकार इस नियम के माध्‍यम से देश के ऐसे कई लाख कर्मचारियों का भविष्‍य सुरक्षित करना चाह रही थी। इसी प्रकार समाचार एजेंसियों की अनिवार्यता को लेकर कहा जा सकता है। अक्‍सर देखा गया है कि वेब मीडिया के आ जाने के बाद से कई अखबार अपने समाचार पत्र में खबरों की पूर्ति इनसे सीधे कर लेते हैं। इन खबरों के निर्माण में जो श्रम, समय और धन उस संस्‍था का लगा है, उसका पारिश्रमिक चुकाए बगैर समाचारों का उपयोग जैसे इन दिनों रिवाज सा बन गया था। एक तरफ दूसरे के कंटेंट को बिना उसकी अनुमति के उपयोग करना अपराध माना जाता है तो दूसरी ओर मीडिया जगत

में ऐसा होना आम बात हो गई थी। वास्‍तव में एजेंसी के माध्‍यम से सरकार की कोशिश यही थी कि सभी अखबार नियमानुसार समाचार प्राप्‍त करें और उन खबरों के एवज में कुछ न कुछ भुगतान करें, जैसा कि दुनिया के तमाम देशों में होता है । लेकिन इसका देशभर के कई अखबारों ने विरोध किया । आश्‍चर्य की बात उसमें यह है कि यह विरोध एक समाचार एजेंसी पर आकर टिक गया था। यहां कोई भी पीटीआई या यूएनआई का विरोध नहीं कर रहा था, विरोध करने वालों के पेट में दर्द था तो वह हिन्‍दुस्‍थान समाचार को लेकर था। इस एजेंसी को लेकर यही बातें आम थी कि यह एक विशेष विचारधारा की एजेंसी है। यहां समाचार नहीं विचारधारा मिलेगी और इन्‍हीं के लोगों की सरकार है इसलिए उन्‍होंने इस एजेंसी को डीएवीपी में मान्‍यता दी है। यानि की पैसा भी देना पड़ेगा और समाचार भी नहीं मिलेंगे, लेकिन क्‍या यह पूरा सत्‍य था ? जो हिन्‍दुस्‍थान समाचार की कार्यप्रणाली से पहले से परिचित रहे हैं वे जानते हैं कि इस संवाद समिति का सत्‍य क्‍या है। एक क्षेत्रीय न्‍यूज एजेंसी से जुड़े समाचार पत्र एवं अन्‍य लोग जैसा कि कई लोगों से चर्चा के दौरान पता चला कि नाम लेकर हिन्‍दुस्‍थान समाचार का खुला विरोध कर रहे थे। कम से कम उन्‍हें पहले इसके इतिहास की जानकारी कर लेनी चाहिए थी ।

हिन्‍दुस्‍थान समाचार 1948 से देश में कार्यरत है। पीटीआई को जब देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल ने विधिवत शुरू किया था, उसके पहले ही यह संवाद समिति मुंबई से अपना कार्य अंग्रेजी के साथ भारतीय भाषाओं में आरंभ कर चुकी थी। यह आज भी देश में सबसे ज्‍यादा भारतीय भाषाओं में समाचार देने वाली बहुभाषी न्‍यूज एजेंसी है। इस एजेंसी के खाते में कई उपलब्‍धियां दर्ज हैं। यह हिन्‍दी और भारतीय भाषाओं में सबसे पहले दूरमुद्रक टेलीप्रिंटर निर्माण कराने वाली संवाद समिति है। चीन का आक्रमण हो या अन्‍य विदेशी घुसपैठ से लेकर देश की ग्रामीण जन से जुड़ी बातें यदि किसी एजेंसी ने सबसे ज्‍यादा और पहले देश के आमजन से जुड़ी सूचनाएं सार्वजनिक की हैं तो यही वह एजेंसी है। आज भी इस संवाद समिति का अपना संवाददाताओं का एक अखिल भारतीय और व्‍यापक नेटवर्क है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू से लेकर श्रीमती इंदिरा गांधी के समय तक हिंदुस्‍थान समाचार को केंद्र व राज्‍य सरकारों द्वारा लगातार न्‍यूज एजेंसी के रूप मान्‍यता दी जाती रही है। यहां तक कि कई कांग्रेसी एवं अन्‍य विचारधाराओं वाले नेता समय-समय पर इससे जुड़े रहे। मध्‍यप्रदेश कांग्रेस के अध्‍यक्ष अरुण यादव के पिता स्‍व. सुभाष यादव भी कभी हिंदुस्‍थान समाचार बहुभाषी सहकारी संवाद समिति  के अध्‍यक्ष रह चुके हैं। संवाददाताओं के स्‍तर पर भी देखें तो किसी पत्रकार की अपनी विचारधारा कुछ भी रही हो, यदि उसमें पत्रकारिता के गुण हैं और वह मीडिया के स्‍वधर्म को जानता है, तो बिना यह जाने कि वह किस विचारधारा से संबद्ध है, हिंदुस्‍थान समाचार ने उसे अपने यहां बतौर संवाददाता से लेकर केंद्र प्रमुख एवं अन्‍य महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारियां सौंपने में संकोच या भेदभाव नहीं किया।

डीएवीपी ने हिन्‍दुस्‍थान समाचार को केवल इसलिए ही अपनी सूची में नहीं डाल लिया होगा कि इसकी विशेष विचारधारा से नजदीकियां होने की चर्चाएं आम हैं। सभी को यह समझना ही चाहिए कि समाचार में कैसा विचार ? क्‍यों कि एक समाचार तो समाचार ही होता है, और देश, दुनिया के समाचार देना प्रत्‍येक संवाद समिति का रोजमर्रा का कार्य है।  वास्‍तव में विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय ने पीटीआई, यूएनआई के साथ हिन्‍दुस्‍थान समाचार को इसलिए अपनी सूची में लिया क्‍योंकि यह एजेंसी प्रिंट के लिए दी जाने वाली समाचार सामग्री में सबसे ज्‍यादा क्षेत्रीय खबरों को नियमित प्रसारित करती है और वह भी कई भाषाओं में । यह भी सरकार के समय-समय पर निर्धारित किए गए नियमों का पालन करती है, मजीठिया वेतन आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार अपने कर्मचारियों को वेतन देती है और नियमित कर्मचारियों का पीएफ काटने से लेकर अन्‍य निर्धारित मापदंडों को पूरा करती है।

ऐसे में क्‍या उन तमाम समाचार एजेंसियों को अपने गिरेबान में नहीं झांकना चाहिए जो अपने कर्मचारियों के हित में न तो किसी वेज बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू करती हैं और न ही सभी को कर्मचारी भविष्‍य नि‍धि का लाभ देती हैं।

देखा जाए तो विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) को आज अखबारों की तरह ही यह तय कर देना चाहिए कि न्‍यूज एजेंसी के लिए हमारे यहां सूची में पंजीकृत होने के लिए क्‍या नियम होने चाहिए, जिनकी कि पूर्ति की जाना अपरिहार्य रहे। डीएवीपी ने अभी हाल ही में इस मामले को लेकर ‘ मुद्रित माध्‍यमों के लिए भारत शासन की विज्ञापन नीति-2016 में संशोधन’ किया है, उसमें उसने लिखा है कि समाचार पत्र पीआईबी एवं प्रेस कॉन्‍सिल ऑफ इंडिया से मान्‍यता प्राप्‍त किसी भी न्‍यूज एजेंसी के ग्राहक बन सकते हैं। यहां सीधा प्रश्‍न विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) से आज क्‍यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि आपने यह जो नया निर्देश निकाला है, विरोध इसका नहीं, लेकिन क्‍या उन्‍होंने उन तमाम संवाद एजेंसियों का निरीक्षण करा लिया है जो अब इस निर्देश के नाम पर अखबारों को अपनी सदस्‍यता देंगे। क्‍या यह तमाम समाचार एजेंसियां समय-समय पर पत्रकारों के हित में बनाए गए भारत सरकार नियमों और आयोगों के निर्देशों का पालन कर रही हैं। इन्‍होंने अपने यहां क्‍या मजीठिया बेज बोर्ड के नियमों का अक्षरक्ष: पालन किया है। यदि पीटीआई और यूएनआई के साथ हिन्‍दुस्‍थान समाचार केंद्र सरकार के सभी नियमों का पालन करती है,  तो क्‍यों नहीं अन्‍य संवाद समितियों को भी उन नियमों को स्‍वीकार करना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं कर रहीं तो उन्‍हें किस आधार पर विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी)  अपनी सूची में शामिल करने के लिए तैयार हो गया ? 

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फ्री-टू-एयर चैनलों को विज्ञापनों के लिए निर्धारित समय सीमा से मुक्त करेगी सरकार

सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि सरकार फ्री-टू-एयर (एफटीए) चैनलों को विज्ञापन समय की सीमा के नियम से मुक्त करना चाहती है। इस संबंध में जल्दी ही आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। सरकार का ये निर्णय उन न्यूज़, म्यूज़िक व क्षेत्रीय ब्रॉडकास्टरों के लिए खुशखबरी है जो विज्ञापन समय की सीमा थोपे जाने के कारण सरकार और भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) के साथ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
 
जावड़ेकर ने केबल टीवी डिजिटलीकरण के तीसरे व चौथे चरण के लिए बनी टास्कफोर्स की पहली बैठक के दौरान कहा, “हम जल्दी ही एफटीए चैनलों को 12 मिनट की विज्ञापन सीमा के नियम से मुक्त करने का फैसला लेंगे। लेकिन पे चैनलों को विज्ञापन समय सीमा के नियम का पालन करना होगा। इस फैसले से मैं उन्हें (पे चैनलों को) फ्री होने के लिए प्रोत्साहित कर रहा हूं।”
 
जावड़ेकर ने कहा कि वे पे चैनलों पर विज्ञापन सीमा लगाने के पक्ष में हैं, पे-चैनलों को ग्राहकों पर विज्ञापनों की अधिक बमबारी नहीं करनी चाहिए। उन्होने कहा कि ग्राहक चैनल के लिए दाम अदा करा करें और साथ ही विज्ञापन भी देखने को मजबूर हों ये उचित नहीं है। ब्रॉडकास्टर अधिक विज्ञापन चला सकते हैं लेकिन फिर उन्हें अपने चैनलों को ग्राहकों के लिए मुफ्त कर देना चाहिए।
 
केबल टीवी नेटवर्क नियम (सीटीएनआर) 1994 में निर्धारित विज्ञापन संहिता के अनुसार, “कोई भी प्रोग्राम प्रति घंटे 12 मिनट से ज्यादा के विज्ञापन नहीं चलाएगा जिसमें प्रति घंटे 10 मिनट के कमर्शियल विज्ञापन और 2 मिनट के चैनल के खुद के प्रोग्रामों के प्रमोशनल विज्ञापन हो सकते हैं।” एफटीए ब्रॉडकास्टर मांग करते रहे हैं कि उन्हें विज्ञापन समय की सीमा वाले नियम से बरी कर देना चाहिए क्योंकि खुद को टिकाने के लिए विज्ञापन आय पर ही निर्भर हैं, जबकि पे ब्रॉडकास्टरों को सब्सक्रिप्शन आय भी मिलती है।
 
गौरतलब है कि सरकार को एफटीए चैनलों को विज्ञापन समय की सीमा से मुक्त करने के लिए केबल टीवी नेटवर्क नियम (सीटीएनआर) 1994 में संसोधन करना होगा।
 
न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) और कुछ म्यूज़िक व क्षेत्रीय चैनलों में विज्ञापन सीमा के नियम को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दे रखी है। इस पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने ट्राई को आदेश दिया था कि वो अंतिम फैसला आने तक याचिकाकर्ताओं के खिलाफ जबरदस्ती कोई कदम न उठाए। हाल ही में यह मामला 20 नवंबर तक टाल दिया गया है।
 
ट्राई ने सेवा की गुणवत्ता (टेलिविज़न चैनलों पर विज्ञापन की अवधि) संशोधन विनियमन, 2013 को 20 मार्च 2013 को अधिसूचित किया था। इसके बाद से विज्ञापन समयसीमा का नियम 1 अक्टूबर 2013 से लागू हो गया। स्टार इंडिया, ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ज़ेडईईएल), वायाकॉम18 और मल्टी स्क्रीम मीडिया जैसे ब्रॉडकास्टर बाकायदा इसका पालन कर रहे हैं।

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हिन्दुस्तान की उदारता, अमर उजाला के विज्ञापन को ख़बर बना के छापा

hindustan MK

हिन्दुस्तान में छपी ख़बर

गलाकाट व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के बीच क्या एक अखबार किसी दूसरे अखबार की विज्ञापन योजना को प्रोत्साहित कर सकता है? कतई नहीं। लेकिन 9 अक्टूबर को हिन्दुस्तान में छपी एक खबर को इस का उदाहरण कहा जा सकता है।

खबर फिरोजाबाद जिले के शिकोहाबाद से छपी है। ये खबर अमर उजाला के दीवावली विज्ञापन धमाका योजना के अंतर्गत है। इसी दिन ये खबर अमर उजाला में भी लगी है। अपने विशिष्ट विज्ञापनदाताओं की सेल को प्रमोट करने के लिए अमर उजाला में विज्ञापन के साथ खबरें भी छापी जा रही हैं। पेड न्यूज जैसी यह खबरें विज्ञापन परिशिष्ट के पेज पर इस तरह से छापी जा रही हैं कि आम खबर पढ़ने वालों को दिक्कत न हो।

लेकिन हिन्दुस्तान की उदारता और हिम्मत काबिल-ए-तारीफ़ है। उसने एक पेड न्यूज को एक मासूम खबर की तरह छाप दिया है। खबर के कंटेंट वही हैं जो अमर उजाला में हैं और फोटो पूरा का पूरा वही है। अंतर सिर्फ इतना है कि हिन्दुस्तान ने खबर में से अमर उजाला का नाम हटा दिया है।

कई बार विज्ञापन की विषयवस्तु को खबर बना कर छापने के उदाहरण मिलते हैं लेकिन यह तभी संभव होता है जब संस्थान का विज्ञापन तंत्र अनदेखी की सीमा पर टहलकदमी कर रहा हो। या संपादक के विभाग ने साथी विभाग का बेड़ा गर्क करने का अभियान चला रखा हो।

मगर यह खबर और आगे का उदाहरण पेश करती है। सिर्फ विज्ञापन की विषयवस्तु को ही नहीं बल्कि विरोधी अखबार के विज्ञापन अभियान को ही खबर में छाप दिया है। ऐसे में इस अखबार के प्रबन्धन की दृष्टि पर कुछ कहना आसान हो सकता है।

दरअसल फिरोजाबाद में पिछले कुछ समय से हिन्दुस्तान में विज्ञापन को लेकर लचर और खींचतान का माहौल बना हुआ है। काम करने वाले लोग असंतुष्ट हैं। बताते हैं स्ट्रिंगरों की शिकायत रहती है कि उनके विज्ञापन सम्बन्धी काम को ऊपर से कोई तवज्जो नहीं मिल रही है।

amar ujala MK

अमर उजाला के दीवावली विज्ञापन धमाका योजना के अंतर्गत छपी ख़बर

 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

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