विनोद मेहता पत्रकारों को पगार देने के नाम पर बेहद कंजूस थे लेकिन ‘एडिटर’ कुत्तों पर खूब खर्च करते थे

(स्व. विनोद मेहता जी)


Sumant Bhattacharya : विनोद मेहता की रुखसती का मतलब… मैं शायद उन चंद किस्मत वाले पत्रकारों में हूं, जिनका साक्षात्कार विनोद मेहता साहब ने लिया और पत्रकारिता के अपने स्कूल में दाखिला लिया। मैं हिंदी आउटलुक में था और हिंदी आउटलुक को नीलाभ मिश्र साहब देख रहे हैं। वो भी मेरे बेहद पसंदीदा और मेरी नजर में पत्रकारिता के बेहद सम्मानित, काबिल नाम हैं।

नीलाभ जी ने कहा, “आ जाना, विनोद साहब इंटरव्यू लेंगे।” मैंने पूछा, “क्या पूछ सकते हैं.?” .नीलाभ भाई ने कहा,” मुझे क्या पता..कुछ भी पूछ सकते हैं..” नीलाभ भाई का जवाब कतई इंसानियत वाला नहीं था और मुझे झंझावत में छोड़कर चल दिए।

हालांकि मैं जानता था कि यह महज रस्म अदायगी है और नीलाम साहब के चयन पर उनको सिर्फ मोहर लगानी है लेकिन नीलाभ भाई ने डरा भी दिया था, “वैसे तो मैं तुम्हें ले चुका हूं पर यदि उनको नहीं जमा तो मामला खत्म भी हो सकता है।”

हालांकि मैं इससे पहले प्रभाष जोशी, आलोक मेहता, शेखर गुप्ता सरीखे स्थापित नामों के साथ काम कर चुका था, खुद भी संपादक रह चुका था। फिर भी विनोद मेहता की छवि मेरे जेहन में एक ऐसे संपादक की थी जो तीखा बोलने, चंद पलों में फैसलों को बदलने में कोताही ना करने वाले शख्स की थी।

दिल्ली के सफदरजंग वाले ए-बी-10 दफ्तर में घुसा। ऊफर पहुंच कमरे में घुसा तो विनोद मेहता साहब कुर्सी पर विराजे हुए थे। सामने नीलाभ भाई बैठे हुए थे। विनोद मेहता साहब ने ऊपर से नीचे तक देखा। मुस्कराए। मुझे लगा कि यह बुड्ढा खामख्वाह मुस्करा रहा है, अभी गर्दन काटेगा मेरी।

फिर बोले, “अच्छा तुम बंगाली हो..? मेरी वाइफ भी बंगाली है।” मैं अवाक…। यह क्या सवाल हुआ.? .मामला तो काफी अपनापा वाला हो गया। फिर बोले, “नीलाभ ने मुझे सब बता दिया है..चलो काम करो।”

फिर रिवॉल्विंग चेयर पर घूमे और अपने डेस्कटॉप पर देखने लगे। नीलाभ भाई ने उठने का इशारा किया और हम दोनों बाहर निकल आए। मुझे अजीब सा लगा, ना उठने से पहले इजाजत ली गई ना ही विनोद साहब ने ही मीटिंग के खात्मे का कोई संकेत दिया। मुस्कराते हुए नीलाभ भाई ने कहा, “जब वो घूम जाएं तो समझ लो मीटिंग खत्म।” यह पहला साक्षात्कार था मेरा विनोद मेहता साहब से।
फिर तो उनके बारे में ना जाने कितनी ही बातें मालूम होती चली गई। कुछ नीलाभ भाई से तो कुछ आसपास गुजरते हुए।

विनोद मेहता साहब वो शख्स हैं जिन्होंने “डेबोनयर” का संपादन किया था। उन्होंने ही शुरू किया था। जिसे बेहद बोल्ड मैगजीन के तौर पर जाना गया। विनोद साहब ने अपने कुत्ते का नाम “एडीटर” रखा था। और पूछो तो वजह भी बताते थे। तीन वजहें थी, एक तो उनका कुत्ता किसी के नमस्कार का जवाब नहीं देता, दूसरे किसी को अपने अपने सामने कुछ नहीं समझता और तीसरे, उनके कुत्ते को भारी गलतफहमी थी कि उसे सब कुछ आता है। सो “एडीटर” नाम से दूसरा और क्या बेहतर हो सकता है..?

एक और वाकया, नीलाभ भाई ने बताया था। खान मार्केट में खाना खाने गए थे। खाना बेहद पसंद आया तो रेस्टोरेंट के बेवरेज मैनेजर को बुलाकर तारीफ की और अपना विजिटिंग कार्ड थमा दिया। मैनेजर ने कार्ड पढ़ा तो डर सा गया। विनोद मेहता साहब ने कुछ पल मैनेजर के चेहरे की ओर देखा और कहा. “डरो मत यंग मैन. मैं बिल का भुगतान करूंगा।”

विनोद मेहता साहब की एक और बेहद खूबी थी. वो पत्रकारों को पगार देने के नाम पर बेहद कंजूस थे। इस खूबी को नीलाभ भाई ने भी विरासत में बखूबी हासिल किया है। अलबत्ता काफी पैसा कुत्तों पर जरूर खर्च करते थे। सफदरजंग मार्केट में राजेंद्र ढाबा के सामने ही एबी-10 दफ्तर है। इस ढाबे का नॉनवेज काफी पसंद किया जाता है। ना जाने कितने ही प्लेट कबाव और चिकन बोटी कुत्तों को खिला दिया करते थे विनोद साहब।

पत्रकारिता में साफगोई और नैतिकता की शायद पराकाष्ठा थे विनोद मेहता साहब। मुझे कहीं से मालूम चला था कि एनडीए सरकार के दौर रहेजा भाइयों में से किसी एक ने विनोद साहब से गुजारिश की कि उनकी मीटिंग वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा से करा दी जाए। बदले में विनोद साहब ने साफ इनकार कर दिया। बहुत कम लोगों को पता होगा कि मुंबई के नामचीन “रहेजा बिल्डर” ही आउटलुक ग्रुप के मालिक हैं।

ऐसी ना जाने कितनी ही स्मृतियां लिए हुए है पत्रकारिता का संसार विनोद साहब के बारे में। मैं तो इस हिसाब से बेहद मामूली सा पत्रकार हूं। फिर भी मैं खुशनसीब हूं कि पत्रकारिता में मेरा साक्षात्कार लेने वालों में राजेंद्र माथुर. एसपी सिंह, प्रभाष जोशी और विनोद मेहता साहब रहे। आज इनमें से कोई इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनके मूल्य हैं. उनके स्थापित मानक हैं..जो लड़खड़ाती पत्रकारिता को थामे रखेगी…कम से कम उम्मीद तो कर ही सकता हूं कि जब कभी पत्रकारिता के मानकों की बात होगी तो इन व्यक्तित्वों को खारिज ना किया जा सकेगा।

नमन विनोद साहब…

सुमंत भट्टाचार्या

लेखक सुमंत भट्टाचार्या वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई बड़े अंग्रेजी और हिंदी के अखबारों-न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनसे संपर्क +91 9999011012 के जरिए किया जा सकता है.


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Comments on “विनोद मेहता पत्रकारों को पगार देने के नाम पर बेहद कंजूस थे लेकिन ‘एडिटर’ कुत्तों पर खूब खर्च करते थे

  • Hemant Tyagi says:

    ऐसे संपादक को क्यों याद किया जाए जो पत्रकारों को वेतन देने कंजूसी करता था और कुत्तों पर पैसे ज्यादा करता था।

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