सफलता के मुहावरे गढ़ते हैं आईआईएमसीएन… कभी इश्क़ की बात कभी खबरों से मुलाक़ात…

Amarendra A Kishore : बात की शुरुआत करने के पहले राजकमल प्रकाशन परिवार को बधाई– आज उसकी प्रकाशन यात्रा के ६६ वर्ष पूरे करने पर। जब भी किसी बड़े पुरस्कार या सम्मान की घोषणा होती है तो अमूमन भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) का नाम उभर कर सामने आता है– चाहे गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार की बात हो या रामनाथ गोयनका सम्मान की– आईआईएमसी एक अनिवार्यता बन जाता है।

यह सुखद संयोग है कि हाल ही में जब रामनाथ गोयनका सम्मान की घोषणा हुई तो उसमें पांच नाम ऐसे थे जिन्होंने पत्रकारिता की शिक्षा भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) में पूरी की थी। आज एक ख़ास अवसर है। इस साल का राजकमल प्रकाशन सृजनात्मक गद्य सम्मान रवीश कुमार की गुलाबी कृति ‘इश्क़ में शहर होना’ को देने की घोषणा हुई है। रवीश भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के छात्र रह चुके हैं। आज से ३ साल पहले इसी मंच पर मुझे भी सम्मानित होने का अवसर मिला था, मेरी कृति “बादलों के रंग हवाओं के संग” के लिए। इसलिए आज एक बार फिर से आईआईएमसी सम्मानित हो रहा है। आईआईएमसी में सहपाठी होने के नाते मेरी ओर से रवीश को बहुत सारी बधाई। राजकमल प्रकाशन पुरस्कार निर्णायक समिति को साधुवाद– जिन्होंने एक आईआईएमसीएन की कृति को सम्मान के योग्य एक बार फिर से समझा। रविश लगातार इश्क़ की दास्ताँ लिखते रहें, मेरी शुभ कामनाएं। बाकी बातें रवीश तुमसे मिलकर।

अमरेंद्र किशोर के फेसबुक वॉल से.

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अर्नब गोस्वामी पत्रकारिता छोड़ने का फैसला कर चुके थे, मुंबई ने उन्हें रोक लिया!

Nadim S. Akhter :  Times Now वाले अर्नब गोस्वामी को मैं पसंद करता हूं. आप उन्हें अच्छा कहें या बुरा कहें या जो कहें, मुझे लगता है कि तमाम सीमाओं के बावजूद (एक बार फिर दोहरा रहा हूं, बाजार और सियासत की तमाम सीमाओं के बावजूद) वो अपना काम शिद्दत से कर रहे हैं. हां, अफसोस तब होता है जब रवीश कुमार के अलावा हिंदी चैनलों में मुझे अर्नब जैसा passionate एक भी पत्रकार नहीं दिखता.

अर्नब मुझे पसंद हैं क्योंकि मुझे उनमें FIRE दिखता है जो कि पत्रकारिता के लिए बहुत जरूरी है. हालांकि मुझे भी मेरे कई बॉसेज कह चुके हैं कि तुममें बहुत FIRE है, संभल कर, कहीं अपना हाथ ही ना जला बैठो लेकिन मुझ जैसे “FIRE PERSONALITY” (अपने मुंह मियां मिट्ठू भी समझ सकते हैं) को भी जब अर्नब में आग दिखती है तो या तो ये मेरी समझ बहुत कम है या फिर ये एक सच्चाई है. खैर, अभी अर्नब का एक लंबा भाषण सुना, जिसमें उन्होंने अपने पत्रकारीय जीवन के कुछ -राज- खोले और पत्रकारिता पर अपने विजन की चर्चा की. सोचा कि आप लोगों से भी शेयर करूं. तो पहली बात ये कि

1. अर्नब गोस्वामी ने वर्ष 2003 में पत्रकारिता छोड़ने का फैसला कर लिया था लेकिन Times Group के मालिकों ने जब उन्हें चैनल लॉन्च करने के लिए मुंबई में समुद्र किनारे टहलते हुए उन्होंने अपना फैसला बदल दिया.

2. अर्नब मुंबई को देश का मीडिया हब बनाना चाहते हैं यानि नोएडा की फिल्म सिटी को खाली करके सारा तामझाम मुंबई में शिफ्ट कराना चाहते हैं.

3. उनके अनुसार मुंबई से पत्रकारिता ईमानदारी से की जा सकती है क्योंकि तब आप दिल्ली के नेताओं को टाल सकते हैं और फालतू की चमचागीरी-सोशल सर्कल को avoid कर अपना पूरा फोकस खबर के कंटेंट और उसकी निष्पक्षता पर लगा सकते हैं.

4. अर्नब आज जो कुछ भी हैं, सिर्फ और सिर्फ मुंबई शहर की वजह से हैं. अगर ये शहर ना होता तो आज अर्नब गोस्वामी भी ना होते….

5. एक सबसे महत्वपूर्ण बात, जो मुझे खटक रही है, वो ये कि अर्नब पत्रकारिता के बेसिक उसूल यानी basic principle को बदलना चाहते हैं. संभव हो तो उसे जमीन में दफ्न करना चाहते हैं. और ये मूलभूत सिद्धांत है खबरों में Objectivity यानी निष्पक्षता बनाए रखने का यानी खबर में views, opinions या विचार मिक्स नहीं करने का.

अर्नब कहते हैं कि मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद उन्होंने दिल्ली में सीखा ये उसूल हमेशा के लिए दफ्न कर दिया है. उनके अनुसार पत्रकार अगर सही-गलत के बीच में खड़ा होकर ये कहे कि मैं तो सिर्फ फैक्ट बताऊंगा, बाकी पाठक-दर्शक पर छोड़ दूंगा तो वह अपने पेशे से न्याय नहीं कर रहा है. पत्रकार को स्टैंड तो लेना ही होगा और वो लेते हैं. अर्नब के अनुसार पत्रकारिता में इस बदलाव की बहुत जरूरत है और news के साथ reporter का view दिखाना जरूरी है.

अब सोचिए कि अगर संघ या कांग्रेस या वाम समर्थक कोई पत्रकार अपनी खबर में view दिखाने लगे, स्टोरी प्लांट करने लगे तो भारत की पत्रकारिता किस ओर जाएगी?? मुझे लगता है कि समान्य परिस्थितयों में पत्रकार को -विचार- बताने से अलग ही रखना चाहिए. हां, जैसे मुंबई हमले के समय भी क्योंकि ऐसा ना हो कि -देशभक्ति- के चक्कर में आपकी किसी खबर से किसी का ऐसा बुरा हो कि उसका पूरा जीवन ही बर्बाद हो जाए. खैर ये डिबेट का विषय तो है ही.

और आखिरी बात जो अर्नब ने कही. वो ये कि मुंबई से जल्द दी दुनिया को बीबीसी और सीएनएन को टक्कर देने वाला एक हिन्दुस्तानी अंग्रेजी चैनल मिलने वाला है. और हम दुनिया भर में टीवी न्यूज इंडस्ट्री की परिभाषा बदल कर रख देंगे.

खैर, पूरे भाषण के दौरान कुछ कर गुजरने की अर्नब की छटपटाहट मुझे अच्छी लगी. यही तो है अर्नब की कामयाबी का राज

नोटः पत्रकारिता के विद्यार्थियों (जो हम सब आज भी हैं) को अर्नब का ये लम्बा भाषण जरूर सुनना चाहिए क्योंकि यह उनका News Hour शो नहीं है. इससे आप को पता चलेगा कि अर्नब ऐसे क्यों हैं और टाइम्स नाऊ ऐसा क्यों है.

और एक सवाल मेरे मन में भी है. क्या हम हिंदी में भी टाइम्स नाऊ के तेवर और कलेवर वाला चैनल ला सकते हैं. अगर हां, तो उस दिन देश के टेलिविजन इतिहास में एक नई क्रांति का जन्म होगा.

देखिए, अर्नब का पूरा भाषण.

https://www.youtube.com/watch?v=JBV_FK_x7t8

युवा और तेज-तर्रार पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से. नदीम कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

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पत्रकार अमित आर्य का मीडिया सलाहकार और पत्रकारिता छात्र शैलेश तिवारी का धर्मगुरु बनना….

अभिषेक श्रीवास्तव


Abhishek Srivastava : मुझे याद है कि एक गोरे-चिट्टे, सम्‍भ्रान्‍त से मृदुभाषी सज्‍जन थे जो आज से करीब 12 साल पहले बीएजी फिल्‍म्‍स के असाइनमेंट डेस्‍क पर काम करते थे। तब इसका दफ्तर मालवीय नगर में हुआ करता था और Naqvi जी उसके हेड थे। मैं तब प्रशिक्षु के बतौर असाइनमेंट पर रखा गया था। मैं तो ख़ैर 21वें दिन ही असाइनमेंट हेड इक़बाल रिज़वी से झगड़ कर निकल लिया था, लेकिन वे सम्‍भ्रान्‍त सज्‍जन इंडस्‍ट्री में बुलेट ट्रेन की तरह आगे बढ़ते गए। बाद में वे इंडिया टीवी गए, इंडिया न्‍यूज़ हरियाणा के हेड हुए और लाइव इंडिया हरियाणा के हेड बने।

आज पता चला कि वे अचानक हरियाणा के मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के ”मीडिया सलाहकार” बन गए हैं। उनका नाम अमित आर्य है। जागरण की साइट पर आज इस आशय की एक ख़बर है जिसमें उन्‍होंने हिमाचल की छात्र राजनीति में एबीवीपी के अपने अतीत को इस फल का श्रेय दिया है और जेपी नड्डा को ससम्‍मान याद किया है। संयोग से आज ही हरियाणा पुलिस ने मीडिया को भर हिक पीटा है। सोच रहा हूं कि ”सिर मुंड़ाते ओले पड़ना” का उदाहरण क्‍या इससे बेहतर कुछ होगा?

अच्‍छे दिनों की ऐसी कहानियां चारों ओर बिखरी पड़ी हैं। मसलन, आज शाम एनडीटीवी इंडिया के पैनल पर जो लोग बाबा प्रकरण पर जिरह करने बैठे थे, उनमें एक के नाम के नीचे परिचय लिखा था ”धर्म गुरु”। इस शख्‍स का नाम है आचार्य शैलेश तिवारी, जो भारतीय जनसंचार संस्‍थान यानी IIMC का कुछ साल पुराना हिंदी पत्रकारिता का छात्र है। पत्रकारिता पढ़ कर पांच साल में धर्म गुरु बन जाना हमारे देश में ही संभव है। ज़ाहिर है, अच्‍छे दिनों का असर रवीश कुमार जैसे ठीकठाक आदमी पर भी पड़ ही जाता है, जिन्‍होंने प्राइम टाइम पर अपनी रनिंग कमेंट्री के दौरान आज मार खाने वाले पत्रकारों के नाम गिनवाते हुए ”एबीपी” चैनल को ‘एबीवीपी” कह डाला। बहरहाल, जितने पत्रकारों को आज मार पड़ी है, उनमें मुझे इंडिया टीवी, ज़ी न्‍यूज़ और इंडिया न्‍यूज़ का कोई व्‍यक्ति नहीं दिखा। किसी को पता हो तो नाम ज़रूर गिनवाएं।

Abhishek Srivastava : ‘पाखी’ पत्रिका के दफ्तर में साढ़े तीन घंटे तक चले अपने सामूहिक साक्षात्‍कार के दौरान कुमार विश्‍वास ने दिल्‍ली के खिड़की एक्‍सटेंशन और सोमनाथ भारती वाली कुख्‍यात घटना का जि़क्र करते हुए अफ्रीकी नागरिकों को ‘नीग्रो’ कहकर संबोधित किया। जब मैंने इस पर प्रतिवाद किया, तो उन्‍हें अव्‍वल यह बात ही समझ में नहीं आई कि आपत्ति क्‍यों की जा रही है। तब मैंने उन्‍हें एक और उदाहरण दिया कि कैसे कमरे में प्रवेश करते वक्‍त उन्‍होंने अपूर्व जोशी को ‘पंडीजी’ कह कर पुकारा था। इस पर वे कुछ बैकफुट पर तो आए, लेकिन अपने इन जातिसूचक और नस्‍लभेदी संबोधनों पर उन्‍होंने कोई खेद नहीं जताया। यह प्रकरण प्रकाशित साक्षात्‍कार में गायब है। ऐसे कई और सवाल हैं, प्रतिवाद हैं जिन्‍हें संपादित कर के हटा दिया गया। ज़ाहिर है, इतने लंबे संवाद से कुछ बातें हटनी ही थीं लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें भी हटा दी गईं जिनसे कुमार विश्‍वास के एक रचनाकार, राजनेता और सार्वजनिक दायरे की शख्सियत होने के कारणों पर शक़ पैदा होता हो।

अपने देश-काल की औसत और स्‍वीकृत सभ्‍यता के पैमानों पर कोई व्‍यक्ति अगर खरा नहीं उतरता, तो यह बात सबको पता चलनी ही चाहिए। ऐसा इसलिए क्‍योंकि जो लोग लिखे में ‘पॉपुलर’ का समर्थन कुमार विश्‍वास की पूंछ के सहारे कर रहे हैं, उन्‍हें शायद समझ में आए कि दरअसल वे अंधेरे में अजगर को ही रस्‍सी समझ बैठे हैं। ‘पॉपुलर’ से परहेज़ क्‍यों हो, लेकिन कुमार विश्‍वास उसका पैमाना कतई नहीं हो सकते। मेरा ख़याल है कि अगर साढ़े तीन घंटे चले संवाद की रिकॉर्डिंग जस का तस सार्वजनिक की जाए, तो शायद कुछ धुंध छंटने में मदद मिले। जो प्रश्‍न औचक किए गए लग रहे हैं, जो बातें संदर्भहीन दिख रही हैं और कुमार को जो ”घेर कर मारने” वाला भाव संप्रेषित हो रहा है, वह सब कुछ पूरे साक्षात्‍कार के सामने आने के बाद परिप्रेक्ष्‍य में समझा जा सकेगा। उसके बाद पॉपुलर बनाम क्‍लासिकी पर कोई भी बहस विश्‍वास के समूचे व्‍यक्तित्‍व को ध्‍यान में रखकर और उन्‍हें इससे अनिवार्यत: बाहर रखकर की जा सकेगी।

युवा मीडिया विश्लेषक और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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रवीश कुमार को मिलेगा छत्रपति सम्मान-2014

साहित्यिक संस्था संवाद, सिरसा द्वारा छत्रपति सम्मान-2014 एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार को दिया जाएगा। सम्मान समारोह शहीद पत्रकार छत्रपति की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में 22 नवम्बर को आयोजित किया जाएगा। इस संबंध में ‘संवाद’ की एक बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता ‘संवाद’ के अध्यक्ष परमानंद शास्त्री ने की। इस संबंध में संस्था के सचिव डा. हरविंद्र सिंह ने बताया कि पत्रकार रामचंद्र छत्रपति 21 नवम्बर को शहीद हुए। उनकी स्मृति में ‘संवाद’ द्वारा छत्रपति सम्मान प्रत्येक वर्ष देश की किसी महान शख्सियत को दिया जाता है।

इस बार सम्मान समारोह का आयोजन 22 नवम्बर को होगा। समारोह में एनडीटीवी इंडिया के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार को छत्रपति सम्मान-2014 दिया जाएगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता बठिंडा के केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. चमन लाल करेंगे। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के लिए स्थान का निर्धारण शीघ्र ही कर लिया जाएगा। इसके अलावा बैठक में विभिन्न सदस्यों को कार्यभार सौंपा गया।

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व छत्रपति सम्मान से ब्रिटेन में भारत के पूर्व राजनयिक एवं चिंतक पत्रकार कुलदीप नैयर, प्रख्यात लेखक विष्णु नागर, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नाटककार एवं रंगकर्मी प्रो. अजमेर सिंह औलख, ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त मूर्धन्य साहित्यकार प्रो. गुरदयाल सिंह को नवाजा जा चुका है। बैठक में ‘संवाद’ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष हरभगवान चावला, लेखराज ढोट, डा. राम जी, गुरबख्श मोंगा, अंशुल छत्रपति, पूर्व सरपंच शिवराम सिंह, राजकुमार शेखूपुरिया आदि मौजूद थे

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जीपी भगत यानि आदमी होने की सर्वोच्च अवस्था : रवीश कुमार

रवीश कुमार

: चल गईलू नू बड़की माई : सुबह सुबह ही दफ्तर पहुंच गया। कहीं से कोई धुन सवार हो गया था कि इस स्टोरी को आज ही करनी है। दिल्ली फरीदाबाद सीमा पर मज़दूरों की विशालकाय बस्तियां बसी हैं। हम जल्दी पहुंचना चाहते थे ताकि हम उन्हें कैमरे से अचेत अवस्था में पकड़ सके। अखबारों में कोई विशेष खबरें नहीं थीं कि आज वृद्धोंं के लिए कोई दिन तय है। टाइम्स आफ इंडिया में एक खबर दिखी जिसे कार में जल्दी जल्दी पढ़ने लगा। इतने प्रतिशत वृद्ध हैं। उतने प्रतिशत अकेले रहते हैं तो फलाने प्रतिशत गांव में रहते हैं तो चिलाने प्रतिशत शहर में। अपोलो अस्पताल से आगे धूल धूसरित मोहल्ले की तरफ कार मुड़ गई। वृद्ध आश्रम का बोर्ड दिखने लगा। शूटिंग ठीक से हो इसलिए पहले ही मोबाइल फोन बंद कर दिया। कभी करता नहीं पर पता नहीं आज क्यों बंद कर दिया।

सड़े गले शौचालय के पीछे का वृद्ध आश्रम। निम्नतम मध्यमवर्गीय इलाका। नियो मिडल क्लास नामकरण गरीबों के साथ धोखा है। जिसके पास किसी तरह से स्कूटर या कूलर आ जाए और उसके पास कच्चा पक्का सा मकान हो हमने उसे गरीब कहना छोड़ दिया है। नियो मिडिल क्लास कहते हैं ताकि लगे कि गरीबी खत्म हो गई है। मगर इनकी गरीबी उन पैमानों से भी खूब झांकती है। खैर मैं आश्रम के  बड़े से दरवाज़े को ठेलते हुए अंदर आता हूं। जो देखा ठिठक गया। बहुत सारे वृद्ध। बेहतरीन साफ सफाई। डिमेंशिया और अलज़ाइमर के शिकार वृद्धों को नहलाया जा रहा था। फर्श की चमाचम सफाई हो चुकी थी। सबको कुर्सी पर बिठाया गया था। इज्जत और प्यार के साथ। कैमरा लगातार रिकार्ड किये जा रहा था।

इस संस्था के संस्थापक जी पी भगत कुछ दिन पहले दफ्तर आए थे। कहा कि आपको सम्मानित करना चाहते हैं। मैंने यूं ही पूछ लिया कि काम क्या करते हैं। सुना तो कहा सम्मान छोड़िये। बहुत मिल चुका सम्मान, अब उस तरफ देखने का मन भी नहीं करता। आपका काम अच्छा है तो कभी आऊंगा मगर बताकर आऊंगा। मैं गया बिना बताये। शायद यही वजह है कि उस जगह की कुछ गहरी छाप पड़ गई। तिरासी के साल में जे एन यू से कंप्यूटर साइंस में एम फिल करने वाले जी पी भगत ने अपनी जिंदगी बुजुर्गों के लिए लगा दी है। वो उनका पखाना और पेशाब अपने हाथों से साफ करते हैं। उनके साथ काम करने वाले भी हाथ से साफ करते हैं। भगत ने बताया कि कई बुजुर्ग तो ऐसी अवस्था में दिल्ली की सड़कों से मिले कि उनमें कीड़े पड़े हुए थे। उन्हें उठाकर लाना, नहाना, साफकर दवायें लगाना ये सब करते करते एक बुजुर्ग के पीछे साल गुज़र जाते हैं तब वे कुछ सम्मान जनक स्थिति में पहुंच पाते हैं। फिर तो उसके बाद अनुभवों का जो पन्ना खुलते गया मैं सुन सुनकर नया होने लगा। जो कुछ भी भीतर बना था वो सब धाराशाही हो गया।

भगत बताये जा रहे थे। जितिन भुटानी का कैमरा रोल था। हमारे सहयोगी सुशील महापात्रा की आंखें भर आ रही थीं। मैं खुद हिल गया। फर्श की सफाई किसी अच्छे अस्पताल से भी बेहतर की गई थी। सबको प्यार से डायपर पहनाकर कुर्सी पर बिठा दिया गया था।  दो चार लोग दिल्ली के घरों से फेंक दिये गए, कुछ बुजुर्ग भटक कर लापता हो गए।  मैंने त्याग और करुणा का सर्वोच्च रूप देखा। भगत ने कहा कि लोगों को घिन आती है। पखाना पेशाब साफ करने में। इसलिए सड़कों पर छोड़ देते हैं। अस्पताल के बाहर छोड़ देते हैं। कई बुजुर्ग तो इस अवस्था में भी मिले कि उनके अंगूठों पर नीली स्याही के निशान ताज़े थे। ऐसा कई केस आ चुका है। संपत्ति के दस्तावेज़ पर अंगूठा लगवाकर इन बुजुर्गों को लोग फेंक देते हैं। स्याही सूखने का इंतज़ार भी नहीं किया।  कई लोग तो फोन कर छोड़ देते हैं कि दस बारह हज़ार का महीना ले लो लेकिन अपने पास रख लो। भगत ने कहा कि मैं काफी समझाता हूं कि अपने पास रखिये फिर उनके सामने कड़ी शर्तें रखता हूं कि मिलने नहीं दूंगा मगर कोई यह नहीं कहता कि दूर से भी देख लेने देना। मां बाप को छोड़ कर जाते हैं तो दोबारा नहीं आते। एक बेटी से कहा कि फिर नहीं आओगी तो उसने कहा मंज़ूर है। फिर कहा कि देखो अगर तुम्हारी मां गुज़र गईं तो अंतिम संस्कार भी नहीं करने दूंगा तो उस पर भी वो मान गई। ऐसे तमाम बेटों की कहानी है कि पता चल गया कि मां बाप यहां हैं। कोई लंदन है कोई लुधियाना तो कोई अफसर मगर कोई लेने नहीं आता।

भगत के पास समाज की जो हकीकत है वो न तो ओबामा के पास है न मोदी के पास न किसी पत्रकार के पास। उनका अनुभव बोले जा रहा था। बुजुर्ग औरतें और पुरुष भगत और उनके सहयोगियों को बहुत प्यार करते हैं। सोहन सिंह को हिन्दू महिला सोहन कहती है तो मुस्लिम हैदर। सोहन ने बताया कि जो नाम याद आता है इन्हें बुला लेती हैं। भगत ने कुर्सी पर कोने में दुबके पांडे जी से कहा कि ये सिर्फ केला खाते हैं। मैंने कहा कि ये कैसे पता चला। तो कहने लगे कि महीनों तजुर्बा करते करते समझ आ गया। जो डिमेंशिया या अलज़ाइमर  के मरीज होते हैं  उन्हें अपने बच्चों के नाम याद रह जाते हैं। पोते पोतियों के नाम याद रह जाते हैं। जाति याद नहीं रहती मगर धर्म याद रहता है और हां स्वाद याद रहता है। इसलिए बाकी लोग स्वादिष्ट दलिया और हार्लिक्स पी रहे हैं मगर पांडे जी केला खा रहे हैं। आश्रम के सेवक कुछ औरतों को खैनी खिला रहे थे। कहा कि इसकी आदत है नहीं दो तो रोने लगती हैं।

भगत ने अमीरी गरीबी का भी भेद खोल दिया। कहा कि कई अमीर हैं जो अपने मां बाप की खूब सेवा करते हैं। तब पता चलता है जब वे उनके गुजरने के बाद महंगी मशीने और डायपर लेकर आते हैं। दान देने के लिए। मगर अमीर ही अपने मां बाप को सड़कों पर छोड़ देते हैं। हां लेकिन गरीब अपने मां बाप को नहीं फेंकता है। वो सेवा कर लेता है। कहा कि दान मांग कर और खुलकर मांग कर इनकी सेवा करता हूं। ऐसा हिसाब लगा रखा है कि पैसा बचेगा ही नहीं। बचने से समस्या पैदा होती है। मैंने खुद देखा। बेहतरीन साफ सफाई के साथ खाना बन रहा था। सबको अच्छे कपड़े दिये गए थे। हैदर ने बताया कि एक बार  घिन आ गई तो किसी बुजुर्ग के पखाने को ब्रश से साफ कर दिया। भगत जी तो भगाने लगे कि भागो यहां से। ब्रश से जख्म हो जाएगा। हाथ से साफ करो। अब सामान्य ही लगता है सबकुछ।

उस आश्रम में अनगिनत किस्से हैं। हर किस्सा आपको गिरा कर नए सिरे से खड़ा कर देता है। भगत जी ने कहा कि हम सबका धर्म के हिसाब से संस्कार करते हैं। हज़ार लोगों का अंतिम संस्कार कर चुका हूं। अब तो मेरे पास चार आदमी हैं मगर जब यह काम शुरू किया था तब अपने हाथ से उठाकर मृत शरीर को गली के बाहर तक ले जाता था। मुझे तो हिन्दू मां भी बेटा कहती है तो मैं हिन्दू हो गया, मुस्लिम मां भी बेटा कहती है तो मुसलमान हुआ जब मां मुसलमान है तो बेटा भी मुसलमान हुआ, ईसाई मां ने बेटा कहा तो ईसाई हो गया। उनकी इस बात ने छलका दिया मुझे। हम किन वहशी लोगों के गिरफ्त में आ जाते हैं। धर्म पहचान कर अलग कर देते हैं। आश्रम की तख्ती पर कुरान की आयतें, गुरु नानक देवजी, ईसा मसीह के बगल में दुर्गी जी, कबीर,रविदास जी।  सब एक साथ। ये होती है इंसानियत की इबादत। इंसानों को भगवान मानकर सेवा की तब भगवान एक से लगने लगे।

जो देखा खुद को काफी भरोसा देने वाला था। भगत ने कर के दिखाया है। उनके नब्बे साल के पिता ने कहा कि मैं नहीं भी रहा तो भगत के मां बाप हमेशा दुनिया में रहेंगे। इतने लोग  इसे बेटा बेटा कहते हैं तो कभी होगा ही नहीं कि इसकी कोई मां नहीं होगी, इसका कोई पिता नहीं होगा। मैं नहीं रहूंगा तो क्या हुआ। इस कहानी ने भीतर तक तर कर दिया। सहयोगी सुशील बहुगुणा ने कहा कि फुटेज देखकर रोना आ गया। मैं यही सोचता हुआ दफ्तर से निकला कि इसे कहते हैं आदमी होने की सर्वोच्च अवस्था जब आप पखाने में उतरकर उसकी सेवा कर दें। कार में बैठा ही था कि कई मिस्ड काल नज़र आने लगे तो सुबह आए होंगे। सूचना मिली कि मेरी अपनी बड़की माई गुज़र गईं हैं। दो बुजुर्गों की दुनिया में बंट गया। हमारे बाबूजी को बहुत प्यार करती थी, कहती थीं मेरा देवर होता तो ये कर देता वो कर देता। छठ के समय बड़किया का बनाया रसियाव आज तक याद है। बचपन की स्मृतियों का आधार है। कसार अब नहीं खा सकेंगे। वो चली गई। इस वक्त जब मैं यह लिख रहा हूं मेरे बड़े भैया उन्हें अग्नि दे चुके हैं। बता रहे थे कि हम सब घाट पर हैं। अगर भगत से नहीं मिला होता तो इस खबर से मैं टूट जाता । मगर भगत के माता-पिता की कहानी सुनकर लगता है कि मेरी बड़किया किस्मत वाली है। उसकी बहू ने खूब सेवा की, बेटे ने भी की।  संपन्न बेटी- दामादों ने की या नहीं मालूम नहीं। किया ही होगा। बिना जाने कुछ नहीं कहना चाहिए मगर भगत की बातें सुनकर बिना जाने यकीन भी नहीं होता। अपने रिश्तेदारों से न के बराबर संपर्क रखता हू। भगत का स्केल देखकर ऐसा लग रहा था कि हमने भी अपने बाबूजी की कम सेवा की। मां की कम सेवा करता हूं। मुझे लगता है कि बहुत ख्याल रखता हूं मगर कोई भगत के भाव की बराबरी नहीं कर सकता है।

बड़का बाबूजी भी कमज़ोर हो गए हैं। दोनों एक दूसरे को खूब प्यार करते हैं। चंद दिनों पहले पटना के अस्पताल में बड़किया भरती थीं। उन्होंने मेरी भाभी से कहा कि तुम लोग हमको जिया दोगे आ बेतिया में हमार बुढऊ के कुछ हो जाई त। ले चलो वहां। बेतिया में बड़का बाबूजी ने खाना बंद कर दिया था कि मेरी बुढ़िया को पटना ले गए हैं। नहीं बच पाई तो। क्या लव स्टोरी है। आज बड़किया का देवर बहुत याद आ रहा है।

एनडीटीवी इंडिया के चर्चित एंकर और पत्रकार रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

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पीएम, सीएम, डीएम और लोकल थानेदार को बचा लेना, बाकी किसी के भी खिलाफ लिख देना

आज से 35 साल पहले जब आज के ही दिन मैने अखबार की नौकरी शुरू की तो अपने इमीडिएट बॉस ने सलाह दी कि बच्चा पीएम, सीएम, डीएम और लोकल थानेदार को बचा लेना। बाकी किसी के भी भुस भरो। पर वह जमाना 1979 का था आज का होता तो कहा जाता कि लोकल कारपोरेटर, क्षेत्र के एमएलए और एमपी के खिलाफ भी बचा कर तो लिखना ही साथ में चिटफंडिए, प्रापर्टी दलाल और मंत्री पुत्र रेपिस्ट को भी बचा लेना। इसके अलावा डीएलसी, टीएलसी, आईटीसी और परचून बेचने वाले डिपार्टमेंटल स्टोर्स तथा पनवाड़ी को भी छोड़ देना साथ में पड़ोस के स्कूल को भी और टैक्सी-टैंपू यूनियनों के खिलाफ भी कुछ न लिखना। हां छापो न गुडी-गुडी टाइप की न्यूज। पास के साईं मंदिर में परसाद बटा और मां के दरबार के भजन। पत्रकारिता ने कितनी तरक्की कर ली है, साथ ही समाज ने भी। सारा का सारा समाज गुडी हो गया।  

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आज बहुत दिनों बाद एनडीटीवी प्राइम टाइम में रवीश कुमार दिखे। अच्छा लगा। रवीश अपने विषय पर पूरी स्टडी करते हैं और कहीं भी नहीं लडख़ड़ाते। इसी तरह उनकी टीम भी उम्दा होती है। अभय कुमार दुबे हिंदी के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जिनकी जिनकी जमीनी समझ लाजवाब है। अभय जी के अपने कुछ पूर्वाग्रह हो सकते हैं पर इसमें कोई शक नहीं कि अभय जी राष्ट्रीय राजनीति को समझने में निष्णात हैं। वे हर जटिल से जटिल समस्या का भी ऐसा समाधान पेश कर देते हैं कि लगने लगता है अरे ऐसा तो सोचा ही नहीं था। आज भी उन्होंने महाराष्ट्र में भाजपा के ढोल की पोल खोल दी। भाजपा लगातार एक देश एक जाति एक धर्म की बात करती है जबकि भारत जैसे बहुजातीय, बहुधर्मी और बहु संस्कृति वाले देश में ऐसा नामुमकिन है। यही कारण है कि भाजपा अपनी पूरी ताकत लगाकर भी महाराष्ट्र में मोदी के व्यक्तित्व को तेज हवा में भी नहीं बदल सकी। इतने धुंआधार प्रचार के बावजूद कोई ऐसी लहर नहीं पैदा कर सकी कि बहुमत के करीब तक पहुंच पाती। उसे जो भी सीटें मिली हैं वे मोदी की सोच और तैयारी के मुकाबले बहुत कम हैं। यहां तक कि वह लोकसभा में जो सीटें जीती थी वह भी नहीं जीत पाई। नीलांजल मुखोपाध्याय और संजय कुमार भी अपनी बात ढंग से रख सके तथा भाजपा कोटे से आर बालाशंकर भी और भाजपा के प्रच्छन्न चिंतक सुधींद्र कुलकर्णी भी। आज रवीश के आने पर प्राइम टाइम देखा और उनकी टीम का वाक् कौशल सुनकर अच्छा लगा। कल से लगातार टीवी पर विश्लेषण हो रहे हैं लेकिन 50 मिनट के इस कार्यक्रम से ही पता चला कि हकीकत क्या है बाकी में तो प्रवचन ही चल रहा था।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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