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मेरी थाईलैंड यात्रा (3) : …अपमान रचेता का होगा, रचना को अगर ठुकराओगे

कोरल आईलेंड की यात्रा से पहले थाईलेंड के बारे में कुछ बातें कर ली जाय. हवाई अड्डे से ही लगातार नत्थू की एक इच्छा दिख रही थी कि वो अपने देश के बारे में ज्यादा से ज्यादा हमें बताये. शायद इसके पीछे उसकी यही मंशा रही हो कि हम जान पायें कि केवल एक ही चीज़ उसके देश में नहीं है, इसके अलावा भी ढेर सारी चीज़ें उनके पास हैं जो या तो हमारी जैसी या हमसे बेहतर है. बाद में यह तय हुआ कि जब-जब बस में कहीं जाते समय खाली वक़्त मिलेगा तो थाईलैंड के बारे में नत्थू बतायेंगे और मैं उसका हिन्दी भावानुवाद फिर दुहराऊंगा. उस देश के बारे में थोड़ा बहुत पहले पायी गयी जानकारी और नत्थू की जानकारी को मिला कर अपन एक कहानी जैसा तैयार कर लेते थे और उसे अपने समूह तक रोचक ढंग से पहुचाने की कोशिश करते थे. नत्थू तो इस प्रयोग से काफी खुश हुए लेकिन ऐसे किसी बात को जानने की कोई रूचि साथियों में भी हो, ऐसा तो बिलकुल नहीं दिखा. उन्हें थाईलैंड से क्या चाहिए था, यह तय था और इससे ज्यादा किसी भी बात की चाहत उन्हें नहीं थी. खैर.

कोरल आईलेंड की यात्रा से पहले थाईलेंड के बारे में कुछ बातें कर ली जाय. हवाई अड्डे से ही लगातार नत्थू की एक इच्छा दिख रही थी कि वो अपने देश के बारे में ज्यादा से ज्यादा हमें बताये. शायद इसके पीछे उसकी यही मंशा रही हो कि हम जान पायें कि केवल एक ही चीज़ उसके देश में नहीं है, इसके अलावा भी ढेर सारी चीज़ें उनके पास हैं जो या तो हमारी जैसी या हमसे बेहतर है. बाद में यह तय हुआ कि जब-जब बस में कहीं जाते समय खाली वक़्त मिलेगा तो थाईलैंड के बारे में नत्थू बतायेंगे और मैं उसका हिन्दी भावानुवाद फिर दुहराऊंगा. उस देश के बारे में थोड़ा बहुत पहले पायी गयी जानकारी और नत्थू की जानकारी को मिला कर अपन एक कहानी जैसा तैयार कर लेते थे और उसे अपने समूह तक रोचक ढंग से पहुचाने की कोशिश करते थे. नत्थू तो इस प्रयोग से काफी खुश हुए लेकिन ऐसे किसी बात को जानने की कोई रूचि साथियों में भी हो, ऐसा तो बिलकुल नहीं दिखा. उन्हें थाईलैंड से क्या चाहिए था, यह तय था और इससे ज्यादा किसी भी बात की चाहत उन्हें नहीं थी. खैर.

नत्थू द्वारा बतायी गयी ढेर सारी जानकारियों में से कुछ का जिक्र पहले आ चुका है शेष यह कि थाईलैंड मोटे तौर पर एक ग्राम प्रधान, कृषि प्रधान देश है. यहां की 70 प्रतिशत जनता खेती पर ही आश्रित है और लगभग इतने ही प्रतिशत लोग गांवों में निवास करते हैं. बकौल नत्थू इस देश को ‘दुनिया का रसोई’ कहे जाने का गौरव प्राप्त है. यहां से चावल, मक्का, गन्ना समेत अनेक कृषि उत्पाद और फल आदि अमेरिका, जापान आदि देशों तक को निर्यात किये जाते हैं. इन्हें इस बात की प्रसन्नता है कि दुनिया के कई देशों तक ये अपना कृषि उत्पाद पहुचाते हैं. थाईलैंड में लगभग सभी नागरिक शिक्षित हैं. ख़ास कर शहरी इलाकों में ऐसा शायद ही कोई हो जिसने स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त नहीं की हो.

यह वृत्तांत लिखते समय नेट से इन आंकड़ों को क्रॉस चेक भी करते जा रहा हूं तो लगभग नत्थू के बताये सारे तथ्य और आंकड़े सही साबित हो रहे हैं. नेट बता रहा है कि 92 प्रतिशत की साक्षरता दर तो थाईलैंड ने दस वर्ष पहले 2005 में ही हासिल कर लिया था. उस देश की प्रति व्यक्ति आय 14000 डॉलर है, इंटरनेट की तरफ कातर निगाहों से देख रहा हूं और वह बता रहा कि हमारी प्रति व्यक्ति आय कूथ-काथ कर अभी 1610 डॉलर तक पहुच पाया है. आश्चर्य यह कि बावजूद इसके चाहे थाई एयर की उड़ान हो या भारतीय कंपनियों की, थाईलेंड से भारत आने वाले या वहां वापस जाने वाले सभी ऐसे विमानों में शत-प्रतिशत भारतीय ही मिलेंगे आपको. यानी किसी थाई नागरिक को इस बात की गरज नहीं है कि वह भारत आये. हम ही वहां जा-जा कर अपना सब कुछ वहां निवेश कर आते हैं, अपनी गरीबी के बावजूद. खैर.

नत्थू आगे बताये जा रहे थे कि इस देश के हर व्यक्ति तक स्वास्थ्य सेवा मुफ्त है. बेहतर सुविधा प्रात सभी सरकारी और निर्दिष्ट अस्पतालों में दवाओं के साथ इलाज मुफ्त किया जाता है. थाईलैंड मोटे तौर पर स्त्री प्रधान देश है. यहां नर-नारी अनुपात लगभग बराबर है. वयस्क स्त्रियों की संख्या इस देश में पुरुषों से ज्यादा है. यह भी कि लिंग आधारित किसी भी तरह का भेदभाव करना यह देश नहीं जानता है. घर में बच्ची का पैदा होना यहां समान या ज्यादा आनंद का विषय होता है. वहां के निवर्तमान प्रधानमंत्री यिंकगल शिवानात्रा का भ्रष्टाचार, उसके द्वारा विभिन्न निर्माण प्रोजेक्टों में की गयी धांधली, ठेके में रिश्वत, रिश्तेदारों आदि को प्रश्रय आदि की कहानी और उसके कारण लोगों में फैले रहे असंतोष की कथा वह गाइड बताते जा रहा था और लगा जैसे ये भारत की कहानी सुनाने लगा हो. बक़ौल नत्थू ‘भारतीय नाम वाले सेनाध्यक्ष- प्रयुथ चान ओछा’ ने अंततः शिवानात्रा का तख्तापलट किया और देश में सब खुश हुए इससे. राजा ‘रामा नाइन’ की संवैधानिक अध्यक्षता में सेनाध्यक्ष ने सत्ता बेहतर तरीके से सम्हाल ली है. खैर.

होटल से वाकिंग डिस्टेंस पर ही पटाया का प्रसिद्द बीच था जहां से कुछ दूर घुटने भर तक पानी में पैदल जा कर फिर स्पीड बोट के सहारे कोरल आइलैंड तक की दूरी तय करने थी. इतना नज़दीक होते हुए भी इस बीच पर आने का यह पहला मौका था. कुछ देर रेत पर खड़ा-खड़ा ही महसूस कर रहा था, इमैजिन करने लगा लगभग पचास साल पहले के उस समय को जब मछुआरे के इस गांव में ‘पश्चिम’ ने दस्तक दी होगी. कैसा रहा होगा गरीब और पिछड़ा सा यह गांव जब वियतनाम युद्ध से थके-मांदे सौ अमेरिकन सैनिकों का जत्था यहां तक पहुचा था और फिर देखते ही देखते यह तटीय इलाका गर्म गोश्त के कारोबार में खुद को आसमान तक पहुचा आज इतने कम समय में ही दुनिया के सबसे फेवरेट गंतव्यों में से एक बन चुका है. कभी शायद मछुआरों की झोपड़ियां ही यहां रही होंगी जहां आज गगनचुंबी होटलों की श्रृंखला खड़ी हो गयी है. कभी मछली का शिकार करने वाले इन थाई लोगों के बच्चे आज खुद ही शिकार बने फिर रहे हैं, दुनिया भर से आये हवस के शिकारियों का.

स्पीड बोट रवाना हुआ रफ़्तार से. समुद्री हवाओं ने उमस से बेचैन हम सबको जरा राहत पहुचाई. लगभग बीस मिनट की सैर के उपरान्त बीच समुद्र में ही, दो-चार ज़हाजों को लंगर डालकर एक प्लेटफार्म जैसा बना दिया गया था जहां आप पेरासेलिंग कर सकते थे. एक हज़ार भारतीय रुपया में वहां आपको पैराशूट में बांध कर उसे एक तेज़ रफ़्तार बोट से जोड़ दिया जाता है. वह बोट उस प्लेटफार्म के चक्कर लगाता है और आप आकाश में उड़ते रहते हैं. चक्कर लगाते हुए आसमान में उड़े जा रहे थे कि अचानक लगा मानो बोट में कुछ खराबी आ गयी. धड़ाम से अपन पानी में गिरने लगे. करीब जंघा भर पानी में डूब जाने के बाद फिर से बोट ने रफ़्तार पकड़ी और कुछ देर के बाद फिर मैं जहां से उड़ा था वहीं सुरक्षित पहुंच गया था. एक्चुअली पानी में अकस्मात उतार देना भी इस खेल का सुनियोजित हिस्सा होता है ताकि इस खेल को भी ज़रा ज्यादा रोमांचक बनाया जा सके. हां, ऊंचाई से डरने वाले लोगों को ऐसे करतबों से परहेज़ ही करना चाहिए. आगे ज़रा और भयानक करतब वाला खेल इंतज़ार कर रहा था.

ऐसे ही आधा घंटा और समुद्र में भागते रहने पर एक ऐसा ही प्लेटफार्म मिला जहां आपको समुद्र की सतह तक भेजने की जुगत बिठाई गयी थी. यानी पहले वाले में आसमान के बाद अब पाताल तक पहुच जाना था आपको. आकाश से पाताल तलक, जल, थल और नभ तीनों की यात्रा एक ही घंटे में कर लेने का यह अनोखा अवसर तो था ही. यहां करीब 25 सौ रुपया खर्च कर आपको समुद्र की सतह पर उतरना था. पानी से दम घुटने के कारण ज़ाहिर है पहले तो मैंने मना किया था उस ‘स्कूबा डाइविंग’ करने को. लेकिन एक-एक कर युवाओं को पानी में उतरते और समुद्र में विलीन होता हुआ देख कर खुद को भी रोक नहीं पाया. बजाप्ता भीतर जाने की ट्रेनिंग दी गयी. यह पूछा गया कि अस्थमा या ह्रदय रोग तो नहीं है. अपन ने इंकार में सर हिलाते हुए सोचा, चलो सफल स्कूबा कर लेने पर ये तो पता चल जाएगा कि अपन इन दोनों रोग से मुक्त हैं.

करीब पचीस किलो भारी आक्सीजन वाला हेलमेट सर पर पहना कर पानी में अंततः धकेल दिया गया. आप ज़मीन पर अगर वैसा हेलमेट पहन कर दो कदम चलें तो शायद गर्दन टूट जाए लेकिन पानी के भीतर, हम जानते हैं कि वज़न का पता हमें नहीं चलता. ज़ाहिर है नीचे हम बात भी नहीं कर सकते सो किसी आपात स्थिति के लिए कमांड बता दिया गया था. अगर आप ठीक हैं तो अंगूठे और तर्ज़नी का गोला बनाते हुए आपको ऑल राइट का इशारा करना है. और अगर कोई दिक्कत हो, आप बाहर निकलना चाहें तो चार अंगुलियों को समेट कर बस अपने अंगूठे को बार-बार ऊपर की ओर दिखाना है. पानी में जाते ही ऐसी घबराहट हुई, ऐसा दम घुटा कि क्या कहें. बार-बार बाहर ले जाने का कमांड देते रहने पर भी पानी के मौजूद दो-दो गाइडों में से कोई भी ऊपर ले जाने को तैयार नहीं हुआ. उस कुछ क्षण में जीवन और ज़मीन का महत्व समझ में आया. सचमुच ढेर सारी ऐसी नेमतें हमें सहज प्राप्त हो गयी है, जिसका महत्त्व हमें पता भी नहीं चलता. क्षण भर को भी उन सुविधाओं से हमें महरूम कर दिया जाय, तब पता चलता है कि क्या होती हैं वे चीज़ें. हवा, पानी, भोजन, ज़मीन, परिवार, देश, नागरिकता……! खैर.

शायद उस गाइड को मालूम था कि मैं सुरक्षित हूं, बस डर और घबराहट के कारण बाहर निकलने के लिए इतना बहाना कर रहा हूं. अतः अंततः उसने समुद्र की सतह पर ले जा कर धकेल ही दिया. कुछ क्षण सुस्ताने के बाद लगा कि ऑक्सीजन की आपूर्ति भी सामान्य हो गयी है. फिर गाइड के बताये रास्ते पर चलने लगा समुद्र पर बिलकुल ज़मीन जैसा. तरह-तरह की मछलियों के झुण्ड, अजीब-अजीब समुद्री जीवों, शैवाल, शायद मोती वाले सीप, समुद्री वनस्पति आदि को देखते-देखते चल रहे थे. डर भी रहे थे की कहीं ऊपर से अकस्मात आक्सीजन आना बंद हो गया तो क्या होगा. फिर भी टहलते-टहलते ही वक्त गुजारना था. बीच में उन लोगों ने अपने हाथ में अजीब सी वस्तु थमा कर उसे मसल कर फेकने का इशारा किया. यंत्रवत अपन फेकने लगे मसल कर उस स्पंज जैसी चीज़ को. आह … वो मछली के लिए कुछ खाने लायक चीज़ थी. उसे लपकने हज़ारों मछलियां इस तरह आपकी परिक्रमा करने लगती है जिसका वर्णन करना मुश्किल है. कितना लाज़वाब होती हैं मछलियां न? ये अलग बात है कि ‘मुझे मछलियां पसंद हैं’ ज़मीन पर यह कहने का मतलब होता है कि मछलियां खाना आपको पसंद है. गोया किसी व्यक्ति के प्रति हम पसंदगी ज़ाहिर करें तो उसका अर्थ उन्हें खा जाना हो. पूरे नियत जगह पर आपको घुमा देने के बाद स्टील की एक सीढ़ी के पास ले जाकर उस सीढ़ी का पाईप पकड़ा कर ऊपर की ओर धकेल दिया जाता है. शेष कार्य खुद पानी ही कर लेती है. कुछ देर तक यंत्रवत सीढ़ी दर सीढ़ी फलांगते आप कुछ क्षण में ऊपर ज़मीन पर होते हैं. उस सीढ़ी के माध्यम से ऊपर की ओर उठते हुए यही सोच रहा था कि रावण स्वर्ग तक जैसी सीढ़ी का निर्माण करना चाह रहा था, वह कुछ इसी तरह का होता शायद. खैर, जान बची तो लाखों पाए, लौट के बुद्धू फिर आगे कोरल आईलेंड की तरफ जाए.

बोट निकल पड़ा आगे की ओर. ज़मीन से घंटे भर दूर यानी बीच समुद्र की ताज़ी हवाओं का फेफड़ा भर-भर पान करते हुए आगे बढ़े. नत्थू ने बताना शुरू किया कि आगे एक सुन्दर सा, छोटा सा आईलेंड मिलेगा. हम सब वहां घंटे भर रुकेंगे, घूमेंगे, मन हो तो स्वीमिंग करेंगे, खायेंगे-पीयेंगे फल-फूल, समुद्र उत्पाद आदि. लेकिन वहां यह चेतावनी भी साथ ही दे दी गयी कि ‘बूम-बूम’ की फरमाइश कोई नहीं करे. भाई लोग इस बात पर भी जरा निराश सा हो गए थे. यह बताना रह गया था कि समूचे थाईलेंड में ‘बूम-बूम’ शब्द सेक्स के लिए इस्तेमाल होने वाला कोड वर्ड है. यात्रा की शुरुआत में ही नत्थू ने यह ताकीद कर दी थी कि इस काम के लिए यही शब्द इस्तेमाल किया जाय. नत्थू के अनुसार यह कोई थाई या अंग्रेज़ी शब्द नहीं है लेकिन ‘सेक्स’ कहना बड़ा ही अभद्र लगता है, इसलिए हमारे यहां यह ज़रा डिसेंट कोड कहने की रीत बन गयी है. सचमुच, जिसे करने में किसी तरह का संकोच नहीं उसे कह देने भर में दुनिया भर की लाज ले आने का दोगलापन तो अपने देश में भी कम कहां है. क्या हुआ अगर ज़रा सा हमारी तरह ही थाईलेंड भी संकोची हो गया तो.

ज़रूरत से ज्यादा लंबा और शायद उबाऊ होते जा रहे इस यात्रा वृत्तांत को अब समेट लेना ही उचित है. कहने को अभी भी ढेर सारी बातें हैं लेकिन मोटी-मोटी दो-चार बातों के साथ यह सभा समाप्त की जाय. दो घंटे बाद उस द्वीप से वापसी हुई. अपने लोगों द्वारा समय का सम्मान न करने की परंपरा समूचे यात्रा में शर्मसार करता रहा. इस आईलेंड की उमस भरी गर्मी में भी घंटे भर के बदले दो घंटे से ज्यादा समय बर्बाद कर भाई लोग वापस आये. तबतक हम जैसे दो-तीन लोग तपती रेत पर कुर्सी लगा कर बैठे हुए उन साहबों का इंतज़ार करते रहे. यह समस्या विदा होने से लेकर वापस पहुंचने तक कायम रही. समय के पालन का आग्रह करते हुए नत्थू द्वारा हर बार मुस्कुरा देने पर ऐसा लगता जैसे कलेजे में कोई तीर सा बींध दिया हो. सोच कर शर्म से गड़ जाता था कि आखिर मेरे देश के बारे में क्या सोचते होंगे ये लोग. कतार में खड़े होने में आनाकानी करने पर एयरपोर्ट पर किसी विदेशी ने टिप्पणी भी कर ही दी थी हमलोगों को देख कर कि ये भारतीय कभी नहीं सुधर सकते. ऐसी ढेर सारी नागरिक बोध की कमी महसूस करते हुए यात्रा करना एक तरह की यातना को ही आमन्त्रण करने जैसा होता है. जैसे होटल के स्वीमिंग पूल में नग्नप्राय एक विदेशी जोड़ा को देख कर एक बुजुर्ग मित्र धड़ाधड़ मोबाइल से फोटो लेने लगे थे. उसके बाद तो इतनी फटकार पड़ी उन्हें की पूछिए मत. बड़ी मुश्किल से वो भारी जुर्माना अदा करने से बच पाए. हालांकि ‘देश’ तो ऐसे हर कारनामों का जुर्माना भरता ही है, अपनी छवि को ज़रा सा और खराब कर. लेकिन साथ चल रहे ग्लोबल टूर एंड ट्रेवेल एजेंसी के मनोज राठौर का धैर्य ही एक राहत थी जिसके सहारे सबको झेलते हुए भी हंसी-मजाक द्वारा सफ़र आसान और आरामदायक बना हुआ था.

कोरल से वापसी हुई. लॉबी में बैठ कर पहली बार मोबाइल को ज़रा वाय-फाय से कनेक्ट किया था कि दिल्ली से घबराई हुई सी एक मित्र का wattsap पर सन्देश चमका. तुम सब ठीक तो हो न? चिंता का सबब पूछने पर पता चला कि बैंकॉक में भीषण आतंकी हमला हुआ है. निशाने पर विदेशी पर्यटक ही हैं और विस्फोट की श्रृंखला जारी है. तीन से चार मिनट पहले ही हुआ था वह हमला और हमारा तेज़ चैनल झटपट परोस चुका था खबर सारे देश को. जबकि मेरे होटल की लॉबी में सभी टीवी स्क्रीन पर कोई मनोरंजक कार्यक्रम चल रहा था, सभी गेस्ट उसका आनंद उठा रहे थे. समूचे पटाया को तबतक पता नहीं था कि पहली बार उनके इस प्यारे देश पर भी आतंक ने दस्तक दी है. उस लेखिका मित्र को धन्यवाद के साथ अपनी खैरियत बताते हुए पत्नी को watsap पर ही कॉल किया. कनेक्ट हो जाने पर चन्दा को बता दिया कि कुछ देर बाद तुम चिंतित होने वाली थी जब पता चलता कि थाईलेंड पर आतंकी हमला हुआ है. सो हम सब बिलकुल ठीक हैं, किसी का फोन आये तो उन्हें भी यही बता देना. आशंका सही निकली. कुछ ही देर बाद सभी रिश्तेदारों-परिवारजनों का फोन चन्दा के पास घनघनाने लगा था. वह सबको हमारी खैरियत बताती जा रही थी, जो वापस आने पर पता चला.

लेकिन पटाया बिलकुल आम दिनों की तरह ही मशगूल था. अलबत्ता पहली बार दो-चार बार पुलिस सायरन की गूंजती आवाज़ सुनाई दी. अमूमन सायरन क्या, कोई भी हॉरन आप कभी थाईलेंड में (या किसी भी सभ्य देश में) सड़क पर कभी नहीं सुनेंगे. हम भारतीयों के लिए ही मोटर का हॉरन संगीत की तरह है अन्यथा सभ्य हो गए देशों में इसे असभ्यता समझा जाता है. पटाया के वाकिंग स्ट्रीट में भी चहल-पहल कायम थी लेकिन पश्चिमी लोगों की भीड़ ज़रूर ज़रा कम हो गयी थी जिन्होंने अपने होटल के कमरे में न्यूज़ देख लिया होगा, वे कमरे से बाहर नहीं निकल पाए थे. शेष सब सामान्य था.

पटाया का वाकिंग स्ट्रीट भी उस शहर का एक हॉट डेस्टिनेशन है. या यूं भी कह सकते हैं कि वह पटाया की पहचान भी है. शहर के बीच पर आप खड़े हो जायें और उत्तर की ओर एक तरफ समुद्र और दूसरी ओर अट्टालिकाओं-बाजारों, और बीच में लड़कियों-अर्द्ध लड़कियों सबको निहारते चलते चले जाय तो कुछ किलोमीटर के बाद ही एक बड़ा सा गेट दिखेगा. उसी में भीतर की सड़क ‘वाकिंग स्ट्रीट’ के नाम से जाना जाता है. बिलकुल लॉस वेगास की तर्ज़ पर उस एक सड़क पर ही ‘सबकुछ’ परोस दिया गया है. वहां गाड़ियों का जाना प्रतिबंधित है. आप टहलते हुए घूमिये, लुभाइये, लोभित होइए, मज़े लीजिये, ठगाइये, लुटाइए… ऐसी बरबादियों का हर सामान वहां सुन्दर तरीके से मौजूद है. साथ के एक मित्र की चमचमाती चेन उनके गले से कब गायब हो गयी, पता ही नहीं चला. पता चलने पर दुःख मनाने के बजाय हम सब ठठा-ठठा कर हंस पड़े. सहानुभूति सी हो आयी उस लुटेरिन पर क्यूंकि आभूषण नकली था.

लेकिन यह प्रसन्नता ज्यादे समय तक कायम नहीं रह पायी. भोजन करने जिस होटल में गए थे वहां से निकल कर मनोज राठौर बाहर खड़े थे, कुछ लोगों का खाना भीतर चल ही रहा था. अकस्मात दो सुन्दरी (या अर्द्ध सुन्दरी यानी शी-मेल भी हो सकती है) स्कूटी पर आयी. मनोज से बिलकुल लिपटने-चिपटने लगी. उनके चश्मे से खेलने लगी, देह से भी. इस अकस्मात घटना का वह आनंद लें या आक्रमण से डरें ऐसा जबतक मनोज तय कर पाते तबतक उनके गले से हार तोड़कर वह दोनों चम्पत हो गयी थी. कुछ देर तक पीछा करने की भी कोशिश हुई, लेकिन गली-गली से परिचित उन लुटेरों का पीछा कर पाना किसी परदेसी के लिए कहां संभव था. इस बार चेन असली थी. यात्रा के दौरान सबको लुटेरों से हमेशा सचेत करते रहने वाले मनोज खुद ही लुट गए थे. एक्चुअली चेन के साथ किसी मुल्युवान रत्न का लॉकेट भी था, जिसे हमेशा धारण किये रहने की ताकीद के कारण उसे उतारा नहीं गया था और पल भर में लाख रूपये के आसपास का नुकसान हो चुका था.

हमारा मत था कि पुलिस में रपट दर्ज होनी चाहिए. ज़रा धुंधला ही सही लेकिन सारा वाकया रेस्तरा के सीसीटीवी में भी दर्ज हो गया था. लेकिन संदेहास्पद ढंग से वह भारतीय रेस्तरा वाला, पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने से मना कर रहा था. उस दिन आतंकी हमले के कारण शायद पुलिस भी व्यस्त रही होगी और हमलोगों ने बीमा भी नहीं कराया था, अतः अंततः जो नुकसान हुआ उसे भूल आगे की तैयारी में हम सब जुट गए. यह ज़रूर वहां सबने तय किया कि आगे से कहीं भी जाने से पहले बीमा ज़रूर सब करा लेंगे. मनोज ने भी तय किया कि आगे से यात्रा पैकेज में ही बीमा को शामिल कर लेंगे. अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान हम सब एक लाख डॉलर का बीमा करा कर गए थे, मात्र कुछ हज़ार की प्रीमियम पर. ऐसा सभी को करना चाहिए हमेशा.  

वृत्तांत को समेटने से पहले एक और किस्सा. समूह का सबसे स्मार्ट एक लड़का अमूमन किसी भी सामूहिक योजना में शामिल नहीं हो पाता था. वह चुपके से किसी अनंत-अनजान की ओर निकल पड़ता था. यात्रा की समाप्ति वाली रात सबने तय किया कि आज इसका पीछा किया जाय कि आखिर यह जाता कहां है. जल्दी ही जेम्स बांडों को पता चल गया कि बगल के ही ‘पूल बार’ में उसने स्थायी ठिकाना बनाया हुआ है. वहां बीयर पीते हुए रात-रात भर वह ‘पूल’ (बिलियर्ड्स जैसा खेल) खेलता रहता है. उस शहर की रीत के अनुसार एक लडकी ज़ाहिर है हमेशा साथ देने के लिए तत्पर थी ही. वह लड़की थाईलेंड के मानदंडों के अनुसार औसत से भी कम सुन्दर थी, ठिगनी सी और ज़रा मोटी भी. जबकि बालक अपना बिलकुल छः फीट का छैल-छबीला. इतना स्मार्ट कि कई बार मुफ्त में ही साथ चलने का प्रस्ताव उसे वारांगनाएं दे देती थी. लेकिन अपने परिवार से बेहद प्यार करने वाला, अपनी बेटी के फोटो का गोदना हज़ारों खर्च कर अपनी बांह पर गुदा लेने वाला यह मित्र उस पूल वाली लड़की के ‘प्यार’ में खो गया था. अमूमन ऐसा पूल खेलते हुए आप साथ की लडकी के लिए वहां चार से छः सौ बाथ (हज़ार-बारह सौ रुपया तक) खर्च करते हैं.

वहां सारे मित्रों के एक साथ पहुचने पर मित्र ज़रा झेंप सा गया था. फिर एक दुसरे मित्र ने पूल खेलने देने की गुजारिश की. मित्र तो तैयार हो गया लेकिन लड़की टस से मस नहीं हुई. आश्चर्यजनक किन्तु सत्य कि मात्र पांच सौ बाथ में रात भर साथ देने वाली यह लड़की किसी भी कीमत पर मिनट भर के लिए उस मित्र को छोड़ने को राजी नहीं हुई. दूसरा लड़का बौखला कर 1 हज़ार बाथ से शुरू कर 7 हज़ार बाथ तक का प्रस्ताव उस लड़की को दिया लेकिन किसी भी मूल्य पर वह ‘मैदान’ छोड़ने या मित्र को छोड़ने को तैयार नहीं हुई. जहां अपने देश में सभ्य कहे जाने वाले समाज में भी आज के लड़के-लड़कियों के लिए रिश्ते खेल की मानिंद हो गए हों, वहां कोई विदेशी वारांगना का किसी परदेसी के प्रति इतना निष्ठावान हो जाना निश्चय ही बॉलीवुड की फिल्मों के लिए मसाला सा देता नज़र आ रहा था. सच भी है.. इंद्राणी मुखर्जियों से आहत हमारे समाज को तो अब रिश्तों का नजीर लेने भी कहीं दूर देश की सफर ही करनी ही होगी. भारत तो शायद अब रीता जा रहा है इन चीज़ों से.

अगले दिन ढेर सारी सुन्दर यादों को समेटे हम सब विदा हो गए पटाया से. दोपहर तक बैंकॉक. फिर अगले दिन रात को वापसी की फ्लाईट वाया कोलकता, रायपुर के लिए लेनी थी. बैंकॉक में भी ढेर सारे अच्छे अनुभव रहे लेकिन उन सबका विवरण देना कहीं न कहीं दुहराव जैसा ही होगा. वहां के जेम्स गैलरी की सैर, रत्नों के चकाचौंध को देखना सचमुच शानदार अनुभव था. खरीदना तो उस गैलरी में कुछ भी संभव नहीं था. 20 से 30 लाख रुपया तक खर्च कर आप वहां सामान्य खरीदारी ही कर सकते थे. अल्प प्रवास में ही वहां भी एक क्लब में जाना और सबसे बढ़ कर डिजनीलैंड की तर्ज़ पर बने वहां के एक पार्क में दिन भर रह कर, एक से एक कलेजा मूंह को आ जाने वाले करतबों को करते हुए, अपने-अपने बच्चों को मिस करना आदि वर्णन भी विस्तार की मांग करता है. लेकिन फ़िलहाल इस वृत्तांत को यहीं विराम देना उचित होगा. हां, जेम्स गैलरी के बाहर एक मित्र का हज़ार बाथ खो जाना और हमारे गाइड नत्थू द्वारा वह पैसा खुद की जेब से देने की जिद्द करना एक अनूठा और भावुक कर देने वाला अनुभव था. नत्थू का तर्क था कि चुकि हम सब उसका दायित्व हैं यहां, इसलिए पैसा गायब हो जाने का  जिम्मेदार वह है. ज़ाहिर है नत्थू से पैसा लेने से मित्र ने इनकार किया, ऐसा करना ही था. आगे हम सब निकल पड़े थे अपने वतन की ओर. नत्थू अंतिम छोर तक छोड़ने आया. इस तीन दिन में ही उसने एक रिश्ता सा बना लिया था हमलोगों से.

सुबह-सुबह हम सब कोलकाता पहुचे. अगली फ्लाईट तीन घंटे बाद थी. किसी ने बाहर जाने की इच्छा व्यक्त की तो झट से मेरे मूंह से निकल गया कि वीजा थोड़े है यहां जो अपन बाहर जायेंगे. फिर अपनी बेवकूफी पर खुद ही हंस पड़े थे हम. याद आ गया कि हम अब अपने देश में हैं. चार दिन में ही देश के बिना रहने का महत्त्व मालूम हो गया था. जहां आपको हर वक़्त अपनी पहचान अपने सर पर चिपकाए घूमना पड़ता है. अब तो अपनी माटी अपने लोगों के बीच में था. विमान फिर रायपुर के लिए उड़ान भर चुकी थी, यादों का पिटारा एक-एक कर खुलना शुरू हो चुका था, झपकी सी लग गयी थी.

…समाप्त…

इस यात्रा संस्मरण के लेखक पंकज कुमार झा छत्तीसगढ़ भाजपा की मैग्जीन ‘दीपकमल’ के संपादक हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है. पंकज बिहार के मिथिला इलाके के निवासी हैं. नौकरी भले ही भाजपा में करते हैं पर वक्त मिलते ही देश-विदेश की यात्राओं पर निकल पड़ते हैं, यायावर बन कर.


इसके पहले वाला पार्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करें:

मेरी थाईलैंड यात्रा (2) : …हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे!

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2 Comments

2 Comments

  1. मनीष मिश्रा

    September 19, 2015 at 1:57 pm

    इस वृत्तांत को पढ़ कर लखनउ से मनीष मिश्र जी लिखते हैं :-
    पंकज जी
    आपने थाईलैंड यात्रा का जिस तरह वर्णन किया है वो वाकई में काबिले तारीफ है। यात्रा वृत्तांत पढ़कर मैं चार साल पुरानी अपनी बैंकॉक/पटाया यात्रा की यादों में खो गया। हू-ब-हू ऐसी ही थी अपनी यात्रा। फर्क इतना था कि जब आप यात्रा पर गए थे तो वहां आतंकी हमले का साया था और जब मैं गया था तब बैंकॉक बाढ़ की त्रासदी झेल रहा था। मुझे लगता है कि इस यात्रा वृत्तांत के जरिए आपको कुछ सुझाव भी देने चाहिए थे। जैसे अगर आप पटाया या बैंकॉक जा रहे हैं तो क्या-क्या सावधानी बरतें? कौन-कौन से स्थान, क्लब, शो, बीच या रेस्ट्रां आप जरूर घूमें, या कहां आपको नार्थ इंडियन खाना बेहतर मिल सकता है?
    इसमें मैं आपकी कुछ मदद कर सकता हूं।
    1. सभी दोस्तों को मेरा सुझाव है कि ‘थाईलैंड तीर्थ यात्रा’ पर जाने से पहले अपने जेवरात खासकर सोने की चेन घर पर ही रख दें। साथ ही अन्य जेवरात अंगूठी वगैरह भी न पहन जाएं तो अति उत्तम
    2. बूम-बूम के लिए रोड साइड बालाओं से दूर ही रहें। खासकर सी-मैन से। ये सी-मैन आपके गले से चिपटकर सोने की चेन कब गायब कर देंगी आपको पता भी नहीं चलेगा।
    3. आप इसकी रिपोर्ट लिखाने थाने जाएंगे तो आपका स्वागत तो बेहतर तरीके से होगा। बिल्कुल प्राइवेट बैंक जैसा। घुसते ही आपको अपनी आवश्यकतानुसार मशीन से टोकन लेना पड़ेगा। फिर वेटिंग लॉबी में बैठकर अपनी बारी की प्रतिक्षा करनी पड़ेगी। काउंटर पर बैठे पुलिस अफसर को आप अगर आप अपनी इंग्लिश में बात समझा ले गए तो ठीक वर्ना आपको एक अंग्रेज के पास भेज दिया जाएगा जो आपकी बात को बेहतर तरीके से समझ कर थाई अफसर को उनकी भाषा में समझाएगा। फिर आपको एफआईआर सेल के पास भेजा जाएगा जो आपको थाई में लिखी रपट की कॉपी देगा। अगर आप क्लेम करने के लिए इसी अंग्रेजी भाषा में कनवर्ट कराना चाहते हैं तो इसके लिए 500 भाट का भुगतान करना पड़ेगा। बाद में यह गारंटी भी नहीं कि क्लेम मिलेगा या नहीं। क्योंकि वापस आने पर आपको बताया जाता है कि क्लेम आपके पर्सनल बिलांगिंग का नहीं था।
    4. शुद्ध शाकाहारी खाने के शौकीन लोगों के लिए यहां कई इंडियन रेस्टोरेंट हैं, इनमें सागर रत्ना प्रमुख है। कोरल बीच पर जाने के लिए जिस समुद्र तट से सफर शुरू होता है उस रोड के ठीक सामने भी एक इंडियन रेस्टोरेंट हैं जहां आप दाल-चावल, रोटी, सब्जी का आनंद ले सकते हैं।
    5. बियर और पानी की बोतल के रेट लगभग बराबर हैं लिहाजा आप डिपार्टमेंटल स्टोर से पानी की बोतल की पूरी कैरट खरीद कर होटल में रख सकते हैं।
    6. बिल्कुल ही घर के खाने के आदी हैं तो आप हल्दीराम के रेडीमेड फूड पैकेज लेकर जा सकते हैं जिसे होटल रुम के ओवन में गर्म करके आप जब चाहे खा सकते हैं।
    7. सस्ती दारु के लिए आप अपने इंटरनेशनल एयरपोर्ट की सेवाएं ले सकते हैं, शायद ये बात किसी को बताने की जरुरत नहीं।

    बाकी बातें याद आने पर…..

    मनीष मिश्र
    लखनऊ, उत्तर प्रदेश

  2. Arif Masih

    September 20, 2015 at 7:19 am

    झउआ बाबू बड़का मास्टर पीस निकले थाईलैंड बिना पत्नी के 🙄 , दूसरो का मजाक बना रहे हैं पक्का ई खुद भी वहां मजा लिये होंगे खिलवाओ इनसे बीबी बच्चों की कसम 😆 हम तो भइया दू बार गये मगर परिवार के साथ 🙁 🙁

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